tag:blogger.com,1999:blog-127157552008-04-15T17:26:22.727-07:00सुभाष यादव भारतीDr.vyomhttp://www.blogger.com/profile/07520058687349196109noreply@blogger.comBlogger6125tag:blogger.com,1999:blog-12715755.post-1115710893282704372005-05-10T00:40:00.000-07:002006-03-31T09:42:31.593-08:00परिचय<a href="http://photos1.blogger.com/blogger/5497/1090/1600/subhash%20yadav.jpg"><img style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://photos1.blogger.com/blogger/5497/1090/320/subhash%20yadav.jpg" border="0" /></a><br /><br /><br /><br /><br /><div align="justify"><br /><span style="color:#000000;">01 अप्रैल 1962 को चन्द्रपुरा (शिवपुर) जिला होशंगाबाद में जन्में श्री सुभाष यादव 'भारती' डाक विभाग में कार्यरत हैं। आपकी कविताओं में व्यंग्य का पुट रहता है। सुभाष यादव हास्य-व्यंग्य कविताएँ, क्षणिकाएँ, मुक्तक, गीत आदि लिखते हैं। संगीत, चित्रकारी एवं अध्ययन में आपकी गहरी रुचि है। देश भर की पत्र-पत्रिकाओं में आपकी रचनाओं का अनवरत प्रकाशन होता रहता है।</span></div><div align="justify"><span style="color:#ffff00;"><span style="color:#3333ff;">प्रकाशित पुस्तक-<br /></span><span style="color:#3366ff;">* </span></span><span style="color:#003333;"><span style="font-size:130%;">कुछ तो ईमान धरम रखो संस्मरण</span><br /></span>सम्पर्क सूत्र—<br /><span style="font-size:130%;color:#3333ff;">एल.आई.जी.—बी 223</span></div><div align="justify"><span style="font-size:130%;color:#3333ff;">हाउसिंग बोर्ड कालोनी<br />होशंगाबाद म.प्र. 461001</span></div><div align="justify"><span style="font-size:130%;color:#3333ff;"><br /></span>दूरभाष— <span style="color:#ff6666;">07574-257099</span></div><div align="justify"><span style="color:#ff6666;"></span></div><div align="justify"><span style="color:#ff6666;">e-mail : <a href="mailto:subhashpnt@yahoo.co.in">subhashpnt@yahoo.co.in</a></span></div>Dr.vyomhttp://www.blogger.com/profile/07520058687349196109noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-12715755.post-1115710802677155462005-05-10T00:35:00.000-07:002005-09-20T10:46:12.770-07:00कविता<ul><li><strong><span style="font-size:130%;"><span style="color:#33cc00;">पिंजरे में कैद पंछी</span><br /></span></strong></li></ul><br /><span style="color:#000000;">पिंजरे में कैद<br />एक पंछी ने<br />हमसे किया सवाल—<br />न हमने कहीं डाला डाका<br />न किसी की आबरू पर ताका<br />न किसी देशद्रोही का दिया साथ<br />न हमारा किसी हवाले में है हाथ<br />फिर बताइये, हमें किस लिए किया है बंद<br />यही सवाल हमारे दिमाग में घूम रहे हैं चंद ।<br />आखिर कैसा है तुम्हारा ये लोकतंत्र ?<br />जबकि ये तमाम अपराधी घूम रहे हैं स्वतंत्र<br />हमने कहा भाई !<br />तुम्हारी बात में है शत् प्रतिशत् सच्चाई<br />तुम्हें बंद रखने के इनमें से कोई नहीं हैं कारण<br />तुम तो पंछी जाति में<br />मनुष्य जैसे बोलने वाले एकमात्र हो उदाहरण<br />तुम दिखते हो सुन्दर<br />तुम्हारा नाम है तोता<br />तुम्हारे घर में होने से आदमी<br />अकेले होने पर भी अकेला नहीं होता<br />तुम्हारे बात करने से भाग जाते हैं चोर<br />वे सोचते हैं, क्या मालूम इस घर में<br />न जाने कितने आदमी हैं और<br />तुम करते हो बातें बड़े शान की<br />तुम्हारे इन्हीं गुणों के कारण<br />तुम्हें दहेज में साथ लायी थीं माँ जानकी<br />ऍसा ही एक और हमने,<br />गीता में पढ़ा है तुम्हारा प्रसंग<br />जब तुम ॠषियों के रहते थे संग<br />वहाँ ॠषियों के बालक<br />रोज मंत्रों का करते थे गुणगान<br />वे मंत्र तुम सीख गए थे श्रीमान्<br />लेकिन एक दिन एक चोर ने तुम्हे चुराया<br />और ले जाकर एक वेश्या को थमाया<br />तुम वहाँ भी उन मंत्रों को गुनगुनाने लगे<br />और रोज उस वेश्या को सुनाने लगे<br />तुम्हारी इस प्रक्रिया से<br />उस वेश्या का अन्तःकरण हो गया शुद्ध<br />वह सद्गति पा गई<br />और मित्र उस दिन से यह बात<br />हमारे दिल को भा गई ।