tag:blogger.com,1999:blog-125216862009-07-05T22:26:34.469+05:30प्रत्यक्षाPratyakshahttp://www.blogger.com/profile/10828701891865287201noreply@blogger.comBlogger250125tag:blogger.com,1999:blog-12521686.post-53428540567169094812009-07-03T22:27:00.002+05:302009-07-03T22:46:42.499+05:30सबसे बड़ा ग्लोब<a href="http://3.bp.blogspot.com/_HMnaTG-3n8M/Sk47PplItJI/AAAAAAAABxw/pNjlNnG3CtE/s1600-h/DSC00320.JPG"><img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 150px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_HMnaTG-3n8M/Sk47PplItJI/AAAAAAAABxw/pNjlNnG3CtE/s200/DSC00320.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5354282147035788434" /></a>हमारे घर एक बैरोमीटर , एक लक्टोमीटर और एक ग्लोब था । एक थर्मामीटर भी था जो टूट गया था और जिसका पारा हमने एक छोटे पारदर्शी डब्बे में इकट्ठा कर रखा था । लैक्टोमीटर से हम दूध की शुद्धता नापते थे । उन दिनों हमारे घर में फ्रिज़ नहीं था और माँ दिन में चार बार दूध गरम करती थीं कि खराब न हो । हम स्टील के कटोरे में दूध डालकर जाँचते थे । उसमें पानी डाल डाल कर देखते कि लैक्टोमीटर सही बता रहा है कि नहीं । हर बार सही माप हमें भौंचक करता और हम एक दूसरे को देख विजयी भाव से हँसते थे जैसे कि ये कोई जादू का खेल था जिसे हमने ही अंजाम दिया था । <br /><br />गर्मी की चट दोपहरियों में माँ साड़ी का आँचल एक तरफ फेंक कर पँखे के नीचे फर्श पर चित्त सो जाया करती थी तब हम चुपके दबे पाँव बरोमीटर लेकर बाहर निकल जाया करते । पुटुस की झाड़ियों की ठंडी छाँह में भुरभुरी मिट्टी में तलवे धँसाये हम बैरोमीटर पढ़ते । उसका माप हमारे समझ के बाहर था । फिर भी उसको हाथ में थाम कर उसके बढ़ते घटते रीडिंग को देखना हमें अंवेषण कर्ता बना देता था । ग्लोब पढ़ना अलबत्ता अकेले का खेल था । ग्लोब नीले रंग का था और उस पर दर्शाये ज़मीन के टुकड़े भूरे हरे रंग के । उसका ऐक्सिस हल्के पीले रंग का था । धीमे धीमे उसे हम घुमाते और आँख बन्द कर कहीं उँगली रख देते । कुछ पल में ही ऐशिया से योरोप या दक्षिण अमरीका पहुँच जाते । हम जगह सीख रहे थे .. लीमा, पेरु , इस्तामबुल से बढ़ते हुये हम बुरकिना फास्सो , उलन बटूर , युरुग्वे , समोआ, तिमोर , इस्तोनिया, किरीबाटी, सान मरीनो तक पहुँच गये थे । फिर हमने ऐटलस पढ़ना शुरु किया । ज़मीन पर ऐटलस फैलाये हम मूड़ी जोड़े महीन अक्षरों को उँगलियों से पढ़ते । फिर हमने पुरानी दराज़ों को खँगालते हुये मैग्नीफाईंग ग्लास का अंवेषण किया था । उससे न सिर्फ अक्षर बड़े हो जाते थे बल्कि हथेलियों की रेखायें और उँगलियों के पोरों के महीन घुमाव से लेकर त्वचा के रोमछिद्र तक विशाल दिखाई देते । पकड़ी हुई मक्खी का शरीर और चम्मच पर रखे शक्कर का दाना भी । और सबसे मज़े की चीज़ कि सूरज की किरण को फोकस कर नीचे रखे अखबार का एक कोना भी जलाया जा सकता था ।<br /><br />पर ये सब दूसरे दर्जे के खेल थे । असली मज़ा ऐटलस और ग्लोब पढ़ने का ही था । टुंड्रा और सवाना और पम्पास समझने का था । पहाड़ों पर उगते मॉस लिचेंस और रोडोडेंड्रॉन जानने का था । ऐटलस को छाती से सटाये चित्त लेटकर छत देखने का था । छत देखते उन दूरदराज जगहों की गलियों में भटकने का था । मोरोक्कन जेल्लाबा , अरब हिज़ाब , काहिरा की गलियाँ , स्पैनिश क्रूसेड्स बोलने का था । दिन में सपने देखने का था । जबकि स्कूल में भूगोल मेरा प्रिय विषय नहीं था । इसमें सरासर गलती सिस्टर रोज़लिन की थी । सिस्टर रोज़लिन हमें भूगोल पढ़ाती थीं । उनके टखने नाज़ुक थे और उनके पाँव सुडौल । वो पतले काले फीते वाले सैंडल पहनती थीं और उनके सफेद हैबिट के नीचे उनके टखने और पाँव नाज़ुक सुडौल दिखते थे । जब वो टेम्परेट और मेडिटेरानियन क्लाईमेट पढ़ातीं थीं मैं उनके पाँव और पतली कलाई और लम्बी उँगलियाँ देखती थी ।<br /><br />माँ सुबह रोटियाँ बेलते वक्त गाने गातीं थीं । बँगला गीत , चाँदेर हाशी या फिर भोजपुरी लोकगीत , कुसुम रंग चुनरी या फिर फिल्मी गाने , रहते थे कभी जिनके दिल में । माँ काम करते वक्त गाने गाती थीं । माँ चूँकि दिनभर काम करती थीं , हम दिन भर उनके गाने सुनते थे । उनकी आवाज़ में एक खनक थी । उनकी आवाज़ तहदार थी और पाटदार । मुझे लगता था उनकी आवाज़ पतली क्यों नहीं । मैं कई बार रात को प्रार्थना करती , सुबह उठूँ तो उनकी आवाज़ पतली हो जाये या फिर मैं अपने कश्मीरी दोस्त की तरह गोरी हो जाऊँ । बहुत बरस बीतने पर ये मेरी समझ में आना था कि माँ की आवाज़ बेहद खूबसूरत थी , उसका एक अपना कैरेक्टर था , अपना वज़न और जो अपने आप को कहीं भी पहचान करवा सकता था । उस आवाज़ में एक खराश भरी लय थी , लोच था जो लम्बी तान में चक्करघिन्नियाँ खा सकता था , बिना टूटे , बिना बिखरे , जो कहीं दूर वादियों से उदास झुटपुटे की महक ला सकता था , जिसमें दिल मरोड़ देने वाली चाहत की प्रतिध्वनि थी । मेरे पिता माँ की उस आवाज़ पर कैसे फिदा हुये होंगे ये समझना बेहद आसान था । पर ये सब भविष्य की बातें थीं । <br /><br />माँ दिन में एक घँटा सोतीं थीं । तब हम दूसरे कमरे में होते जहाँ किताबें ही किताबें थीं। चौकोर भूरे दस लकड़ी के बक्से जिनको हम कभी पिरामिड की तरह सजाते , कभी एक के ऊपर एक रखते । चार नीचे फिर उनके ऊपर तीन फिर उनके ऊपर दो और सबसे ऊपर एक । सबमें किताबें सजी होतीं । बालज़ाक , प्रूस्त , ज़ोला , फ्लॉबेयर , इलिया कज़ान , लौरेंस । इनके साथ साथ महादेवी , रेणु , निराला , प्रेमचंद । बरसात के दिनों में गीले कपड़ों की महक इन किताबों में बस जाती । आज भी बरसात की महक से उन किताबों की महक आती है । पेट के बल लेट कर किताब पढ़ते थक कर सो जाते फिर माँ के गाने की आवाज़ से नींद खुलती । माँ शाम के खाने की तैयारी में लगीं होतीं । बाहर धुँआ होता या फिर शायद रात घिरने को आती । लैम्पपोस्टस पर बल्ब के चारों ओर लहराते फतिंगो का गोला होता और झिंगुरों की हमहम होती । हमारे सब साथी छुट्टियों में गाँव गये होते और अचानक शाम घिरते हम मायूस उदासी में डूब जाते । बैरोमीटर , टूटे थर्मामीटर का पारा , ग्लोब , सब आलमारी पर असहाय अकेले रखे होते । बिना संगी के , सिर्फ एक दूसरे के साथ से हम अचानक ऊब से भर उठते । माँ के गाने में भयानक उदासी होती । हम चुप खिड़की के शीशे से नाक सटाये अँधेरे में आँख फाड़े देखते , शायद पिता , जो महीने भर के लिये बाहर थे , आज आ जायें । आज ही आ जायें ।<br /><br /><br />माँ दूध में रोटी डालकर पका देतीं । दूध ज़रा सा किनारों पर जल जाता और रोटी भीगकर मुलायम हो जाती । घर में सोंधी खुशबू फैल जाती । खिड़की के बाहर अमरूद के पेड़ की डाली शीशे से टकराती । माँ कहतीं जल्दी खाना खा लो फिर हम बाहर बैठेंगे । रात की हवा गर्मी भगा देती और हम खटिया पर लेटे चित्त तारों को देखते । माँ धीमे धीमे गुनगुनातीं । फिर कहतीं बस अब बीस दिन और । फिर कहतीं गर्मी अब कम है । हम दोनों माँ को देखते फिर चुपके से हँसते । पिता ने वादा किया था कि इस बार बड़ा ग्लोब लायेंगे , जिसमें छोटे शहर और नदियाँ और पहाड़ भी दिखेंगे । हम चाँद को देखते और हमारी आँखों में नींद भर जाती । रात किसी वक्त , जब शीत गिरती और हम ठंड से सिकुड़ जाते , हमारे पैर हमारी छाती से जुड़ जाते , माँ हमारे शरीर पर चादर डाल देतीं और दुलार से हमारे बाल सहला देतीं । हम नींद में मुस्कुराते और अस्फुट बुदबुदाते , शायद समोआ और तिमोर और लीमा ।<br /><br />(ऊपर की तस्वीर, सुल्तानपुर)<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/12521686-5342854056716909481?l=pratyaksha.blogspot.com'/></div>Pratyakshahttp://www.blogger.com/profile/10828701891865287201noreply@blogger.com9tag:blogger.com,1999:blog-12521686.post-40596003180230596912009-05-29T17:21:00.002+05:302009-05-29T17:27:28.459+05:30समय सपनामैं सपने देखने के सपने देखता हूँ ।<br />हवा तेज़ चलती है , सीटी बजाती और गौरैया फुदकती है खिड़की के सिल पर ,रेडियो सिलोन पर पुराने गाने बजते हैं, प्रीतम आन मिलो ....और बाहर सड़क पर सिलबट्टे कूटने वाला फेरी लगाता है सुनसान सड़क पर , अकेला <br /><br />सब दरवाज़े बन्द हैं , एक परिन्दा तक झाँकता नहीं सिर्फ एक लाल चेहरे वाला लंगूर सफेद चूने लगी छत पर से ताकता है , बिटर बिटर आँखों से , कपड़े तार पर फड़फड़ाते हैं , अबरक लगे दुपट्टे और कलफ की गई पाँच गजी साड़ियाँ और सफेद पजामे के नाचते पैर, बिन बाँह की नीली शमीज़<br /><br />शायद जब बादल घुमड़ेंगे तब मोर नाचेगा अपने पँख फैलाकर <br />शायद उसका एक जादू गिर जायेगा , फिर टंग जायेगा उस दीवार पर जिसमें एक खिड़की खुलती है , रंगीन छीटदार परदे के पीछे <br /><br />बाबू रात को बारह बजे तक लैम्प की रौशनी में पढ़ेगा , माँ रात को एक गिलास हॉरलिक्स रख जायेगी फिर,बिवाई वाले तलवे पर वेसलीन मलेगी , बिंटी पॉंन्ड्स ड्रीमफ्लॉवर टॉल्क अपने गरदन पर छिड़क कर डूब जायेगी उमस भरे नींद में <br /><br />रात के अँधेरे में बहादुर की जागते रहो गूँजेगी , फिर लाठी की ठकठक और तेज़ सीटी , चाँद साक्षी है ... साक्षी है तब जब टीवी पर देर रात देखता है कोई पेरिस ज़तेम और सोचता है इस समय का हो कर भी इस समय का मैं नहीं <br /><br /> मैं पन्ने पलटता हूँ , ये दुनिया झप्प से ओझल हो जाती है, शब्दों का बोध खत्म होता है , समय खत्म होता है , मैं एक गुमशुदा घर का बाशिन्दा हूँ , एक खोये सपने का मालिक , अपने समय से बिछुड़ा एक अदना सा मुसाफिर <br /><br />नीलगाय चर जाते हैं सपने हर रोज़ और मैं हर दिन की ऊब को जम्हाई में भर कर पी जाता हूँ , आईने में देखकर कहता हूँ ..यू आर ऐन ऐडिक्ट नीडिंग यॉर फिक्स ऑफ ड्रीम्ज़ एवरी नाईट ..शुक्र है अब भी सपने देखने के सपने देखता हूँ , दीवार पर जबकि काली परछाईयों का शोकगीत है ..<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/12521686-4059600318023059691?l=pratyaksha.blogspot.com'/></div>Pratyakshahttp://www.blogger.com/profile/10828701891865287201noreply@blogger.com22tag:blogger.com,1999:blog-12521686.post-54047991080874992452009-03-30T12:37:00.014+05:302009-03-30T17:51:12.074+05:30सफ़ीना ए ग़मे दिल<a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_HMnaTG-3n8M/SdCs2pKZHXI/AAAAAAAAA_M/kz0vGN1MTwQ/s1600-h/qurratulain_hyder.jpg"><img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 132px; height: 200px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_HMnaTG-3n8M/SdCs2pKZHXI/AAAAAAAAA_M/kz0vGN1MTwQ/s200/qurratulain_hyder.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5318941214686911858" /></a>कभी आप इश्क़ में पड़ जाते हैं , कुछ पढ़ते हैं और मोहब्बत हो जाती है । क़ुर्तुल एन हैदर को पढ़ा था जब दस बारह साल की रही हूँगी । <strong>अपरम्परा</strong> एक पत्रिका थी जिसके सिर्फ तीन अंक निकले । बड़े लोग जुटे थे इस पत्रिका से और इसके छपने से घरैया संबंध भी था जो खैर महत्त्वपूर्ण नहीं। बस इतना था कि उसके दो अंक हमारे घर पर थे । पहले अंक में ऐनी आपा की ज़िलावतन थी । उस दस साल की उमर में मुझे पहला इश्क हुआ। फिर जहाँ जहाँ कहाँ कहाँ खोज कर उनको पढ़ा .. उनकी कहानियाँ , उनके कुछ उपन्यास , अपरम्परा के दूसरे अंक में रिपोर्ताज ।