tag:blogger.com,1999:blog-13053295.post-61134313564860672972007-03-13T16:46:00.000-07:002007-03-13T16:46:07.185-07:00वानरतंत्र<span style="color:#000099;">प्राचीन समय में अनंत वन में शक्तिशाली सिंह अभयंकर का एकक्षत्र राज्य था. अभयंकर एक अत्यंत ही निपुण, शिक्षित, साहसी, विद्वान एवं उदार शासक था तथा राज्य को सुचारुपूर्वक चलाने में पूर्णतः सक्षम था. अनंत वन के सभी प्राणी और समस्त पड़ोसी राज्यों के राजा अभयंकर का आदर करते थे.<br /><br />परंतु हर राज्य या राष्ट्र में ऐसे तत्व अवश्य होते हैं जिनकी मानसिकता विनाशकारी होती है और उनको किसी भी प्रकार के संतुष्ट नहीं किया जा सकता है. दुर्भाग्यवश, अनंत वन के वानर इसी श्रेणी के नागरिकों में आते थे. वानर समुदाय चोरी, तोड़ फोड़, अन्य नागरिकों के कार्य में विघ्न पहुँचाने तथा वन के नियमों का उल्लंघन करने में अग्रणी था. राज्य में उचित व्यवस्था बनाये रखने के लिये अभयंकर ने कड़े नियम स्थापित कर रखे थे और इन्हीं नियमों के कारण वानर खुल कर मनमानी करने में अक्षम थे. इसी कारण से समस्त वानर अभयंकर से क्षुब्ध थे और उसको किसी प्रकार से अपदस्थ करना चाहते थे.<br /><br />एक दिन वानरों का मुखिया दुष्कामी घूमते घूमते पड़ोसी राज्य जनराष्ट्र में पहुँच गया. जनराष्ट्र अनंत वन का मित्र राज्य था और वहाँ के अधिकांश नागरिक सुशिक्षित तथा स्व-अनुशासित थे. दुष्कामी को जनराष्ट्र के राज-काज की पद्धति अलग सी प्रतीत हुई अतः वो जनराष्ट्र में कुछ दिनों के लिये रुक गया वहाँ के राज-काज की पद्धति के बारे में जानकारी प्राप्त करने के लिये.<br /><br />कुछ दिनों के पश्चात दुष्कामी अनंत वन वापस आया और उसने घूम घूम कर सभी नागरिकों को ये बताना प्रारम्भ कर दिया कि जनराष्ट्र किस प्रकार से भिन्न है. दुष्कामी ने एक नागरिक सभा का आयोजन किया और नागरिकों को सभा में आने के लिये निःशुल्क भोजन का लोभ दिया. सभा में दुष्कामी ने बताया कि जनराष्ट्र में प्रजातंत्र है – राज्य के नागरिक मिल जुल कर ये निर्णय लेते हैं कि उनका शासक कौन बने. कोई भी नागरिक राज्य के शासक के पद के लिये अपना नामांकन कर सकता है भले ही वो अशिक्षित या भ्रष्टाचारी ही क्यों न हो. राज्य के नागरिक मतदान देकर निर्वाचन में खड़े किसी एक उम्मीदवार को अपना शासक चुनते हैं.<br /><br />अनंत वन के सभी नागरिकों को प्रजातंत्र का विचार बहुत ही भाया और सभी ने अभयंकर के समक्ष अपने विचार प्रस्तुत किये. अभयंकर ने कहा कि यदि प्रजातंत्र के माध्यम से एक अत्यंत सक्षम शासक का चयन हो सकता है जो कि राज्य को कुशलतापूर्वक सुचारु रूप से चला सके, तो मुझे प्रजातंत्र से कोई आपत्ति नहीं है. अभयंकर ने उसी समय घोषणा की कि अनंत वन में प्रजातंत्र की स्थापना की जा रही है और अगले माह शासक चुनने के लिये मतदान किये जायेंगे.