<br />कि तुम इसी तरह किसी दिन खोल दो<br />ईश्वर से जुड़ने का कोई रहस्य या कोई भेद<br />और सच पूछो तो, शायद इसीलिए<br />तुम्हें पिंजरे में रखा गया है कैद ।।<br /><br /></span><span style="color:#ffff00;"></span><span style="color:#3333ff;">--000--<br /></span><br /><div align="center"><span style="color:#ff9900;">:: सुभाष यादव ::<br /></span><br /></div>Dr.vyomhttp://www.blogger.com/profile/07520058687349196109noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-12715755.post-1115710284930106482005-05-10T00:30:00.000-07:002005-12-10T00:01:21.766-08:00दोहेदोहेDr.vyomhttp://www.blogger.com/profile/07520058687349196109noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-12715755.post-1115709960406858112005-05-10T00:23:00.000-07:002005-09-20T10:48:16.086-07:00कविता<span style="font-size:180%;color:#003300;"><strong>पन्नी बीनते बच्चे<br /></strong></span><br /><br /><span style="color:#000000;">वे बच्चे<br />जो बीनते हैं पन्नी<br />कब हो जाते जवान<br />पता ही नहीं चलता श्रीमान<br />कब लग जाते कमाने<br />उन्हें आज तक<br />कोई नहीं गया स्कूल दिखाने<br />उन्हें जन्म से ही<br />दिखा दी जाती है रोटी<br />फिर वे रोटी के चक्कर में<br />बीनने निकल पड़ते पन्नी<br />कहीं से उठाते प्लास्टिक का जूता<br />कहीं से प्लास्टिक की छन्नी ।<br />यह देख हर मोहल्ले का कुत्ता<br />उन पर भौंकता<br />हर आदमी उनको टोंकता<br />कई तो दे देते गाली<br />मगर श्रीमान् ! आज तक उन्होंने<br />किसी के विरुद्ध आवाज़ तक नहीं निकाली<br />वे इसे अनसुना कर दूसरे मोहल्ले में बढ़ जाते<br />उस मोहल्ले के कुत्ते भी उन पर गुर्राते<br />मगर, वे चुपचाप पन्नी बीनते रहते<br />दिन भर धूप छाँव सहते<br />ढ़लते सूरज को देख पहुँच जाते किसी दूकान<br />बेंच कर पन्नी खरीदते सामान<br />जलाते किसी प्लेटफार्म या खुले मैदान में चूल्हा<br />सेंक कर रोटी खाते<br />खुले आसमान के नीचे सो जाते<br />न कोई चिन्ता न कोई फिक्र उन्हें सताती<br />न कोई ट्रेन या मोटर की आवाज़ उन्हें जगाती<br />न जनता का शोरगुल उन्हें उठा पाता<br />केवल सूर्य ही उन्हें जगाता<br />उठते ही फिर पन्नी बीनने निकल जाते ।<br />इसी प्रकार अपना जीवन बिताते<br />एक दिन हो जाते जवान<br />इसी गगन के नीचे,<br />उनकी शादी हो जाती श्रीमान्<br />फिर उनके भी हो जाते बच्चे<br />दबाये बच्चों का काँख में<br />पन्नी बीनने निकल जाते<br />उन बच्चों को भी,<br />पन्नी बीनने के गुर सिखाते<br />चलते ही पैर, वे भी बीनने लगते पन्नी<br />चाहे मुन्ना हो मुन्नी<br />इसी प्रकार उनका बीत जाता<br />बचपन, बुढ़ापा, जवानी<br />ये है उनके जीवन की कहानी ।<br />अगर ये बच्चे नहीं होते श्रीमान्<br />तो मोहल्ले की पन्नियाँ कौन बीनता ?<br />इन पन्नियों से नालियाँ हो जाती चोक<br />फिर कौन करता इनकी सफाई<br />ये तो इन बच्चों की है दुहाई<br />कि बच गई नाली की गंदगी<br />रोड पर आने से<br />और हम बच गये<br />नगरपालिका के चक्कर लगाने से<br />ये तो इन बच्चों के हैं एहसान<br />अगर ये बच्चे नहीं होते श्रीमान्<br />तो मोहल्ले में, पन्नियों के लग जाते ढ़ेर<br />आज बस्ती में है पन्नी<br />कल पन्नी में बस्ती हो जाती<br />जिनको खाने से<br />कई गौ माताओं की जान खतरे में पड़ जाती<br />सच में ये बच्चे, देश के लिए वरदान है<br />पर्यावरण को शुद्ध रखने में<br />इनका बहुत बड़ा योगदान है ।