tag:blogger.com,1999:blog-14854597.post-1129489043036645092005-10-16T11:40:00.000-07:002005-10-16T11:57:23.043-07:00जैनिटर-फायरफाईटर<span style="color: rgb(0, 102, 0);">हमारे एक मित्र हैं, वाद-विवाद में मास्टर| पहले हम साथ ही काम करते थे| हमने नोटिस किया कि भाई जान सुबह दफ़्तर देर से आयेंगे, दिन में कम्प्युटर पर गेम्स खेलेंगे, शाम को भी जल्दी कट लेंगे| चाहते तो हम भी यही थे पर शायद उनके जितना जिगरा हमारे पास नहीं था, और उनका मैनेजर भी अमेरीकी ऑफिस में रहता था| एक दिन कॉफी के दौरान हमने पूछ ही लिया कि भय्ये ये मा़ज़रा क्या है? तो जनाब बोले - "</span><span style="font-style: italic; color: rgb(0, 102, 0);">इस कम्पनी में दो तरह के लोग काम करते हैं - एक तो जैनिटर, जो रोज़ रोज़ का कचरा काम करने को रख छोडे हैं| और दूसरे फ़ायर-फ़ाईटर, जो कि उस्ताद लोग होते हैं पर उनकी ज़रूरत सिर्फ कुछ खास कामों और खास समय पर ही पडती है</span><span style="color: rgb(0, 102, 0);">"| अब उस वक्त तो यह सफ़ाईकर्मी-अग्निशामक थ्योरी सुन लिये, पर जब कुछ दिनों बाद उनका मैनेजर महीने भर के लिए यहाँ के ऑफिस आया तब जनाब के पैंतरे फिर बदल गये थे| अब तो सुबह-सुबह जल्दी आकर मैनेजर के साथ चाय पीते थे, दिन के हिसाब से १०-१५ ईमेल भी दुनिया के कोने-कोने में भेजते थे, शाम को डिनर-टाईम तक ऑफिस में पडे रहते थे| हम पैन्ट्री में इसी बदलाव पर चर्चा कर रहे थे, कि वे भी आ गये| जनाब जल्दी में थे, हम कुछ पूछते उस से पहले खुद ही बोले - "</span><span style="font-style: italic; color: rgb(0, 102, 0);">आ गया साला अमरीकी यहाँ आग लगाने!</span><span style="color: rgb(0, 102, 0);">" </span><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/14854597-112948904303664509?l=baakisabtheekhai.blogspot.com'/></div>Varun Singhnoreply@blogger.com1