tag:blogger.com,1999:blog-124655712008-04-29T14:18:41.736Zदेश-दुनियाHindi Bloggerhttp://www.blogger.com/profile/04059710706721725509noreply@blogger.comBlogger129125tag:blogger.com,1999:blog-12465571.post-76803367488385996372008-04-11T15:55:00.008Z2008-04-11T17:28:35.689Zसवाल-जवाब: ओलम्पिक मशाल<a href="http://bp1.blogger.com/_on3RyEKlOsA/R_-b50wxQ6I/AAAAAAAAAGo/pYajwpvxNzE/s1600-h/beijingtorchlogo.jpg"><img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp1.blogger.com/_on3RyEKlOsA/R_-b50wxQ6I/AAAAAAAAAGo/pYajwpvxNzE/s320/beijingtorchlogo.jpg" border="0" alt="लोगो"id="BLOGGER_PHOTO_ID_5188036713472148386" /></a><strong>1. क्या ये सच है कि नाज़ियों ने ओलम्पिक मशाल दौड़ की शुरुआत की थी?</strong><br />हाँ, मौजूदा रूप में मशाल दौड़ की शुरुआत 1936 के बर्लिन ओलम्पिक के दौरान हुई थी. माना जाता है कि हिटलर के प्रचार मंत्री जोज़ेफ़ गोयबल्स को मशाल दौड़ की योजना डॉ. कार्ल डीम ने बताई थी. डीम ने ओलम्पिक के प्रचार का काम भी देख रहे गोयबल्स को बताया कि एथेंस में माउंट ओलिम्पस के हेरा मंदिर से बर्लिन तक की 3422 किलोमीटर की दूरी 3422 आर्य युवा मशाल के साथ पूरा करें तो दुनिया को एक ख़ास तरह का संदेश मिलेगा. मशाल के रूट में बुल्गारिया, युगोस्लाविया, हंगरी, ऑस्ट्रिया और चेकोस्लोवाकिया आया. इन सभी देशों पर आगे चल कर नाज़ियों का क़ब्ज़ा हुआ.<br /><br />वैसे, सही मामलों में पहली विश्वव्यापी ओलम्पिक मशाल दौड़ 2004 के एथेंस ओलम्पिक के लिए आयोजित की गई.<br /><br /><strong>2. मशाल की बनावट के बारे में कुछ बताएँ, और ये भी कि इसमें ईंधन के रूप में क्या होता है?</strong><br />मशाल का डिज़ायन मेज़बान देश तय करता है. बीजिंग ओलम्पिक की मशाल 72 सेंटीमीटर ऊँची है. <a href="http://bp3.blogger.com/_on3RyEKlOsA/R_-cTUwxQ8I/AAAAAAAAAG0/uz6bc2Kt6Hs/s1600-h/beijingtorch.jpg"><img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp3.blogger.com/_on3RyEKlOsA/R_-cTUwxQ8I/AAAAAAAAAG0/uz6bc2Kt6Hs/s320/beijingtorch.jpg" border="0" alt="मशाल"id="BLOGGER_PHOTO_ID_5188037151558812610" /></a>अल्युमिनियम निर्मित मशाल का वज़न 985 ग्राम है. मशाल में ईंधन के रूप में प्रोपेन नामक हाइड्रोकार्बन का उपयोग किया जाता है. मौजूदा मशाल 65 किलोमीटर प्रतिघंटा की रफ़्तार वाली हवा को झेल सकती है. इतना ही नहीं प्रति घंटे 50 मिलिमीटर की दर से बारिश हो तो उसे भी ये मशाल भलीभाँति झेल सकती है. एक मशाल सामान्य परिस्थितियों में क़रीब 15 मिनट तक जल सकती है. यानि अधिकारियों का लक्ष्य होता है कि दौड़ के समय हर 10-12 मिनट में किसी जल रही मशाल से दूसरी मशाल जलाई जाती रहे.<br /><br /><strong>3. किसी कारणवश कभी मशाल बुझी भी है?</strong><br />पेरिस में यात्रा के दौरान 7 अप्रैल 2008 को मशाल को तीन बार बुझाना पड़ा. ऐसा चीन विरोधी प्रदर्शनों के कारण ऐहतियात के तौर पर करना पड़ा. इससे पहले मात्र दो अवसर और आए जब ओलम्पिक मशाल बुझी. 1976 में मॉन्ट्रियल में अचानक हुई तेज़ बारिश के कारण मशाल बुझ गई. किसी ने आनन-फ़ानन में सिगरेट लाइटर से उसे जला दिया जो कि ठीक बात नहीं मानी गई. इसलिए फिर बैकअप लैम्प से दौड़ में प्रयुक्त मशाल को नए सिरे से जलाया गया. 2004 में भी एक बार मशाल तेज़ हवा के कारण बुझी थी.<a href="http://bp3.blogger.com/_on3RyEKlOsA/R_-cbUwxQ9I/AAAAAAAAAHA/2f1Dk7_pkts/s1600-h/beijingtorch_lantern.jpg"><img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp3.blogger.com/_on3RyEKlOsA/R_-cbUwxQ9I/AAAAAAAAAHA/2f1Dk7_pkts/s320/beijingtorch_lantern.jpg" border="0" alt="मातृज्योति लैम्प"id="BLOGGER_PHOTO_ID_5188037288997766098" /></a><br /><br />जहाँ तक एक देश से दूसरे देश की यात्रा की बात है, तो हवाई जहाज़ पर ले जाने से पहले मशाल को बुझा दिया जाता है. लेकिन दौड़ के लिए एथेंस में तापक शीशे के सहारे जो अग्नि जलाई जाती है, उस मातृज्योति को सुरक्षित लैम्पों में जलते रहने दिया जाता है. इन लैम्पों को आयोजक देश के अधिकारी विमान में संभाले रखते हैं. मशाल दौड़ के विभिन्न चरणों के बीच रातों में विश्राम के वक़्त भी मशाल बुझा दी जाती है, सिर्फ़ लैम्प ही हमेशा जलते रहते हैं. <br /><br /><strong>4. मशाल दौड़ में शामिल होने के लिए लोगों का चुनाव कौन करता है?</strong><br />ओलम्पिक मशाल थामने के लिए लोगों का चुनाव कई तरह से किया जाता है. ज़्यादातर तो उस देश के अधिकारियों की सलाह पर चुने जाते हैं, जहाँ कि मशाल दौड़ हो रही होती है. इस कोटि में खेल की दुनिया के लोगों की तादात ज़्यादा होती है, हालाँकि समाज के दूसरे तबकों के प्रतिष्ठित लोगों को भी मौक़ा दिया जाता है. मशाल लेकर दौड़ने के लिए कुछ लोगों का चुनाव आयोजक देश की सरकार की तरफ़ से होता है. जैसे लंदन में मशाल थामने वालों में ब्रिटेन में चीन की राजदूत भी शामिल थीं. तीसरी कोटि के लोग मशाल दौड़ के प्रायोजकों की तरफ़ से लगाए जाते हैं. इस बार की प्रायोजक कंपनियाँ हैं- सैमसंग, कोका-कोला और लेनोवो.