<br /><br />आप किसी लेखक को प्यार करते हैं तो उसके बारे में उमग कर बात करना चाहते हैं , उनकी लिखी पंक्तियाँ आप हँस कर एक प्यार भरी हैरानी से दूसरों के साथ बाँटना चाहते हैं । आप इश्क में होते हैं और सबको बता देना चाहते हैं । शब्दों की दुनिया के चमकीले संसार की रौशनी आपकी आत्मा में भरी होती है । हैरानी होती है कि दूसरे उसे देख नहीं पा रहे , शब्दों के जादू की थाह नहीं पा रहे । कैसी नज़र है ? कैसी आत्मा है ? और कैसी गरीबी है । कुर्तुल ऐन हैदर के बारे में बात करते हमेशा ऐसा ही महसूस हुआ । लेकिन कहीं भी उनका नाम लिया , उत्साह से छलकते किताबों का ज़िक्र किया ..<br /><br />ओह , अच्छा ..आग का दरिया हाँ हाँ , फिर बात बदल गई..। जैसे कोई दीवार खड़ी हो ।<br /><br />उनकी "<strong>गर्दिशे रंगे चमन</strong>" पाँच सात साल पहले पढ़ी थी । कुछ बहुत कुछ पागल हुई थी । कुछ मित्रों से ज़िक्र किया । इस मुगालते में थी कि कुर्तुल की किताब है , कहीं भी मिल जायेगी । ऐसे भोलेपन का टूटना ही था । तब तक हिन्दी साहित्य समाज की गरीब दिशाहारेपन से वास्ता न पड़ा था । <strong>आग का दरिया </strong>तक जो उनका मैग्नम ओपस समझी जाती है , उस तक पहुँचने के लिये भी कम तकलीफ नहीं उठानी पड़ी । भला हो श्रीराम सेंटर की पुस्तक दुकान (अफसोस अब वो जगह भी बंद हुई )जिन्होंने मिन्नत करने पर कहीं से एक प्रति उठवाई । ये कहानी अलग है कि उसकी छपाई , कागज़ की क्वालिटी सब , कई कई बार अपने कंगलेपन में आपका दिल तोड़ दें और आप फिर याद करें कि किसी भी और विदेशी भाषा के क्लासिक्स कैसे चमकीले साज सज्जा में आपका दिल जुड़ाते हैं । खैर , वो उनके लिखे के प्रति मेरी अगाध अनुरक्ति है कि उस घटिया कागज़ के बावज़ूद उस दुनिया ने मुझे जकड़ पकड़ लिया , छू लिया । रंगे चमन अब तक खोज रही हूँ। तमाम लोगों को कह रखा , वैसे लोग भी जो उस दुनिया के हैं। हर जगह बड़ी ठंडक दिखी और मुझे इस बात से हैरानी भरी तकलीफ और न समझ में आने वाला गुस्सा ।<br /><br />आमेर हुसैन, टाईम्स लिटररी सप्प्लीमेंट में लिखते हैं कि आग का दरिया उर्दू साहित्य में वो जगह रखता है जो हिस्पानिक साहित्य में वन हंड्रेड ईयर्स ऑफ सॉलिट्यूड का है । और ये कि अपने समकालीन लेखकों, जैसे मिलान कुंडेरा और मार्खेज़ से उनकी तुलना की जाये तो उनके लेखकीय संसार की वृहत्ता , उनकी दृष्टि , उनका अंतरलोक . समय के पार और उसके परे जाता है । अमिताव घोष कहते हैं कि वो बीसवीं सदी की सबसे महत्त्वपूर्ण भारतीय आवाज़ हैं । फिर वो सबसे महत्त्वपूर्ण आवाज़ क्यों हमें उपलब्ध नहीं है ? क्यों जब हम महत्त्वपूर्ण किताबों की बात करते हैं तो कुर्तुल का नाम अमूमन उस आसानी से नहीं लिया जाता ? किसी ने कभी मुझे कहा था कि वो उर्दू की हैं , डोंट क्लेम हर ऐज़ योर ओन (यहाँ ओन मतलब हिन्दी साहित्य )<br /><br />एक बार मैने किसी से शिकायत की थी क्यों नहीं उनकी सब चीज़ें एक जगह एकत्रित की जा सकती हैं । मुझे कॉपीराईट रूल्स और पब्लिकेशन के नियम बताये गये थे । मैं नहीं जानती उनकी चीज़ों के कॉपीराईट्स किसके पास हैं, मुझे नहीं पता कि पब्लिशिंग़ हाउसेस उन चीज़ों को नहीं छापता जो किसी और ने छापी हैं पहले से । मुझे सचमुच इन नियमों के बारे में कुछ नहीं मालूम। मैं सिर्फ एक अदना पाठक हूँ जिसको उनके लिखे से बेपनाह मोहब्बत है। मैं सिर्फ ये जानती हूँ कि उन जैसी लेखिका के लिये शायद ऐसे सब नियम तोड़े जा सकते हैं और इस बात का क्षोभ कि मैं सिर्फ अदना पाठक क्यों हूँ । मैं ऐसे किसी समाज का हिस्सा क्यों नहीं जहाँ एक पाठक की हैसियत इतनी महत्त्वपूर्ण हो कि किताबें उनके माँग को ध्यान में रखकर मुहैय्या करायीं जायें ।<br /><br />मैं याद करती हूँ कि चाँदनी बेगम, सीताहरण या गर्दिशे रंगे चमन मे उन हिस्सों को जहाँ कहानी खत्म होती है और लूज़ली स्ट्रक्चर्ड बातचीत के ज़रिये वो हमें कहीं और ले जाती हैं , वहाँ जहाँ जीवन अपनी संपूर्णता में, अपने कच्चे पक्केपन में धड़कता है । उन हिस्सों को पढ़कर कई बार मुझे लगा है कि उनसे बात करना ऐसा ही होता , अगर मिल लेती तो और अगर वो मुझे प्यार से , ए लड़की इधर बैठो ..कहतीं ।<br /><br />नेट पर खंगालते मुझे उनके बारे में बहुत कुछ नहीं मिला ..लेकिन <a href="http://www.razarumi.com/major-works-of-qurratulain-hyder/" target="_blank">रज़ा रूमी</a> के उनसे मिलने की दास्तान <a href="http://razarumi.wordpress.com/2006/07/25/qurratulain-hyder-writer%E2%80%99s-muse/" target="_blank">मिली</a>, उनकी कुछ <a href="http://www.bbc.co.uk/mediaselector/ondemand/hindi/meta/dps/2007/08/070821_qurratul_ain_haider?bgc=003399&amp;lang=hi&amp;nbram=1&amp;nbwm=1&amp;ms3=2&amp;size=au" target="_blank">औडियो लिंक्स</a> , <a href="http://azdak.blogspot.com/2008/12/blog-post_30.html" target="_blank">यहाँ भी </a> , कुछ उनपर लिखे पुराने ब्लॉग लिंक्स मिले ..<a href="http://pratyaksha.blogspot.com/2006/10/blog-post_05.html" target="_blank">यहाँ</a><br /><br />बस इतना सा ही । कुछ दिन पहले ज़ुबानबुक्स पर सीताहरण का अंग्रेज़ी तर्ज़ुमा <a href="http://zubaanbooks.com/zubaan_books_details.asp?BookID=104" target="_blank">अ सीज़न ऑफ बिट्रेयल्स</a> देखकर मन प्रसन्न हुआ था । इस उम्मीद में हूँ कि ऐसे ही "<strong>कारे जहाँ दराज़</strong>" और "<strong>मेरे भी सनमखाने</strong>" कहीं मिल जायें ।<br /><br />उनके बारे में कुछ <a href="http://www.razarumi.com/2007/09/24/end-of-an-era-qurratulain-hyder/" target="_blank">यहाँ</a> भी पढ़ा जा सकता है। <br /><br />ये भी तकलीफ की ही बात है कि नेट तक पर उनसे संबंधित कितनी कम सामग्री है । ऐनी आपा होतीं अभी, कहतीं, अच्छा लड़की , तू इतना ही समझती है? <br /><br />शी वुडंट हैव केयर्ड अ डैम ..<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/12521686-5404799108087499245?l=pratyaksha.blogspot.com'/></div>Pratyakshahttp://www.blogger.com/profile/10828701891865287201noreply@blogger.com32tag:blogger.com,1999:blog-12521686.post-68305324084732274832009-03-26T17:09:00.004+05:302009-03-26T17:44:23.798+05:30तैमूर तुम्हारा घोड़ा किधर है ?बूढ़ा गरम कपड़ों में लिपटा , पनियायी आँखों से देखता है , जीवन जो बीत चुका । अब और कुछ नहीं है इंतज़ार के सिवा । चाय की प्याली से हाथ सेंकता सोचता है अब भी वही तीस साल का फुर्तीला जोशीला लड़का कुँडली मार कर बैठा है भीतर । क्या होगा उसका मृत्यु के बाद । <br /><br /><br />ये वो नहीं, मैं सोचती हूँ । बियाबान चट पहाड़ों के बीच कहीं खो जाती सी , जाने कहाँ जाती सी सड़क पर घँटों चलते शरीर अकड़ जाता है । इतनी ऊँचाई पर साँस की भी दिक्कत । तराई पर अपने कमरे का गर्म सुकून याद आता है । सच पागल हुये थे जो ऐसे जोखिम भरे रास्ते पर चल पड़े । ऐसी कैसी घुमाई । हल्की धीमी उबकाई साँस के साथ चलती है । उस उचाट बियाबान में इस चाय की गुमटी का मिल जाना भगवान का मिलना है । गुमटी के पीछे दो देसी मुर्गियों के बीच एक बाँका मुर्गा कलगी फैलाये शान से देखता है । मुर्गियाँ अच्छी गृहणियों की तरह एक बार हमें देखकर पथरीली चट ज़मीन में फिर कीड़े मकोड़े तलाशने में जुट जाती हैं । टेढ़े बेढ़ंगे दो टाँग पर टिके पटरे पर बैठना खतरे से खाली नहीं पर बूढ़े के इशारे पर हम बैठ जाते हैं , ठंड से सिकुड़ते और लालसा से ओट में जलते चूल्हे की आग की गर्मी और खदबदाते देग से गर्म भाप को आँखों से पीते , हम ताकते हैं .. बाहर की पहाड़ियों की तरफ , फिर भीतर के सफेद गंदलाये अँधेरे की तरफ , फट्टों की दीवार के फाँक से आती हवा से हिलते पिछले साल के कैलेंडर और ताक पर रखे पीतल के बुद्ध भगवान की मूर्ति के सामने लोबान के उठते धूँये की तरफ । बुद्ध अपनी मंगोल आँखों से अनुक्म्पा बरसाते हैं ।<br /><br /><br />कभी तैमूरलंग इसी रास्ते आया होगा , समरकंद , अमु दरिया से ऐटॉक होते हुये दिल्ली । शहरों और गाँवों को लूटते हुये , बाशिन्दों को मौत के घाट उतारते हुये , औरतों को हवस का शिकार बनाते हुये और फिर नब्बे हाथियों पर सिर्फ बेशकीमती पत्थरों को लाद कर और बाकी लूट का माल लिये लौटा होगा बीबी खानम मस्जिद बनाने के लिये ।<br /><br /><br />मुझे नक्शे देखना पसंद है । उँगली रखकर मैं तैमूर के रास्ते चलती हूँ , हेरात , इस्फाहन , शीराज़ । क्या ज़मान रहा होगा । तैमूर सुनते हैं लंगड़ा था और घोड़ों पर सवार अपने सैनिकों के साथ , दुर्गम दुर्दांत दर्रों और पहाड़ियों से , बर्फीली हवाओं वाली तराई से , कँपकँपाते ठंड में कैसे जोखिम उठाते निकल पड़ा होगा । कैसी अदम्य जीवनी होगी । धूल उड़ाते , भालो और तलवारों और नेज़ों से लैस, चमड़ों के पट्टों की जीन कसे अरबी घोड़े मुँह से झाग उड़ाते उड़ते होंगे , धूल , पसीने , थकन से पस्त , भूरी दाढ़ियों में कहाँ कहाँ की धूल भरे, अपने अंदर की आग जलाये । जीना , मरना फिर जीना । व्यर्थ नहीं , हमेशा किसी सार्थकता की तलाश में । और बेचारी औरतें ? हमेशा पहला निशाना , आतताईयों के , हमलावरों के , लूटेरों के । वही जीवन का तरीका था । अ वे ऑफ लाईफ । कितना ऐडवेंचर , कितनी तकलीफें । <br /><br />मेरी उँगली तैमूर के साम्राज्य की सीमाओं पर फिरती लौट आती हैं । अपने खोल के अंदर दुबक जाती हैं। पोरों से मैंने एक संसार छू लिया । किसी ने कहा था , तुम्हारे अंदर वो आग कहाँ है ? <br />मैं खोजती हूँ , टटोलती हूँ अपने भीतर । इस आग को लेकर मैं भी तैमूर बन जाऊँगी । सब तज कर किधर अपने सपने खोजती निकल जाऊँगी ? अपने मन की भीतरी सब गुफाओं और खोह की पड़ताल कर लूँ पहले , दुबके अँधेरों को पहचान लूँ , अपनी आत्मा से सब संताप मिटा दूँ तब मेरे पैरों की नीचे ज़मीन होगी न , ठोस ज़मीन । मैं अपने पँख चमकते धूप में फैला कर आसमान देखती हूँ । आसमान आज खुशी का नाम है ।<br /><br /><br />गाड़ी के बोनट पर थोड़ी धूल जमी है । उसका पिछला चक्का बैठ गया है और स्टेपनी , मालूम पड़ता है कि पिछले पंक्चर के बाद बदला गया था , बनवाया नहीं । दोनों पुरुष गहन बहस में जुटे हैं । चाय गुमटी बूढ़ा अपनी पनियायी आँखों से चुप देखता है । उसकी जवान चिपटे सेब गाल चेहरे वाली बहू बिना कुछ समझे हँसती है । कोई गैराज ? मेकैनिक ? पर भी मुँह पर हाथ धरे फिर हँसती है । रियर व्यू मिरर से लटकती घँटी धीमे से हिलती है , पेंडुलम की तरह , फिर स्थिर हो जाती है । मैं अपने दुखते एड़ियों को जूते की कैद से निकालते सोचती हूँ , तैमूर तुम्हारा घोड़ा किधर है ?<br /><br /><table bgcolor="#000000" cellpadding="0" cellspacing="0"><tr><td><embed quality="high" pluginspage="http://www.macromedia.com/go/getflashplayer" type="application/x-shockwave-flash" bgcolor="#000" width="328" height="94" src="http://www.esnips.com//escentral/images/widgets/flash/esnips_player.swf" flashvars="theTheme=blue&amp;autoPlay=no&amp;theFile=http://www.esnips.com//nsdoc/b628adfc-c15f-44c4-8ed4-760609ebe723&amp;theName=turkish&amp;thePlayerURL=http://www.esnips.com//escentral/images/widgets/flash/mp3WidgetPlayer.swf"></embed></td></tr><tr><td><table cellpadding="2" style="font-family:Verdana, Arial, Helvetica, sans-serif; padding-left:2px; color:#FFFFFF; text-decoration:none ; ; font-size:10px; font-weight:bold"><tr><td><a style="color:#FFFFFF; text-decoration:none " href="http://www.esnips.com/CreateWidgetAction.ns?type=0&objectid=b628adfc-c15f-44c4-8ed4-760609ebe723"> Get this widget </a></td><td style="font-size:7px; font-weight:normal;">|</td><td align="center"><a align="center" style="color:#FFFFFF; text-decoration:none " href="http://www.esnips.com/doc/b628adfc-c15f-44c4-8ed4-760609ebe723/turkish/?widget=flash_player_esnips_blue"> Track details </a></td><td style="font-size:7px; font-weight:normal;">|</td><td><a align="center" style="color:#FF6600; text-decoration:none" href="http://www.esnips.com//adserver/?action=visit&cid=player_dna&url=/socialdna"> eSnips Social DNA </a></td></tr></table></td></tr></table><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/12521686-6830532408473227483?l=pratyaksha.blogspot.com'/></div>Pratyakshahttp://www.blogger.com/profile/10828701891865287201noreply@blogger.com15tag:blogger.com,1999:blog-12521686.post-71318226553260721182009-03-24T15:02:00.005+05:302009-03-24T15:40:02.842+05:30चीख<a href="http://3.bp.blogspot.com/_HMnaTG-3n8M/Scipwyo5MJI/AAAAAAAAA_E/uPMkqf2Ifq8/s1600-h/scream_edward+munch.jpg"><img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 158px; height: 200px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_HMnaTG-3n8M/Scipwyo5MJI/AAAAAAAAA_E/uPMkqf2Ifq8/s200/scream_edward+munch.