tag:blogger.com,1999:blog-13053295.post-19827477268517744422007-03-13T16:45:00.000-07:002007-03-13T16:45:21.642-07:00नामों का चक्कर.<span style="color:#6666cc;">पुनीत और सुनीत जुड़वा भाई – दोनों ही पढ़ने में अव्वल. बिना कोई कोचिंग किये ही दोनों ने भारतीय औद्योगिकी संस्थान (आई. आई. टी.) की दीवार पार कर ली और चार साल बाद कैंपस में आने वाली प्रसिद्ध कंपनियों की साक्षात्कार की पंक्तियों में खड़ा होना शुरू कर दिया.<br /><br />अधिकतर भारतीय अभियाँत्रिकी (इंजीनियरिंग) छात्रों की तरह पुनीत और सुनीत भी एक नामी गिरामी साफ्टवेयर कंपनी के अंग बन गये – अब ये बात तो बेकार की ही है कि पुनीत ने मेकैनिकल और सुनीत ने केमिकल में इंजीनियरिंग की है. खैर, अधिकतर भारतीय साफ्टवेयर अभियंताओं (इंजीनियर) के पद चिन्हों पर चलते हुये पुनीत और सुनीत भी पहुँच गये संयुक्त राज्य अमेरिका – संक्षिप्त में अमेरिका.<br /><br />अभी जेट लैग पूरी तरह से ठीक भी नहीं हुआ था कि ऑफिस के लोगों ने एक पिकनिक का आयोजन कर दिया. दोनों बन्धु भी पहुँच गये – सोचा इसी बहाने लोगों से खुल कर मिलना जुलना भी हो जायेगा. कुछ देर बाद पुनीत को अचानक कुछ याद आया और आदतन सुनीत को उसके घर के नाम से पुकार बैठा, “ए रिंकू, अब घर के लिये निकलते हैं. आज घर फोन करना है.” सुनीत ने पलट कर कहा, “क्या यार चिंकू, अभी से? खैर चल मैं भी साथ में चलता हूँ.”<br /><br />पुनीत और सुनीत का वार्तालाप पास खड़े डैन के कानों में भी पड़ गया. उससे रहा नहीं गया और उसने सुनीत से पूछ ही डाला, “तुमको पुनीत ने अभी क्या कह कर पुकारा?”<br /><br />“रिंकू”<br /><br />“ये क्या है?”<br /><br />“मेरा नाम.”<br /><br />“पर तुम्हारा नाम तो सुनीत है.”<br /><br />“हाँ. पर रिंकू मेरा घर का नाम है. जैसे कि चिंकू पुनीत का.”<br /><br />“तो क्या तुम दोंनो भाईयों के दो दो नाम हैं.”<br /><br />“हाँ. अधिकतर भारतीयों के दो नाम होते हैं.”<br /><br />“वाह. ऐसा तो मैंने आज तक नहीं देखा या सुना था. नामों को छोटा करना तो सामान्य है – जैसे कि थॉमस का टाम, जेफरी का जेफ या रिचर्ड का रिच, पर दो दो नाम... पता करना पड़ेगा कि ऐसा किसी और भी देश में होता है क्या. पर ये दो दो नाम क्यों.”<br /><br />“अब ये तो मुझे पता नहीं. अब आदमी ही क्यों, हमारे तो देश के भी दो नाम हैं – इंडिया और भारत.”<br /><br />“ये तो मुझे पता ही नहीं था कि इंडिया का एक और भी नाम है – भारत.”<br /><br />“भारत नाम उसी तरह है जैसे कि रिंकू या चिंकू. ये नाम बस घर के भीतर ही लिया जाता है. पढ़े लिखे और सभ्य लोगों के बीच में इंडिया नाम ही लिया जाता है जैसे कि पुनीत या सुनीत.”<br /><br />“रिंकू और सुनीत के अलावा भी और कोई नाम है तुम्हारा?”<br /><br />“हाँ है न. मेरा राशि का नाम. मेरा राशि का नाम ‘ब’ से शुरू होना था, इसलिये पिता जी ने ‘बद्रीनाथ’ रख दिया.”<br /><br />“फैसिनेटिंग! तो फिर इंडिया, भारत...”<br /><br />“और हिन्दुस्तान... ये तीसरा नाम न बस ऐंवे ही होता है.”<br /><br />“तो क्या मुअन जोदारो के समय से ही दो दो नामों का प्रचलन है?”<br /><br />“इस बारे में तो कभी सोचा ही नहीं. भाई मैं कोई इतिहासकार तो नहीं हूँ, पर मेरे विचार से पहले शायद ऐसा नहीं था. मैंने अशोक, हर्षवर्धन, चंद्रगुप्त, अकबर, शिवाजी और बिम्बसार वगैरह के कभी दूसरे नाम तो नहीं पढ़े या सुने. मेरे बाबा और पर-बाबा के भी दो नाम नहीं थे.”<br /><br />“तो फिर ये नया फैशन होगा.”<br /><br />“नहीं नया तो नहीं है. मुझे लगता है ये सब आजादी के बाद ही शुरू हुआ है.”<br /><br />“खैर, मुझको तो इतने सारे नामों का कोई खास फायदा नहीं समझ में आता है.”<br /><br />“सो तो है. इसी लिये अब हम लोग भी दूसरे नाम को छोड़ने लगे हैं. नई पीढ़ी में बच्चों के अब एक ही नाम रखे जाते हैं.”<br /><br />“तो फिर इंडिया...”<br /><br />“यहाँ भी दूसरे नाम को छोड़ना शुरू कर दिया है. अब देखो न टीवी कार्यक्रम का नाम रखा गया है ‘शाबाश इंडिया’ गाना लिखा गया है ‘आई लव माई इंडिया, वतन मेरा इंडिया..’”<br /><br />“देर आये दुरुस्त आये.”<br /><br />“ओके डैन मैं अब चलता हूँ. घर जाकर इंडिया फोन करना है.”<br /><br />****<br /></span>अतुल श्रीवास्तवhttp://www.blogger.com/profile/17285074473402112374noreply@blogger.com