tag:blogger.com,1999:blog-13092120.post-1121614367202519542005-07-17T08:32:00.001-07:002005-07-19T10:52:05.623-07:00कविताएँ<span style="font-size:130%;color:#003333;">तमाशा<br /></span><br />तमाशा जारी है<br />साँप नेवले को<br />डस नहीं पाता<br />नेवला हर-बार छोड़ देता है<br />साँप को जिंदा<br />और फिर<br />मदारी की झोली में<br />बरसते हैं सिक्के।<br />चौराहे, गालियाँ, गाँव, शहर<br />बदलते जाते हैं<br />डमरू बजता रहता है<br />भीड़ जुटती रहती है<br />तमाशा चलता रहता है<br />सब् जानते हैं<br />साँप नहीं डसेगा नेवले को<br />नेवला मार नहीं पाएगा साँप<br />फिर भी<br />तमाशबीनों के हाथ<br />फेंकते रहेंगे सिक्के<br />अपनी ही मर्जी के ख़िलाफ़।<br />***<br /><br /><br /><span style="font-size:130%;color:#003333;">शगल</span><span style="font-size:130%;color:#003333;"><br /></span><span style="font-size:130%;color:#003333;"><br /></span>घिर जाती है लड़की<br />रात के अँधेरे में<br />सुबह होने तक बेसाख्त़ा<br />डराते हैं उसे ख्व़ाबों के खौफनाक चेहरे<br />टपकता है<br />टूटकर तारा कोई<br />और अटक जाता है<br />लड़की के उलझे बालों में<br />जिसे वह घबराकर<br />छुड़ाती है हर दिन<br />सूरज की पहली किरणों की<br />कंघी से।<br /></span>***<br /><br /><br /><span style="font-size:130%;color:#003333;">भाषा स्पर्श की</span><br /><span style="font-size:130%;color:#003333;"><br /></span>आहटों का अर्थ, भाषा स्पर्श की<br />वो हृदय समझेगा जिसमें प्यार है<br />सृष्टि का कण-कण बँधा है स्नेह से<br />स्नेह मत विघटित करो संदेह से<br /></span>ये तो प्रकृति का अमर उपहार है<br />यूँ लगेगा जग अगर ना स्नेह हो<br />रक्त बिन निर्जीव जैसे देह हो<br />प्यार है बस इसलिए संसार है<br />विष घृणा का डस न ले जीवन की बेल<br />स्नेह–रस चख लो हो मन से मन का मेल<br />प्यार करना स्वंय पे उपकार है<br />***<br /><br /><span style="font-size:130%;color:#003333;">गीत मेरे !</span><br /><br />गीत मेरे किसी को उदास मत करना<br />किसी नैन–गागर में नीर मत भरना<br />दुख अपना तू मन के शीशे में जड़कर<br />मुस्काना सीख ले ख़ुशी से बिछड़कर<br />पीड़ा की चाप अधर द्वार मत धरना<br />संगम हृदय का हृदय से कराने<br />द्वेष–आँधियों में प्रेम-दीपक जलाने<br />मरने से भी तू सौ–बार मत डरना<br />कंठ मौन होगा ये स्वर मौन होगें<br />एक दिवस जब मेरे अधर मौन होगें<br />पतझड़ के फूलों सा तू मत बिखरना।<br /> ***<br /><span style="color:#330000;"></span><br /><div align="center"><span style="color:#330000;">-जया नर्गिस</span></div>Dr.vyomhttp://www.blogger.com/profile/07520058687349196109noreply@blogger.com