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5316686015802978450" /></a>खुशी एक याद है । बचपन जैसे । फिर कैसे भूलती हूँ । वो रास्ता गुम हो जाता है समय में । पीछे पीछे पाँव रखते पहुँच नहीं पाती वहाँ जहाँ से सब शुरु हुआ था । उन दिनों को याद रखना इतना ज़रूरी क्यों था ? अब सिर्फ एक चीख की गूँज जैसा कुछ सिर्फ क्यों बाकी है ।<br /><br />बच्चा ज़ोर से खिलखिलाता है । उसके चेहरे से धूप छिटकती है । मुड़ कर जाती हुई औरत देखती है , मुस्कुराती है फिर चल पड़ती है । हवा में अचानक जाने कहाँ से आये कपास के फूल तैर रहे हैं । तितलियों को देखे ज़माना बीता । और शायद कुछ दिनों में पेड़ और हरियाली को देखे भी , ऐसे ही ज़माना बीतेगा । मेरे आसपास लोग बात करते हैं , ज़ोर शोर से । शेयर प्राइइसेज़ और रियल एस्टेट के फ्लकचूयेटिंग रेट्स पर । आचार संहिता लागू हुआ तो अब किसी भी नये काम के लिये एलेक्शन कमीशन की अनुशंसा लेनी पड़ेगी । काम का लीन पीरीयड ..अच्छा है । बैंगलोर में कोई मकान खरीद रहा है । ई एम आई और ब्याज़ दर ..ये बैंक और वो बैंक , योरप टूअर के लिये एस ओ टी सी का शानदार स्कीम , स्पाउज़ की बजाय कम्पैनियन ले जायें पर ज़ोरदार कहकहा .. <br /><br />कोई नहीं देख रहा कि अब तितलियाँ नहीं दिखतीं । या ये कि खुशी सिर्फ गये दिनों की याद है । या ये कि काम क्यों रुक रहा है ? इसीलिये हम अभी तक इंफ्रास्ट्रक्चर के मामले में इतने कंगाल हैं , सिर्फ इंफ्रास्ट्रक्चर क्यों ? और हर मामले में ..बस कंगाल । भावनात्मक रूप से भी ..गरीब गरीब। किसी तरीके का बोध हम में नहीं है । मोहन-जो-दारो और हरप्पा बनाने वालों की संततियाँ कूड़े के दलदल में बसती हैं । सामने शीशे की विशाल खिड़कियों से मेट्रो का घुमावदार कंक्रीट दिख रहा है । उसमें भी एक तरीके की सुंदरता है । स्लीकनेस है , नई तकनॉलॉजी का क्या शानदार नमूना है । कुछ कुछ ‘द ग्रेट बाथ’ जैसा ही शायद। फिर यहाँ से वहाँ जाना कितना सुविधाजनक , नहीं ? पीले सेफ्टी हेलमेट में मजदूरों की शक्ल की भुखमरी नहीं दिखती । सिर्फ रौशन पीलापन दिखता है , कंक्रीट कर्व का स्लीकनेस दिखता है । हम उतना ही देखते हैं जितना देखना कम्फर्टेबल होता है । रिश्तों में भी तो । हम ऐसे ही ब्रीड के हैं। हमारे आसपास भय का गहरा कूँआ तैरता है , अनाम चीखों का और हम पुरज़ोर कोशिशों में लगे हैं , अपने आप को बचा लेने की, अपनी आँखें और कान बन्द कर लेने की। हम सब इस पृथ्वी के शुतुर्मुर्ग हैं । <br /><br />मैं क्लयरवॉयेंट हूँ । चीज़ों के घट जाने का अभास एक छाया है । मैं सिद्धार्थ बन कर निकल जाऊँ कहीं और बुद्ध बन जाऊँ ? या कहीं किसी गाँव में संतरे के पेड़ के नीचे बैठकर होमर पढ़ूँ या मेघदूतम । एक महक आती है , सूखे पत्तों के जलने की । धूँये का स्वाद मुझे अच्छा लगता है । मुझे लगता है कि मैं भारी लती बन सकती हूँ । धूँये का स्वाद कूँये के पानी के स्वाद सा लगता है । कल सबसे तीव्रता से ऐसा लगा । पीछे , कॉल सेंटर की बिल्डिंग से लड़के और लड़कियों की चहचहाहट सुनाई देती है , फिर एक तेज़ आवाज़ , डोंट एवर कॉल मी नाउ । मैं मुड़ कर देखती हूँ । अँधेरे में कोई लड़की शायद सेलफोन पर अपने दोस्त से झगड़ा कर रही है । मैं अँधेरे में उठते धूँये को , जिसमें युक्लिप्टस की पत्तियों की खुश्बू है , छाती में भरते सोचती हूँ अँधेरी रात और निर्वाण का कैसा अनोखा संबंध है ।<br /><br /><br />(Edvard Munch ..The Scream )<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/12521686-7131822655326072118?l=pratyaksha.blogspot.com'/></div>Pratyakshahttp://www.blogger.com/profile/10828701891865287201noreply@blogger.com11tag:blogger.com,1999:blog-12521686.post-65961831634188589842009-03-23T14:29:00.004+05:302009-03-23T15:50:21.103+05:30स्वप्न गीत<a href="http://4.bp.blogspot.com/_HMnaTG-3n8M/ScdhsF9SnXI/AAAAAAAAA-8/xuMMw-qZ1ZA/s1600-h/gauguin32.jpg"><img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 139px; height: 200px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_HMnaTG-3n8M/ScdhsF9SnXI/AAAAAAAAA-8/xuMMw-qZ1ZA/s200/gauguin32.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5316325295275548018" /></a>किसी छोटी सी बात का सिरा कहाँ तक जाता है । उसने सिर्फ ये कहा था , लगता नहीं है जी मेरा उजड़े दयार में । उसकी आवाज़ में उदासी का बेहोश आलम था । जैसे अफीम के पिनक में कोई नशेड़ी । मैंने पूछना चाहा था , कौन सा दयार था जो उजड़ गया ? लेकिन पूछा नहीं था । सिर्फ कविताओं की पतली सी किताब उठा कर पढ़ना शुरु किया था । वो लगातर खिड़की से बाहर देखती रही । मैं हर तीन पंक्ति के बाद निगाह उठाकर उसे देख लेता । उसका थ्री फोर्थ चेहरा । आम के फांक सा चेहरा । बचपन में किताबों के मार्जिन पर ठीक ऐसा ही आम के फांक सा चेहरा बनाता था , खूब घने बरौनियों वाली आँखें और झुकती हुई लटों वाले बाल । वो सब टेढ़े मेढ़े प्रपोर्शन वाली औरतें , सब जीवित होंगी अब भी उन किताबों के मार्जिंस में । या शायद सब किसी कबाड़ी के दुकान के तहखाने में । उन्हीं किसी कबाड़ी की दुकान से ली थी मैंने कौड़ियों के मोल या शायद मुफ्त , हेमिंग्वे की द मूवेबल फीस्ट । किसी दोपहरी में सुगबुगाती खुशी से पन्नों को सूँघ कर शुरु किया था । कविता पढ़ना रोक कर बताना चाहता हूँ उसे ये सब । लेकिन वो आम फांक चेहरे से अब भी बाहर देख रही है । मैं चुपचाप उठ कर निकल जाता हूँ । वो मुझे रोकती नहीं है ।<br /><br />मेरे पैरों की नीचे पत्तियाँ चुरमुराती हैं । एक औचक बवंडर का गोला उठता है , सड़कों को पागलपने में बुहारता है , सूखे जंगियाये पत्तों को एक उन्मादी पल भर के जुनून में ऊपर और ऊपर गोल गोल उठाता फिर धीरे से छोड़ देता है । मेरे हाथों में किताब भारी हैं । वो किताब जिन्हें मैं पहली बार नहीं पढूँगा । वो किताबें जिन्हें मैं कई कई बार पढ़ चुका हूँ । मेरे सबसे आत्मीय , मेरे सबसे अंतरंग । इन किताबों से मैं और जीवन जी लेता हूँ , वो सारे जो स्थिति शरीर के अवरोधों के गुलाम नहीं हैं । मैं समय और स्थान के परे हो जाता हूँ । मैं भाव और बोध के ऐसे स्तर पर पहुँच जाता हूँ जो मेरे वास्तविक परिस्थितियों से भिन्न हैं । मैं बेहतर मनुष्य हो जाना चहता हूँ , हो जाता हूँ । मैं उस सब ज्ञान , प्रज्ञा , विवेक का अधिकारी हो जाता हूँ जो मनुष्य ने आज तक अर्जित किया है । मैं वो पात्र हो जाता हूँ जहाँ सभ्यता अपनी अंजुरी से जीवन अनुभव भरती है । मैं एक मानव हो जाता हूँ , सबसे अलग , सबसे उच्च । पर सबके साथ । मैं ठीक उसी वक्त पूरी मानवजाति का प्रतिनिधि हो जाता हूँ । मैं संपूर्ण होता हूँ । एक साथ मैं अपने अंदर उतने जीवन इकट्ठा कर लेता हूँ , जितनी किताबें मैंने पढ़ी हैं । मैं किताबों से बेइंतहा प्यार करता हूँ । मैं एक साथ सौ लोग होता हूँ , सैकड़ों लोग होता हूँ । मैं स्त्री होता हूँ , बच्चा होता हूँ ,पुरुष होता हूँ । मैं कभी अफ्रीकी मसाई और कभी मोरक्कन बरबर होता हूँ , कभी औस्ट्रलियाई अरूंता , कभी रेडइंडियन नवाज़ो लड़ाका । मैं रेगिस्तान में प्यासा दौड़ता हूँ , कभी समन्दर के थपेड़ों से नमक कटे गालों को थामता हूँ । मैं सूली पर मरता हूँ , मैं भाले की नोक पर जीता हूँ । कितनी बार जिया और कितनी बार मरा । <br />मैं ये सब उसे बताना चाहता हूँ । <br /><br />मैं बताना चाहता हूँ ..कोई दयार नहीं उजड़ता । मन में इतने लोग एक साथ वास करते हैं । फिर उजाड़पना कैसा । मैं उँगली पर रंग लगाकर शीशे रंगना चाहता हूँ और उसके चेहरे से उदासी पोंछ देना चाहता हूँ । मैं जीवन से टूटकर मोहब्बत करता हूँ । मैं रात दिन चलता हूँ । जंगलों के बीच , पानी पर , रेत पर , दलदल के पार । मेरे घुटने छिले हैं , मेरे पैर कड़े हैं । मेरे कँधे दर्द से झुके हैं , मेरे अंगूठे चोटिल ठेस खाये हुये हैं । फिर भी मैं चलता हूँ , इसलिये कि जीता हूँ । <br /><br />ये सब वो आमफांक चेहरा नहीं समझता । सिर्फ दर्द में डूबा रहता है । अपने छोटे से दर्द के पिंजरे में । मैं अपनी ऊँचाई में सिहरता हूँ फिर एक बार भी पीछे मुड़कर नहीं देखता । <br /><br />वो अब भी खिड़की के बाहर देख रही है । उसकी उदासी धीरे धीरे निथर जाती है । जैसे पानी से थकान धो दिया गया हो । वो चीज़ों को रचाती बसाती है । फूल उगाती है और सूरज के निकलने पर अपनी आत्मा धो पोछ कर चमकाती है । कहती है , मैं वो औरत नहीं ... <br /><br />(गोगां Ia Orana Maria (Hail Mary). 1891<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/12521686-6596183163418858984?l=pratyaksha.blogspot.com'/></div>Pratyakshahttp://www.blogger.com/profile/10828701891865287201noreply@blogger.com8tag:blogger.com,1999:blog-12521686.post-87240963897982611202009-03-19T14:38:00.002+05:302009-03-19T16:05:48.897+05:30बैठे बिठाये<em>उदास संगतों के बीच कोई सुर तलाशते हैं , खोजते हैं मायने सपनों के । झरते फूलों और गिरते पत्तों के सारंगी सुरबहार तान में , कोई विकल बेचैनी नये पत्ते की तरह फूटती है । काली बिल्ली एक बार घूम जाती है पूँछ उठाये । मैं अँधविश्वासी नहीं फिर भी रुकती हूँ , सोचती हूँ । देखती हूँ लोगों को बोलते बतियाते जीते और हैरान होती हूँ । हर पल हैरान । </em><br /><br />किसी रोज़ बारिश में भीगते देखा था <br />देखा था मिट्टी में पानी की धार<br />भीगते शब्द थरथराते काँपते<br />निचोड़ते थे अर्थ<br />छोड़ते थे अपनी जगह<br />कुछ शर्मिन्दगी से<br />बियाबान मैदान पर <br />विचरती जैसे कोई अकेली नीलगाय<br />पुरानी पोथियों में छुपी किसी<br />गोपन कथा के संकेत चिन्ह <br />जिनको बाँचते पहुँचेंगे<br />पकड़ लेंगे तुम्हारे सब अर्थ<br />तुम समझते थे तुम्हीं चालाक<br />हम भी सीखते हैं , पकड़ते हैं औज़ार<br />तलवार की तेज़ी सा, पैनी बुद्धि की कसम<br />एक दिन सब होगा हमारी पकड़ में<br />नीलगाय का झुँड तब आराम से विचरेगा , निर्द्वन्द<br />शब्द लटकेंगे रस भरे , लदी टहनियों से <br />पहुँच के पास<br />गप्प से मुँह में धर कर <br />कर लेंगे अंदर<br />और बहेगा तब <br />हमारी मांस मज्जा रक्त में <br />शब्द अपने पूरे अर्थ में<br />फिर तुम कैसे बच पाओगे<br />कैसे कहोगे<br />मेरा ये मतलब तो नहीं था <br /><br /><em>मार्गरेट ऐटवुड की इन पंक्तियों को पढ़ते हुये<br />You fit into me<br />like a hook into an eye<br />A fish hook<br />An open eye</em><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/12521686-8724096389798261120?l=pratyaksha.blogspot.com'/></div>Pratyakshahttp://www.blogger.com/profile/10828701891865287201noreply@blogger.com16tag:blogger.com,1999:blog-12521686.post-60614976368630644252009-02-25T13:46:00.007+05:302009-02-25T15:49:18.367+05:30लमोरे केकैसी आवाज़ थी ? जैसे किसी तूफान में समन्दर हरहराता हो , जैसे रेत का बवंडर गले से उठता था । उसमें पत्थरों की खराश थी , नमी थी एक खुरदुरापन था । रात में खुले में चित्त लेटे तारों को देखना था और किसी ऐसे ज़मीन के टुकड़े पर पाँव रखना था जो इस दुनिया का नहीं था । जैसे छाती में कोई तार अटका कर खींच ले गया हो , वहाँ जहाँ अँधेरे में छिटपुट जुगनू सी रौशनी थी , फुसफुसाहटों की दुनिया थी और बहुत कुछ था , न समझने वाला बहुत कुछ । शायद उस बच्चे की भौंचक रुलाई सा जिसे ये नहीं पता कि उस बड़े ने क्यों उसे एक थप्पड़ मार दिया । सपने की रुलाई , गालों पर नमी छू जाती है । सपने और हकीकत के कैसे तकलीफदेह झूलों पर झुलाती , उसकी आवाज़ । बीहड़ गुफा में अँधेरे को छूती आवाज़ जिसके सुरों पर ..