tag:blogger.com,1999:blog-138380922009-02-20T17:47:14.277-08:00डॉ॰ सरला अग्रवालडॉ॰ व्योमhttp://www.blogger.com/profile/10667912738409199754noreply@blogger.comBlogger7125tag:blogger.com,1999:blog-13838092.post-1121018435402503882005-07-10T10:54:00.000-07:002005-07-16T20:44:14.973-07:00परिचय<div align="justify"><a title="Photo Sharing" href="http://www.flickr.com/photos/vyomjpg/24920818/"><img style="WIDTH: 113px; HEIGHT: 144px" height="182" alt="sarala agrwal" src="http://photos21.flickr.com/24920818_34bc839a5e_m.jpg" width="143" /></a><br />12 जुलाई 1933 को बुलन्दशहर (उ॰प्र॰)में जन्मीं श्रीमती सरला अग्रवाल हिन्दी साहित्य की विभिन्न विधाओं में सृजन कर रही हैं। आपकी 25 पुस्तकें अब तक प्रकाशित हो चुकी हैं। लगभग 100 संकलनों में आपकी कहानियाँ, निबन्ध, कविताएँ, लघुकथाएँ एवं हाइकु कविताएँ प्रकाशित हुई हैं। देश की शीर्षस्थ पत्र–पत्रिकाओं में आपकी विभिन्न विधाओं की रचनाओं का अनुवाद गुजराती, मराठी, उर्दू और पंजाबी भाषा में हुआ हैं। देश के अनेक साहित्यिक कार्यक्रमों में सहभागिता। </div><p><span style="font-size:130%;color:#003300;">संपादन-</span><br />* 'शिशु स्वास्थ्य' त्रैमासिक पत्रिका का पिछले पन्द्रह वर्षों से निरन्तर संपादन।<br />* हाड़ौती के कथाकारों का हिन्दी कथा संकलन 'कथांचल'।<br />* लाइनेस क्लब के एक दर्जन से अधिक स्मारिकाएँ।<br />* 'शिशु एवं स्वास्थय' पुस्तक।<br /><span style="font-size:130%;color:#003300;">प्रसारण-</span> * आकाशवाणी कोटा से वार्ताएँ, कहानियाँ, भेंट वार्ताएँ एवं चिन्तन आदि का प्रसारण। </p><p><span style="font-size:130%;color:#003300;">प्रकाशित पुस्तकें</span>- </p><p align="justify"><span style="color:#003333;">कहानी संग्रह</span>- मुझे बेला से प्यार है (1992), मुट्ठी भर उजास (1995), सुबह होगी जरूर (1999), भोर की किरण (1999), मंजिल की ओर तथा वन्य कहानियाँ (2002), धूप उदास है (2001), चर्चित कहानियाँ (2001), दिन दहाड़े-लघुकथाएँ (2004), लौटती खुशियाँ (2004), टाँय-टाँय फिस्स (2004), यह तो आगाज है ।<br /><span style="color:#003300;">उपन्यास-</span> अनुमेहा (1997), एक कतरा धूप (1999)।<br /><span style="color:#003333;">निबन्ध-</span> व्यवहार आपका सुझाव हमारा (1995), समय के दस्तावेज (2002)।<br /><span style="color:#003300;">काव्य-संग्रह</span>- अन्तर्ध्वनि (2000)।<br /><span style="color:#003300;">वास्तु शास्त्र</span>- वास्तु दर्शन (1996), भारतीय वास्तु विज्ञान (1997)।<br /><span style="color:#003300;">अन्य</span>- स्मृतियों का सफर [संस्मरण]- 2000, बच्चे और उनकी देखभाल [रूपान्तरण] , सुधियों के इन्द्र धनुष (आत्मकथा)।<br /></p><span style="font-size:130%;color:#003300;"></span><p><span style="font-size:130%;color:#003300;">सम्प्रति</span>- सत्र 1987-88 में अन्तर्राष्ट्रीय लायनेस क्लब कोटा की अध्यक्षा तब से बराबर डायरेक्टर पद पर आसीन। * साहित्य की विभिन्न विधाओं में स्वतंत्र लेखन।