tag:blogger.com,1999:blog-151259722009-07-11T00:07:02.443+05:30गीत कलशकाव्य का व्याकरण मैने जाना नहीं छंद आकर स्वयं ही संवरते गयेराकेश खंडेलवालhttp://www.blogger.com/profile/08112419047015083219noreply@blogger.comBlogger308125tag:blogger.com,1999:blog-15125972.post-13000282218534680552009-07-08T07:52:00.000+05:302009-07-08T07:52:00.361+05:30यह गीत आख़िर कौन गाता<strong><em><span style="color:#993399;">मौन सरगम की अधूरी रागिनी का हाथ थामे</span></em></strong><br /><strong><em><span style="color:#993399;">ज़िंदगी के तार पर यह गीत आख़िर कौन गाता </span></em></strong><br /><br /><strong><em><span style="color:#993399;">है अजानी सी किसी अनुभूति का यह स्पर्श कोमल </span></em></strong><br /><strong><em><span style="color:#993399;">गंध की बदरी उमड़ कर कर आई कोई वाटिका से </span></em></strong><br /><strong><em><span style="color:#993399;">पांखुरी को छु रही हो बूँद कोई ओस की ढल</span></em></strong><br /><strong><em><span style="color:#993399;">दूब में सिहरन कोई जागी हुई चंचल हवा से </span></em></strong><br /><br /><strong><em><span style="color:#993399;">जानने की कोशिशें आती नहीं हैं हाथ मेरे</span></em></strong><br /><strong><em><span style="color:#993399;">शिंजिनी में देह की है कौन आकर झनझनाता<br /><br />सूर्य की पहली किरण की दुधमुँही अंगड़ाई जैसा<br />बालपन से रह रही मन में किसी परिचित कथा सा<br />है उतरता दॄष्टि की अँगनाई में बन कर दुपहरी<br />घेर कर जिसको खड़ा है भोर से जैसे कुहासा<br /><br />बढ़ रही महसूसियत की खिड़कियों पर आ खड़ा हो<br />कौन है आकाश पर जो चित्र कोई खींच जाता<br /><br />दर्पणों पर झील के लिक्खा हवा के चुम्बनों ने<br />जलतरंगों ने जिसे तट की गली में आ सुनाया<br />धूप का सन्देश उलझा शाख की परछाईयों में<br />मोगरे ने मुस्कुरा जो रात रानी को बताया<br /><br />एक वह सन्देश जिसने केन्द्र मुझको कर लिया है<br />कौन है आ परिधि पर होकर खड़ा मुझको सुनाता</span></em></strong><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/15125972-1300028221853468055?l=geetkalash.blogspot.com'/></div>राकेश खंडेलवालhttp://www.blogger.com/profile/08112419047015083219noreply@blogger.com5tag:blogger.com,1999:blog-15125972.post-33349503745248725252009-06-29T07:25:00.000+05:302009-06-29T07:25:00.886+05:30नया ही प्रश्न पत्र लेकर आती हैदेते हैं हम नित्य परीक्षा, पीड़ाओं के अध्यायों की<br />और सांझ हर बार नया ही प्रश्न पत्र लेकर आती है<br /><br />टूटे हुए स्वप्न की किरचें चुनते चुनते छिली हथेली<br />पंथ ढूँढ़ते हुए पथों का, पड़े पांव में अनगिन छाले<br />पथरा गई दृष्टि अम्बर के सूने पन को तकते तकते<br />दीप शिखा ने स्वयं पी लिये हैं दीपक के सभी उजाले<br /><br />जब भी चाहा संकल्पों की काँवर को कांधे पर रख लें<br />शब्द भेद तीरों की यादें आकर दिल दहला जाती हैं<br /><br />मुरझा गये पुष्प परिचय के, छुईमुई से छूकर उंगली<br />रिश्तों के धागे कच्चे थे, तने जरा तो पल में टूटे<br />घिसी हथेली तो सपाट थी एक कांच के टुकड़े जैसी<br />असफ़ल हुई हिना भी चिन्हित कर पाती जो कोई बूटे<br /><br />चाहा तो था उगी भोर में नित हम कोई सूर्य जलायें<br />किन्तु उमड़ती बदली आकर फिर सावन बरसा जाती है<br /><br />समझौतों के समीकरण को सुलझाने में समय निकलता<br />एकाकीपन हिमपर्वत सा एक बून्द भी नहीं पिघलता<br />स्थिर हो गये पेंडुलम से बस लटके असमंजस के साये<br />एक कदम आगे बढ़ने का हर प्रयास दो बार फ़िसलता<br /><br />जब अनुकूल हवाओं के झोंकों को किया निमंत्रित, जाने<br />कैसे झंझा उमड़ उमड़ कर खुद द्वारे पर आ जाती है<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/15125972-3334950374524872525?l=geetkalash.blogspot.com'/></div>राकेश खंडेलवालhttp://www.blogger.com/profile/08112419047015083219noreply@blogger.com9tag:blogger.com,1999:blog-15125972.post-88336720886094906542009-06-23T10:12:00.000+05:302009-06-23T07:18:25.113+05:30वह अनलिखा पत्र लिख डालूँ<span style="color:#cc0000;"><em>आंखों में फिर तिर आये वे यादों की पुस्तक के पन्ने<br />बुदकी फ़िसली सरकंडे की कलमों से बनती थी अक्षर<br />प से होता पत्र, जिसे था लिखना चाहा मैने तुमको<br />जीवन की तख्ती पर जिसके शब्द रह गये किन्तु बिखर कर<br /><br />शायद कल इक किरण हाथ में आकर मेरे कलम बन सके<br />सपना है ये, और तुम्हें मैं वह अनलिखा पत्र लिख डालूँ<br /><br />फिर उभरे स्मॄति के पाटल पर धुंधले रेखाचित्र अचानक<br />सौगंधों के धागे कि्तने जुड़ते जुड़ते थे बिखराये<br />पूजा की थाली का दीपक था रह गया बिना ज्योति के<br />और मंत्र वे जो अधरों तक आये लेकिन गूँज न पाये<br /><br />शायद पथ में उड़ी धूल में लिपटा हो कोई सन्देसा<br />सपना है ये, और बुझा मैं दीपक फिर वह आज जला लूँ<br /><br />फिर आकर महकी हैं मन में गंधों भरी हवाये वे सब<br />जो कि तुम्हारे रची हथेली से उनवान लिया करती थीं<br />सांसों की गलियों में आकर जो धीमी आवाज़ लगाती<br />और इत्र की फ़ुहियों बन कर मुझसे बात किया करती थीं<br /><br />शायद फिर से बही हवा में लिपटे वे ही गंध सुगन्धी<br />सपना है ये, और उन्हें मैं फिर से अपने गले लगा लूँ<br /><br />देती हैं दस्तक आ आकर सुधि पर सुघर पदों की चापें<br />जिनका करते हुए अनुसरण, निशि में ओस झरा करती थी<br />तय करते मन का गलियारा, बन जाती थी धड़कन की धुन<br />और उमंगों की क्यारी में नूतन आस भरा करती थी<br /><br />खिली धूप की परछाईं में फिर से उभरें वे पदचापें<br />सपना है ये, और उमंगों को मैं फिर से नया बना लूँ</em></span><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/15125972-8833672088609490654?l=geetkalash.blogspot.com'/></div>राकेश खंडेलवालhttp://www.blogger.com/profile/08112419047015083219noreply@blogger.com7tag:blogger.com,1999:blog-15125972.post-62082756809204831302009-06-18T17:25:00.000+05:302009-06-18T17:14:20.457+05:30गीत बस दुहरा रहा हूँज़िन्दगी ने एक दिन जो झूम कर था गुनगुनाया<br />आज भी मैं प्रीत का वह गीत बस दुहरा रहा हूँ<br /><br />जब ह्रदय में आप ही उपजे निमंत्रण मंज़िलों के<br />थी डगर ने माँग अपनी पूर ली थी गंध लेकर<br />दीप आकर जल गये थे रात की अंगनाईयों में<br />फूल नभ में खिल गये थी रंग की सौगंध लेकर<br /><br />चित्र जो इक खिंच गया था आप ही आकर नयन में<br />मैं उसी में रात दिन बस रंग भरता जा रहा हूँ<br /><br />जब मरुस्थल सज गया था महकती फुलवारियों में<br />टांक दीं लाकर हवा ने झाड़ियों में सुगबुगाहट<br />केतकी जब खिल गई थी इक खुले दालान में आ<br />कोंपलों में भर गई जब इक अनूठी सरसराहट<br /><br />उस घड़ी जो इक लहर ने कह दिया था तीर पर आ<br />मैं वही किस्सा तुम्हें आकर सुनाता जा रहा हूँ<br /><br />जब सुकोमल रूप आकर ॠषि नयन में बस गया था<br />मुद्रिका खोई हुइ जिस पल अचानक मिल गई थी<br />शास्त्र सारे बह गये थे मंत्रमुग्धित हो जहां पर<br />सृष्टि जब भगवत कथा के पाठ से आ मिल गई थी<br /><br />शंख सीपी लिख गये जो सिन्धु के तट पर कहानी<br />ढाल कर मैं कंठ में उसको सुनाता जा रहा हूँ<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/15125972-6208275680920483130?l=geetkalash.blogspot.com'/></div>राकेश खंडेलवालhttp://www.blogger.com/profile/08112419047015083219noreply@blogger.com11tag:blogger.com,1999:blog-15125972.post-37463378388687295322009-06-08T06:59:00.001+05:302009-06-08T18:24:10.581+05:30लेकिन कभी कभी जाने क्यों<span style="color:#3333ff;">असमंजस के धागों से हम यूं तो दूर रहे हैं अक्सर<br />किंकर्तव्यविमूढ़ हुए हैं लेकिन कभी कभी जाने क्यों<br /><br />दिन व्यय किया रखा तब हमने निमिष निमिष का जोखा लेखा<br />हर रिश्ते को हर नाते को नापा और तोल कर देखा<br />परखा अपनी एक कसौटी पर जो मिला कहीं भी कुछ भी<br />और सदा अपनी सीमायें तय कर, खींचीं लक्ष्मण रेखा<br /><br />निर्धारित है रही समय की गति ये हमको ज्ञात रहा है<br />चाहा कालचक्र रुक जाये, लेकिन कभी कभी जाने क्यों<br /><br />बातें करते हैं अर्थात लिये हो ताकि नहीं कोई भ्रम<br />धारा से परिचय से पहले जान लिया है उसका उद्गम<br />डगमग पग हों नहीं इसलिये चले संतुलित कर कदमों को<br />मानचित्र पर राह बनाई, हो न सके कोई भी दिग्भ्रम<br /><br />परिभाषा की व्याख्याओं में गहरे खूब लगाये गोते<br />शब्द अपैरिचित हो जाते हैं लेकिन कभी कभी जाने क्यों<br /><br />दुविधा, संशय, संदेहों से परिचय कभी नहीं हम जोड़े<br />आशंका के धागे कत लें, इससे पहले ही सब तोड़े<br />अगवानी के लिये द्वार पर निश्चय की प्रतिमा रख दी थी<br />ऊहापोह भरे पल जितने भी थे वे सब पीछे छोड़े<br /><br />हम हर बार चुनौती देकर बाधाओं को पास बुलाते<br />परछाई से डर जाते हैं लेकिन कभी कभी जाने क्यों</span><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/15125972-3746337838868729532?l=geetkalash.blogspot.com'/></div>राकेश खंडेलवालhttp://www.blogger.com/profile/08112419047015083219noreply@blogger.com4tag:blogger.com,1999:blog-15125972.post-4803476244766565412009-06-01T06:55:00.001+05:302009-06-01T07:17:49.656+05:30तुम न आये<a href="http://farm4.static.flickr.com/3336/3583812378_16faee95fa.jpg?v=0"><img style="margin: 0px auto 10px; display: block; width: 500px; height: 281px; text-align: center;" alt="" src="http://farm4.static.flickr.com/3336/3583812378_16faee95fa.jpg?v=0" border="0" /></a><br /><div><br /><span style="color: rgb(102, 102, 0);"><em><br />परे हो खिड़कियों के झांकती थी शाख से बदली<br />लिये थी कामना रंगीन चित्रों की सजा पगली<br />उमंगों की हिलोरों में उठाती मदभरी लहरें<br />उतरती दूब पर पाने परस थी पांव का मचली<br /><br />सजे ही रह गये अगवानियों के थाल,आरति कर न पाये<br />तुम न आये<br /><br />सिमट कर रह गया मॄदुप्रीत का अरुणाभ आमंत्रण<br />निशा के अश्रुओं ने सींच कर महका दिया चन्दन<br />कसकती रह गईं भुजपाश की सूनी पड़ी साधें<br />शिथिल ही रह गया द्रुत हो न पाया ह्रदय का स्पंदन<br /><br />खिड़कियों के पट खुले ही रह गये, फिर भिड़ न पाये<br />तुम न आये<br /><br />भिखारिन सेज थी ले आस का रीता पड़ा प्याला<br />हवायें आतुरा थी चूम पायें गंध की माला<br />रही निस्तब्धता व्याकुल भरे वह माँग रुनझुन से<br />निखर कर चान्दनी में रूप की मदमाये मधुशाला<br /><br />सांझे से सोये पखेरु जग गये फिर चहचहाये<br />तुम न आये<br /><br />प्रतीक्षा के दिये का तेल सारा चुक गया जल कर<br />शमा का मोम विरह की अगन में बह गया गलकर<br />उबासी ले सितारों ने पलक भी मूँद लीं अपनी<br />उषा को साथ ले आने लगा रथ सूर्य का चलकर<br /><br />नैन थे दहलीज पर पलकें बना पांखुर बिछाये<br />तुम न आये</em></span></div><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/15125972-480347624476656541?l=geetkalash.blogspot.com'/></div>राकेश खंडेलवालhttp://www.blogger.com/profile/08112419047015083219noreply@blogger.com6tag:blogger.com,1999:blog-15125972.post-16336465626102982592009-05-28T06:53:00.001+05:302009-05-28T07:20:43.367+05:30पढ़ा नहीं है पत्र तुम्हारा<strong><em><span style="color: rgb(0, 153, 0);">खुला नहीं है बन्द लिफ़ाफ़ा अभी हवा का वन से आकर<br />इसीलिये ही पत्र तुम्हारा पढ़ा नहीं कोयल ने गाकर<br /><br />ये तो है अनुमान मुझे क्या तुमने लिखा पत्र में होगा<br />एकाकीपन घेरे रहता है यादों के दीप जलाये<br />और एक आवारा बदली ठहरी हुई नयन के नभ पर<br />नीर भरी कलसी ढुलकाती है जब भी उसका मन आये<br /><br />और लिखा होगा असमंजस जो उतरा है मन में आकर<br />इसीलिये ही पत्र तुम्हारा पढ़ा नहीं कोयल ने गाकर<br /><br />आग लगाता मन में,होगा लिखा,यहां जब बरसे सावन<br />और उमड़ती गंधें चुभती कांटा बन बन कर सीने में<br />क्रूर पपीहा जाने क्योंकर मुझको अपना राग सुनाये<br />और शिला जैसी है बोझिल सांस सांस लगता जीने में<br /><br />शायद ये भी लिखा पीर ही रखती है मुझको बहलाकर<br />इसीलिये ही पत्र तुम्हारा पढ़ा नहीं बुलबुल ने गाकर<br /><br />चन्दन की ले कलम शहद में डुबो लिखे होगे जब अक्षर<br />और शब्द में उभरा होगा नाम स्वत: ही मेरा आकर<br />चूमी होगी उस पल तुमने सौ सौ बार हथेली अपनी<br />और पत्र फिर खोला होगा बन्द हुआ फिर से अकुलाकर<br /><br />भेजा शायद एक फूल भी तुमने उस के साथ लगाकर<br />अब तक लेकिन पत्र तुम्हारा पढ़ा नहीं मौसम ने गा