किसी एक टिम्बर पर रौशनी की चमकती किरण सवार हो , आँखों में चमक गया धूप का टुकड़ा , आवाज़ , जिसके सब रेशे बिखरते हों .. <br /> <br />उसकी आवाज़ ऐसी ही थी , रात के फुसफुसाहटों की आवाज़ , जंगल में पेड़ के पत्तों के सरसराने की आवाज़ , आग में लकड़ियों के चटकने की आवाज़ , मुझे मार देने वाली आवाज़ । मुझे कभी प्यार नहीं हुआ । मर जाने वाला प्यार । उस न होने वाले प्यार के सोग में मैं इश्क वाले गाने सुनती हूँ और कल्पना में जीती हूँ कि अगर प्यार हुआ होता तो ऐसा ही होता , रुखड़ा , टेढ़ा , आड़ा तिरछा , बाँका , पागल , अस्तव्यस्त , शायद । हवा के झोंके से झिलमिलाता फिर भी न बुझने वाला प्यार । पर प्यार नहीं हुआ इसलिये मैं इस शब्द को हाथेलियों में भरकर पानी पर तैरा देती हूँ , कोई मछली गप्प से गड़क जाती है । मैं उदास , बहुत उदास होती हूँ पर अच्छा हुआ नहीं तो <em><strong>'लमोरे के'</strong></em> सुनकर शायद मैं पागल हो जाती । सचमुच ।<br /><br /><br /><object width="425" height="344"><param name="movie" value="http://www.youtube.com/v/vervObJHOCw&hl=en&fs=1"></param><param name="allowFullScreen" value="true"></param><param name="allowscriptaccess" value="always"></param><embed src="http://www.youtube.com/v/vervObJHOCw&hl=en&fs=1" type="application/x-shockwave-flash" allowscriptaccess="always" allowfullscreen="true" width="425" height="344"></embed></object><br /><br />पाओलो कोंते की <em><strong>लमोरे के</strong></em> सुनते हुये<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/12521686-6061497636863064425?l=pratyaksha.blogspot.com'/></div>Pratyakshahttp://www.blogger.com/profile/10828701891865287201noreply@blogger.com15tag:blogger.com,1999:blog-12521686.post-60582834821462550052009-02-13T21:57:00.005+05:302009-02-13T22:24:12.647+05:30डांस मी टू द एन्ड ऑफ लवकोई ताला था जिसकी चाभी बस मेरे पास थी । नीम अँधेरी रातों में अपने भीतर की गर्माहट में उतर कर देखा था मैंने ..ठंड से सिहरते किसी ऐसी अनजान लड़की को बाँहों में भरकर ताप दिया था और फिर पाया था , अरे इसकी शकल तो हू बहू मेरी है । उसके चेहरे को हथेलियों में भरकर कितने प्यार से उसके भौंहों को चूमा था । उस हमशकल की आँखें कैसी मुन्द गई थीं सुख से । उसके नीले पड़े होंठ पर जमी बर्फ पिघल रही थी । किसी ने कहा था न कभी कि ऑर्किड के फूल पास रखो तो उम्र बढ़ती है ..बस ऐसे ही उसके नीले ऑर्किड होंठ अपने पास , अपने होंठों पर रखने हैं । अचानक खूब लम्बी उम्र हो ऐसी इच्छा फन काढ़ती है । <br />पीछे से कोई अपनी उँगलियों से गर्दन सहलाता है । ठीक बाल के नीचे का हिस्सा । एहसास के रोंये हवा में लहराते झूमते हैं । फिर ऐसी झूम नीन्द आती है कि बस । <br /><br /><br /><br /><br />आजकल उसने पाया है कि हर रात सपने आते हैं । जब से उससे मिली है तबसे । उससे मिलना भी क्या मिलना था । किसी बिज़ी ट्राफिक सिग्नल पर अगल बगल दो गाड़ियों के चालक , शीशे के आरपार एक दूसरे को पलभर नाप लें । काले चश्मे और सॉल्ट पेपर दाढ़ी में अटकी आँख एक बार फिर देख ले । उसके चेहरे पर कोई भाव नहीं था । क्षण भर को अपना चेहरा मुस्कान में खिंचता सर्द होता है इस भावहीनता पर । रात वॉशबेसिन पर दिनभर की गर्द धोते शीशे में नज़र जाती है । उसकी आँखों से देखती हैं होंठों की बुनावट जब मुस्कान इतनी फिर इतनी फिर इतनी होती है । क्या दिखा होगा कि उसने कुछ नहीं देखा ..कुछ भी नहीं देखा । <br /><br />उसने कुछ अस्फुट मंत्र बुदबुदाये थे । अब मैं तुम्हारे सपने में मिलूँगी । उन नीली कुहासे ढँक़ी पहाड़ियों की तराई में , नीले हाथियों के झुंड के पीछे किसी पत्तों भरी टहनी से ज़मीन बुहारते तुम्हारे पदचिन्ह खोज लूँगी । <br /><br /> <br />गाड़ी के शीशे के पार गीयर न्यूट्रल करते बेपरवाही से मुड़ा था । उसका साफ शफ्फाक चेहरा और पीछे समेटे सारे बाल में खिलता उगा चेहरा अचानक एक मुस्कुराहट से भीग गया था । जबतक उसकी मुस्कान को मैं छूता पकड़ता गाड़ी आगे बढ़ गई थी । मेरे बाँह पर के रोंये अचानक खड़े हो गये थे । स्टीरियो पर लियोनार्दो कोहेन ‘ डांस मी टू द एन्ड ऑफ लव ‘ , गा रहा था ।<br /><br /><br /><br /><table bgcolor="#000000" cellpadding="0" cellspacing="0"><tr><td><embed quality="high" pluginspage="http://www.macromedia.com/go/getflashplayer" type="application/x-shockwave-flash" bgcolor="#000" width="328" height="94" src="http://www.esnips.com//escentral/images/widgets/flash/esnips_player.swf" flashvars="theTheme=blue&amp;autoPlay=no&amp;theFile=http://www.esnips.com//nsdoc/a7e5d57b-8a42-46ae-84d3-f667b2083db8&amp;theName=Leonardo Cohen -- Dance me to the end of love&amp;thePlayerURL=http://www.esnips.com//escentral/images/widgets/flash/mp3WidgetPlayer.swf"></embed></td></tr><tr><td><table cellpadding="2" style="font-family:Verdana, Arial, Helvetica, sans-serif; padding-left:2px; color:#FFFFFF; text-decoration:none ; ; font-size:10px; font-weight:bold"><tr><td><a style="color:#FFFFFF; text-decoration:none " href="http://www.esnips.com/CreateWidgetAction.ns?type=0&objectid=a7e5d57b-8a42-46ae-84d3-f667b2083db8"> Get this widget </a></td><td style="font-size:7px; font-weight:normal;">|</td><td align="center"><a align="center" style="color:#FFFFFF; text-decoration:none " href="http://www.esnips.com/doc/a7e5d57b-8a42-46ae-84d3-f667b2083db8/Leonardo-Cohen----Dance-me-to-the-end-of-love/?widget=flash_player_esnips_blue"> Track details </a></td><td style="font-size:7px; font-weight:normal;">|</td><td><a align="center" style="color:#FF6600; text-decoration:none" href="http://www.esnips.com//adserver/?action=visit&cid=player_dna&url=/socialdna"> eSnips Social DNA </a></td></tr></table></td></tr></table><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/12521686-6058283482146255005?l=pratyaksha.blogspot.com'/></div>Pratyakshahttp://www.blogger.com/profile/10828701891865287201noreply@blogger.com10tag:blogger.com,1999:blog-12521686.post-27424253670296587532009-02-06T22:59:00.004+05:302009-02-06T23:06:00.745+05:30ओ लाल मेरी पत रखियो ...<a href="http://2.bp.blogspot.com/_HMnaTG-3n8M/SYxz3TwGs-I/AAAAAAAAA78/_eShMdUFqlU/s1600-h/DSC02905.JPG"><img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 240px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_HMnaTG-3n8M/SYxz3TwGs-I/AAAAAAAAA78/_eShMdUFqlU/s320/DSC02905.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5299738255540270050" /></a><br />दिन गुज़रता है , दीवार पर हिलते काँपते सिमटती छाया , साया गुज़र जाता है आसपास , रात बीतती नहीं , आँखों में सपना बीत जाता है । आग के फूल रेगिस्तान में उगते हैं , पैर के तलवे फटते हैं , सफर होता नहीं खत्म , दिन बीतता है , बीतती है साँस और छाती पर हर रोज़ जमता है , फिर रात होते पिघलता है अँधेरा , ऐसे ही .. ऐसे ही <br /><br />रात के अँधेरे में मेज़ पर एक गोल टुकड़ा रौशनी का उगता है धीरे से । स्याही की शीशी , फाउंटेन पेन और कॉपी और किताब के बीच रखी चिट्ठी , एक पोस्टकार्ड सुघड़ अक्षरों में । चाय की प्याली पर हल्दी के निशान और टूटा एक कोना । लकड़ी की कंघी जो खरीदी थी पिछले दफे दो सौ रुपये में दस्तकार बाज़ार से और कितने अल्लम गल्लम चिड़िया पक्षी फुदने गुदने सब देखा था । गाता था पीछे से ..ओ लाल मेरी पत रखियो बला झूले लालण ... सिन्दरी दा सेवण दा सखी शाबाज़ कलन्दर ...<br /><br />उसकी आवाज़ में शहद घुला था । उतना ही जितना आँखों की पुतलियों में था । गाढ़ा नशीला । आवाज़ ऐसे गमक के साथ उठती थी कि दिल तक फँसा कर खींच ले जाये । तान मुरकियाँ बारीक कभी घनेरी । पान के पत्ते पर खुशबूदार सुपारी का छल्ला । सुन कर दिल लटपटा जाये , ज़ुबान की औकात क्या । <br /><br />बंजारों की टोली रातोंरात उठ गई । खिड़की से झाँकता देखता है , चाँद के पिछवाड़े टप्परगाड़ी पर असबाब लादे भूतिया टोली विलीन होती है , शायद जाने कब की पढ़ी किसी किताब के पन्ने पर या फिर किसी सपना कल्पना में । लौटता है , फिर फिर लौटता है , छूता है किताब के पन्नों को , सूँघता है दिन को , चहक पहक रोता है मन ही मन सोचता है , जाने क्या देखता है ,उन आँखों से ? जाने क्या देखता है ..<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/12521686-2742425367029658753?l=pratyaksha.blogspot.com'/></div>Pratyakshahttp://www.blogger.com/profile/10828701891865287201noreply@blogger.com15tag:blogger.com,1999:blog-12521686.post-82277724442967862582009-02-02T15:31:00.002+05:302009-02-02T15:34:43.208+05:30मैं तुम्हारे लिये गुमनाम सडकों पर बसों से उतरता अकॉर्डियन बजाता रहता हूँ ..<a href="http://1.bp.blogspot.com/_HMnaTG-3n8M/SYbErv56inI/AAAAAAAAA7k/nzJF4ujjmdE/s1600-h/violinst++marc+chagall.jpg"><img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 149px; height: 200px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_HMnaTG-3n8M/SYbErv56inI/AAAAAAAAA7k/nzJF4ujjmdE/s200/violinst++marc+chagall.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5298138267520764530" /></a>तुमने कहा था – मैं तुम्हारे लिये गुमनाम सडकों पर बसों से उतरता अकॉर्डियन बजाता रहता हूँ .. ढेर सारी सूखी पत्तियाँ फिर भी झरती रहतीं हैं । बचपन में देखे पोस्टकार्ड्स में पीले और सुर्ख पत्तों से भरे बाग के नीचे एक अकेला बेंच। कुछ कुछ उस फेल्ट लगाये दढ़ियल बूढे की हल्के नशे में बेहद नरम उदासी से बार बार मेर्सी कहना , किसी फिल्म का अटका कोई दृश्य । मुझे कई बार लगता है मैं कोई सोख्ता हूँ और सब एहसास एक एक करके मुझमें जज़्ब होते रहते हैं । मोटी किताबों की कहानियाँ जो भीतरी तह तक रिस कर कहीं लुकछिप बैठी रहती हैं और त्वचा से साँस लेती ज़िंदा रहती हैं और कभी भी , जानते हो, के साथ बाहर उचक कर आ जाती हैं । <br /><br />मैं तुम्हें कहानी सुनाना चाहती हूँ , तमाम कहानियाँ जो मैंने अब तक देखी पढ़ी हैं , और सारे नये शब्द जो मेरी ज़ुबान पर आ कर चिपक जाते हैं , जैसे कल मैंने पढ़ा ..नदामत ..