<br /><span style="font-size:130%;color:#00cccc;"><span style="color:#003300;">सम्पर्क सूत्र-</span><br /></span><span style="color:#003300;">आस्था, 5-बी-20<br />तलवण्डी, कोटा (राज॰) 324005 </span><br /><span style="color:#003300;">दूरभाष- 0744-2405360 </span></p><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/13838092-112101843540250388?l=kavyakunjsa.blogspot.com'/></div>डॉ॰ व्योमhttp://www.blogger.com/profile/10667912738409199754noreply@blogger.com4tag:blogger.com,1999:blog-13838092.post-1120893921552025452005-07-09T00:24:00.001-07:002005-07-10T11:23:54.703-07:00डॉ॰ सरला अग्रवाल की हाइकु कविताएँ<div align="center">कीचड़ में भी<br />खिलना कमल का<br />सद् प्रयास।</div><div align="center"><br />***</div><div align="center"></div><div align="center">तीखे काँटों में<br />खिलना गुलाब का<br />कैसी बेबसी।</div><div align="center"><br />***</div><div align="center"></div><div align="center">देती प्रकाश<br />बलिदान होकर<br />बत्ती मोम की।</div><div align="center"></div><div align="center">***</div><div align="center"></div><div align="center"><br />घर के वृद्ध<br />हैं अनुभव बैंक<br />परिवार के।</div><div align="center"><br />***</div><div align="center"></div><div align="center">बुजुर्ग हैं वे<br />वट वृक्ष सरीखे<br />छाया देते हैं।</div><div align="center"></div><div align="center">***</div><div align="right"><br /><span style="color:#660000;">-डॉ॰ सरला अग्रवाल</span></div><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/13838092-112089392155202545?l=kavyakunjsa.blogspot.com'/></div>डॉ॰ व्योमhttp://www.blogger.com/profile/10667912738409199754noreply@blogger.com2tag:blogger.com,1999:blog-13838092.post-1120893879559599772005-07-09T00:24:00.000-07:002005-07-10T11:20:04.683-07:003-कविताएँ<span style="font-size:130%;color:#003300;"><strong>रुग्ण मानसिकता</strong></span><br /><span style="font-size:130%;color:#003300;"><strong></strong></span><br />हम दूर-दूर खड़े हैं<br />निर्जनों में छितरे मकानों की तरह<br />एक दूसरे से असंपृक्त<br />संवेदनशून्य !<br />बाहरी ताकतें मंडरा रही हैं<br />चील कौए सी, लीलने को तैयार।<br />सड़ी लाश हों जैसे............<br />हमें कोई चिन्ता नहीं<br />जो होगा देख लेंगे।<br />अभी बड़ा प्रश्न है............<br />अपने अहम् का<br />सोपान पर टिके रहने का<br />पीढ़ियों के प्रबन्ध का<br />चौराहों पर मढ़े जाने का............<br />हम कहते कुछ और हैं<br />करते कुछ और<br />दूसरों की आलोचना, आत्मप्रशंसा<br />इन्हीं हथियारों से<br />जीत लेना चाहते हैं<br />सारी दुनिया को<br />देश-काल-ज़रूरत<br />से<br />बेपरवाह!<br />***<br /><br /><br /><span style="font-size:130%;color:#003300;"><strong>घास<br /></strong></span><br /><br />घास खुद ही उग आई थी<br />न किसी ने बोया था<br />न किसी ने सींचा था<br />न खाद ही दिया था<br />मैदान के एक छोर से दूसरे छोर तक<br />ज़मीन से जुड़ी।<br />देती रही जीवन<br />अनाथ पशुओं को<br />करती रही पोषण उनका<br />मानव करता शोषण जिनका<br />घास बदले में कुछ माँगती नहीं<br />जैसी आई, वैसी गई<br />जब तक रही<br />देती रही<br />तन मन और धन।<br />घास<br />ज़मीन पर बिछी है<br />उठ सकती नहीं<br />वार कर सकती नहीं<br />तभी तो कुचली जाती है<br />चील होती तो उड़ जाती<br />आसमान में<br />शेर होती तो सटक लेती<br />समूचे को<br />कुत्ता होती तो भौंकती<br />भौं-भौं<br />मानव होती तो<br />पीठ पीछे छुरा घोंपती<br />छोड़ अपनों को दुर्दिन में<br />भाग लेती विदेशों को<br />अपना सुख खोजती<br />कुचली क्यों जाती जूतों से?