कर</span></em></strong><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/15125972-1633646562610298259?l=geetkalash.blogspot.com'/></div>राकेश खंडेलवालhttp://www.blogger.com/profile/08112419047015083219noreply@blogger.com7tag:blogger.com,1999:blog-15125972.post-17626499420806474772009-05-25T06:41:00.001+05:302009-05-25T06:41:01.057+05:30प्रीत का पहला निमंत्रणयाद आया है मुझे वह प्रीत का पहला निमंत्रण<br />जो हवा ने गुनगुना कर द्वार पर मेरे पढ़ा था<br /><br />स्वप्न जो अंगनाईयों में आंख की पलते रहे थे<br />वो लगा सहसा मुझे, साकार सब होने लगे हैं<br />और जो असमंजसों के पल खड़े थे, चित्र बन कर<br />कामना के ज्वार में घिरते हुए खोने लगे हैं<br /><br />पैंजनी का सुर खनकने लग गया है आज फिर वह<br />कॄष्ण की जो बासुरी पर राग में ढल कर चढ़ा था<br /><br />याद फिर आया अधर का थरथराना, मौन वाणी<br />याद वह संदेश, आये जो हवाओं के परों पर<br />दॄष्टि की किरणें,पिरोती अक्षरों की गूँथ माला<br />और मन की बात को रचती हिनाई उंगलियों पर<br /><br />एक बूटा वह लगा है आज गाने गीत फिर से<br />पांव के नख से धरा के शाल पर जो आ कढ़ा था<br /><br />दंत-क्षत पल्लू सुनाने लग गये हैं फिर कहानी<br />उंगलियों के चिन्ह फिर से छोर पर बनने लगे हैं<br />फिर किताबों में सुगन्धित हो गये हैं फूल सूखे<br />और गुलमोहर पुन: अब शाख से झरने लगे हैं<br /><br />बात करने लग गया है एक वह रूमाल मुझसे<br />एक दिन जिस पर अचानक होंठ का चुम्बन जड़ा था<br /><br />फिर संवरने लग गये हैं पात पीपल के सुनहरे<br />फिर घटाओं ने लिखा है बूँद से सन्देश कोई<br />फिर पखेरू बन उड़ी है कामना जीवन्त होकर<br />कल्पना फिर गुनगुनाने लग गई है दूध धोई<br /><br />आज फिर वह भाव करने लग गया है नॄत्य मन में<br />जो कभी भुजपाश के पथ पर सहज आगे बढ़ा था<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/15125972-1762649942080647477?l=geetkalash.blogspot.com'/></div>राकेश खंडेलवालhttp://www.blogger.com/profile/08112419047015083219noreply@blogger.com9tag:blogger.com,1999:blog-15125972.post-40224291111842986082009-05-18T06:47:00.002+05:302009-05-18T20:11:13.231+05:30तीन सौवीं प्रस्तुति---सांझ का दिया जला नहींसूरज आज भी अपने समय पर ही निकला है और प्राची से ही निकला है, मौसम में भी कोई परिवर्तन नहीं. सब कुछ वैसे का वैसा ही है केवल एक बात अलग है. आज गीत कलश पर यह तीन सौवीं प्रस्तुति है.आपके स्नेह ने प्रेरणा बन कर इस यात्रा में निरन्तर गतिमय रहने का प्रोत्साहन दिया है और वही स्नेह मेरा मार्गदर्शक रहा है. आप सभी को आभार देते हुए प्रस्तुत है<br /><br /><strong><em><span style="font-size:130%;color:#ff0000;">साँझ का दिया जला नहीं</span></em></strong><br /><br /><br /><span style="color:#333399;">भोर जब हुई तो पंछियों ने गीत गाये थे<br />रश्मियों के तार छू हवा ने गुनगुनाये थे<br />पर छली थी दोपहर, सो एक घात हो गई<br />सांझ का दिया जला नहीं कि रात हो गई<br /><br />नीड़ ने बना रखी थी द्वार एक अल्पना<br />और हाथ में उंड़ेल रंग भर रही हिना<br />लौट कर कदम दिवस के जब इधर को आयेंगे<br />पल थके तिवारियों में आ के पसर जायेंगे<br />सिगड़ियों में आग जागने से मना कर गई<br />गुड़गुड़ी उठी न जाने किस घड़ी किधर गई<br />अलगनी पे जो अटक के रह गये थे तौलिये<br />एक पल में जाने कैसे पाग बन को सो लिये<br /><br />पांव जो पखारती<br />आ थकन उतारती<br />गागरी बिखर के रिक्त इक परात हो गई<br />सांझ का दिया जला नहीं, कि रात हो गई<br /><br />ज़िन्दगी बनी रही अधूरा इक समीकरण<br />एक संधि पे अटक गई समूची व्याकरण<br />प्रश्न पत्र में मिले जो प्रश्न थे सभी सरल<br />पर न जाने क्यों जटिल हुआ सभी का अंत हल<br />उत्तरों की माल हो गई किताब से पॄथा<br />लग रहा प्रयत्न जो थे वो सभी हुए वॄथा<br />देह बांसुरी बनी, न सांस रास कर सकी<br />और रिक्त झोलियों में आ न आस भर सकी<br /><br />होंठ खुल सके नहीं<br />शब्द मिल सके नहीं<br />जो कही गई, वही अधूरी बात हो गई<br />सांझ का दिया जला नहीं कि रात हो गई<br /><br />याद की किताब के पलटते पॄष्ठ रह गये<br />जो जले थे दीप साथ, धार में वे बह गये<br />रोशनी के पक्षपात यूँ हमारे सँग हुए<br />तीलियाँ उगल गईं जलीं तो पंथ में धुंये<br />दॄष्टि के वितान पर कुहासे घिर्ते आ रहे<br />मौन कंठ पाखियों के शून्य गुनगुना गये<br />उमड़ रही घटाओं में सिमट गया सभी गगन<br />शांत हो गई उठी अगन भरी हुई लगन<br /><br />भाग्य रेख चुक गई<br />ज्योति हो विमुख गई<br />शह लगी न एक बार और मात हो गई<br />सांझ का दिया जला नहीं कि रात हो गई<br /><br />प्यार था बढ़ा गगन में डोर बिन पतंग सा<br />सावनी मल्हार में घुली हुई उमंग सा<br />झालरी बसन्त की बहार की जहाँ उड़ी<br />आस रह गई ठिठक के मोड़ पे वहीं खड़ी<br />गंध् उड़ गई हवा में फूल के पराग सी<br />दोपहर में जेठ के उमगते हुए फ़ाग सी<br />पतझड़ी हवायें नॄत्य कर गईं घड़ी घड़ी<br />शाख से गिरी नहीं गगन से बूंद जो झरी<br /><br />वक्त बीतता रहा<br />कोष रीतता रहा<br />ज़िन्दगी बिना दुल्हन की इक बरात हो गई<br />सांझ का दिया जला नहीं कि रात हो गई<br /></span><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/15125972-4022429111184298608?l=geetkalash.blogspot.com'/></div>राकेश खंडेलवालhttp://www.blogger.com/profile/08112419047015083219noreply@blogger.com23tag:blogger.com,1999:blog-15125972.post-17551790956782846582009-05-11T07:00:00.001+05:302009-05-11T07:00:01.634+05:30अंधियारे के शब्द कोश में मिलता नहीं सूर्य का परिचयचढ़ा नकाब व्यस्तताओं का निगल रहा है दिन दोपहरी<br />और समय के गलियारे में भटक गई कविता कल्याणी<br /><br />थिरक रहे पांवों में पायल मौन रहे कब हो पाता है<br />अंधियारे के शब्द कोश में मिलता नहीं सूर्य का परिचय<br />काई जमे ताल के जल से प्रतिबिम्बित न किरन हो सकी<br />खुली हाथ की मुट्ठी में कब हो पाता है कुछ भी संचय<br /><br />तो फिर उथली पोखर जैसे मन में उठे भाव की लहरें<br />संभव यह तो कभी कल्पना में भी नहीं हुआ पाषाणी<br /><br />कमल पत्र के तुहिन कणों का हिम बन जाना सदा असम्भव<br />और मील के पत्थर कब कब तय कर पाते पथ की दूरी<br />दर्पण की मरमरी गोद में भरते कहां राई के दाने<br />कहो रंग क्या दोपहरी का कभी हो सका है सिन्दूरी<br /><br />प्रतिपादित चाणक्य नियम से