tag:blogger.com,1999:blog-14977646.post-1122831487754774072005-07-31T06:34:00.000-07:002005-07-31T10:38:36.906-07:00बेकार हमें गम़ होता है..(जगजीत जी की सहराना आवाज़ में ग़ज़ल यहां सुनें)
सच ये है बेकार हमें गम़ होता है
जो चाहा था दुनिया में कम होता है
ढलता सूरज फैला जंगल रस्ता गुम
हमसे पूछो कैसा आलम होता है
ग़ैरों को कब फ़ुर्सत है दुख देने की
जब होता है कोई हम-दम होता है
ज़ख्म़ तो हम ने इन आंखों से देखे हैं
लोगों से सुनते हैं मरहम होता है
ज़हन की शाख़ों पर अशआर आ जाते हैं
जब तेरी यादों का मौसम होता हैNeeraj नीरज نیرجnoreply@blogger.com