</span><br /><span style="color:#000000;"> ***<br /></span><br /><br /><div align="center"><span style="color:#330000;">:: सुभाष यादव भारती :: </span></div>Dr.vyomhttp://www.blogger.com/profile/07520058687349196109noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-12715755.post-1115663321549697082005-05-09T11:26:00.000-07:002005-09-20T10:50:28.226-07:00मेरा गाँव<div align="left"><span style="color:#000000;">बात उन दिनों की है<br />जब हम रहते थे गाँव में<br />और खेलते थे इमली की छाँव में<br />तब कई मित्र थे मेरे<br />जो घंटों रहते थे घेरे<br />तब जाति पाँति का नहीं था ज्ञान<br />तब नहीं था कोई हिन्दू या मुसलमान<br />तब हम सब थे भाई भाई<br />वे दिन, कितने सुहाने और नेक थे<br />जब हम सब एक थे<br />तब नहीं थी बिजली की रोशनी<br />केवल एक दीप टिमटिमाता था<br />जो अंधकार में राह दिखाता था ।<br />आज भरपूर है रोशनी<br />पर राह का कोई अता पता नहीं<br />अर्थात् हम रोशनी की चकाचौंध में<br />अपने पथ से गए हैं भटक<br />देखकर रोशनी की चटक मटक<br />हम सब गए हैं भूल<br />आज नहीं है गाँव की धूल<br />जिसमें बैठकर के हम<br />बुजुर्गों की ज्ञानभरी बातें<br />सुनते थे ध्यान से<br />और जग के कल्याण की<br />दुआ करते थे भगवान से<br />आज नहीं है वह दीपक की रोशनी<br />जिसके चारों ओर बैठकर पढ़ते थे हम<br />रोशनी फिर भी नहीं पढ़ती थी कम<br />उस समय दस बार मिलते थे दिन रात में<br />और घंटों बिता देते थे बात बात में<br />आज दूभर हो गया है मिलना एक बार<br />भीड़ में खो गया है वह स्नेह, वह प्यार<br />आज दिलों में नहीं है वह चाहत वह प्यास<br />जिसकी वास्तव में है तलाश<br />आज मैं यादव से, यादव जी<br />और शर्मा से शर्मा जी हो गया हूँ<br />जमाने के भटकाव में बह गया हूँ ।<br />आज वह अपनत्व भरा शब्द<br />भैया, हो गया है गायब<br />जिसमें झलकता था अपनापन<br />जिसमें साफ स्वच्छ था मन<br />अर्थात अब न तो वह प्यार भरा शब्द है<br />न ही वह अपनापन<br />आज रेगिस्तान की तरह हो गया है मन<br />आज भी एक ही शहर में मेरे कई मित्र हैं<br />लेकिन वो समर्पण, वो स्नेह, वो प्यार नहीं<br />अब मन में वह टीस, वह तड़फ, वह पुकार नहीं<br />आज किसी से भी एकाएक गले मिलना<br />हो गया है दूभर<br />क्योंकि एकाएक गले मिलने पर<br />उनके मन में, शंका कुशंकाएँ जन्म ले लेती हैं<br />मन ही मन कहती हैं<br />क्या मालूम, क्यों यादव जी<br />इतनी हमदर्दी दिखा रहे हैं<br />बार बार गले लगा रहे हैं<br />आज दोस्त हैं, गाड़ी है, मकान है<br />बीबी है, बच्चे हैं दुकान है<br />सब कुछ है मेरे पास<br />परन्तु नहीं है वह आत्मीय प्यास<br />जिसमें हम बेधड़क गले मिलते थे<br />जिसमें अपनत्व के फूल खिलते थे<br />आज सब कुछ पाकर भी<br />मैंने बहुत कुछ खो दिया है<br />जो मुझे मेरे देश की संस्कृति ने दिया है ।<br />उस समय किसी के दुःख दर्द में<br />शरीक होता था पूरा गाँव<br />आज घर में ही नहीं है वह भाव<br />यही सब सोचकर आँखें भर आती हैं<br />जब याद उस समय की आती है<br />जिसकी मुझे अभी भी तलाश है<br />जिसकी मन में अभी भी प्यास है<br />उस समय आदमी को आदमी से प्यार था<br />और सच पूछो तो<br />मेरा पूरा गाँव ही एक परिवार था ।<br /> ***</span></div><span style="color:#000000;"><div align="center"><br /></span><span style="color:#660000;">:: सुभाष यादव भारती ::</span></div>Dr.vyomhttp://www.blogger.com/profile/07520058687349196109noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-12715755.post-1115454591441621172005-05-07T01:29:00.000-07:002005-05-15T08:24:34.830-07:00प्रतिक्रिया<strong><a href="http://www.narmadateere.blogspot.com"><span style="font-size:130%;"><span style="color:#33cc00;">नर्मदा तीरे</span> </span></a><span style="font-size:130%;">के लिए यहाँ क्लिक करें</span></strong>Dr.vyomhttp://www.blogger.com/profile/07520058687349196109noreply@blogger.com