शर्मिंदगी । और याद करती रही कि इस शब्द को और कब कब बिना अर्थ जाने पढ़ा है और कितनी बार तुम्हें नहीं बताया है या फिर कितनी बार ये कहकर , सुनो तुम्हें एक बात बतानी थी पर अब भूल गई हूँ कह कर सचमुच भूल गई हूँ । <br /><br />या ये कि मैं बकलावा बनाना सीखना चाहती हूँ और तुम मुझे मोरक्को ले जाओगे ? अकॉरडियन की धुन वहीं सुन लेंगे और वहीं से निकल पड़ेंगे किसी और देश । या फिर ये कि आज नहीं करनी कोई राजनितिक बहस या आर्थिक मन्दी पर सर नहीं फोड़ना । ये सब मैंने औरों के साथ कर लिया है , और ये कि परसों, मैं दिनभर किसी कम्पनी के बैलेंस शीट को अनलाईज़ करती रही और अब दुखते कंधे लिये और भारी सर लिये कहीं शब्दों की यात्रा पर निकल पड़ना चाहती हूँ , कि कल मैं सारे दोपहर ऐनी आपा को पढ़ती रही और उदास होती रही कि कभी मिली क्यों नहीं , क्या इसलिये कि मेरी भीतरी औरत उनके बाहरी और भीतरी औरत जैसी है , हू बहू वैसी और इस नाते मैं उनसे जुड़ी हूँ , समय , उम्र के परे , मौत के भी परे । कि उनके शब्द मेरे अंदर एक दुनिया रच देते हैं शायद बिलकुल वैसी दुनिया जैसी उन्होंने देखी थी और मैं देखती हूँ उनके शब्दों से , या उसके परे भी जैसे हर साँस के बाद एक और साँस ज़्यादा भीतर आये , जैसे मैंने बिना देखे भी देख लिया और बिना छूये भी छू लिया । या ये कि , जानते हो कल मैं एक उदास सुखी कर देने वाले सफर पर थी ..पाकिस्तान , सिंध , कोलंबो और उससे भी ज़्यादा ..किसी के भीतर की यात्रा , उसे उसके शब्दों के ज़रिये जानने की दिल तोड़ देने वाले अनुभव , कि देखो अब तक जैसे कुछ जाना ही न था , जैसे परदा अचानक उठ गया हो और धूप खिल गई हो । खूब खूब उदास चेहरे पर हँसी की आभा देखी है तुमने ? रक्त मांस मज्जा के भीतर छू कर देखा है तुमने ? किसी की दुनिया कितनी वाईब्रैंट हो सकती है इसका अंदाज़ा है तुम्हें ?<br /><br />मैं भी बजाना चाहती हूँ अकॉर्डियन या फिर कोई सा भी सितार । डूब जाना चाहती हूँ फिर हँसना भी चाहती हूँ । तुम भी जानते हो न कैसी बेचैनियों भरी उदासी में भी कैसे कोई गहरा कूँआ खिल जाता है , मीठे पानी का सोता फूट पड़ता है । उसी उदासी के साये में कैसी अमीर खुशी कौंध पड़ती है । आई फील रिच । ऐसी अमीरी ..जानते हो न तुम ।<br /><br />तुम कहते हो संजीदगी से - मैं तुम्हारे लिये गुमनाम सडकों पर बसों से उतरता अकॉर्डियन बजाता रहता हूँ .. <br /><br />(शगाल ... वायलिन वादक ..अकॉर्डियन नहीं , न सही )<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/12521686-8227772444296786258?l=pratyaksha.blogspot.com'/></div>Pratyakshahttp://www.blogger.com/profile/10828701891865287201noreply@blogger.com14tag:blogger.com,1999:blog-12521686.post-48678899199226468452009-01-30T17:04:00.002+05:302009-01-30T17:12:02.687+05:30एक ऐसा प्यार भी ..<a href="http://4.bp.blogspot.com/_HMnaTG-3n8M/SYLmClGZAUI/AAAAAAAAA7c/LQwQhg-5ddc/s1600-h/L-7-798-lovers_in_moonlight-Z000IXMV.jpg"><img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 150px; height: 200px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_HMnaTG-3n8M/SYLmClGZAUI/AAAAAAAAA7c/LQwQhg-5ddc/s200/L-7-798-lovers_in_moonlight-Z000IXMV.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5297049043734167874" /></a>कुछ बेहद उदासी वाला गाना क्रून करना चाहती हूँ , नशे में डूब जाना चाहती हूँ । माई ब्लूबेरी नाईट्स । अँधेरे रौशन कमरों की गीली हँसी में फुसफुसाते शब्दों को छू लेना चाहती हूँ , उस धड़कते नब्ज़ को छू कर दुलरा लेना चाहती हूँ । गले तक कुछ भर आता है उसे छेड़ना नहीं चाहती , बस रुक जाना चाहती हूँ एक बार , तुम्हारे साथ । <br /><br />चलते चलते धुँध में खो जाना चाहती हूँ एक बार । और एक बार उस मीठे कूँये का पानी चख लेना चाहती हूँ । एक बार तुमसे बात करना चाहती हूँ बिना गुस्सा हुये और एक बार प्यार , सिर्फ एक बार । फिर एक बार नफरत । सही तरीके से नफरत , न एक आउंस कम न एक इंच ज़्यादा , भरपूर , पूरी ताकत से । और उसके बाद तुम्हें भूल जाना चाहती हूँ । और चाहती हूँ कि तुम मेरे पीछे पागल हो जाओ , मेरे बिना मर जाओ ..सिर्फ एक बार ! <br /><br />अगली ज़िंदगी अगली बार देखी जायेगी...फिर एक बार !<br /><br />( मार्क शगाल के चाँदनी रात में प्रेमी युगल )<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/12521686-4867889919922646845?l=pratyaksha.blogspot.com'/></div>Pratyakshahttp://www.blogger.com/profile/10828701891865287201noreply@blogger.com18tag:blogger.com,1999:blog-12521686.post-46428475081258209122009-01-28T09:40:00.003+05:302009-01-28T11:13:40.761+05:30मेरी यात्रा शुरु होती है अब ..<a href="http://3.bp.blogspot.com/_HMnaTG-3n8M/SX_bD9omqMI/AAAAAAAAA7U/r7uU1JGsxA4/s1600-h/cartier+bresson+1975+romania.jpg"><img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 214px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_HMnaTG-3n8M/SX_bD9omqMI/AAAAAAAAA7U/r7uU1JGsxA4/s320/cartier+bresson+1975+romania.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5296192547941951682" /></a>मेरा मन ऐसा क्यों हुआ ? जैसे दरवाज़े पर लटका भारी ताला ? और तुम्हारी<br />संगत के दिन ? ऐसे थे क्या कि धूप अब खत्म हुई सदा के लिये । मेरे दिन क्या ऐसे ही लाचार बेचारे थे ? अपाहिज़ ,जो तुम्हारी संगत के बिना एक पल धूप और रौशनी की तरफ चल न पायें ? उन दिनों का रंग माना चटक था , फिज़ाओं में खुशबू ऐसे घुली थी जैसे ज़ुबान पर हमेशा प्लम वाईन का स्वाद | मन में कोई जंगल पत्ते खोलता था , फुनगियाँ आसमान छूती सी थीं ..सही है वो दिन वैसे ही थे । फिर उनकी परछाई इतनी लम्बी क्यों पड़ी कि आज तक के दिन ठंडे , अँधेरे , बिना किसी ताप के हुये । किसी अच्छी चीज़ का बुरा कसैला आफ्टरटेस्ट ?<br /><br />न ! मैंने स्वाद चखा और अब बस । बस । फिर इसके आगे दिन कुछ और होंगे । जीवन बहुत बड़ा है और तुम्हारा दुख ? दुख है लेकिन ऐसा तीखा नहीं कि पहाड़ों पर छाया सर्द हो गई हो । तुम्हारे साथ के दिन वो चाभी नहीं जो इस ताले को खोल दें । वो चाभी उस अल्बम में भी नहीं जिसके फोटो पीले पड़ गये हैं , उस पीलेपन में उन दिनों की रौशनी और खुशी कैद है । न चाभी उन यादों में है जिन्हें याद कर मैं हंसता तो हूँ पर छाती हुमहुम कर जाती है । पर ये हँसी भी उस तार की तरह है जिसके खिंचने पर अजीब ऐंठी हुई सी खुशी तड़क जाती है । किसी दोपहर में फर्श पर लेटे छत ताकते किसी दोस्त से , किसी पुराने दोस्त से बतियाने जैसा सुख । ऐसा है तुम्हें याद करना , सिर्फ ऐसा । न उससे ज़्यादा न उससे कम । <br /><br />मेरे मन में तुमने खिड़की खोली थी , किसी और प्यारी दुनिया की झलक दिखाई थी , जब तक थी सुहानी थी । उसका सुहानापन, दिनों के किनारे पर जड़ी किरणें और सितारे थे । उसकी चमक अब भी है मेरे अंदर चमकती हुई लेकिन मैं सिर्फ तुम्हारे साथ के दिनों से खुद को सीमित कैसे कर लूँ ? दुनिया बड़ी है , बहुत बड़ी और जीवन नियामत है , एक बार मिली हुई नियामत । और हज़ार चीज़ें करनी हैं इस एक जनम में। तुमसे मोहब्बत की , टूट कर इश्क किया , मेरी आत्मा में नये रंग भरे । उन रंगों का वास्ता , अब मुझे कुछ और करना है । सामने हरा मैदान फैला है , सड़क कहीं दूर जाती है , कोई अपहचाना छोर कूल किनारा दिखता है । मैं यायावर होना चाहता हूँ , उस नीले आसमान की चमक मुझे खींचती है । मैं तुमसे प्यार करता हूँ, अब भी। इसलिये तुम्हारे बिना जीना चाहता हूँ । दुख तकलीफ में नहीं । खुशी से जीना चाहता हूँ । जैसे कोई बच्चा सुबह उठते ही किलकारी से नये भोर को बाँहें फैला कर गले लगाता है ..वैसे । तुम कहती थीं मेरे बिना तुम टूट जाओगे न । मेरा टूट जाना मेरे प्यार को साबित करता था ? तुम्हारे लिये ?<br /><br />मैं हैरान हूँ । मैं जीता हूँ , साबुत हूँ । इसलिये कि एक समय मैंने प्यार किया , बेहद किया । इसलिये , अब तक जुड़ा हूँ । अब शायद तुमसे प्यार नहीं करता । शायद बहुत करता भी होऊँगा , अब भी । प्यार , तुमसे । या प्यार से । प्यार । शायद पागल हूँ कि सफेद कैनवस को रंगना चाहता हूँ उँगलियों से , रीम के रीम कागज़ भरना चाहता हूँ शब्दों से , कैनवस के जूते पहन किसी तंग गलियों में लोगों के चेहरे देखता , घरों की खिड़कियों से भीतर झाँकता , चलना चाहता हूँ , दुनिया के हर कोने का खाना चखना चाहता हूँ , धूप में बैठकर अपने पसंद के लोगों से जी भरकर बात करना चाहता हूँ , कितना कितना करना चाहता हूँ । मैं अपने मन का ताला अपनी चाभी से खोलना चाहता हूँ । मैं जीना चाहता हूँ , तुम्हारे बिना भी ..खुशी से उमगना चाहता हूँ । एक समय मैंने प्यार किया था इसलिये..इसलिये भी कि उस पार जाने के लिये दरवाज़ा मेरे ही अंदर है जो है अगर मैं देख सकूँ , अगर खोल सकूँ ..मेरी यात्रा शुरु होती है अब ..<br /><br />(कार्तिये ब्रेसों की 1975 रोमानिया )<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/12521686-4642847508125820912?l=pratyaksha.blogspot.com'/></div>Pratyakshahttp://www.blogger.com/profile/10828701891865287201noreply@blogger.com8tag:blogger.com,1999:blog-12521686.post-43501421805066244802009-01-23T08:04:00.004+05:302009-01-23T08:18:48.439+05:30चुंगकिंग एक्सप्रेस ?<a href="http://4.bp.blogspot.com/_HMnaTG-3n8M/SXks6a1jl3I/AAAAAAAAA7I/WKJzH4PsaMg/s1600-h/chunhking.JPG"><img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 240px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_HMnaTG-3n8M/SXks6a1jl3I/AAAAAAAAA7I/WKJzH4PsaMg/s320/chunhking.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5294312219098716018" /></a><br />सब चीज़ें एक्स्पायरी डेट के साथ आती हैं । प्यार , स्नेह , भरोसा , अंतरंगता , भोला सहज विश्वास ..सब । उम्र तक ! मैं कहती हूँ । <br />तुम कहते हो ,चुंगकिंग एक्स्प्रेस का डायलॉग बोल रही हो ?<br /><br />मैं लेकिन पाईनऐप्पल खाते नहीं मर सकती , मैं हँसती हूँ । मैं दुख में कुछ भी नहीं खाती । <br /><br />पाईनऐप्पल के सारे टिन जो मैं कल खरीद लाई थी उसका क्या करूँ अब ? ये अब हँसने वाली बात कहाँ रही । लेकिन सचमुच दुख में मैं कुछ भी नहीं खाती । फिर बिना एक्सापयरी डेट जाँचे , मैं सारे टिन गटर में फेंक देती हूँ । सड़क पर चलती औरत ठिठक कर देखती है , खराब है ? पूछती है । <br />मेरे लिये , हाँ , मैं बुदबुदाती हूँ । बाहर बारिश झूमती है । गाड़ी के अंदर स्टिरियो पर बेगम अख्तर टूट कर गाती हैं <br /><br /><em>हम तो समझे थे कि बरसात में बरसेगी शराब <br />आयी बरसात तो बरसात ने दिल तोड़ दिया </em><br /><br />मैं बेतहाशा हँसती हूँ । इसलिये कि मुझे रोना नहीं आता । शीशे के पार सब धुँधला है । सड़क नहीं दिखती , गटर नहीं दिखता , वो दुकान नहीं दिखती जहाँ से टिन खरीदा था , तुम भी नहीं दिखते और शायद उससे ज़रूरी , तुम मुझे नहीं देखते , वैसे जैसे मैं तुम्हें दिखना चाहती हूँ । <br />तुम कुछ कहते हो लेकिन अब मैं नहीं सुनती । मैंने सारे पाईनऐप्पल टिन गटर में जो फेंक दिये ।