<br />पर ये तो घास है!<br />अपनी ज़मीन से जुड़ी।<br />***<br /><br /><br /><span style="font-size:130%;color:#003300;"><strong>पीयूष</strong></span><br /><span style="font-size:130%;color:#003300;"><strong><br /></strong></span>जीवन होता व्यतीत<br />असमंजस में<br />पशोपेश में<br />पत्ते पीले पड़े, सूख गये<br />झड़ गये<br />ठूंठ खड़ा रह गया।<br />रीता घट रीता ही<br />लुढ़क गया<br />जीवन बीत रहा<br />असमंजस में।<br />पेशोपेश में।<br />जल की दो बूँदे<br />यदि ठूंठ पर पड़ जायें<br />वह वृक्ष हरा हो सकता है!<br />रस की कुछ धारें<br />रीते घट को मिल जायें<br />वह झरने सा झर सकता है<br />प्यासे की पयास बुझा सकता है!<br />प्रेरक पीयूष यदि जीवन को मिल जाये<br />असमंजस, पशोपेश से निकल वह<br />जीवन पथ पर आगे बढ़ सकता है।<br />प्रेम पीयूष यदि जीवन में झर जाये<br />मन का तम हर सकता है<br />औरों पर नेह लुटा सकता है!<br />प्रेम पीयूष यदि जीवन में पड़ जाये<br />क्या नहीं हो सकता है?<br /><br /></strong></span><div align="center"><br /><span style="color:#660000;">-डॉ॰ सरला अग्रवाल</span></div><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/13838092-112089387955959977?l=kavyakunjsa.blogspot.com'/></div>डॉ॰ व्योमhttp://www.blogger.com/profile/10667912738409199754noreply@blogger.com0tag:blogger.com,1999:blog-13838092.post-1120893844267614082005-07-09T00:23:00.001-07:002005-07-10T11:31:34.286-07:002- कविताएँ<span style="font-size:130%;color:#333300;"><strong>गृहिणी<br /></strong></span><br /><br />वह<br />उठती है मुँह अँधेरे<br />भोर कै प्रथम किरण के साथ<br />बना चाय<br />जगाती औरों को<br />बच्चों को भेज स्कूल<br />निभाती दायित्व घर के<br />कराती जमा<br />पानी बिजली के बिल<br />लाती सब्जी दाल-चवाल<br />नून तैल<br />संवारती घरौंदा।<br />भूल गई इन सभी के बीच<br />वह<br />कविता-सितार<br />गीत-नृत्य<br />कॉलिज की पढ़ाई<br />संगीत उसका परिवार की खुशियाँ<br />पढ़ाई उसकी<br />बच्चों को पढ़ाना<br />दौड़ते रहना<br />तेज रफ्तार जीवन च्रक में<br />बाँटते मृदुहास<br />धुरी, पति का विश्वास<br />आते याद<br />फुर्सत के वे दिन<br />बेफिक्र बचपन<br />हँसना-हँसाना<br />पर अब<br />जीवन के इस महायज्ञ में<br />जरूरी है<br />स्वंय समिधा बन<br />जीते जाना।<br />***<br /><br /><br /><span style="font-size:130%;color:#333300;"><strong>प्यार-विश्वास धीरज</strong></span><br /><br /><br />रेतीले मैदान की सर्द हवाओं में<br />कच्ची दीवार<br />तपती घास में फूस का नाजुक छप्पर<br />मंझधार में डूबते को<br />तिनके का सहारा<br />छलना है केवल!<br />प्रतीक्षा में आहट............<br />व्याकुलता में दर्शन............<br />गम में मयनोशी............<br />छलना है केवल!<br />पर ...........<br />शीत, तपन, मंझधार में<br />मिल जाये यदि प्यार की गरमाई<br />विश्वास का शीतल सागर<br />धीरज का सतत चप्पू<br />हो जाये नैया पार<br />मिल जाये अवश्य किनारा!