<br /><br /><strong>5. इस बार मशाल के इर्दगिर्द प्रथम सुरक्षा घेरा बना कर चल रहे नीली-सफ़ेद ट्रैकसूट वाले रक्षकों का क्या मामला है?</strong><br />ब्लू-एंड-व्हाइट ब्रिगेड के ये लोग दरअसल चीनी सुरक्षा बल के अतिविशिष्ट दस्ते के सदस्य हैं. इस बार लंदन में मशाल दौड़ में शामिल कुछ धावकों की मानें तो चीनी मशाल-रक्षकों का शालीनता से कोई वास्ता नहीं है. टूटी-फूटी अंग्रेज़ी में ये धावकों को 'हाथ ऊपर उठा कर रखो, सीधा चलो...' जैसे आदेश देते रहते हैं. लंदन में 2012 के ओलम्पिक आयोजन से जुड़े एक बड़े खेल अधिकारी ने चीनी मशाल रक्षकों को 'Thugs' की उपमा दी है. <br /><br />नीले-सफ़ेद पहनावे वाले चीनी मशाल रक्षकों का सबसे ज़्यादा विरोध इस बात को लेकर हो रहा है कि ये चीनी सुरक्षा बलों की उन्हीं टुकड़ियों से हैं जिन पर कि तिब्बत में दमनात्मक कार्यों में शामिल होने का आरोप रहा है. और अंतत:, मशाल दौड़ में शामिल ब्रिटेन, फ़्रांस, अमरीका और अर्जेंटीनी जैसे देशों की चुप्पी के बाद जापान ने चीनियों से ये कहने का साहस किया है कि उसके यहाँ चीनी रक्षकों को मशाल के साथ दौड़ने की अनुमति नहीं दी जाएगी, क्योंकि जापान अपने दम पर मशाल की सुरक्षा-व्यवस्था सुनिश्चित कर सकता है.<div class="blogger-post-footer"><p><a href="http://feeds.feedburner.com/blogspot/mLvz" rel="alternate" type="application/rss+xml"><img src="http://www.feedburner.com/fb/images/pub/feed-icon16x16.png" alt="" style="vertical-align:middle;border:0"/></a> <a href="http://feeds.feedburner.com/blogspot/mLvz" rel="alternate" type="application/rss+xml">देश-दुनिया का रीडर-फ़ीडर</a></p></div>Hindi Bloggerhttp://www.blogger.com/profile/04059710706721725509noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-12465571.post-39833083976780547952008-04-09T11:17:00.008Z2008-04-29T14:17:08.038Zचाइना रेडियो की एक रिपोर्ट<a href="http://bp2.blogger.com/_on3RyEKlOsA/R_yyWIwAeNI/AAAAAAAAAGc/ybdazPcvEXs/s1600-h/extinguisher_london.jpg"><img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp2.blogger.com/_on3RyEKlOsA/R_yyWIwAeNI/AAAAAAAAAGc/ybdazPcvEXs/s320/extinguisher_london.jpg" border="0" alt="लंदन में बीजिंग ओलंपिक मशाल बुझाने की कोशिश"id="BLOGGER_PHOTO_ID_5187216964199676114" /></a>मीडिया के लिए पूरी तरह नहीं खुले किसी देश का सूचना-प्रवाह सत्य से कितना दूर हो सकता है, उसकी मिसाल चाइना रेडियो इंटरनेशनल की एक रिपोर्ट में देखा जा सकता है, जिसे हिंदी श्रोताओं/पाठकों के लिए प्रस्तुत किया गया.<br /><br />मैंने सुना था कि चीनी मीडिया या तो अपनी मर्ज़ी से या सरकारी दबाव में अपने लोगों को आधी-अधूरी या बनी-बनाई ख़बरें देता है. लेकिन भारतवासियों और हिंदीभाषियों के लिए सफेद झूठ प्रसारित करने का कोई मतलब समझ में नहीं आता. क्योंकि भारत में मीडिया के क्षेत्र में खुलापन कई मामलों में तो पश्चिमी देशों से भी ज़्यादा है.<br /><br />चाइना रेडियो इंटरनेशनल की ख़बर लंदन में ओलंपिक मशाल दौड़ के बारे में है. सब को पता है कि लंदन में 50 किलोमीटर के पूरे रास्ते में मशाल दौड़ को तिब्बत समर्थक और चीन विरोधी प्रदर्शनकारियों का सामना करना पड़ा. क़रीब 35 प्रदर्शनकारियों को गिरफ़्तार किया गया. मशाल छीनने और उसे अग्निशामक से बुझाने की कोशिशों की तस्वीरें दुनिया भर ने देखीं. मशाल थामने के लिए चीनी राजदूत को तयशुदा स्थान से दूर चाइना-टाउन जाना पड़ा. लेकिन ये देखिए ओलंपिक मशाल दौड़ के लंदन चरण के बारे में चाइना रेडियो की रिपोर्ट, सब कुछ कितना व्यवधानरहित और आनंदमय रहा! (कृपया मज़े के लिए पढ़ें.)-<br /><br /><strong>2008-04-07 16:16:49<br />पेइचिंग ओलिंपिक मशाल रिले लंदन में संपन्न हुई<br /><br />6 मार्च को 2008 पेइचिंग ओलिंपिक की मशाल रिले ब्रिटेन की राजधानी लंदन में चली , उसी दिन लंदन में बड़ी बर्फबारी पड़ी , विशाल जमीन पर सफेद चादर सा बिछा हुआ , जान पड़ता था कि पूरा शहर एक सफेद दुनिया में आच्छादित था , मौसम ठंडा था , लेकिन ओलिंपिक मशाल के स्वागत में लंदन निवासियों और ब्रिटेन में रह रहे चीनी मूल के लोगों और प्रवासी चीनियों का उत्साह बहुत ऊंचा था । <br /><br />ओलिंपिक मशाल रिले 6 मार्च के सुबह सफेद बर्फों से ढके लंदन में हुई । लंदन के उत्तरी भाग में स्थित वेम्बली स्टेडियम के पास आरेना चौक पर रंगबिरंगे झंडे हवा में लहरा रहे थे , बैंड की ध्वनि आकाश में गूंज उठी और चौक पर हजार से अधिक लोग एकत्र हुए , उन में से सपरिवार आए लोग बहुत अधिक थे । सुबह दस बज कर तीस मिनट पर मशाल वेम्बली स्टेडियम में प्रज्ज्वलित किया गया और उस के स्वागत में इकट्ठी भीड़ में हर्षोल्लास गूंज उठा , जो आरेना चौक तक सुनाई पड़ा था। अपने तीन बच्चों को ले कर मशाल रिले देखने आए लंदन निवाली श्री अर्वांद बाटेल और उन के बच्चे हाथों में चीनी राष्ट झंडे , ब्रिटिश राष्ट्र झंडे और ओलिंपिक पताकाएं थामे हर्षोल्लास कर रहे थे । उन्हों ने कहाः <br /><br />हम स्टेडियम के निकटस्थ स्थान पर है । आज की गतिविधि उत्साहजनक है , मुझे इस प्रकार के संगीत बहुत पसंद है । <br /><br />सुश्री काटिए.