<br /><br />तुम कहते हो तुम्हें विदा गीत तक लिखना नहीं आता <br />मैं कहती हूँ मैं अजनबियों से बात नहीं करती <br />तुम कहते हो मेरी छतरी बहुत बड़ी है <br />मैं कहती हूँ बारिश में मैं फिर भी भीग जाती हूँ <br />तुम कहते हो मेरे पास आसमान है <br />मैं कहती हूँ ज़मीन किधर है <br />तुम कहते हो सपने नहीं देखती तुम <br />मैं कहती हूँ मैं सच देखती हूँ , सपने के पार का सच <br /><br />बारिश थम गई है । तमाम लिखाई के बावज़ूद सच मुझे विदागीत लिखना नहीं आता । उसमें ग्रेस और डिग्निटी नहीं आती , उसमें निस्पृहता नहीं आती । मैं अब तक सड़क पर ठिठक कर देखती फिर आगे बढ़ जाती औरत नहीं बन पाई । मैं अब भी छोटी बच्ची हूँ जो बड़ों की दुनिया में जबरदस्ती घुस आई है । <br /><br />(किसी बारिश के रोज़ की खींची तस्वीर)<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/12521686-4350142180506624480?l=pratyaksha.blogspot.com'/></div>Pratyakshahttp://www.blogger.com/profile/10828701891865287201noreply@blogger.com19tag:blogger.com,1999:blog-12521686.post-27900341042405043232009-01-20T08:26:00.003+05:302009-01-20T08:36:31.476+05:30एक दोपहर ..तुम यकीन नहीं करोगे<a href="http://2.bp.blogspot.com/_HMnaTG-3n8M/SXU9q2ErpjI/AAAAAAAAA6o/16xO8YzD_Ps/s1600-h/DSC01798.JPG"><img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 240px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_HMnaTG-3n8M/SXU9q2ErpjI/AAAAAAAAA6o/16xO8YzD_Ps/s320/DSC01798.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5293204743322838578" /></a>हम जब बात करते हैं हमारे बीच की हवा तैरती है , तरल । तुम यकीन नहीं करोगे लेकिन कई बार मैंने देखी है मछलियाँ , छोटी नन्ही मुन्नी नारंगी मछलियाँ , तैरते हुये , लफ्ज़ों के बीच , डुबकी मारती , फट से ऊपर जाती, दायें बायें कैसी चपल बिजली सी । तुम कहते हो ,<br />मेरी बात नहीं सुन रही ? <br /><br />मैं जवाब में मुस्कुराती हूँ , तुम्हारी बात पर नहीं । इसलिये कि कोई शैतान मछली अभी मेरे कान को छूती कुतरती गई है ।तितलियाँ भी उड़ती हैं कभी कभार । और कभी कभी खिड़कियों पर लटका परदा हवा में सरसराता है । हमारी कितनी बातें घुँघरुओं सी लटकी हैं उसके हेम से । मेज पर रखे तश्तरी और कटोरे में दाल और चावल के साथ हमारी उँगलियों का स्वाद भी तो रह गया है । <br /><br />तुम यकीन नहीं करोगे । दीवार पर जो छाया पड़ती है , जब धूप अंदर आती है , उसके भी तो निशान जज़्ब हैं हवा में । सिगरेट का धूँआ , तुम्हारे उँगलियों से उठकर मेरे चेहरे तक आते आते परदों पर ठिठक जाता है । मैं कहाँ हूँ पैसिव स्मोकर ? न तुम्हें नैग करती हूँ , छोड़ दो पीना । सिगरेट का धूँआ मुझे अच्छा लगता है । मैं मुस्कुराती हूँ । तुम कहते हो ,<br />मेरी बात नहीं सुन रही ?<br /><br />मैं सचमुच नहीं सुन रही तुम्हारी बात । मैं खुशी में उमग रही हूँ । मैं अपने से बात कर रही हूँ । परदे के पीछे रौशनी झाँकती सिमटती है । उसके इस खेल में रोज़ की बेसिक चीज़ें एक नया अर्थ खोज लेती हैं , जैसे यही चीज़ें ज़रा सी रौशनी बदल जाने से किसी और दुनिया का वक्त हो गई हैं । तुम सचमुच यकीन नहीं करोगे <br /><br />लेकिन कई बार मेरी छाती पर कुछ भारी हावी हो जाता है जो मुझे सेमल सा हल्का कर देता है । तब छोटी छोटी तकलीफें अँधेरे में दुबक जाती हैं । मेरा मन ऐसा हो जाता है जैसे मैं आकाशगंगा की सैर कर लूँ , दुनिया के सब रहस्य बूझ लूँ , पानी के भीतर , रेगिस्तान के वीरान फैलाव के परे , चट नंगे पहाड़ों के शिखर पर ..जाने कहाँ कहाँ अकेले खड़े किन्हीं आदिम मानवों की तरह प्राचीन रीति में सूर्य की तरफ चेहरा मोड़ कर उपासना कर लूँ । <br /><br />परदा हिलता है , रौशनी हँसती है , अँधेरा मुस्कुराता है । तुम कहते हो ,<br />मेरी बात नहीं सुन रही ? <br /><br />तुम यकीन नहीं करोगे लेकिन अब मैं सचमुच तुम्हारी बात सुन रही हूँ ।<br /><br /><br /><a href="http://3.bp.blogspot.com/_HMnaTG-3n8M/SXU9kvWdKtI/AAAAAAAAA6g/nPzezcx-n7E/s1600-h/DSC01788.JPG"><img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 240px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_HMnaTG-3n8M/SXU9kvWdKtI/AAAAAAAAA6g/nPzezcx-n7E/s320/DSC01788.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5293204638439123666" /></a><br /><br />(रौशनी और अँधेरे का खेल एक दोपहर)<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/12521686-2790034104240504323?l=pratyaksha.blogspot.com'/></div>Pratyakshahttp://www.blogger.com/profile/10828701891865287201noreply@blogger.com18tag:blogger.com,1999:blog-12521686.post-80823018992831873212009-01-16T15:28:00.003+05:302009-01-16T15:33:21.057+05:30उन सारी नियामतों के नाम<a href="http://4.bp.blogspot.com/_HMnaTG-3n8M/SXAnrSGgW5I/AAAAAAAAA6A/0vtRWFTej1A/s1600-h/DSC02141.JPG"><img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 240px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_HMnaTG-3n8M/SXAnrSGgW5I/AAAAAAAAA6A/0vtRWFTej1A/s320/DSC02141.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5291773186707315602" /></a>मैं उसे चिड़िया बुलाती हूँ। मेरी अवाज़ एक धीमी फुसफुसाहट है साँस जैसी, और <br />चिड़िया हँसती है लगातार। बेतहाशा। फिर नरमी से कहती है। अब सपने देखो। <br /><br /><a href="http://1.bp.blogspot.com/_HMnaTG-3n8M/SXAnlpAYlFI/AAAAAAAAA54/71Lcp0dqjrk/s1600-h/DSC02140.JPG"><img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 240px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_HMnaTG-3n8M/SXAnlpAYlFI/AAAAAAAAA54/71Lcp0dqjrk/s320/DSC02140.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5291773089776440402" /></a>समन्दर कहते मैं आहलादित होती हूँ। समन्दर समन्दर। लहरों का गर्जन मेरी शिराओं में गूँजता है। वहाँ जहाँ ज़मीन नहीं। मछलियाँ हैं। नमक है। सीगल भी हैं शायद और फेन। और। और पुराने जंगी जहाज़। कोलम्बस का बेड़ा। खतरा। बहुत सा रोमाँच। तेज़ थपेड़ों में उड़ते बाल , गालों पर नमक की तुर्शी , ज़िन्दगी। मैं थोड़ा सा मर जाती हूँ। मैं बहुत सा जी जाती हूँ। <br /><br /><a href="http://2.bp.blogspot.com/_HMnaTG-3n8M/SXAnfdXOd1I/AAAAAAAAA5w/kR8PRv18qfg/s1600-h/DSC02137.JPG"><img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 240px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_HMnaTG-3n8M/SXAnfdXOd1I/AAAAAAAAA5w/kR8PRv18qfg/s320/DSC02137.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5291772983571806034" /></a>किताब के पन्नों के बीच वो नक्शा। पेंचदार, गूढ़। कुछ पीला पड़ा। घुमंतु बंजारा रुककर साँस लेता खाता है पनीर का सूखा टुकड़ा पीता है घूँट भर कोई सस्ती शराब। आस्तीन से मुँह पोछता, नक्शे को समेटता चल पड़ता है मेरे सपने के बीच से ही अचानक। <br />समन्दर की छोटी सी लहर छूती है मेरे पैर को। चिड़िया मेरे बाल को। मेरा मन मुझे।<br /><br /><a href="http://2.bp.blogspot.com/_HMnaTG-3n8M/SXAnTly5hXI/AAAAAAAAA5o/WUUCf0w6DOQ/s1600-h/DSC02143.JPG"><img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 240px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_HMnaTG-3n8M/SXAnTly5hXI/AAAAAAAAA5o/WUUCf0w6DOQ/s320/DSC02143.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5291772779676927346" /></a>मैं उसे चिड़िया बुलाती हूँ। समन्दर कहते मैं आहलादित होती हूँ। रात भर नक्शे की महीन बारीक रेखाओं पर बनते हैं निशान , उँगलियों के, समन्दर आसमान रेत के , बवंडर चक्रवात के , छनती हुई रौशनी और झरते हुये अँधकार के , धूँये और सब्ज़ खुशबू के , होंठों पर नफीस स्वाद के , जीवन की सबसे बढ़िया चीज़ों के , उन सारी नियामतों के निशान , तमाम नियामतों के ..<br /><br /><a href="http://1.bp.blogspot.com/_HMnaTG-3n8M/SXAnKXu9xyI/AAAAAAAAA5g/rb_K4-CIHEk/s1600-h/DSC02136.JPG"><img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 240px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_HMnaTG-3n8M/SXAnKXu9xyI/AAAAAAAAA5g/rb_K4-CIHEk/s320/DSC02136.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5291772621283510050" /></a>अँधेरों के बावज़ूद ..बावज़ूद बावज़ूद <br /><br /><a href="http://3.bp.blogspot.com/_HMnaTG-3n8M/SXAnENKguXI/AAAAAAAAA5Y/4SZKu7ebcac/s1600-h/DSC02131.JPG"><img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 240px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_HMnaTG-3n8M/SXAnENKguXI/AAAAAAAAA5Y/4SZKu7ebcac/s320/DSC02131.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5291772515367041394" /></a>नसों के भीतर तब चाँद उतरता है , पत्थरों पर मूंगों पर , छतनार पत्तियों पर । कहते हैं कोई पूर्वज पागल जुनूनी यायावर रहा था। लहरों में जीया था , वहीं मरा था। <br /><br /><a href="http://2.bp.blogspot.com/_HMnaTG-3n8M/SXAmszYwizI/AAAAAAAAA5Q/o5VQNKmKw5I/s1600-h/DSC02130.JPG"><img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 240px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_HMnaTG-3n8M/SXAmszYwizI/AAAAAAAAA5Q/o5VQNKmKw5I/s320/DSC02130.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5291772113310485298" /></a><br /><br /><br /><br />( तस्वीरें वागातोर , गोआ में ली गईं, एक शाम )<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/12521686-8082301899283187321?l=pratyaksha.blogspot.com'/></div>Pratyakshahttp://www.blogger.com/profile/10828701891865287201noreply@blogger.com15tag:blogger.com,1999:blog-12521686.post-53170394400566104762009-01-15T09:30:00.009+05:302009-01-15T09:43:27.421+05:30ज़ायके का दिनरेस्तरां में एक दिन ....<br /><br /><a href="http://3.bp.blogspot.com/_HMnaTG-3n8M/SW62XAwu9kI/AAAAAAAAA4o/UV68z-ORq4s/s1600-h/DSC02465.JPG"><img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 240px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_HMnaTG-3n8M/SW62XAwu9kI/AAAAAAAAA4o/UV68z-ORq4s/s320/DSC02465.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5291367118664562242" /></a><br /><a href="http://1.bp.blogspot.com/_HMnaTG-3n8M/SW62R0NFM8I/AAAAAAAAA4g/SzvUii4-KCU/s1600-h/DSC02464.JPG"><img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 240px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_HMnaTG-3n8M/SW62R0NFM8I/AAAAAAAAA4g/SzvUii4-KCU/s320/DSC02464.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5291367029394453442" /></a><br /><a href="http://4.bp.blogspot.com/_HMnaTG-3n8M/SW62LdOqG2I/AAAAAAAAA4Y/vaUDVTSrm0c/s1600-h/DSC02462.JPG"><img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 240px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_HMnaTG-3n8M/SW62LdOqG2I/AAAAAAAAA4Y/vaUDVTSrm0c/s320/DSC02462.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5291366920147835746" /></a><br /><a href="http://1.bp.blogspot.com/_HMnaTG-3n8M/SW62GYrXf7I/AAAAAAAAA4Q/P5QcNpiFFts/s1600-h/DSC02460.JPG"><img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 240px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_HMnaTG-3n8M/SW62GYrXf7I/AAAAAAAAA4Q/P5QcNpiFFts/s320/DSC02460.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5291366833026727858" /></a><br /><a href="http://1.bp.blogspot.com/_HMnaTG-3n8M/SW62B8nNRyI/AAAAAAAAA4I/0V_Ux5l9xlk/s1600-h/DSC02453.JPG"><img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 240px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_HMnaTG-3n8M/SW62B8nNRyI/AAAAAAAAA4I/0V_Ux5l9xlk/s320/DSC02453.