<br /> ***<br /><div align="center"><br /><span style="color:#660000;">-डॉ॰ सरला अग्रवाल</span></div><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/13838092-112089384426761408?l=kavyakunjsa.blogspot.com'/></div>डॉ॰ व्योमhttp://www.blogger.com/profile/10667912738409199754noreply@blogger.com0tag:blogger.com,1999:blog-13838092.post-1120893820749427672005-07-09T00:23:00.000-07:002005-07-10T10:51:43.863-07:002 - कविताएँ<span style="font-size:130%;color:#333300;"><strong>मेरी व्यथा<br /></strong></span><br />चुभते रहते शूल से<br />हरदम, आठों प्रहर<br />उमड़ आई है<br />इन नयनों में<br />विश्व की सारी व्यथा<br />क्यों सोचा करते<br />इतना हम<br />कर पाते कुछ भी नहीं।<br />हो रहे उत्पात इतने<br />विश्व के हर क्षेत्र में<br />मानचित्र विश्व का<br />भर गया क्यों खून से<br />शांति, अहिंसा का नारा लगाते<br />विश्व-शांति का पुरस्कार पाते<br />देश-देश के बन्दी बनाते<br />नृशंसता का इतिहास रचते।<br />कौन है जो लील रहा?<br />कौन खंडित कर रहा ?<br />मानवता, संस्कृति, इतिहास को<br />इस धरा के हास को<br />मन चाहता है बाँधना<br />विश्व को बंधुत्व में<br />चाहता है तोड़ना<br />सीमा धरा की, धर्म की<br />जाति, रंग-भेद की<br />विश्व है यह मंच सारा<br />और हम सब पात्र हैं<br />इन्सानियत ही धर्म अपना<br />एकता है प्राण है।<br /> ***<br /><br /><br /><span style="font-size:130%;color:#333300;"><strong>क्या कहा कश्मीर दे दूँ?<br /></strong></span><br />क्या कहा कश्मीर दे दूँ?<br />हिन्द की जागीर दे दूँ?<br />यह कभी संभव न होगा, देश की तकदीर दे दूँ?<br />ये हमारे चश्मेशाही निशात नेहरूपार्क<br />डलझील झेलम के शिकारे तैरता वह सब्जबाग<br />गगन चुम्बी चिनारों की कतारें सुधा सम मेवा बदाम<br />मकरंध सुगन्ध केसर क्यारियाँ दे दूँ?<br />फूल फल ये शरबती खुशनुमा गुलबाग दे दूँ?<br />क्या कहा कश्मीर दे दूँ?<br />खड़ा साथ सदियों से नगेन्द्र जिसके<br />घाटियों में पुष्प हँसते, हरित अनुपम दृश्य खिलते<br />स्वर्ण लुटाता अंशुमाली हिम से मंडित जिस शिखर पे<br />गौरव देश का ये उन्नत भाल दे दूँ?<br />पर्वतों का ताज दे दूँ, हिन्द की यह ढाल दे दूँ?<br />अब गवारा है नहीं, देश की तलवार दे दूँ?<br />क्या कहा कश्मीर दे दूँ?<br />प्रकृति स्वयं लुटाती है जहाँ आभा<br />है स्वर्ण धरा पर यहीं, कहा फिरदौस ने कभी<br />अविभाज्य अंग है हमारा, यह जानते सभी<br />हिन्द के अनुपम चमन का अनमोल सुन्दर हीर दे दूँ?<br />अधखिले फूलों का बंसत दे दूँ? निर्झरों का नीर दे दूँ?<br />यह कभी संभव न होगा, देश की तकदीर दे दूँ?<br />क्या कहा कश्मीर दे दूँ?<br />वीराना हुआ गुलिस्तां हमारा, उदास हैं चिनार<br />रक्त रंजित झेलम का पानी, आतंकित हर प्राणी<br />सहमीं हैं नादान कलियां, फूलों में चुभे कांटे<br />औ दु:शासन! हाथ में क्या द्रौपदी का चीर दे दूँ?<br />यह कभी संभव न होगा, देश की प्राचीर दे दूँ?<br />क्या कहा कश्मीर दे दूँ?<br />***<br /><div align="center"><br /><span style="color:#660000;">-डॉ॰ सरला अग्रवाल</span></div><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/13838092-112089382074942767?l=kavyakunjsa.blogspot.com'/></div>डॉ॰ व्योमhttp://www.blogger.com/profile/10667912738409199754noreply@blogger.com0tag:blogger.com,1999:blog-13838092.post-1120893633855347592005-07-09T00:18:00.000-07:002005-07-10T11:57:38.016-07:00डॉ॰ सरला अग्रवाल की कविताएँ<span style="font-size:130%;color:#333300;"><strong>सह-अस्तित्व<br /></strong></span><br /><br />एक नन्हीं सी बेल उग आयी मेरे समीप<br />जीने दिया मैंने उसे दे जगह आश्रय समीर<br />प्राणसुधा से सींचा अहर्निश