tag:blogger.com,1999:blog-14743488.post-1124093410213099422005-08-15T02:07:00.000-06:002005-08-15T02:10:10.213-06:00भारति जय विजय करे,<br /> कनक शस्य कमल धरे/<br />लंका पदतल शतदल, गर्जितोर्मि सागर जल<br />धोता शुचि चरण युगल, स्तव कर बहु अर्थ भरे/<br />तरु तृण वन लता वसन, अन्चल मे खचित सुमन<br />गंगा ज्योतिर्जल कण, धवल धार हार गले/<br />मुकुट शुभ्र हिम तुषार. प्राण प्रणव ओंकार<br />मुखरित दिशायें उदार, शतमुख शतरव मुखरे/<br /> <span style="color:#3333ff;"> महाकवि सूर्यकान्त त्रिपाठी "निराला</span>"Bhaskar Lakshakarhttp://www.blogger.com/profile/18112544818203939650noreply@blogger.com