बंधी रही हो सारा जीवन<br />सरगम नहीं उंड़ेला करती विष से बुझी हुई वह वाणी<br /><br />बदला करती नहीं उपेक्षा कभी अपेक्षाओं की चादर<br />अपना चेहरा ढक लेने से सत्य नहीं ढँक जाया करता<br />हर मौसम बासन्ती ही हो ये अभिलाषा अर्थहीन है<br />पतझर को आना ही है तो बिना नुलाये आया करता<br /><br />गति का नाम निरन्तर चेतनता के संग में लिखा हुआ है<br />चाहे न चाहे वल्गायें स्वयं थाम लेती हैं पाणी<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/15125972-1755179095678284658?l=geetkalash.blogspot.com'/></div>राकेश खंडेलवालhttp://www.blogger.com/profile/08112419047015083219noreply@blogger.com5tag:blogger.com,1999:blog-15125972.post-28435082177802724602009-05-04T07:39:00.000+05:302009-05-04T07:39:00.562+05:30अपने गीत सुनाता हूं मैं<div style="color: rgb(102, 51, 0);">छन्दों का व्याकरण अपरिचित होकर रहा आज तक हमसे</div> <div style="color: rgb(102, 51, 0);">और गज़ल का बहर काफ़िया, सब कुछ ही रह गया अजाना</div> <div style="color: rgb(102, 51, 0);">काव्य सिन्धु का तीर परे है बहुत हमारी सीमाऒं के</div> <div style="color: rgb(102, 51, 0);">सत्य यही है, क्षमतायें भी सीमित हैं हमने पहचाना</div> <div style="color: rgb(102, 51, 0);">किन्तु ह्रदय की सुप्त भावना में गिर कंकर एक भाव का</div> <div style="color: rgb(102, 51, 0);">शान्त लहर में कोई हलचल सहसा कभी जगा जाता है</div> <div style="color: rgb(102, 51, 0);">तो निस्तब्ध ह्रदय का पाखी मुखरित कर अपनी उड़ान को</div> <div style="color: rgb(102, 51, 0);">अपने स्वर की पीड़ित सरगम को झट से बिखरा जाता है</div> <div style="color: rgb(102, 51, 0);"> </div> <div style="color: rgb(102, 51, 0);">गूँथ रखे हूं सरगम के मैं वो ही स्वर अपने शब्दों मे</div> <div style="color: rgb(102, 51, 0);">और उन्हीं को समो कंठ में अपने गीत सुनाता हूं मैं</div> <div style="color: rgb(102, 51, 0);"> </div> <div style="color: rgb(102, 51, 0);">मंदिर की चौखट पर बिखरे हुए फूल की क्षत पंखुड़ियां</div> <div style="color: rgb(102, 51, 0);">रिसता हुआ उंगलियों में से बून्द बून्द कर अभिमंत्रित जल</div> <div style="color: rgb(102, 51, 0);">आशंका से ग्रस्त दीप की थर थर होती कंपित इक लौ</div> <div style="color: rgb(102, 51, 0);">डगमग होता हुआ धुंआसी हुई आस्थाओं का सम्बल</div> <div style="color: rgb(102, 51, 0);">शीश तिलक के पीछे अंकित चुपे हुए अनबूझ सन्देसे</div> <div style="color: rgb(102, 51, 0);">और आरती का स्वागत या विदा प्रश्न पर उलझे रहना</div> <div style="color: rgb(102, 51, 0);">अगरु धूम्र में लिपटे लिपटे छितरा जाती हुई आस का</div> <div style="color: rgb(102, 51, 0);">रह रह कर अपनी सीमा में छुपते हुए मौन हो रहना</div> <div style="color: rgb(102, 51, 0);"> </div> <div style="color: rgb(102, 51, 0);">ये जो भाव दूर ही रहते आये देव चरण से अक्सर</div> <div style="color: rgb(102, 51, 0);">इन सबको समेट कर अपने संग में, अर्घ्य चढ़ाता हूँ मैं</div> <div style="color: rgb(102, 51, 0);"> </div> <div style="color: rgb(102, 51, 0);">पांवों की ठोकर से बिखरे हुए देहरी पर के अक्षत</div> <div style="color: rgb(102, 51, 0);">पूजा की चौकी पर नव ग्रह के प्रतीक भी बन जाते हैं</div> <div style="color: rgb(102, 51, 0);">रंग अलक्तक के लेते हैं करवट जब अंगड़ाई लेकर</div> <div style="color: rgb(102, 51, 0);">रोली बन कर देव-भाल की सज्जा बन कर सज जाते हैं</div> <div style="color: rgb(102, 51, 0);">खंड खंड जो कर देती है एक शिला को वह ही छैनी</div> <div style="color: rgb(102, 51, 0);">डूब प्रीत में, सुघड़ शिल्प की प्रतिमा को निखार देती है</div> <div style="color: rgb(102, 51, 0);">बिखरे हुए संतुलन से जो ढली शोर में, वे आवाज़ें</div> <div style="color: rgb(102, 51, 0);">कभी कभी वंशी पर चढ़ कर सरगम को संवार देती हैं</div> <div style="color: rgb(102, 51, 0);"> </div> <div style="color: rgb(102, 51, 0);">सहज विरोधाभास ज़िन्दगी के जो कदम कदम पर बिखरे</div> <div style="color: rgb(102, 51, 0);">उठा उन्हें भर कर बाँहों में अपने अंक लगाता हूँ मैं</div> <div style="color: rgb(102, 51, 0);"> </div> <div style="color: rgb(102, 51, 0);">उंगली एक छूट कर मुट्ठी से खो जाती है मेले में</div> <div style="color: rgb(102, 51, 0);">और निगाहें वे जो लौटीं वापिस हर द्वारे से टकरा</div> <div style="color: rgb(102, 51, 0);">स्वर वे उपजे हुए कंठ के जिन्हें न पथ में कोई रोके</div> <div style="color: rgb(102, 51, 0);">और आस के फूल पांखुरी रह जाती हैं जिनकी छितरा</div> <div style="color: rgb(102, 51, 0);">वह सांसों की डोर न थामें जिसको कभी हवा के झोंके</div> <div style="color: rgb(102, 51, 0);">और धड़कने वे जिनकी गति अवरोधों से ग्रस्त हुई है</div> <div style="color: rgb(102, 51, 0);">निशि के अंतिम एक सितारे कीज बिखराती हुई रश्मियाँ <br /></div> <div style="color: rgb(102, 51, 0);">सूरज की अगवानी होती देख स्वयं ही अस्त हुई हैं</div> <div style="color: rgb(102, 51, 0);"> </div> <div style="color: rgb(102, 51, 0);">रहे उपेक्षित इतिहासों की गाथाओं की नजरों से जो</div> <div style="color: rgb(102, 51, 0);">आज उन्हीं को ढाल शब्द में गाथा एक सुनाता हूँ मैं</div><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/15125972-2843508217780272460?l=geetkalash.blogspot.com'/></div>राकेश खंडेलवालhttp://www.blogger.com/profile/08112419047015083219noreply@blogger.com8tag:blogger.com,1999:blog-15125972.post-91766393800324553822009-04-29T06:53:00.001+05:302009-04-29T06:53:50.746+05:30बिना तुम्हारे साथ न देतेशब्द नहीं ढलते गीतों में स्वर ने भी विद्रोह किया है<br />बिना तुम्हारे साथ नयन का देते नहीं स्वप्न रातों में<br /><br />मेंहदी महावर काजल कुंकुम सब की ही हैं क्वारी साधें<br />चूड़ी कंगन तगड़ी पायल बिछुवा रह रह अश्रु बहाते<br />कानों की लटकन रह रह कर प्रश्न पूछती है नथनी से<br />देखा कोई मेघदूत क्या टीके ने सन्देसा लाते<br /><br />बाजूबन्द मौन बैठे हैं जैसे किसी बात के दोषी<br />करते रहते निमिष याद वे, जब सज रहते थे