tag:blogger.com,1999:blog-13053295.post-80864124736846233742007-06-05T18:10:00.000-07:002007-06-05T18:10:00.000-07:00स्मृतियाँ बहुत निष्ठुर होती हैं. जितना छिपाने की क...स्मृतियाँ बहुत निष्ठुर होती हैं. जितना छिपाने की कोशिश करी जायेगी, उतना ही सामने आ कर खड़ी होती जायेंगी. इन स्मृतियों में जीवन का कितना वक्त छिपा पड़ा है और वक्त में कितने लमहे - कुछ मीठे, कुछ नमकीन, कुछ चटपटे और शायद कुछ कड़वे भी. इन सब स्मृतियों और यादों के साथ कुछ चेहरे भी जुड़े हैं - अपनों के चेहरे जो वास्तविकता में तो शायद हाथ छुड़ा कर चले गये हों लेकिन इन निष्ठुर यादों ने उन्हें वैसा ही संजो कर रखा है. उन अपनों से जो इन यादों में आज भी बसे बसे हैं, हम कैसे बच पायेंगे? <BR/><BR/>यादों में वो<BR/>सपनों में है<BR/>जायें कहाँ<BR/>धड़कन का बंधन तो धड़कन से है. <BR/><BR/>सपनों को दूँ मैं कैसे भुला<BR/>अपनों से हूँ मैं कैसे जुदा.अनुराग श्रीवास्तवhttp://www.blogger.com/profile/03416309171765363374noreply@blogger.com