tag:blogger.com,1999:blog-13256792.post-1118860859970607352005-06-15T11:40:00.000-07:002005-06-24T11:25:46.860-07:00गज़ल़ें<p><span style="font-size:130%;color:#003333;">[1]</span></p><br /><span style="font-size:130%;">कारगर शिकारी की आँख के इशारे हैं ।<br />एक तीर से उसने कितने लोगा मारे हैं।।<br /><br />ढूँढ़ते हो क्या इनमें, आज तक इन आँखों ने।<br />ख़्वाव ही सजाए हैं ख़्वाब ही सँवारे हैं।।<br /><br />हिन्दू है न मुस्लिम है, सिक्ख है न ईसाई।<br />इक पवित्र दरिया है, जिसके चार धारे हैं।।<br /><br />लोग तो बदी करके भी गुजार लेते हैं।<br />इस जह़ान में हम तो नेकियों के मारे हैं।।<br /><br />बेहयाई का रोना किसके आगे रोया जाए।<br />इस हमाम में ऐ भक्त बेलिबास सारे हैं।।<br />***<br /><br /><br /></span><span style="font-size:130%;"><span style="color:#003333;">[2]<br /></span><br />तनहाई में बैठ के रो लो।<br />सबसे मन का भेद न खोलो।।<br /><br />आँखें सच-सच बोल रही हैं।<br />दर्पन से तुम झूठ न बोलो।।<br /><br />सूरज सर पर आ पहुँचा है।<br />अब तो जागो आँखें खोलो।।<br /><br />रहते हो क्यों चुप चुप-चुप चुप।<br />बोलो बोलो कुछ तो बोलो।।<br /><br />या तो किसी को अपना बना लो।<br />या फिर भक्त किसी के हो लो।।<br />***<br /><br /><br /><br /><span style="color:#990000;"></span><span style="color:#003333;">[3]</span><br /></span></span><span style="color:#003333;"><br /></span><span style="font-size:130%;">अपने चारों ओर हैं फैले अन्धे गूँगे।<br />इतने कभी देखे न सुने थे अन्धे बहरे गूँगे।।<br /><br />लिखने वाला कितने दुख से ये इतिहास लिखेगा।<br />हम हर नाजुक समय पे हो गए अन्धे बहरे गूँगे।।<br /><br />हमसे बढ़कर कौन भला है अन्धा बहरा गूँगा।<br />हमने सर आँखो पे बिठाए अन्धे बहरे गूँगे।।<br /><br />कैसे कैसे हिम्मत वाले निकले सीना ताने।<br />एक ही पल में हो गए कैसे अन्धे बहरे गूँगे।।<br /><br />भक्त ये किन लोगों से तुमने बाँधी हैं आशाएँ।<br />देखेंगे कब खैर के सपने अन्धे बहरे गूँगे।।<br />***<br /><br /><br /><span style="color:#003333;">[4]</span><br /></span></span><span style="color:#990000;"></span></span><div align="left"><br /><span style="font-size:130%;">वाणी में अमृत रस घोलो।<br />अच्छा सोचो अच्छा बोलो।।<br /><br />कविता की सरिता के तट पर।<br />मन की मैली चादर धोलो।।<br /><br />पिछले पहर में हर आहट पर।<br />घर के दरवाजे मत खोलो।।<br /><br />जीवन है इक रात अँधेरी।<br />मेरी मानो थोड़ा सोलो।।<br /><br />भक्त की कोमल निर्मल बातें।<br />बातों को फूलों से तौलो।।<br /><br />और भी घर हैं इस बस्ती में ।<br />और किसी के भी घर होलो।।<br />*** </span></div><div align="center"><br /><span style="font-size:130%;color:#000000;">-ठा॰ गंगाभक्त सिंह भक्त<br /></span><span style="font-size:78%;"><span style="font-family:webdings;color:#c0c0c0;">ggggggggggggggggg</span><br /></div></span></span></span><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/13256792-111886085997060735?l=kavyakunjgbs.blogspot.com'/></div>डॉ॰ व्योमhttp://www.blogger.com/profile/10667912738409199754noreply@blogger.com0