पोल मशाल रिले के अपने पास से गुजरते देख कर बहुत प्रफुल्लित हुई , वह स्थानीय चीनियों द्वारा प्रस्तुत रंगीन फीता नृत्य से बरबस आकर्षित हुई । उन्हों ने कहाः <br /><br />यह नृत्य बेहद सुन्दर है । मैं ने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि रंगीन फीतों से इस किस्म का मनोहर नृत्य पेश किया जा सकता है । यह नृत्य बहुत मोहक है । मुझे बड़ी खुशी हुई कि मशाल रिले यहां से गुजर कर लंदन और अन्य स्थानों को चली जाएगी । <br /><br />उसी दिन की मशाल रिले गतिविधि के लिए लंदन के उन सभी स्थलों , जहां मशाल रिले पहुंचेगी , ने अनेक प्रकार के रंगबिरंगे जश्न आयोजित किए । आरेना चौक पर जाकोब .माट्वीजसन ने लाल सफेद रंगों की धारीदार नृत्य पोशाक पहना था और उन के हाथों में अग्नि का प्रतीक वाला पकाता था । वे अपने सहपाठियों के साथ रंगमंच पर कार्यक्रम पेश करने की प्रतीक्षा में थे । उन्हों ने संवाददाता से कहा कि वह लंदन के एक मिडिल स्कूल का छात्र है । <br /><br />हम रंगमंच पर प्रोग्राम पेश करेंगे । जब मशाल पहुंचा , तो हमारा एक भाग चक्कर लगाए गोलाकार दिखाएंगे और दूसरा भाग रंगीन झंडे फहराएंगे । <br /><br />प्रोग्राम पेश करने वाले स्कूली छात्र दल के नेता ब्रेंट सामुदायिक बस्ती से आई सुश्री क्लारी. सालंडी है । उन्हों ने कहाः <br /><br />आज बहुत से नौजवान यहां आए हैं । उन्हों ने खुद प्रोग्राम के लिए पोशाक बनाये है । वे पेइचिंग ओलिंपिक मशाल के ब्रिटेन में आने का जोशीला स्वागत करते हैं । उन का यह प्रोग्राम शांति वाहक कबूतरे की आकृति में है , जिस का अर्थ ओलिंपिक भावना शांति है । प्रोग्राम का यह हिस्सा लहराती पवित्र अग्नि का द्योतक है । मैं बहुत भावविभोर हूं, यह एक महान घड़ी है । मैं समझती हूं कि ओलिंपिक मशाल की अग्नि विश्व के सभी देशों के एकता के सूत्र में बांध देगी और खेल समारोह के जरिए लोगों को और बेहतर करने के लिए प्रोत्साहित करेगी , यह ओलिंपिक द्वारा प्रवर्तित मुख्य विषय है । <br /><br />मशाल रिले के लंदन में चलने के समय ब्रिटेन में रह रहे चीनी मूल के लोग और प्रवासी चीनी सब से अधिक प्रभावित हुए । जब मशाल रिले लंदन की चाइना टाउन में खड़े चीनी तौरण तक पहुंची , तो वहां इंजतार में खड़े चीनियों में जोरदार उमंग और उत्साह की लहर दौड़ने लगी । लाल रंग की लाइट , सड़क के दोनों किनारों पर फहराती रंगीन झंडियां , घूम रहे स्वर्णिम ड्रैगन व सिंह नाच और प्यारे प्यारे पेइचिंग ओलिंपिक के पांच शुभंकर यहां के खुशगवार वातावरण को चार गुना बढ़ा गए। लंदन के चीनी व्यापारी संघ के अध्यक्ष श्री तङ चुथिंग ने कहाः <br /><br />हम पिछले अनेक महीनों से तैयारी कर रहे हैं । देखो , वहां के कंडीलों और रंगीन ध्वजों को देखो , ओलिंपिक के पांच शुभंकर भी आ पहुंचेंगे , हम ड्रैगन व सिंह नाच भी नाचेंगे । और वे चीनी राष्ट्र झंडे , ओलिंपिक ध्वज और ब्रिटिश राष्ट्र झंडे सभी हम ने तैयार कर रखे हुए हैं । <br /><br />चीनी मूल की युवती सुश्री कामेन वु सिंह नाच दल की सदस्या है । उस ने अपने सहपाठियों के साथ सिंह नाच नाचते हुए ब्रिटेन स्थित चीनी राजदूत सुश्री फु श्यन और उन के हाथ में थामे मशाल को चाइना टाउन के अंतिम छोर तक पहुंचाया । कामेन .वु ने कहा कि यद्यपि उन की चीनी भाषा अच्छी नहीं है, तथापि वह पेइचिंग ओलिंपक मशाल के साथ निकट संपर्क के इस मौके को बहुत मूल्यवान समझती है । उस ने कहाः <br /><br />हम ने इस बार की गतिविधि के लिए दो महीनों तक तैयारी की है , हम हर हफ्ते तीन दिन अभ्यास करते थे । मैं बहुत प्रभावित हुई हूं , मैं समझती हूं कि मेरी यह कोशिश मूल्यवान है । आम स्थिति में हमें ओलिंपिक मशाल के इतने नजदीक पहुंचने का मौका नहीं मिलता है । <br /><br />लंदन की सड़कों पर बहुत से लोग मशाल रिले के साथ एक स्थल से दूसरे स्थल तक दौड़ने चले जाते थे । उन में से लंदन युनिवर्सिटी के छात्र , अखिल ब्रिटिश चीनी छात्र मित्रता संघ के अध्यक्ष श्री ये हाईथाओ भी हैं । उन की नजर में 6 मार्च की यह हिमपात शुभसूचक है । उन का कहना हैः <br /><br />आज सुबह बड़ी बर्फबारी हुई , यह बड़ी खुशी की बात है । क्योंकि यह बर्फबारी इस साल के ओलिंपिक की सफलता का शुभसूचक है । यों मौसम ठंडा है , किन्तु लोगों के दिल में गर्मी भरी हुई है । ओलिंपिक एक शानदार खेल समारोह है , वह मातृभूमि का शानदार जश्न है , जिस से मातृभूमि की प्रतिष्ठा और उपलब्धि अभिव्यक्त हुई है। <br /><br />मशाल रिले के जोशीले वातावरण से ब्रिटिश पक्ष के कर्मचारी भी प्रभावित हुए । मशाल रिले के दौरान सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के काम में तैनात सुश्री मारिया. आर्मस्ट्रांग ने कहा कि मौसम ठंडा है , पर वह सभी लोगों की भांति बहुत उत्साहित हुई है । <br /><br />आज इतने ज्यादा लोग एकत्र हुए हैं , बड़ी खुशी है कि इतने ज्यादा मुस्कराते चेहरे देखे । मौसम सर्द है , लेकिन ओलिंपिक मशाल रिले की कार्यवाही बहुत उम्दा है । मैं पेइचिंग ओलिंपिक देखने के आतुर हूं । मैं और मेरे