<br /><br />निर्वाचन हेतु दुष्कामी और अभयंकर का नामांकन हुआ. अभयंकर को विश्वास था कि अनंत वन की जनता दुष्कामी जैसे दुराचारी की जगह उस जैसे निपुण, शिक्षित, साहसी, एवं विद्वान को ही अपना शासक चुनेगी. परंतु सभी वानरों ने, जो कि समस्त राज्य की 25 प्रतिशत जनसंख्या थी, दुष्कामी को ही अपना मत दिया. वानरों के अतिरिक्त राज्य के अशिक्षित नागरिकों ने भी दुष्कामी द्वारा दिये गये उपहारों को स्वीकार कर के अपना मत दुष्कामी के हित में डाल दिया. अंततः चुनाव परिणाम ने दुष्कामी को अनंत वन का शासक घोषित किया.<br /><br />दुष्कामी के विजयी होते ही समस्त वानर और उनके जैसी मानसिकता रखने वाले अन्य नागरिकों की पौ-बारह हो गयी. और, देखते ही देखते समस्त राज्य में अराजकता फैल गयी.<br /><br />प्रति वर्ष चुनाव होते पर परिणाम सर्वदा एक ही होता – दुष्कामी की विजय, अभयंकर की पराजय और अराजकता का विस्तार. अंततः अभयंकर ने राजनीति से सन्यास ले लिया और एक विद्यालय की स्थापना की. विद्यालय स्थापना के दिवस एक नागरिक ने अभयंकर से पूछा कि उसने किसी और कार्य के बारे में क्यों नहीं सोचा. अभयंकर ने उत्तर दिया -<br /><br />किसी भी प्रजातंत्र की सफलता के लिये ये अत्यंत ही आवश्यक है कि उस राज्य या राष्ट्र के अधिकांश नागरिक शिक्षित, स्वयं ही अनुशासित हों, भ्रष्ट न हों, और सही और गलत को पहचानते हुये उचित निर्णय में सक्षम हों. और, ये तभी संभव है जब कि शिक्षा की आधारशिला ऐसे नागरिक बनाने के लिये रखी जाये. मेरे विचार से अनंत वन के नागरिक इस प्रकार से शिक्षित नहीं किये गये थे. हम लोगों ने शिक्षा को मात्र गणित, भौतिकी और रसायन शास्त्र की सीमाओं में बाँध दिया है. मेरा ऐसा मानना है कि अनंत वन प्रजातंत्र के लिये तैय्यार नहीं था, और, प्रजातंत्र की इमारत बिना एक ठोस आधारशिला के खड़ी कर दी गयी. बंदर के हाथ में कृपाण दोगे तो वो दूसरों के साथ साथ अपनी भी गर्दन काट डालेगा. प्रजातंत्र एक कृपाण ही है – इसे देने से पूर्व यह निश्चित कर लेना चाहिये कि इसे ग्रहण करने वाला इसको उचित प्रकार से प्रयोग में ला भी पायेगा अथवा नहीं. इस विद्यालय की स्थापना के पीछे मेरा एक मात्र उद्देश्य है अज्ञानता का विनाश कर के अच्छे नागरिक बनाना जो कि प्रजातंत्र को एक उचित दिशा में ले जा सकें – स्वार्थ रहित. और, इस वानरतंत्र को हटा कर एक वास्तविक प्रजातंत्र की स्थापना कर सकें.<br /><br />अभयंकर ने जगह जगह इस प्रकार के विद्यालयों और महा-विद्यालयों की स्थापना की - परिणाम स्वरूप अगली पीढ़ी के नागरिकों ने अभयंकर जैसे योग्य व्यक्ति को एक बार पुनः शासक के पद पर स्थापित कर दिया.<br />*****<br /></span></span>अतुल श्रीवास्तवhttp://www.blogger.com/profile/17285074473402112374noreply@blogger.com