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5291366756773611298" /></a><br /><a href="http://1.bp.blogspot.com/_HMnaTG-3n8M/SW61G1whXdI/AAAAAAAAA4A/04VAz2saOhw/s1600-h/DSC02456.JPG"><img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 240px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_HMnaTG-3n8M/SW61G1whXdI/AAAAAAAAA4A/04VAz2saOhw/s320/DSC02456.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5291365741321346514" /></a><br /><a href="http://2.bp.blogspot.com/_HMnaTG-3n8M/SW609PDBD_I/AAAAAAAAA34/aHp-Z7A-uU0/s1600-h/DSC02454.JPG"><img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 240px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_HMnaTG-3n8M/SW609PDBD_I/AAAAAAAAA34/aHp-Z7A-uU0/s320/DSC02454.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5291365576311115762" /></a><br /><br />(चार पाँच महीने पहले खींची गई तस्वीरें )<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/12521686-5317039440056610476?l=pratyaksha.blogspot.com'/></div>Pratyakshahttp://www.blogger.com/profile/10828701891865287201noreply@blogger.com8tag:blogger.com,1999:blog-12521686.post-76245789533789688942009-01-13T13:40:00.002+05:302009-01-13T14:40:14.830+05:30दरवाज़े के पार ?<a href="http://1.bp.blogspot.com/_HMnaTG-3n8M/SWxMtvrsHfI/AAAAAAAAAz8/ZcAH4uQGrdQ/s1600-h/abbas+kiarostami.jpg"><img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 264px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_HMnaTG-3n8M/SWxMtvrsHfI/AAAAAAAAAz8/ZcAH4uQGrdQ/s400/abbas+kiarostami.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5290688011031027186" /></a><br /><br />( इरानी फिल्म निर्देशक अब्बास कियारोस्तामी , उन पहाड़ियों पर जहाँ उनकी फिल्म टेस्ट ऑफ चेरी शूट की गई थी )<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/12521686-7624578953378968894?l=pratyaksha.blogspot.com'/></div>Pratyakshahttp://www.blogger.com/profile/10828701891865287201noreply@blogger.com7tag:blogger.com,1999:blog-12521686.post-51972172136275074862009-01-03T12:28:00.002+05:302009-01-03T12:34:40.454+05:30अब जंगली हरियाले तोते शोर मचाते नहीं उतरते आम के पेड़ों परआम के बगीचे के पास रास्ता पक कर धूसर हो गया है , घास ऐसे उड़ गई है जैसे अब इस पत्थर से सख्त ज़मीन पर कोई दूब उगेगा नहीं । लोगों के पैरों की चाप ने ऐसी गत कर दी है । जब उस ज़माने में दीवार मज़बूत थी तब परिंदा नहीं फटकता था बगीचे में । बगल वाले बरामदे में खटिया पर बैठे ईया यही देखतीं है । चाय का गिलास तक उठाते हाथ काँपते हैं अब । सब त्वचा झिंगुर कर सिकुड़ गई है , बाल सन से सफेद । तब हरियाले तोतों का झुँड पेड़ की फुनगी पर आ बैठता था । जंगली तोते । सुनहरे पिंजरे में कैद मीठू राम कैसा शोर मचाता था तब । कैसे पँख फड़फड़ाता था बेचैन अकुलाहट में कि डर में ?<br /><br />पिछवाड़े वाली खपड़ैल छप्पर अब आधी ढह चुकी । जंगली घास और झाड़ उग आये हैं । पिछली बरसात तो एक करैत निकल गया था शाम को । पेट्रोमैक्स की रौशनी में डंडों से उसका हाँका गया था । फिर दीना उसका कुचला निर्जीव शरीर पतली लम्बी छड़ी पर लटकाये सबको दिखाता फिरा था । <br />बड़ा ज़हरवाला साँप था हुज़ूर , उसकी काली आँखें चमकीं थीं । कितने दिनों तक , अरे वही दिन जब करैत मारा था , के संदर्भ से बात करता रहा था दीना । <br /><br />आँगन के छोर पर चाँपाकल वाला चबूतरा भी टूट चला । जब से पानी का नल लग गया , उसकी पूछ कम गई । अब कभी चलता भी है तो कैसा लोहराईन , गंदला भूरा पानी निकलता है । पाईप में जंग लग गया होगा जरूर । बच्चे कभी हो हल्ला करते हुमच हुमच कर चलाते हैं तब छेहर सी पानी की मरियल धार निकलती है । चबूतरे के टूटे कोने पर पुदीने की बेल कैसे लहक कर फैली है और उसके एक ओर मेंहदी की झाड़ । पिंकी जब तब कटोरी भर पत्ता सिलौट पर पीस कर जिस तिस को पकड़ कर मनोयोग से हथेली पर अठन्नी जैसा गोला और तीनपत्तिया फूल काढ़ती है । बीस साल की दुबली पतली मैट्रिक पास पिंकी जिसको पिछले छह महीने से ससुराल वाले नैहर ठेल आये हैं । दोपहर को सर झुका कर सरसों के झोल वाली मछली पकाती है , मूड़ी तलती है । जब तक मछली सरसों तेल में तलता है , पीढ़े पर बैठी , घुटनों पर बाँह धरे , लकड़ी के आग को देखते जाने क्या क्या सोचती है ।<br /><br />अम्मा कहती हैं , लम्बी साँस भरकर , सिलाई स्कूल में नाम लिखा दें ? इस साल बरसात के पहले छत भी छवाना है , नया छाता खरीदना है , मिंटू के स्कूल का फीस भरना है , बाबुजी के लिये नया प्रिंसकोट बनवाना है , और और पिंकी के ससुराल भी तो जाना चाहिये न एक बार ? आखिर कोई कारण तो बताये ? ऐसे बेबात लड़की को छोड़ देता है क्या ? किसी अंदेशे से उनकी छाती धौंक जाती है , हथेलियाँ ठंडी हो जाती हैं । बाबुजी अचानक अलगनी से लटका बंडी उतारकर पहनते हैं और बिना कुछ बोले निकल जाते हैं । अब जाने कब लौटेंगे । जब से सस्पेंड हुये हैं तब से एकदम चुप्पा हो गये हैं । <br /><br /><br />ईया झुकी कमर को सहारा देतीं खटिया से उठती हैं । निहुर कर अपनी कोठरी में घुसती हैं । बाहर की चकचक धूप के बाद आँख एकदम अँधिया जाती है ..अंदर ठंडा अँधेरा है , बांस की अलगनी पर कथरी और चादर मोड़ कर लटका है , चौकी के बगल में थूकदान और हुक्का , चीकट तकिये के ऊपर पूरी बाँही का ब्लाउज़ और किनारी वाली धोती , सीट कर चपोत कर तहाया हुआ । भूख लग गई है । पुकारती हैं , पिंकी पिंकी ..<br /><br /><br />सामने एक तस्वीर टंगी है फ्रेम में । घर के मालिक शेरवानी अचकन पहने , सर पर टोपी धारे कुर्सी पर बैठे हैं , दोनों हाथ नक्काशीदार छड़ी की मूठ पर टिकाये । बगल में ईया , तब की तीस साल की , सीधा पल्ला साड़ी और बालों की काकुलपत्ती के बीच शरमाती हँसती आँखों से सामने देखतीं और पैर के पास दो गदबद बच्चे और किनारे एक अदद झबरीला कुत्ता । पीछे डाकबंगला नुमा विशाल घर के सामने का हिस्सा पीछे के बैकग़ाउंड में घुलता फ्रीज़ होता है । <br /><br /><br />अब जंगली हरियाले तोते शोर मचाते नहीं उतरते आम के पेड़ों पर ।<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/12521686-5197217213627507486?l=pratyaksha.blogspot.com'/></div>Pratyakshahttp://www.blogger.com/profile/10828701891865287201noreply@blogger.com15tag:blogger.com,1999:blog-12521686.post-36917357087079732012008-12-29T15:07:00.005+05:302008-12-29T15:21:34.905+05:30धूप के खेत में ... काश काश काश !<a href="http://3.bp.blogspot.com/_HMnaTG-3n8M/SViawpsuwVI/AAAAAAAAAjs/K9roBBiII48/s1600-h/monet+field+of+poppies.bmp"><img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 150px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_HMnaTG-3n8M/SViawpsuwVI/AAAAAAAAAjs/K9roBBiII48/s200/monet+field+of+poppies.bmp" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5285144323337142610" /></a>अकॉर्डियन पर कोई धुन बजाता है , घूम जाता है , पुराने चिरमिखी बटुये से सोने की धूल छिटक पड़ती है , दिन बीतता है रात आती है , कुहासे में कोई महीन चीख कौंधती है , गुम होता है मन , छाती डूब डूब डूबती है , पूरे भरे तालाब में जैसे एक , सिर्फ एक कमल का फूल , गुम जाता है धुँध में , पानी से उठता है जाने क्या ? <br /><br />चेहरे पर गर्म भाप की नमी का सुकून है , बेचैन दिल की राहत है , ठहरा हुआ मन तैरता है कागज़ के नाव सा डोलता है , उबडुब .. सपने की उड़ान में मुस्कुराता है , जी कहीं ठौर नहीं लगता ? ऐसा क्यों है भला ? का भोला प्रश्न हवा में टंगा है दीवार की कील सा , अकेला , खुला , अनुत्तरित .. बेआवाज़ ?<br /><br />भीतर इतना शोर है , बाहर कैसी अबूझ शाँति । कोहरे के पार हाथों हाथ न सूझता संसार है , पीली कमज़ोर रौशनी है , मुँह से निकली , बात की जगह , भाप का गोला है , गर्म है नर्म है , चाँदी की महीन दीवार है । मन की टेढ़ी मेढ़ी पगडंडियों के ठीक उलट कितना साफ , कितना फीका ..ये कैसा सरल संसार है । गज़ब !<br /><br /><br />ऐसा संसार जहाँ खुशी चहकती हो चिड़िया की चोंच से , धूप उतरता हो गर्माहट में , पीठ से , कँधों से , मन के भीतर , अंजोर फैलता हो आत्मा में , किसी बच्चे की खिलखिल हँसी सी तृप्ति में , चित्त लेटे धरती पर देखें आसमान को , नीले आसमान में फाहे आवारा बादल को और घर लौटने की जल्दी न हो , दिन बीतने की जल्दी न हो , धूप आँख को लगे तो बाँह रख लें चेहरे पर ओट में .. ऐसी दुनिया ऐसी ही दुनिया..<br /><br /><br /><strong><em>क्लोद मोने की फील्ड ऑफ पॉपीज़ ..खसखस के खेत में ..काश काश काश !</em></strong><div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/12521686-3691735708707973201?l=pratyaksha.blogspot.com'/></div>Pratyakshahttp://www.blogger.com/profile/10828701891865287201noreply@blogger.com10tag:blogger.com,1999:blog-12521686.post-92229150515544585522008-12-23T13:34:00.003+05:302008-12-23T14:47:36.409+05:30बाघ की आँख<a href="http://farm1.static.flickr.com/84/222781030_421766b5c7_m.jpg"><img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 240px; height: 180px;" src="http://farm1.static.flickr.com/84/222781030_421766b5c7_m.jpg" border="0" alt="" /></a> बाघ की आँख एक बार घूम जाती है अंदर <br /><br />- यहाँ हँसना मना है , उसकी आवाज़ में संजीदगी है <br />- पर मुझे हँसे बिना रहा जाता नहीं <br />- देन आयम सॉरी <br /><br />गर्म पानी के कुंड में घुसते ही कोई बर्फबारी कर दे , दूर खच्चरों की कतार बोझ से दबे, सर झुकाये , पहाड़ों के साये में चलती जाती है , बिना हरी घास के , उनके आभास के , यहाँ तक कि बिना उसकी आकांक्षा के ..<br /><br />- मुझे ऐसे ही तुम बदल देना चाहते हो ?<br /><br />आज मैंने पहनी है फूलों वाली रंगीन साड़ी ,इतने फूल कि हर कोई आ कर कह जाता है <br />आज धूप खिली है, तितलियों का मौसम है शायद .. <br /><br />बाहर जब की कुहासा है और मैं तुमसे कुछ नहीं बोलना चाहती। जैसे हाईबरनेशन की कोई प्रक्रिया शुरु हो गई है । हलाँकि अमूमन सर्दियों में मैं बहुत अच्छा महसूस करती हूँ , बरसों से । लगता है जैसे जीवन की शुरुआत ही हुई है अभी , सफर पूरा बाकी है और रास्ते के सब अजूबे बाकी हैं देखने को अभी । <br /><br />गहरे कोहरे में, रात को गाड़ी चलाते , फॉगलाईट की रौशनी टकरा कर वापस विंडस्क्रीन तक लौट आती है । और हज़ार छोटे कणों में छिटक जाती है । गाड़ी सड़क के किनारे खड़ी कर मैं साफ करती हूँ शीशा और किसी धुन में बना देती हूँ एक चेहरा , उसकी उठी भौंहों में जाने किस कौतुक का राज़ है । पानी और भाप की बून्दें मिलकर चेहरे को गडमड कर देती हैं , बनते बनाते मिटा देती हैं । सड़क के किनारे रद्दी कागज़ और कूट जलाते दो लोग लोई ओढ़े आग तापते देखते हैं मुझे । मेट्रो का काम चल रहा है । कुहासा थमे तो फिर शुरु होगा , वेल्डिंग से निकली चिंगारियाँ धूल में गिरकर विलीन होंगी , एक पल की नीली गर्मी का संकेत। <br /><br />पर सर्दी इनको पसंद नहीं करती जैसे ये नहीं करते होंगे । गर्म कपड़े और साबुत घर जो रोक सके तेज़ बरछी ठंडी हवा को , हड्डियाँ जमती होंगी , बच्चों के नाक बहते होंगे , पैरों हाथों की उँगलियाँ अकड़ती होंगी । हमेशा ठिठुरता शरीर किधर खोजता होगा गर्मी ?