सहकर्मी सभी आज यहां काम मिलने पर प्रसन्न हुए हैं । <br /><br />लंदन में मशाल रिले 50 किलोमीटर लम्बे रास्ते से गुजरी , जो मौजूदा रिले में सब से लम्बी है। रिले ग्रेट ब्रिटेन संग्रहालय , लंदन टावर पुल , चाइना टाउन और बिग बेन क्लॉक आदि दर्शनीय स्थलों से गुजरी । लंदन की मशाल रिले विशिष्ट ऊंचे दर्जे की है । जब मशाल रिले डाउनिंग स्ट्रेट नम्बर 10 पहुंची , उस के स्वागत में ब्रिटिश प्रधान मंत्री गोर्डुन ब्रोन खुद द्वार पर आए और रिले के अंतिम स्थल पर आयोजित समारोह में राजकुमारी आन्ने भी उपस्थित हुई । <br /><br />मशाल रिले जब लंदन के पूर्वी भाग में स्थित ग्रीनविच के प्रायद्वीप चौक पर पहुंची , तो वहां अग्नि कुंड को प्रज्ज्वलित करने की रस्म आयोजित हुई । इस के उपरांत मशाल रिले लंदन की गतिविधि समाप्त कर आगे के पड़ाव यानी फ्रांस के पैरिस शांति का संदेश पहुंचाने चली जाएगी । <br /><br />पेइचिंग ओलिंपिक मशाल रिले लंदन में अपनी कार्यवाही संपन्न करके 7 मार्च को फ्रांस के शहर पेरिस पहुंची । 7 तारीख को पेरिस के प्रतीकात्मक वास्तु निर्माण यानी एफेर टावर के नीचे से रिले की शुरूआत होगी । इस भव्य रस्म के स्वागत में फ्रांस के पूर्व प्रधान मंत्री , सीनेटर श्री जेन.पिएर . राफिरिन ने 6 तारीख को विशेष कर एफेर टावर के नीचे चीनी संवाददाताओं को इंटरव्यू दिया और कहा कि उन्हें बड़ी खुशी हुई है कि ओलिंपिक पेइचिंग में आयोजित होगा । उन्हों ने कहाः <br /><br />हालांकि पेरिस को 2012 ओलिंपिक के आयोजन का अवसर नहीं मिला , लेकिन मुझे बड़ी खुशी हुई है कि ओलिंपिक चीन में भी होगा । विश्व के सभी देशों को औलिंपिक आयोजित करने का अधिकार है । चीनी जनता को भी ओलिंपिक का आयोजन करने का अधिकार है । 2008 पेइचिंग ओलिंपिक निश्चय ही चीनी व विश्व युवा का शानदार खेल समारोह होगा । ओलिंपिक का आयोजन चीन द्वारा खुलेपन की नीति लागू करने की अभिव्यक्ति है , साथ ही ओलिंपिक भावना की व्यापकता का महत्व व्यक्त होगा । </strong><br /><br />ये रहा रिपोर्ट का- <a href="http://hindi.cri.cn/121/2008/04/07/1@79024.htm">असल लिंक</a>.<br /><br />चाइना रेडियो इंटरनेशनल ने ल्हासा में हुए विरोध प्रदर्शनों से जुड़ी एकतरफ़ा रिपोर्टों का एक <a href="http://hindi.cri.cn/121/2008/03/23/Zt1@78390.htm">विशेष पन्ना</a> भी तैयार किया है. नज़र डालने पर पता चलेगा कि राज्यनियंत्रित मीडिया सच्चाई से कितने कोस दूर होता है.<br /><br />लंदन के बाद पेरिस में भी हंगामा होने के बाद चाइना रेडियो का स्वर थोड़ा बदला, लेकिन फिर भी सच्चाई से कोसों दूर. बाद की रिपोर्टों में 'पवित्र अग्नि' के पथ में बाधा डालने के लिए प्रदर्शनकारियों को लानत दी गई है.<div class="blogger-post-footer"><p><a href="http://feeds.feedburner.com/blogspot/mLvz" rel="alternate" type="application/rss+xml"><img src="http://www.feedburner.com/fb/images/pub/feed-icon16x16.png" alt="" style="vertical-align:middle;border:0"/></a> <a href="http://feeds.feedburner.com/blogspot/mLvz" rel="alternate" type="application/rss+xml">देश-दुनिया का रीडर-फ़ीडर</a></p></div>Hindi Bloggerhttp://www.blogger.com/profile/04059710706721725509noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-12465571.post-16679126820889738492008-03-30T10:29:00.009Z2008-03-30T15:01:12.279Zएक बुशल गेहूँ, एक बुशल टमाटर<a href="http://bp1.blogger.com/_on3RyEKlOsA/R--VqIwAeLI/AAAAAAAAAGM/UO7Gu6Awynw/s1600-h/bushell.gif"><img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp1.blogger.com/_on3RyEKlOsA/R--VqIwAeLI/AAAAAAAAAGM/UO7Gu6Awynw/s400/bushell.gif" border="0" alt="बुशल टोकरी"id="BLOGGER_PHOTO_ID_5183526247262615730" /></a>ख़बरों की दुनिया में घूमते हुए कई ऐसी चीज़ें सामने आती हैं, जिन्हें विस्तार से जानने की या तो ज़रूरत नहीं होती या फिर ज़रूरत होने पर भी उन्हें नज़रअंदाज़ किया जाता है. इकाइयों या यूनिट्स के मामले में भी ऐसा ही होता है. लेकिन आम प्रचलन में ऐसी कई इकाइयाँ हैं जिनके बारे में जिज्ञासा रखने पर बड़ी ही रोचक जानकारियाँ मिलती हैं. कुछ महीनों पहले मेरी नज़र से ऐसी एक इकाई गुजरी थी- <a href="http://desh-duniya.blogspot.com/2005/10/blog-post_22.html">तोरिनो</a>. इसके बारे में विस्तार से जानने का अनुभव रोमाँचक रहा था.<br /><br />पिछले दिनों गेहूँ की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ती क़ीमत के बारे में एक ख़बर पढ़-सुन रहा था. पता चला कि पश्चिमी देशों में उत्पादक के स्तर पर गेहूँ के व्यापार में किलोग्राम या क्विंटल या टन नहीं बल्कि बुशल(Bushel) नामक इकाई प्रयुक्त की जाती है. (ठीक उसी तरह जैसे तेल के अंतरराष्ट्रीय व्यापार में लीटर-किलोलीटर नहीं बल्कि गैलन-बैरल का इस्तेमाल होता है.) सच कहें तो न सिर्फ़ गेहूँ बल्कि बाक़ी खाद्यान्नों, फलों आदि के लिए भी बुशल का ही उपयोग किया जाता है. बुशल दरअसल एक निश्चित आकार की टोकरी होती है(अमरीका में 64 पाइंट, जबकि ब्रिटेन में 8 गैलन आयतन के बराबर) जिसे किसी सूखे कृषि उत्पाद से भर कर उस उत्पाद की एक व्यापारिक इकाई तय की जाती है. मतलब हर उत्पाद के लिए एक बुशल का मतलब अलग-अलग होगा. उदाहरण के लिए अमरीका में एक बुशल गेहूँ या सोयाबीन का वज़न 60 पाउंड निश्चित किया गया है, जबकि एक बुशल में 48 पाउंड सेब और 53 पाउंड टमाटर आते हैं.