उर की<br />बढ़ चली वह, बन गयी विशाल वल्लरी<br />खिल उठे कोमल हरित-लाल किसलय देह पे<br />करने लगी सबको सुवासित निज नेह से<br />प्रमुदित हृदय हो गया जब पुष्प पल्लव छा गये<br />मधु गंध सुगन्ध अनुपम लिए वह खिल उठी<br />छा गयी मुझे उसने अस्तित्व से अपने<br />है नाम ही उसका अब शोभा उसी की<br />कहाँ गया मैं? विस्मित हुआ, आहत हुआ<br />प्रेरणा थी मेरी उसे, श्रम था जिलाने का<br />मंतव्य कहाँ था अपनी बना खुद को मिटाने का<br />खो दिया अस्तित्व अपना समर्थ होकर भी अरे!<br />कोमल मधुर तन्वंगी लता सबकी प्रिये?<br />कहाँ रहा मैं, क्या हुआ यह, रो पड़ा मैं<br />नष्ट र दूँ क्या लता को, सम्मान पाने के पुन:<br />`क्यों समझते हीन खुद को', कह उठी शोभित लता<br />पूरक हैं परस्पर, सह-अस्तित्व अपना अमर<br />मैं हूँ तुम्हीं से, तुम मुझी से शोभित सदा<br />है सत्य सृष्टि का यही ओ प्रवर।<br />***<br /><br /><span style="font-size:130%;color:#333300;"><strong>अह्म ब्रह्मास्मि!<br /></strong></span><br /><br />दुख अन्धकार नैराश्य<br />बेबसी बेवफाई मुफतलिसी<br />का चढ़ावा चढ़ाते रहे तुझे<br />है प्रभो सर्वशक्तिमान कहकर<br />सदा रिझाते रहे हम तुझे<br />माँगत रहे सुख अपने लिए<br />दुख अर्पित कर तुझको अपने!<br />कब किसने सोचा<br />तेरे मन की गहराई को<br />कब कौन बना तेरा अपना<br />पलांश भर की अमराई को<br />जिसके अपना कह सकता तू<br />लगे कितना भी हास्यापद यह<br />पर कब किसने सोचा यह<br />यह ध्यान मुझे तब आया<br />जब स्वयं ब्रह्य बनना चाहा मैंने<br />`अहम् ब्रह्यास्मि' का नाद जगा<br />मन में जब मेरे<br />तब लगा मुझे<br />मैं खुद लिए नहीं<br />हूँ औरों के लिए<br />तू ही मैं हूँ मैं ही तू है<br />हुआ मैं अद्वैत द्वैत से<br />मैं ही ब्रह्य<br />मुझमें ये सारा जग<br />नाम अनेक, विश्चनियंता एक ब्रह्म<br />ये, वह, तुम और सब<br />बच्चे हैं मेरे<br />व्यथित क्षुधित बेबस विकलांग<br />मैं ही केवल संबल सबका<br />अहम् ब्रह्मास्मि!<br />अब है इसमें कहाँ गुंजायश<br />दुख की, अपने टूटेपन की<br />सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान निर्विकार<br />सुख-दुख से परे, विदेह<br />होकर ही बन सकता मानव ब्रह्म।<br />और इसीलिए तो मानव<br />न बन पाया ब्रह्म कभी<br />स्वीकार किया तुझको प्रभु अपना<br />मान तुझे सर्वशक्तिमान महान्!<br />यह सामर्थ्य तुम्हीं में भगवन्<br />होते दुखियों के साथ दुखी तुम<br />हरते सबका दुख<br />देकर सबको शांति अपार<br />बन जाते संबल सबका तुम<br />कर कृपा भक्त को अपने<br />बना देते भगवान!<br />***<br /><div align="center"><span style="color:#660000;">-डॉ॰ सरला अग्रवाल</span></div><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/13838092-112089363385534759?l=kavyakunjsa.blogspot.com'/></div>डॉ॰ व्योमhttp://www.blogger.com/profile/10667912738409199754noreply@blogger.com0tag:blogger.com,1999:blog-13838092.post-1119347104326573142005-06-21T02:44:00.000-07:002005-08-17T10:32:08.126-07:00प्रतिक्रियाकाव्य कुन्ज पर पहुँचें <span style="font-family:webdings;font-size:78%;"><a href="http://www.kavyakunj.blogspot.com">gg</a></span><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/13838092-111934710432657314?l=kavyakunjsa.blogspot.com'/></div>डॉ॰ व्योमhttp://www.blogger.com/profile/10667912738409199754noreply@blogger.com2