<br /><br />मौसम की पसंद भी स्थिति पर निर्भर करती है । ये बात अचानक मेरे दिमाग में धँसती मुझे ऐसा त्रास देती है । जो सहूलियतें सहज स्वाभाविक तरीके से मयस्सर होनी चाहियें वो कहाँ और क्यों गायब हो जाती हैं ? <br /><br /><br />तुम कुछ नहीं समझोगे । सिर्फ कहोगे , हँसना मना है और मैं कहूँगी , सुनो ये बाघ की आँख दिखती है तुम्हें ? मुझे दिखती है , क्यों दिखती है ? <br /><br /><br />( ये स्केच बहुत पहले बनाया था , कल कुछ आड़ी तिरछी लकीरें खींचते उन्हें इतना आड़ा तिरछा पाया कि अपने को रिमाईंड करने के लिये ये फिर से यहाँ चिपका रही हूँ )<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/12521686-9222915051554458552?l=pratyaksha.blogspot.com'/></div>Pratyakshahttp://www.blogger.com/profile/10828701891865287201noreply@blogger.com8tag:blogger.com,1999:blog-12521686.post-30668563959476351462008-12-18T09:58:00.004+05:302008-12-18T12:23:59.940+05:30खुश होना इतनी बड़ी बात है क्या ?<a href="http://1.bp.blogspot.com/_HMnaTG-3n8M/SUnsTPil0SI/AAAAAAAAAhU/do21W8CEt_U/s1600-h/cartier+bresson.jpg"><img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 134px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_HMnaTG-3n8M/SUnsTPil0SI/AAAAAAAAAhU/do21W8CEt_U/s200/cartier+bresson.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5281011853401903394" /></a><br />"To take a photograph is to align the head, the eye and the heart. It's a way of life." <br /><br /><br /><br /><br /><br />वो सपने में हमेशा मुस्कुराते दिखते हैं । तस्वीरों में नहीं ।<br /><br />अच्छी तस्वीर लेना उम्दा ज़िंदगी जीने जैसा है दिल दिमाग और आँख सब एक सुर में..। वो सपने में ऐसे ही दिखते हैं । हँसते हुये भी नहीं , उदास भी नहीं और थोड़ा गहरे सोचने पर , शायद मुस्कुराते हुये भी नहीं .. <br />कुछ कुछ ऐसे जिनकी जड़ें ज़मीन में गहरी गईं हो और टहनियाँ आसमान तक । कुछ खुरदुरे रूखे , सख्त दरख्त , फिर भी कहीं सेमल से हल्के जो उनको जाने कहाँ कहाँ उठा देता है , किस आसमान तक । उनकी ली हुई तस्वीरों को देखती हूँ। कुछ उजाले और अँधकार के खेल हैं , आँखों में किसी नम उदासी को पकड़ लेने के पल हैं , वीरानी है , भयानक उदासी है , खुशी के क्षणों में भी चीरने वाली उदासी , रौशनी के आगे सिलुयेट ..छाया !<br /><br />सपने में भी मद्धम सुर में संगीत बजता है । मार्था अर्गरीच शुबर्ट बजाती हैं । वो कहते हैं मुझे समझ नहीं शुबर्ट की । मैं हँसती हूँ , मुझे भी नहीं फिर बहुत उदास होती हूँ , बहुत । कितनी चीज़ें रह जायेंगी बिना समझ के ? इस एक ज़िंदगी में।<br /><br />मैं ज़िद करती हूँ , मेरी एक भी तस्वीर क्यों नहीं ली ? <br />इसलिये कि तुम्हारे दिल और दिमाग के बीच गहरी खाई है । <br />मैं कहती हूँ , ठीक , और सपने से बाहर निकल आती हूँ ।<br /><br />वो सपने में हमेशा मुस्कुराते दिखते हैं । तस्वीरों में नहीं । <br /><br />मैं खुली नर्म घास पर चित्त लेटकर आसमान देखना चाहती हूँ । बड़ी चीज़ें छूट जायेंगी । छोटी चीज़ें पकड़ लेना चाहती हूँ । मैं तस्वीरों में भी मुस्कुराना चाहती हूँ । सचमुच भी , सचमुच भी । खुश होना इतनी बड़ी बात है क्या ?<br /><br />(कार्तिये ब्रेसों की तस्वीर , उन्नीस सौ बत्तीस , मार्से )<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/12521686-3066856395947635146?l=pratyaksha.blogspot.com'/></div>Pratyakshahttp://www.blogger.com/profile/10828701891865287201noreply@blogger.com17tag:blogger.com,1999:blog-12521686.post-27070915774294625622008-12-08T12:24:00.008+05:302008-12-08T13:16:26.644+05:30इस समय का मैं नहीं..<a href="http://1.bp.blogspot.com/_HMnaTG-3n8M/STzH-pSMtfI/AAAAAAAAAf4/k1gVm5NJJuo/s1600-h/DSC02824.JPG"><img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 150px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_HMnaTG-3n8M/STzH-pSMtfI/AAAAAAAAAf4/k1gVm5NJJuo/s200/DSC02824.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5277312742419379698" /></a>सराय के आगे घुड़सवार रुकता है । घोड़े के मुँह से फेनिल झाग नीचे गिरे उसके पहले गर्द भरे चेहरे से उलटी हथेली थकान पोंछते, हारे गिरे कँधे को समेटता , अस्फुट बुदबुदाता है , इस समय का मैं नहीं , ये समय मेरा नहीं ..<br /><br />भट्टी के आगे , सुलगते अंगारों पर कड़कड़ाते, हथेलियों से ताप उठाते , जोड़ती है , मन ही मन गुनती है , झुर्रियों के जाल में खोजती है सब सपने जो मर गये , अंगारों के फूल भरती छाती में , हुक्के के तल पर गुड़गाड़ाता है पानी , समय ? पीरागढ़ी का सराय इस वक्त भी खुला है , मुसाफिरों के लिये..<br /><br />चौड़ी सड़क शहर का सीना चीरती है , बचपन में देखा कोई साई फी दृश्य हो । घुमावदार फ्लाईओवर्स , जगमगाती रौशनी के तले बंजरपने का गीत हो । घुड़सवार भौंचक है , देखता है , घोड़े की नाल बजती है , पीछे कोई गूबार नहीं छूटता ..<br /><br />(<a href="http://www.nekchand.com/nek.html" target="_blank">नेकचन्द सैनी</a> के <a href="http://www.clt.astate.edu/elind/nc_main.htm" target="_blank">रॉक गार्डेन</a> में )<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/12521686-2707091577429462562?l=pratyaksha.blogspot.com'/></div>Pratyakshahttp://www.blogger.com/profile/10828701891865287201noreply@blogger.com16tag:blogger.com,1999:blog-12521686.post-44370705745631345622008-12-03T13:10:00.003+05:302008-12-03T13:16:25.875+05:30आज के समय में सब भारमुक्त हैं ..<a href="http://1.bp.blogspot.com/_HMnaTG-3n8M/STY4LoLmWLI/AAAAAAAAAKk/_uS8TE4Slic/s1600-h/DSC_0593.jpg"><img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 133px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_HMnaTG-3n8M/STY4LoLmWLI/AAAAAAAAAKk/_uS8TE4Slic/s200/DSC_0593.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5275465785926899890" /></a><br />इतना चौकन्ना रहें ? इतना जितना दो हज़ार साल पहले थे , गुफाओं में ? जंगली नरभक्षी जानवरों की गुपचुप मारक पदचाप से ? उफनते नदी के पानी से ? बेकाबू , बेलगाम आग़ से ? चौकन्ने चौकन्ने , आतंकित ? सहमे ? फिर हमने डर काबू किया , जैसे आग किया , पानी की , तूफानी थपेड़े और कबीलाई हमले किये , प्यार नफरत और मृत्यु की , बीमारी की । हम विकसित हुये । चार पैरों से दो पैर वाले हुये , बड़े माथे से सारिक मस्तिष्क वाले सोचने समझने तौलने वाले बुद्धिमान हुये । जंगल से शहर , देहाती से नागरीय ..क्या क्या नहीं हुये सिर्फ चौकन्ने नहीं हुये । <br /><br />^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^<br /><br /><br />फिर बम फूटे , आगजनी हुई , गोली चली । लोग मरे , पुरुष नारी बच्चे । गलत समय में गलत जगह ? या सही समय में सही जगह । हम बचे , वो मरे ..गनीमत गनीमत । जब कल वो बचेंगे , हम मरेंगे तब उनकी गनीमत । मन ऐसा ही सुन्न हुआ । न गुस्सा , न दुख , न क्षोभ न आक्रोश । ऐसे समय में जीना भी कोई जीना है ? ईश्वर ने हमारी प्रार्थना सुन ली , हमें बख्शा ..या ईश्वर ने हमारी सुन ली ..ऐसी दुनिया से निज़ात दिला दी ..<br /><br /><br />^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^<br /><br />चारों ओर किसी प्रहसन का अंतिम भाग खेला जा रहा है ..देख भई खेल, नौटंकी ? तमाशा ..बोल बोल कर गर्दन की नस रस्सी बनी है , कोई न सुने ..क्यों सुने भला ? बस इतना की चौकन्ने रहो , मुड़ मुड़ कर पीछे देखो , अँधियारी रातों में डर सींचों , बिलों में रेंग जाओ , तूफान की आशंका में जहाज़ छोड़ चलो , भागो भागो ..फिर भी चौकन्ने रहो । पुरखों का चौकन्नापन उनकी कब्रगाहों की मिट्टी से उठा ताबीज़ बनाओ ..सातवीं इन्द्रीय विकसित करो ..उस बिल्ली की तरह जो शिकार पर घात लगाये , दबे पाँव , सतर्क चाल हमला करती है .. <br /><br /><br />^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^<br /><br />हमारे शब्दकोश से चुन चुन कर उन शब्दों को खारिज़ कर दो जो किसी अन्य भाव को दर्शाते हैं । फिर देखा कि शब्दकोश कुछ आड़ी तिरछी रेखाओं का संकलन मात्र रह गया है ..किसी ने आदेश का पलन किया और सभी शब्दों पर सफेद रंग पोत दिया । अब गनीमत है ..किसी के पास कुछ भी व्यक्त करने को शब्द नहीं ..सब भारमुक्त है सब ..<br /><br />^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/12521686-4437070574563134562?l=pratyaksha.blogspot.com'/></div>Pratyakshahttp://www.blogger.com/profile/10828701891865287201noreply@blogger.com9tag:blogger.com,1999:blog-12521686.post-4553673168681016252008-11-13T16:50:00.006+05:302008-11-15T10:06:48.383+05:30फिर एक दरवाज़ा<a href="http://2.bp.blogspot.com/_HMnaTG-3n8M/SRwbAjSBqmI/AAAAAAAAAKc/jgFJW5_8NOk/s1600-h/DSC02635.JPG"><img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 150px; height: 200px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_HMnaTG-3n8M/SRwbAjSBqmI/AAAAAAAAAKc/jgFJW5_8NOk/s200/DSC02635.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5268115360401435234" /></a><br />बचपन से उस दरवाज़े को देखते आये थे ..कभी जागे में कभी सपने में । शीशे पर नीले , पीले , धानी रंगों के चौकोर बक्से जिनसे रंग बहकर एक दूसरे में समा जाते , लगता जैसे समन्दर भीतर बह रहा हो । तब सोचा करते कि घर होगा तो इसकी सब दीवारें रंगों से भरी होंगी , सब दरवाज़ों से दूसरे कमरे की बजाय दूसरी दुनिया का रास्ता होगा । कि सिर्फ उँगली से छूने भर से दीवारें रंगों से पिघल कर पेड़ पौधे , जानवर , दरिया , पर्वत , आँख ..जाने क्या क्या में बदल जायेंगी । फिर वो दरवाज़ा बदल गया । बदल गया उस काठ के गाँठों भरे , खुरदुरे , रुखड़े , फटे फट्टों से भरे दरवाज़े में ,जो खड़ा है किसी पुराने बरगद की तरह , ठीक घर से बाहर , कोई सरपरस्त ! <br /><br />उसकी मोटी साँकल लगाकर अंदर किसी आँधी तूफान के गुज़र जाने का सुरक्षित इंतज़ार किया जा सकता था । लेकिन किसी समुद्री जहाज़ पर पागलपन की धुन में , बिना आगा पीछा सोचे , किसी नशे की बहक में निकल जाने को नहीं उकसाता । मेरा दरवाज़ा मज़बूत था , पागल सनकी नहीं था । सनक मुट्ठी में बन्द एक पैसे का सिक्का था , जो अब चलता नहीं था । <br /><br />फिर एक दिन एक सपना आया । और बार बार आया । सुबह उस सपने को मैं मुट्ठी में बन्द करती । रात तक उँगलियाँ लाख कोशिश के बावज़ूद खुल जातीं और सपना उन खुली उँगलियों से बह जाता । फिर उस बहे हुये सपने ने अपना खेल शुरु किया । हर दिन उनका यों बह जाना थोड़ा थोड़ा टलता रहा ..इतना कि एक दिन फिर एक पूरी रात उसे लगी बह जाने में । उस रात के बाद की सुबह में उसने रंग उठाये और एक दीवार रंगनी शुरु की । दीवार पर सबसे पहले उसने एक दरवाज़ा बनाया ... <br /><br /><br />उस एक दरवाज़े में <br />कई कई दरवाज़ों का <br />खुलना <br />तय था <br />जैसे<br />जीवन भर <br />जीना तय था <br /><br /><br /><br /><br />(पिछले दिन के.. धूप के असर में ऊपर की पेंटिंग)<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/12521686-455367316868101625?l=pratyaksha.blogspot.com'/></div>Pratyakshahttp://www.blogger.com/profile/10828701891865287201noreply@blogger.com12