हाथों में<br /><br />रंगत हुई तीज की पीली, सावन के झूले उदास हैं<br />गौरी मन्दिर की पगडंडी पग की ध्वनि सुनने की आतुर<br />रजनी गंधा नहीं महकती एकाकी होकर उपवन में<br />और बिलख कर रह जाता है कालिन्दी तट वंशी का सुर<br /><br />पल पल पर उद्विग्न ह्रदय की बढ़ती जाती है अधीरता<br />अर्थ नहीं कुछ शेष बचा है आश्वासन वाली बातों में<br /><br />देहरी याद करे अक्षत से जब की थी अभिषेक पगतली<br />अँगनाई है स्पर्श संजोये उंगलियों का रांगोली में<br />दीप दिवाली के नजरों में साध लिये हैं सिर्फ़ तुम्हारी<br />और विलग हो तुमसे सारे रंग हुए फ़ीके होली में<br /><br />सम्बन्धों के वटवृक्षों पर उग आती हैं अमर लतायें<br />और तुम्हारे बिन मन जुड़ता नहीं तनिक रिश्तों नातों में<br /><br />शून्य पार्श्व में देख स्वयं ही मुरझा मुरझा रह जाती है<br />यज्ञ वेदियों की लपटों की वामांगी आहुति की आशा<br />पृष्ठ खोलती नहीं ॠचायें, पूर्ण नहीं हो पाती स्वाहा<br />और बदलने लग जाती है मंत्रों की मानक परिभाषा<br /><br />प्रश्न चिन्ह बन गैं तुम्हारे बिन अब वे सारी सौगंधें<br />बुनी गईं थीं एक साथ जो चले कदम अपने सातों में<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/15125972-9176639380032455382?l=geetkalash.blogspot.com'/></div>राकेश खंडेलवालhttp://www.blogger.com/profile/08112419047015083219noreply@blogger.com6tag:blogger.com,1999:blog-15125972.post-57921070760787032832009-04-23T06:53:00.000+05:302009-04-23T06:53:00.714+05:30आ रहा है डाकिया सन्देस इक लेकर तुम्हाराबढ़ गई सहसा हवा के नूपुरों की झनझनाहट<br />और गहरी हो गई कुछ पत्तियों की सरसराहट<br />दूब के कालीन के बूटे जरा कुछ और निखरे<br />और कलियों में हुई अनजान सी कुछ सुगबुगाहट<br /><br />बात यह मुंडेर पर आ एक पंछी ने कहा है<br />आ रहा है डाकिया सन्देस इक लेकर तुम्हारा<br /><br />गंध भेजी है गुलाबों ने बिछे जाये डगर पर<br />इन्द्रधनुषी हो रहीं देहलीज पर आ अल्पनायें<br />केसरी परिधान वन्दनवार बन कर सज गये हैं<br />आरती का थाल ले द्वारे खड़ी हैं कल्पनायें<br /><br />फ़ुनगियों ने रख हथेली छाँह को, पथ को निहारा<br />आ रहा है डाकिया सन्देस इक लेकर तुम्हारा<br /><br />ले रहीं अँगड़ाइयां अनजान सी मन में उमंगें<br />आस में डूबी फ़ड़कने लग गईं दोनों भुजायें<br />दॄष्टि आतुर, अर्घ्य ले जैसे खड़ी कोई सुहागन<br />बाट जोहे चौथ चन्दा की उभर आयें विभायें<br /><br />दिन ढले से पूर्व ही आया उतर पहला सितारा<br />आ रहा है डाकिया सन्देस इक लेकर तुम्हारा<br /><br />लग गई जैसे अजन्ता कक्ष में आकर संवरने <br />खिड़कियों बुनने लगी हैं धूप के रंगीन धागे<br />सज रहीं अंगनाई में कचनार की कलियां सुकोमल<br />जो निमिष भर को गये थे सो, सभी वे भाव जागे<br /><br />धार ने मंदाकिनी की, पंथ को आकर पखारा<br />आ रहा है डाकिया सन्देस इक लेकर तुम्हारा<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/15125972-5792107076078703283?l=geetkalash.blogspot.com'/></div>राकेश खंडेलवालhttp://www.blogger.com/profile/08112419047015083219noreply@blogger.com7tag:blogger.com,1999:blog-15125972.post-7996788028231911872009-04-20T06:53:00.000+05:302009-04-20T06:53:00.419+05:30ज़िन्दगी के राजपथ पर लिख चुका हूँशब्द मैं चुन ला रहा अनुभूतियों की क्यारियों से<br />तुम इन्हें दो कंठ अपना और धुन में गुनगुनाओ<br /><br />ज़िन्दगी के राजपथ पर तो लिखे हैं गीत अनगिन<br />आज मैं बिसरी हुई पगडंडियों पर लिख रहा हूं<br />जो धरोहर मान अपनी दर्पणों ने रख लिये थे<br />मैं उन्हीं धुंधले अधूरे बिम्ब जैसा दिख रहा हूँ<br />केतकी का रूप जो खिलता रहा वीरानियों में<br />आंजता हूँ मैं उसे लाकर नयन के आंगनों में<br />खींचता हूँ चित्र मैं अब वे क्षितिज के कैनवस पर<br />रात की स्याही निगल बैठी जिन्हें थी सावनों में<br /><br />और ये छू लें अगर मन का कोई कोना तुम्हारा<br />तो मेरी आवाज़ में तुम आज अपना स्वर मिलाओ<br /><br /><br />दे रहा आवाज़ मैं उन स्वेद के खोये कणों को<br />स्याहियां बन कर हलों की खेत पर जो खत लिखे थे<br />शीश पर पगड़ी बना कर जेठ का सूरज रखा था<br />सावनी धारायें बन कर देह से फ़िसले गिरे थे<br />जो किये प्रतिमाओं को जीवन्त थे अपने परस से<br />बालियों को रंग दे धानी हरे पीले सुनहरे<br />और छूकर नीम की शीतल घनेरी छांह का जल<br />झिलमिलाते थे रजत कण बन सभी होकर रुपहरे<br /><br />चिन्ह उनका कोई भी दिखता नहीं है इस नगर में<br />तुम बताना राह में चलते अगर पहचान पाऒ<br /><br />बढ़ रही रफ़्तार, आपाधापियां, शंकायें मन में<br />छूटता विश्वास का हर छोर रह रह उंगलियों से<br />डर रहा परछाईं से भी आज हर अस्तित्व लगता<br />चोंकता है जो हवा की थाप पड़ती खिड़कियों पे<br />चाह तो है द्वार को आकर सजायें चन्द्रकिरणें<br />किन्तु आतीं तो तनिक विश्वास हो पाता नहीं है<br />मन मयूरा था प्रतीक्षित सावनी बादल घिरें आ<br />और घिरते तो कोई भी गीत गा पाता नहीं है<br /><br />आऒ मेरे साथ मिल तुम चीर दो संशय घिरे जो<br />और बन क्र दीप उज्ज्वल रोशनी से जगमगाओ<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/15125972-799678802823191187?l=geetkalash.blogspot.com'/></div>राकेश खंडेलवालhttp://www.blogger.com/profile/08112419047015083219noreply@blogger.com7tag:blogger.com,1999:blog-15125972.post-57481712488564395852009-04-13T06:50:00.003+05:302009-04-13T07:24:50.141+05:30और तुम्हारा एक तकाजा<a name="1727022908462611206"></a><br /><br /><span style="color:#3333ff;">बुझे बुझे सरगम के सुर हैं</span><br /><span style="color:#3333ff;">थके थके सारे नूपुर हैं</span><br /><span style="color:#3333ff;">शब्दों का पिट गया दिवाला</span><br /><span style="color:#3333ff;">कलम वगावय को आतुर है</span><br /><span style="color:#3333ff;">भावों की लुट हई पोटली अनुभूति के कोष रिक्त हैं</span><br /><span style="color:#3333ff;">और तकाजा एक तुम्हारा मैं इक नया गीत लिख डालूँ</span><br /><span style="color:#3333ff;"></span><br /><span style="color:#3333ff;">अक्षर अक्षर बिखर गई हैं गाथाय्रं कुछ याद नहीं हैं</span><br /><span style="color:#3333ff;">शीरीं तो हैं बहुत एक भी लेकिन पर फ़रहाद नहीं है</span><br /><span style="color:#3333ff;">बाजीराव