<br /><br /><strong>टीईयू</strong><br /><br />इसी तरह साइंटिफ़िक अमेरिकन के अप्रैल 2008 अंक में परमाणु तस्करी के ख़तरों के बारे में एक लेख पढ़ते हुए बार-बार TEU नामक इकाई सामने आई. ये दरअसल ग्लोबलाइज़ेशन को आसान बनाने वाली एक प्रमुख चीज़ कंटेनर से जुड़ी हुई है. जैसा कि सर्वविदित है, आज अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ग़ैरपेट्रोलियम पदार्थों का ज़्यादातर व्यापार कंटेनरों में होता है. लेकिन व्यापार बढ़ने के साथ-साथ कंटेनर भी अलग-अलग आकार में आने लगे हैं. लेकिन हिसाब-क़िताब की सहूलियत के चलते इस मामले में भी एक मानक तय किया गया है- TEU या Twenty-foot Equivalent Unit. यानि सबसे ज़्यादा प्रचलित 20 फ़ुट लंबे कंटेनर को मानक माना गया है. साइंटिफ़िक अमेरिकन के लेख से ही उदाहरण लें तो वर्ष 2007 में दुनिया भर में जहाज़ों के ज़रिए लगभग 30 करोड़ TEUs ढोए गए. और यदि एक व्यस्त बंदरगाह की बात करें तो न्यूयॉर्क और न्यूजर्सी बंदरगाह पर प्रतिदिन औसत 10 हज़ार TEUs की आमद होती है.<br /><br /><strong>यूटीसी/जीएमटी</strong><br /><br />यूनिटों की बात को आगे बढ़ाएँ तो अंतरराष्ट्रीय मानक समय को UTC(Universal Time Coordinated या Coordinated Universal Time) कहा जाने लगा है. हालाँकि गणना के तरीके की महीनियों पर नहीं जाएँ तो UTC और GMT(Greenwich Mean Time) के बीच व्यावहारिक स्तर पर कोई अंतर नहीं है. दिलचस्प बात ये है कि यूटीसी की देखरेख पेरिस से होती है, जबकि जीएमटी को लंदन स्थित ग्रीनिच से सँभाला जाता है.<br /><br /><strong>सेंटीग्रेड/सेल्सियस</strong> <br /><br />इसी तरह तापमान की सर्वमान्य इकाई को 'डिग्री सेंटीग्रेड' की जगह 'सेल्सियस' कहा जाने लगा है. बारीकियों पर ध्यान नहीं दें तो व्यावहारिक तौर पर दोनों हैं लगभग एक समान ही. इकाई के रूप में 'सेंटीग्रेड' के 'ग्रेड' का सौवाँ हिस्सा होने का भ्रम बनता है, जबकि 'ग्रेड' तो कोण की इकाई होती है. सेल्सियस इकाई की व्यवस्था के ज़रिए तापमानों को लेकर व्यापक शोध करने वाले Anders Celsius नामक स्वीडिश वैज्ञानिक को सम्मानित भी किया गया है. ध्यान रहे कि अधिकतर बड़े मीडिया संस्थानों ने सेल्सियस से पहले 'डिग्री' शब्द लगाने की बाध्यता ख़त्म कर दी है.<div class="blogger-post-footer"><p><a href="http://feeds.feedburner.com/blogspot/mLvz" rel="alternate" type="application/rss+xml"><img src="http://www.feedburner.com/fb/images/pub/feed-icon16x16.png" alt="" style="vertical-align:middle;border:0"/></a> <a href="http://feeds.feedburner.com/blogspot/mLvz" rel="alternate" type="application/rss+xml">देश-दुनिया का रीडर-फ़ीडर</a></p></div>Hindi Bloggerhttp://www.blogger.com/profile/04059710706721725509noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-12465571.post-36612457017503585102008-03-11T21:19:00.008Z2008-03-12T00:27:28.782Zएक भूगर्भशास्त्री का मोबाइल फ़ोन<a href="http://bp0.blogger.com/_on3RyEKlOsA/R9cRPd0WmDI/AAAAAAAAAF0/4Lja4B-O-Zg/s1600-h/N95.jpg"><img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp0.blogger.com/_on3RyEKlOsA/R9cRPd0WmDI/AAAAAAAAAF0/4Lja4B-O-Zg/s320/N95.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5176625254085597234" /></a>मोबाइल फ़ोनों का चलन इतना व्यापक हो गया है कि आधुनिकता से दूर माने जाने वाले किसी इलाक़े में भी कुछ लोग ऐसे ज़रूर मिल जाते हैं जो संचार के इस क्रांतिकारी साधन को भलीभाँति जानते हैं. लेकिन स्टेटस-सिंबल के रूप में महँगे और दसियों अतिरिक्त सुविधाओं से लैस मोबाइल फ़ोन लेकर चलने वालों में से भी कुछ ही को पता होता है कि आख़िर यह बेतार-यंत्र काम कैसे करता है. जानने की कोई ज़रूरत भी नहीं है. <br /><br />लेकिन यदि किसी भूगर्भशास्त्री को उसके मोबाइल फ़ोन सेट के बारे में पूछें तो वो गर्व से बताएगा कि धरती की कोख से निकले कितने तत्वों की सहायता से काम करता है यह स्मार्ट यंत्र. आप भी जानिए एक भूगर्भशास्त्री के मोबाइल फ़ोन को-<br /><br /><strong>1.एबीएस और पॉलिकार्बोनेट-Acrylonitrile Butadiene Styrene/Polycarbonate alloy</strong>- इस पदार्थ का उपयोग मोबाइल फ़ोन का बाहरी प्लास्टिक आवरण बनाने में होता है. एक मोबाइल फ़ोन के ABS/PC आवरण के निर्माण में लगभग दो किलोग्राम पेट्रोलियम का इस्तेमाल होता है. एबीएस की तरह ही पॉलिकार्बोनेट भी एक हल्का प्लास्टिक उत्पाद है, लेकिन कहीं ज़्यादा मज़बूत, इसलिए अपेक्षाकृत महँगा भी.