नहीं मिल पाया थकी ढूँढते है मस्तानी</span><br /><span style="color:#3333ff;">इतिहासों की प्रेम कथायें किसने समझी किसने जानी</span><br /><span style="color:#3333ff;"></span><br /><span style="color:#3333ff;">राजमुकुट के प्रत्याशी तो खडे हुए हैं पंक्ति बनाकर</span><br /><span style="color:#3333ff;">तुम्ही बताओ सिंहासन पर मैं इनमें से किसे बिठा लूँ</span><br /><span style="color:#3333ff;"></span><br /><span style="color:#3333ff;">महके हुए फूल उपवन से रह रह कर आवाज़ लगाते</span><br /><span style="color:#3333ff;">मल्हारों के रथ पनघट पर रूक जायेंगे आते जाते</span><br /><span style="color:#3333ff;">फागुन के बासन्ती रंग में छुपी हुईं पतझडी हवायें</span><br /><span style="color:#3333ff;">बार बार अपनी ही धुन में एक पुरानी कथा सुनायें</span><br /><span style="color:#3333ff;"></span><br /><span style="color:#3333ff;">माना है अनजान डगरिया, लेकिन दिशाचिन्ह अनगिनती</span><br /><span style="color:#3333ff;">असमंजस में पडा हुआ हूँ, किसको छोडूँ किसे उठा लूँ</span><br /><span style="color:#3333ff;"></span><br /><span style="color:#3333ff;">अलगोजे तो नहीं छेड़ता गूँज रहा कोई बाऊल स्वर</span><br /><span style="color:#3333ff;">रह जाता घुल कर सितार में सरगम के स्रोतों का निर्झर</span><br /><span style="color:#3333ff;">लग जाते हैं अब शब्दों पर पहरे नये, व्याकरण वाले</span><br /><span style="color:#3333ff;">छन्द संवरता तो होठों पर ढलता नहीं सुरों में ढाले</span><br /><span style="color:#3333ff;"></span><br /><span style="color:#3333ff;">गज़ल नज़्म मुक्तक रुबाईयां, सब ही मुझसे संबोधित हैं</span><br /><span style="color:#3333ff;">तुम बोलो इनमें से किसको अभिव्यक्ति का सिला बना लूँ</span><br /><span style="color:#3333ff;">और तुम्हारा एक तकाजा, मैं इक और गीत रच डालूँ </span><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/15125972-5748171248856439585?l=geetkalash.blogspot.com'/></div>राकेश खंडेलवालhttp://www.blogger.com/profile/08112419047015083219noreply@blogger.com9tag:blogger.com,1999:blog-15125972.post-34003780037935392732009-04-09T07:35:00.000+05:302009-04-09T07:35:00.567+05:30कितना उसे ओस ने धोयापता नहीं क्यों आज रोशनी छुप कर रही गगन के पीछे<br />पता नहीं क्यों चन्दा सूरज बैठे रहे पलक को मींचे<br />पता नहीं क्यों आज नीर की गगरी छलकी नहीं घटा की<br />पता नहीं क्यों रश्मि भोर की, उषा रही मुट्ठी में भींचे<br /><br />सोच रहा था जब मैं ये सब, बता गया यह एक झकोरा<br />क्योंकि न तुमने पलकें खोलीं अपनी, रहा जगत भी सोया<br /><br />ढका रहे जब ज्योतिपुंज तो कैसे छिटक सकेंगी किरणें<br />हो न प्रवाहित निर्झर, कैसे उमड़ेंगी नदिया में लहरें<br />कली न आंखें खोले अपनी तो कैसे सुगन्ध बिखरेगी<br />झरे नहीं नयनों से पूनम , कैसे चन्द्र विभा संवरेगी<br /><br />ढांप लिया जब जगमग आनन, मावस की सी चिकुर राशि ने<br />तब ही तो नभ की पगडंडी पर चलता सूरज रथ खोया<br /><br />उमड़ी नहीं घटा पश्चिम की क्योंकि न तुमने ली अंगड़ाई<br />बिखरा नहीं अलक्तक पग से, संध्या हो न सकी अरुणाई<br />बन्द रही काजल की कोरों में हो कैद रात की रानी<br />बंधी रही आंचल से पुरबा कर न सकी अपनी मनमानी<br /><br />पा न सका था स्पर्श स्वरों का , तो गुलाब अधरों का कोमल<br />रहा तनिक मुरझाया सा ही, कितना उसे ओस ने धोया<br /><br />छनकी नहीं पांव की पायल,सुर सितार के संवर न पाये<br />खनका कंगन नहीं, कोयलें चुप ही रहीं गीत न गाये<br />हिना न झांकी मुट्ठी में से, तो अमराई नहीं बौराई<br />शब्दों का विन्यास चला घुटनों पर, आई नहीं तरुणाई<br /><br />हुआ अंकुरित नहीं एक भी गीत ह्रदय की फुलवारी में<br />बिना तुमहारे दॄष्टिपात के,अक्षर अक्षर कितना बोया<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/15125972-3400378003793539273?l=geetkalash.blogspot.com'/></div>राकेश खंडेलवालhttp://www.blogger.com/profile/08112419047015083219noreply@blogger.com10tag:blogger.com,1999:blog-15125972.post-28390445454087955862009-04-06T07:23:00.000+05:302009-04-06T07:23:00.927+05:30गीत भी हँस पड़े<span style="color:#cc0000;"><em>भाव अभिव्यक्त हों इसलिये शब्द की उंगलियां थाम कर देखिये चल पड़े<br />सरगमों की कलाई पकड़ कंठ ने ली जो अँगड़ाई तो गीत भी हँस पड़े<br /><br />प्रार्थना में जुड़े हाथ की उंगलियां पोर पर आरती को सजाती रहीं<br />वर्तिका की थिरकती हुई ज्योति पर पांव अनुभूतियां थीं टिकाये रहीं<br />शंख फिर गूँज कर पात्र में ढल गये और प्रक्षाल करने लगे मूर्त्ति का<br />घंटियों का निमंत्रन बुलाता रहा, मंत्र उठता हुआ वारिधि क्षीर का<br /><br />शिल्प ने थाम लीं हाथ में छैनियाँ, ताकि वह शिल्प अपना स्वयं ही गढ़े<br />सरगमों की कलाई पकड़ कंठ ने ली जो अँगड़ाई तो गीत भी हँस पड़े<br /><br />प्रीत के शब्द को पांखुरी पर लिखे मुस्कुराती रही अधखिली इक कली<br />गंध की डोर पकड़े हुए वावरा एक भंवरा भटकता रहा था गली<br />क्यारियों में उगीं चाहतों की नई कोंपलें, पर जरा कुनमुनाती हुई<br />बाड़ बन कर छिपी झाड़ियों में हिना आप ही हाथ अपने रचाती हुई<br /><br />कर रही थी भ्रमण वाटिका में हवा, भाल उसके अचानक कई सल पड़े<br />सरगमों की कलाई पकड़ कंठ ने ली जो अँगड़ाई तो गीत भी हँस पड़े<br /><br />दॄष्टि के पाटलों पर लगी छेड़ने एक झंकार को स्वप्न की पैंजनी<br />याद के नूपुरों से लिपटती रही छाँह पीपल की हो कर जरा गुनगुनी<br />स्नेह की बून्द से सिक्त हो भावना नाम अपने नय रख संवरने लगी<br />और शैथिल्य के आवरण की जकड़ बन्धनों को स्वयं मुक्त करने लगी<br /><br />कुमकुमे फूट कर श्याम सी चादरेऒं पर नये रंग होकर अचानक चढ़े<br />सरगमों की कलाई पकड़ कंठ ने ली जो अँगड़ाई तो गीत भी हँस पड़े</em></span><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/15125972-2839044545408795586?l=geetkalash.blogspot.com'/></div>राकेश खंडेलवालhttp://www.blogger.com/profile/08112419047015083219noreply@blogger.com6tag:blogger.com,1999:blog-15125972.post-55195477361801142009-03-30T07:09:00.001+05:302009-04-08T20:12:04.101+05:30फिर क्या शेष अभीप्सित जीवन का<span style="color:#6633ff;">नीलकंठ का नाम हमें जब तूने दे ही दिया ज़िन्दगी<br />फिर क्या शेष अभीप्सित जीवन का है जो तुझको बतलायें<br /><br />चाहत से यथार्थ के अंतर की दूरी पर कदम बढ़ाकर<br />सोचा था हम चलते जायेंगे इस पथ पर हँस कर गाकर<br />लेकिन तूने दिशा बोध के जो उपकरण दिये हाथों में<br />वे दिखलाते पग पग पर हैं बने हुए शत शत रत्नाकर<br /><br />नाविक कहकर तूने हमको दे तो दी पतवार हाथ में<br />लेकिन साथ साथ सौंपी हैं लहर लहर भीषण झंझायें<br /><br />अभिलाषाओं के दीपक में बटी हुई सपनों की बाती<br />महज कल्पना के तेलों से संभव नहीं तनिक जल पाती<br />तीली की हर लौ पर तूने लगा दिये सीलन के पहरे<br />और कह दिया हमें, हमारी संस्कॄतियों की है यह थाती<br /><br />जितने भी मोहरे बिसात पर रखे हुए हैं, हैं अभिमंत्रित<br />उनके बस में कहाँ स्वयं ही चालें निर्धारित कर पायें<br /><br />बाधाओं के समाधान की उत्सुकता भर कर बाहोँ में<br />उगते हुए दिवस, रजनी में ढलते रहे बिछी राहों में<br />पगडंडी ने साथ न पग का दिया किसी भी एक मोड़ पर<br />मॄगतृष्णायें रहीं सँवरती, आँखों में पलती चाहों में<br /><br />प्रश्न अधूरे होते अक्सर, ये तो हर कोई स्वीकारा<br />लेकिन तेरे आधे उत्तर की गाथायें किसे सुनायें</span><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/15125972-5519547736180114?l=geetkalash.blogspot.com'/></div>राकेश खंडेलवालhttp://www.blogger.com/profile/08112419047015083219noreply@blogger.com5tag:blogger.com,1999:blog-15125972.post-17507520867736136752009-03-26T06:37:00.000+05:302009-03-26T06:37:03.029+05:30अब सम्बन्ध कलम से मेरा<span style="color:#006600;"><em>सम्बन्धों के अनुबन्धों की लगता अवधि हो गई पूरी<br />करती हैं विच्छेद उंगलियां अब सम्बन्ध कलम से मेरा<br /><br />बही भाव के निर्झर से नित, अविरल एक शब्द की धारा<br />होठों ने कर लिया आचमन और कंठ स्वर ने उच्चारा<br />अलंकरण आ गये सजाने, सांचे में शिल्पों ने ढाला<br />अनुप्रासों ने दर्पण अपना दिखा दिखा कर रूप संवारा<br /><br />लेकिन इक विराम की बिन्दी लगता है अब रोके पथ को<br />लगा उमड़ने धीरे धीरे मन अम्बर पर घना अंधेरा<br /><br />सन्दर्भों से उपमाओं के जो सम्बन्ध रहे वे टूटे<br />सर्ग व्याकरण के जितने थे, एक एक कर सारे रूठे<br />शब्दकोश ने अपनी संचित निधि से दी कुछ नहीं उधारी<br />और पात्र जिनमें हम अक्षर रख सकते थे, सारे फूटे<br /><br />वाणी हुई निरक्षर, कोई वाक्य नहीं चढ़ता अधरों पर<br />मेरी गलियों में आकर अब मौन, लगाये बैठा डेरा<br /><br />बजे भावना की शहनाई पर न सजे बारात छन्द की<br />खिले हुए फूलों को छूकर बदली उमड़े नहीं गन्ध की<br />तारों का कम्पन ढलता ही नहीं किसी सरगम के सुर में<br />कला हुई विस्मॄत जो सीखी, कभी अन्तरों के प्रबन्ध की<br /><br />धब्बा एक बना स्याही की केवल कागज़ पर दिखता है<br />कूची लेकर आज शब्द का मैने जब भी चित्र चितेरा</em></span><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/15125972-1750752086773613675?l=geetkalash.blogspot.com'/></div>राकेश खंडेलवालhttp://www.blogger.com/profile/08112419047015083219noreply@blogger.com5tag:blogger.com,1999:blog-15125972.post-32593019106557421742009-03-23T06:59:00.000+05:302009-03-23T06:59:00.980+05:30बजी नहीं कोई शहनाईकाजल पहरेदार हो गया<br />सपने रोके आते आते<br />रंग बिखर रह गये हवा में<br />चित्र रहे बस बन कर खाके<br />होठों की लाली से डर कर<br />मन की बात न बाहर आई<br />कंगन करता रहा तकाजा<br />लेकिन चुप ही रही कलाई<br /><br />सोचा तो था बांसुरिया के रागों पर सरगम मचलेगी<br />जाने क्या हो गया बांसुरी कोई गीत नहीं गा पाई<br /><br />महावर की खींची रेखा को<br />लांघ नहीं पाया पग कोई<br />पायल की बेड़ी में बन्दी<br />घुंघरू की आवाज़ें खोईं<br />बिछुआ पिसता रहा बोझ से<br />कुछ कह पाने में अक्षम था<br />रहा बोरला गुमसुम बैठा<br />पता नहीं उसको क्या गम था<br /><br />अटकी हुई तोड़िये की लहरों पर एक अकेली बोली<br />रह रह नजर झुका लेती थी जाने थी किससे शरमाई<br /><br />तय तो करती रही अंगूठी<br />नथनी के मोती तक दूरी<br />उंगली रुकती रही होंठ पर<br />जाने थी कैसी मज़बूरी<br />आतुर बाजूबन्द रहा था<br />अपने एक बिम्ब को चूमे<br />लाल हुई कानों की लौ पर<br />बुन्दों का भी मन था झूमें<br /><br />उत्कंठा कर रही वावली, जागी हुई भावना मन में<br />ध्यान लगाये सुना गूँज कर बजी नहीं कोई शहनाई<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/15125972-3259301910655742174?l=geetkalash.blogspot.com'/></div>राकेश खंडेलवालhttp://www.blogger.com/profile/08112419047015083219noreply@blogger.com5tag:blogger.com,1999:blog-15125972.post-68131021935044051082009-03-19T06:53:00.001+05:302009-03-19T06:53:00.860+05:30कोई गीत नहीं गा पाताशब्द अटक रह गये अधर पर, वाणी साथ न देने पाती<br />हो विक्षुब्ध मन मौन पड़ा है, कोई गीत नहीं गा पाता<br /><br />एक अनिश्चय निगल रहा है उगी भोर की अरुणाई को<br />और दिशायें छेड़ रही हैं असमंजस की शहनाई को<br />आशंका के घने कुहासे में लिपटा दिखता है हर पथ<br />हो जाता भयभीत ह्रदय अब देख स्वयं की ही परछाईं<br /><br />विषम परिस्थितियां सुरसा सी खड़ी हुईं फ़ैलाये आनन<br />समाधान को बुद्धिमता का रूप नहीं लेकिन मिल पाता<br /><br />दहला जाता है मन को अब दिखता रंग गुलाबों वाला<br />बुना भाग्य की रेखाओं पर एक गूढ़ मकड़ी का जाला<br />विश्वासों की नींव ढही जाती है बालू के महलों सी<br />पीता हुआ रोशनी हँसता केवल घिरा अँधेरा काला<br /><br />दिशाबोध के चिन्ह घुल गये कुतुबनुमा भी भ्रमित हुई है<br />मुड़ने लगीं राह भी वापिस, उनको पंथ नहीं मिल पाता<br /><br />बिखराता है तिनके तिनके पंछी स्वयं नीड़ को अपने<br />और विवश नजरों को लेकर बीना करता खंडित सपने<br />अभिमन्यु घिर चक्रव्यूह में, मदद मांगता है जयद्रथ से<br />ओझा कौड़ी फ़ेंक, नाग को करता है आमंत्रित डँसने<br /><br />पासों के षड़यंत्र बढ़ गये, और समर्पित हुआ युधिष्ठिर<br />इतिहासों की गाथाओं से कोई सबक नहीं मिल पाता<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/15125972-6813102193504405108?l=geetkalash.blogspot.com'/></div>राकेश