<br /><br /><strong>2. ताँबा-</strong> मोबाइल फ़ोन के इलेक्ट्रॉनिक सर्किट का महत्वपूर्ण अंग ताँबे का बना होता है. ताँबे की ख़ासियत है कि इसे किसी भी रूप में ढाल सकते हैं, और यह बिजली का बेहतरीन सुचालक भी है. इन्हीं दो गुणों के कारण सर्किट की बारीक संचार व्यवस्था के लिए ताँबा उपयुक्त माना जाता है. यह मानव को सबसे पहले ज्ञात धातुओं में से है. प्राचीन सभ्यताओं के ईसा पूर्व 8700 के ताम्र आभूषणों के अवशेष मिल चुके हैं. इस समय चिली दुनिया के एक तिहाई ताँबे का उत्पादन करता है.<br /><br /><strong>3. काँच-</strong> पाषाण युग में पहली बार मानव ने ज्वालामुखी से निकले नैसर्गिक काँच को काटने के एक औज़ार के रूप में इस्तेमाल किया होगा. कृत्रिम काँच बनाने की विधि मेसोपोटामिया की प्राचीन सभ्यता में सामने आई, जब किसी ने भट्टे में पड़े रेत को काँच के मनके के रूप में परिवर्ति पाया. किसी स्तरीय मोबाइल फ़ोन के कैमरे की लेंस में उच्च कोटि के काँच का उपयोग किया जाता है, जो कि आज भी रेत में पाए जाने वाले सिलिका से ही बनाया जाता है.<br /><br /><strong>4. अल्युमिनियम-</strong> इसका उपयोग भी ताँबे की ही तरह ही मोबाइल फ़ोन के इलेक्ट्रॉनिक सर्किट में होता है. अल्युमिनियम भी बिजली का बढ़िया सुचालक है, लेकिन ताँबे के मुक़ाबले 65 प्रतिशत ही. इसके बावजूद चूँकि अल्युमिनियम ताँबे के मुक़ाबले बहुत हल्का और बहुत सस्ता है, इसलिए मोबाइल फ़ोनों में इसकी भी मौजूदगी होती है. धरती के गर्भ में भारी मात्रा में अल्युमिनियम है, लेकिन बॉक्साइट के रूप में. बॉक्साइट से अल्युमिनियम बनाने की विधि 1827 में खोजी जा सकी. चीन, रूस, कनाडा और अमरीका अल्युमिनियम के बड़े उत्पादकों में से हैं.<br /><br /><strong>5. लोहा-</strong> मोबाइल फ़ोन के महँगे मॉडलों का बाहरी आवरण आमतौर पर स्टेनलेस स्टील का होता है, जो कि लोहा, कार्बन और क्रोमियम के मिश्रण से तैयार होता है. क़रीब 6000 साल पहले मिस्र के लोगों द्वारा लोहे का इस्तेमाल किए जाने के सबूत उपलब्ध हैं.<br /><br /><strong>6. सिलिकॉन-</strong> अपने मूल रूप में सिलिकॉन मोबाइल फ़ोन के माइक्रोचिप और लिक्विड क्रिस्टल डिस्पले में प्रयुक्त होता है. जबकि इलेक्ट्रॉनिक सर्किट में इसका उपयोग डाइऑक्साइड के रूप में होता है. धरती की ऊपरी सतह में सबसे ज़्यादा मात्रा में पाया जाने वाला तत्व सिलिकॉन ही है.<br /><br /><strong>7. निकेल-</strong> इस धातु का उपयोग मोबाइल फ़ोन के माइक्रोफ़ोन में होता है. इसकी खोज 1751 में तब हुई जब कुपरनिकल(शैतानी ताँबा) नामक एक अयस्क से ताँबा निकालने की कोशिश हो रही थी. जब एक्सेल फ़्रेडरिक को अपने प्रयास में ताँबे की जगह एक श्वेत धातु मिला तो उसने इसे ओल्ड निक(शैतान) नाम दिया था. आज दुनिया का 30 प्रतिशत निकेल कनाडा के एक ऐसे इलाक़े से आता है जहाँ 1.85 अरब साल पहले एक बड़े उल्का-पिंड की टक्कर से धरती पिचक गई थी.<br /><br /><strong>8. टिन-</strong> टिन की सहायता से ही प्राचीन मानव ने कांस्य युग में कदम रखा था. मोबाइल फ़ोन में इलेक्ट्रॉनिक कलपुर्ज़ों को सही जगह टिका कर रखने के लिए टिन की सोल्डरिंग की जाती है. चीन और इंडोनेशिया टिन के बड़े उत्पादक हैं. माना जाता है कि अगले 40-50 वर्षों में दुनिया में टिन के ज्ञात स्रोत समाप्त हो जाएँगे.<br /><br /><strong>9. लिथियम-</strong> बिग बैंग के दौरान अस्तित्व में आए कुछेक तत्वों में से एक माने जाने वाले लिथियम का उपयोग मोबाइल फ़ोन की बैटरी में इलेक्ट्रोलाइट के रूप में होता है.<br /><br /><strong>10. कोबाल्ट-</strong> मोबाइल फ़ोन की बैटरी के कैथोड छोर(ऋणाग्र) में कोबाल्ट लगा होता है. विटामिन बी12 में भी इसका अंश होता है, जबकि इसके एक अन्य रूप कोबाल्ट-60 का रेडियोथेरेपी में उपयोग होता है.<br /><br /><strong>11. ग्रैफ़ाइट-</strong> मोबाइल फ़ोन की लिथियम ऑयन बैटरी के एनोड छोर(धनाग्र) में इसका उपयोग होता है. ग्रैफ़ाइट को कार्बन के सर्वाधिक स्थाई रूपों में गिना जाता है. ग्रैफ़ाइट को उच्चतम स्तर का कोयला भी मान सकते हैं, लेकिन ईंधन के रूप में इसका इस्तेमाल नहीं होता क्योंकि इसमें आग लगाना लगभग असंभव है.<div class="blogger-post-footer"><p><a href="http://feeds.feedburner.com/blogspot/mLvz" rel="alternate" type="application/rss+xml"><img src="http://www.feedburner.com/fb/images/pub/feed-icon16x16.png" alt="" style="vertical-align:middle;border:0"/></a> <a href="http://feeds.feedburner.com/blogspot/mLvz" rel="alternate" type="application/rss+xml">देश-दुनिया का रीडर-फ़ीडर</a></p></div>Hindi Bloggerhttp://www.blogger.com/profile/04059710706721725509noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-12465571.post-88949494336202386942008-02-29T17:02:00.010Z2008-02-29T20:43:29.965Zलीप वर्ष का जादू<a href="http://bp3.blogger.com/_on3RyEKlOsA/R8hiTPAhYaI/AAAAAAAAAFs/hPc_VEIzkEU/s1600-h/earth.jpg"><img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp3.blogger.com/_on3RyEKlOsA/R8hiTPAhYaI/AAAAAAAAAFs/hPc_VEIzkEU/s400/earth.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5172492254620770722" /></a>कहते हैं तारीख़ डायरी का एक पन्ना मात्र होती है. तीन मार्च हो या नौ अप्रैल या फिर 15 नवंबर, यदि कोई तिथि किसी कारण आपकी ज़िंदगी में किसी मील के पत्थर के समान नहीं हो या किसी ख़ास याद से नहीं जुड़ी हो तो शायद ही आप उसकी नोटिस लेंगे. यानि अधिकांश तारीख़ें बिना अपना महत्व जताए आती-जाती रहती हैं. सिर्फ़ एक तारीख़ ही इसका अपवाद है- 29 फ़रवरी...हर चौथे साल कैलेंडर पर दिखने वाला एक विशेष दिन.<br /><br />लीप वर्ष का अतिरिक्त दिन 29 फ़रवरी इसलिए महत्वपूर्ण है कि ये प्रकृति द्वारा...सौर मंडल और इसके नियमों के सौजन्य से आता है. ये धरती के सूर्य की परिक्रमा करने से जुड़ा हुआ है.<br /><br />जैसा कि स्कूलों में शुरू से ही बताया जाता है, धरती को सूरज का एक चक्कर लगाने में 365.242 दिन लगते हैं. मतलब एक कैलेंडर वर्ष से चौथाई दिन ज़्यादा. इसीलिए हर चौथे साल कैलेंडर में एक दिन अतिरिक्त जोड़ना पड़ता है. इस बढ़े दिन वाले साल को लीप वर्ष या अधिवर्ष कहते हैं. ये अतिरिक्त दिन ग्रेगोरियन कैलेंडर में लीप वर्ष का 60वाँ दिन बनता है, यानि 29 फ़रवरी.<br /><br />यदि 29 फ़रवरी की व्यवस्था नहीं हो तो हम हर साल प्रकृति के कैलेंडर से लगभग छह घंटे आगे निकल जाएँगे, यानि एक सदी में 24 दिन आगे. ऐसा होता तो मौसम को महीने से जोड़ कर रखना मुश्किल हो जाता. मसलन यदि लीप वर्ष की व्यवस्था ख़त्म कर दें तो आजकल जिसे मई-जून की सड़ी हुई गर्मी कहते हैं वैसी 'सूरज तपता धरती जलती' की स्थिति 500 साल बाद दिसंबर में आएगी.<br /><br />ईसा पूर्व 46 में जूलियस सीज़र द्वारा लाए गए जूलियन कैलेंडर में लीप वर्ष की व्यवस्था की गई. उन दिनों कैलेंडर का अंतिम महीना फ़रवरी होता था, जोकि सबसे छोटा महीना भी था. इसलिए अतिरिक्त दिन फ़रवरी में जोड़ा गया. जूलियस सीज़र ने मौसम को महीने से ठीक-ठीक मिलाने की कोशिश में उस साल यानि 46BC में कुल 90 अतिरिक्त दिन भी जोड़े..यानि कुल 445 दिनों का वर्ष जिसे ख़ुद सीज़र ने 'भ्रम का अंतिम वर्ष' कहा था. <br /><br />हालाँकि 42BC में पहला लीप वर्ष अपनाए जाने के बाद भी भ्रम बना रहा, जब जूलियस सीज़र के किसी अधिकारी की ग़लती के कारण हर तीसरे साल को लीप वर्ष बनाया जाने लगा. इसे 36 साल बाद ठीक किया जूलियस के उत्तराधिकारी ऑगस्टस सीज़र ने. उसने तीन लीप वर्ष बिना किसी अतिरिक्त दिन जोड़े गुजर जाने दिए और 8AD से दोबारा हर चौथे साल लीप वर्ष को नियमपूर्वक लागू करना सुनिश्चित किया.<br /><br />लेकिन जूलियन कैलेंडर को लागू किए जाने के बाद भी एक कमी रह गई थी. जिसे दूर किया लुइजि गिग्लियो ने. गिग्लियो ने 1580 के आसपास ये सिद्ध किया कि प्रकृति की घड़ी के साथ पूरी तरह ताल मिला कर चलने के लिए हर चौथे वर्ष एक दिन जोड़ने की व्यवस्था में कुछ अपवाद लगाने होंगे. उसने कहा कि कोई वर्ष जो कि 4 से विभाजित होता हो, उसमें फ़रवरी 29 दिन का होगा. लेकिन यदि 4 से विभाजित साल 100 से भी विभाजित होता है तो उसमें फ़रवरी 28 दिन का ही होगा. इसके ऊपर गिग्लियो ने एक और व्यवस्था दी, वो ये कि 4 और 100 से विभाजित होने वाला साल यदि 400 से भी विभाजित होता हो तो उसे लीप वर्ष माना जाए. इसीलिए 1700, 1800 और 1900 जहाँ सामान्य वर्ष माना गया, वहीं 2000 को लीप वर्ष का सम्मान मिला.<br /><br />पोप ग्रेगोरि के आदेश के बाद कैथोलिक देशों ने संशोधित जूलियन कैलेंडर या नए ग्रेगोरियन कैलेंडर को 1582 में लागू किया. नए कैलेंडर में साल का अंतिम महीना फ़रवरी नहीं, बल्कि दिसंबर निश्चित किया गया.(हालाँकि लीप वर्ष का अतिरिक्त दिन फ़रवरी के लिए ही रहने दिया गया.) उस साल नए कैलेंडर लागू करने की प्रक्रिया में 5 से 14 अक्टूबर की तारीख़ ग़ायब करनी पड़ी. इसी तरह जब 1752 में ब्रिटेन और उसके अधीनस्थ देशों ने अंतत: ग्रेगोरियन कैलेंडर अपनाया तो उन्हें उस साल 3 से 13 सितंबर की तिथियाँ हटानी पड़ीं.<br /><br />लेकिन इसके बाद भी सर्वमान्य ग्रेगोरियन वर्ष अभी सौर वर्ष से 27 सेकेंड बड़ा है. मतलब कैलेंडर में कोई सुधार नहीं किया गया तो दस हज़ार साल बाद हम प्रकृति के कैलेंडर से तीन दिन आगे होंगे. यानि इससे बचने के लिए कोई 3236 साल बाद एक बार फ़रवरी को 30 दिन का बनाना पड़ सकता है.<br /><a href="http://bp2.blogger.com/_on3RyEKlOsA/R8hXp_AhYZI/AAAAAAAAAFk/rAeAvWiN2JA/s1600-h/morarjidesai.jpg"><img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp2.blogger.com/_on3RyEKlOsA/R8hXp_AhYZI/AAAAAAAAAFk/rAeAvWiN2JA/s400/morarjidesai.jpg" border="0" alt="लीप्लिंग थे मोरारजी देसाई"id="BLOGGER_PHOTO_ID_5172480550834889106" /></a><br />क़ानून में 29 फ़रवरी को लेकर बड़ी ही अज़ीबोग़रीब स्थिति है. कई देशों में ऋण से जुड़े अदालती फ़ैसलों में इसके अस्तित्व तक को नकार दिया गया है. इस दिन पैदा हुए लोगों (लीपर्स या लीपलिंग्स) ने हर साल अपना जन्मदिन मनाने के लिए एक अतिरिक्त जन्मदिन तय कर रखा होता है- आमतौर पर 28 फ़रवरी या 1 मार्च. (अपने स्वर्गीय प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई भी 29 फ़रवरी को ही पैदा हुए थे.)