खंडेलवालhttp://www.blogger.com/profile/08112419047015083219noreply@blogger.com6tag:blogger.com,1999:blog-15125972.post-37958134998915060362009-03-17T06:53:00.000+05:302009-03-17T06:53:00.370+05:30धूप को वह पथ दिखाये<span style="color:#993399;">चाह तो है शब्द होठों पर स्वयं आ गीत गाये<br />स्वप्न आंखों में सजे तो हो मुदित वह गुनगुनाये<br /><br />पॄष्ठ सुधियों के अधूरे, पुस्तकों में सज न पाते<br />उम्र बीती राग केवल एक, वंशी पर बजाते<br />हाथ जो ओढ़े हुए थे मांगने की एक मुद्रा<br />बांध कर मुट्ठी कहां संभव रहा कुछ भी उठाते<br /><br />कर्ज का ले तेल बाती, एक मिट्टी का कटोरा<br />चाहता है गर्व से वह दीप बन कर जगमगाये<br /><br />सावनों के बाद कब बहती नदी बरसात वाली<br />बिन तले की झोलियाँ, रहती रहीं हर बार खाली<br />मुद्रिकाओं से जुड़े संदेश गुम ही तो हुए हैं<br />प्रश्न अपने आप से मिलता नहीं होकर सवाली<br /><br />ओस का कण धूप से मिलता गले तो सोचता है<br />है नियति उसकी, उमड़ती बन घटा नभ को सजाना<br /><br />अर्थ तो अनुभूतियों के हैं रहे पल पल बदलते<br />इसलिये विश्वास अपने, आप को हैं आप छलते<br />मान्यताओं ने उगाये जिस दिशा में सूर्य अपने<br />हैं नहीं स्वीकारतीं उनमें दिवस के पत्र झरते<br /><br />रात के फ़ंदे पिरोता, शाल तम का बुन रहा जो<br />उस प्रहर की कामना है धूप को वह पथ दिखाये</span><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/15125972-3795813499891506036?l=geetkalash.blogspot.com'/></div>राकेश खंडेलवालhttp://www.blogger.com/profile/08112419047015083219noreply@blogger.com7tag:blogger.com,1999:blog-15125972.post-9891917341611644082009-03-02T06:40:00.001+05:302009-03-02T06:40:00.335+05:30बोलने लग गये रंगएक ही चित्र में रंग जब भर दिये, तूलिका ने ढली सांझ अरुणाई के<br />कालनिशि के तिमिर में नहाई हुई भाद्रपद की अमावस की अँगड़ाई के<br />फूल की गंध के प्रीत के छन्द के, तो लगा आपका चित्र वह बन गया<br />बोलने लग गये रंग सरगम बने ढल गये गूँज में एक शहनाई के<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/15125972-989191734161164408?l=geetkalash.blogspot.com'/></div>राकेश खंडेलवालhttp://www.blogger.com/profile/08112419047015083219noreply@blogger.com14tag:blogger.com,1999:blog-15125972.post-26138034581901874292009-02-27T07:10:00.003+05:302009-03-04T19:47:08.471+05:30मेरा और तुम्हारा परिचयचाहा तुम्हें लिखूं तुम हो नभ का विस्तार सितारा हूँ मैं<br />चाहा कहूँ तुम्हें सागर-जल का भंडार किनारा हूँ मैं<br />चाहा तुमको लिखदूं तुम निस्सीम, दायरे में मैं बन्दी<br />लिखूँ अक्षुण्य निरन्तर तुमको हो हरबार, दुबारा हूँ मैं<br /><br />लिखने लगी कलम लिख डाला तुम तुम ही हो, तुम ही हो मैं<br />तुम्हें नहीं परिचय आवश्यक और तुम्ही हो मेरा परिचय<br /><br />तुमने ही तो कहा समय हो तुम गतिमान, रुके हो पल छिन<br />तुम ही जड़ हो, तुम ही चेतन, तुम ही निशा और तुम ही दिन<br />एक अकेले तुम ही नश्वर, तुम ही क्षण तुम ही क्षण्भंगुर<br />तुम अनादि हो, आदि तुम्ही हो और एक तुम ही गूँजा सुर<br /><br />ज्ञानदीप की ज्योति तुम्ही हो और तुम्ही हो उपजा संशय<br />तुम्हें नहीं परिचय आवश्यक और मेरा भी तुम ही परिचय<br /><br />मैं क्या लिख पाऊंगा तुमको, तुम ही शब्द तुम्ही अक्षर हो<br />तुम ही एक दानकर्ता हो तुम ही तो याचक का कर हो<br />तुम ही कालनिशा का तम हो, तुम अंधियारा अज्ञानों का<br />तुम एकाकी ज्योतिपुंज हो, तुम प्रकाश नव विज्ञानों का<br /><br />तुम ही तो पल पल पर विचलित, तुम्ही तो हो तन्मय चिन्मय<br />तुम्हें कहां परिचय आवश्यक , तुम परिचय का भी हो परिचय<br /><br />उल्का भी तुम, धूमकेतु तुम, तुम अनदेखे श्याम विवर हो<br />तुम नभ की मंदाकिनियों में प्राण प्रवाहक इक निर्झर हो<br />तुम हो यहाँ, वहाँ भी तुम हो और जहाँ तक उड़े कल्पना<br />तुम्हीं ध्यान हो तुम्ही साधना, तुम्ही वन्दना तुम्ही अर्चना<br /><br />एक तुम्हीं असमंजस के पल और तुम्ही तो हो दॄढ़ निश्चय<br />तुम्हें विदित है सबका परिचय और तुम्हारा सब को परिचय<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/15125972-2613803458190187429?l=geetkalash.blogspot.com'/></div>राकेश खंडेलवालhttp://www.blogger.com/profile/08112419047015083219noreply@blogger.com8tag:blogger.com,1999:blog-15125972.post-46970830576235081842009-02-23T06:41:00.000+05:302009-02-23T06:41:00.366+05:30सत्यापित करवाया प्रियतम<span style="color:#666600;">निशा तुम्हारेही सपनों को लाती है नित झोली में भर<br />तथ्य यही आंखों से मैने सत्यापित करवाया प्रियतम<br /><br />पा कर जिनका स्पर्श सुवासित हो जाती है किरन दूधिया<br />और रातरानी आंगन में फूल खिलाने लग जाती है<br />आशाओं के जुगनू के पर आशा से होते चमकीले<br />और सितारों की छायायें सावन गाने लग जाती हैं<br /><br />उनकी गलियों से जो आये हर झोंका मलयज का होवे<br />यह प्रस्ताव गंध से मैने प्रस्तावित कर पाया प्रियतम<br /><br />भाव ह्रदय के व्यक्त न होकर रह जाते हैं जब अनचीन्हे<br />सम्बन्धों के पथ में उगते संशय के बदरंग कुहासे<br />अवगुंठित होने लगते हैं धागे बँधे हुए रिश्तों के<br />धुँधलाने लगती तस्वीरें, बनी हुई जो चन्द्र विभा से<br /><br />भाव ह्रदय के तुम तक पहुँचें, इसीलिये शब्दों को मैने<br />सरगम के रंगों में रँग कर विज्ञापित करवाया प्रियतम<br /><br />ढलती हुई सांझ ने भेजा जिन सपनों को नेह निमंत्रण<br />उन्हें यामिनी बिठा पालकी अपने संग में ले आती है<br />लेकिन ढलती हुई उमर की निंदिया की स्मॄति की मंजूषा<br />उगती हुई भोर की चुटकी सुन कर खाली हो जाती है<br /><br />मैं जब देखूँ स्वप्न तुम्हारे, ऊषा पलक नहीं खड़काये<br />सूरज से कह आज नियम यह प्रतिपादित करवाया प्रियतम<br /><br />मन की भाषा कह पाने में शब्द सदा हो जाते अक्षम<br />और शब्द के सोचों से होठों तक अर्थ बदल जाते हैं<br />जागी हुई भावना मन की, जब चाहे संप्रेषित होना<br />तब तब आशंकाओं में घिर अधर थरथरा रह जाते हैं<br /><br />मेरे मन की बातें पहुँचें, बिन परिवर्तन ह्रदय तुम्हारे<br />उन्हें नयन की भाषाओं में अनुवादित करवाया प्रियतम</span><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/15125972-4697083057623508184?l=geetkalash.blogspot.com'/></div>राकेश खंडेलवालhttp://www.blogger.com/profile/08112419047015083219noreply@blogger.com5