<br /><br />नौकरीपेशा लोगों को लीप वर्ष में एक अतिरिक्त दिन काम करना पड़ता है, वो भी बिना किसी अतिरिक्त वेतन के. शायद इसीलिए ब्रिटेन में नौकरीपेशा लोगों ने 29 फ़रवरी के बदले एक दिन का अतिरिक्त अवकाश घोषित करने के लिए प्रधानमंत्री की वेबसाइट पर एक <a href="http://petitions.pm.gov.uk/LeapBankHoliday/">माँग पत्र</a> डाला है.<br /><br />ये तो हुई लीप वर्ष की बात. यानि एक ऐसा प्रयास जो सूरज के साथ क़दम मिला कर चलने की कोशिश है. लेकिन एक पचड़ा लीप सेकेंड का भी है. ये हमें प्रकृति से भी कहीं ज़्यादा सटीक 'टाईमकीपर' बनाने के दावे के साथ शुरू किया गया है. लीप सेकेंड के पचड़े पर चर्चा फिर कभी.<div class="blogger-post-footer"><p><a href="http://feeds.feedburner.com/blogspot/mLvz" rel="alternate" type="application/rss+xml"><img src="http://www.feedburner.com/fb/images/pub/feed-icon16x16.png" alt="" style="vertical-align:middle;border:0"/></a> <a href="http://feeds.feedburner.com/blogspot/mLvz" rel="alternate" type="application/rss+xml">देश-दुनिया का रीडर-फ़ीडर</a></p></div>Hindi Bloggerhttp://www.blogger.com/profile/04059710706721725509noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-12465571.post-46963468103644136022008-02-01T09:58:00.000Z2008-02-01T12:13:20.395Zचाँद छूने के बाद (भाग-2)<a href="http://bp2.blogger.com/_on3RyEKlOsA/R6MF9kVnz2I/AAAAAAAAAFM/QZ6h9QqBJsg/s1600-h/moonrise.jpg"><img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp2.blogger.com/_on3RyEKlOsA/R6MF9kVnz2I/AAAAAAAAAFM/QZ6h9QqBJsg/s320/moonrise.jpg" border="0" alt="चंद्रोदय"id="BLOGGER_PHOTO_ID_5161976153181245282" /></a>इस <a href="http://desh-duniya.blogspot.com/2008/01/blog-post.html">लेख के पहले हिस्से</a> में हमने चाँद पर क़दम रखने वाले लोगों में से सात के बारे में पढ़ा. आइए बाक़ी के पाँच मूनवॉकर के बारे में जानते हैं कि धरती से इतर किसी ज़मीन पर क़दम रखने की उपलब्धि हासिल करने के बाद उनकी ज़िंदगी कैसी रही-<br /><br /><strong>8. जेम्स इरविन, अपोलो 15 (30 जुलाई 1971)</strong><br />इरविन की मानें तो चाँद पर क़दम रखने के साथ ही उनका ईश्वर से साक्षात्कार हुआ था. भगवान से इस मुलाक़ात ने उनकी ज़िंदगी को बदल कर रख दिया. धरती पर वापस लौटते ही उन्होंने नासा छोड़ दिया. वे न सिर्फ़ धर्म की शरण में आ गए, बल्कि High Flight Foundation नामक एक संगठन की स्थापना भी की जो कि ईसाइयत की विभिन्न शाखाओं को साथ लेकर चलती है. इस संगठन का नेतृत्व करते हुए वो चार बार मिशन लेकर तुर्की गए Noah's Ark की खोज करने. यानि उस नौका के अवशेष ढूंढने जो कि मिथकों के अनुसार महाप्रलय के दौरान ईश्वरीय निर्देश पर तत्कालीन दुनिया के एकमात्र सदचरित्र व्यक्ति नोह और उसके परिवार तथा प्रमुख जीव प्रजातियों को बचाने के लिए बना था. इरविन को इस मिथकीय नौका को ढूँढ निकालने के अपने प्रयास में हर बार नाकामी ही मिली. इरविन का 1991 में निधन हुआ.<br /><br /><strong>9. जॉन डब्ल्यू यंग, अपोलो 16 (21 अप्रैल 1972)</strong><br />यंग छह बार अंतरिक्ष यात्राएँ करने वाले पहले व्यक्ति बने. ये रिकॉर्ड अभी भी उनके नाम है. चंद्रयात्रा के बाद 32 साल तक वे नासा के साथ रहे और 74 साल की उम्र में 2004 में सेवानिवृति ली. अत्यंत प्रतिभावान यंग ने नासा के 50 वर्षों के इतिहास में लगभग सभी प्रमुख परियोजनाओं में अपना योगदान दिया. उनके साथी अंतरिक्षयात्रियों की मानें तो यंग विनम्रता की प्रतिमूर्ति हैं.<br /><br /><strong>10. चार्ल्स ड्यूक, अपोलो 16 (21 अप्रैल 1972)</strong><br />ड्यूक को चाँद पर जा कर इतनी ख़ुशी हुई कि उन्हें वहाँ हेलमेट उतारने की इच्छा पर काबू करने में काफ़ी मशक्कत करनी पड़ी. चंद्रयात्रा के बाद वे बोरियत का शिकार हो गए. उन्होंने नासा को छोड़ दिया और ढेर सारा पैसा बनाने का फ़ैसला किया. उन्होंने बीयर के धंधे में ख़ूब पैसा बनाया भी. लेकिन बोरियत एक बार फिर उन पर हावी हो गई, और वे दिन-रात बीयर में डूबे रहने लगे. उनकी पत्नी डॉटि को भी ड्यूक पर चंद्र की कुदृष्टि पड़ने का अहसास हुआ. उन्होंने चंद्रयात्रा के बाद ड्यूक के ग़ुस्सैल हो जाने और परिवार से दूर काम में ही मशगूल रहने की शिकायत की. इन सबके बीच डॉटि भी नशाखोरी में डूब गई. लेकिन बाद में वह ईश्वर की शरण में आ गई. इसके बाद ड्यूक ने भी बीयर का धंधा छोड़ धर्म की राह पकड़ ली. इस तरह अंतत: पति-पत्नी चंद्रमा के अभिशाप से मुक्त हुए. अब दोनों ईसाइयत का प्रचार करते हैं, लोगों को सदकर्म के लिए प्रेरित करते हैं.<br /><br /><strong>11. यूजिन कर्नेन, अपोलो 17 (11 दिसंबर 1972)</strong><a href="http://bp2.blogger.com/_on3RyEKlOsA/R6MGTkVnz3I/AAAAAAAAAFU/qBkhocMgI0g/s1600-h/cernan.jpg"><img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp2.blogger.com/_on3RyEKlOsA/R6MGTkVnz3I/AAAAAAAAAFU/qBkhocMgI0g/s200/cernan.jpg" border="0" alt="कर्नेन"id="BLOGGER_PHOTO_ID_5161976531138367346" /></a><br />कर्नेन चंद्रमा पर उतरने वाले ग्यारहवें लेकिन चंद्र सतह पर चलने वाले अंतिम व्यक्ति हैं. दरअसल वापसी के दौरान वे बारहवें मूनवॉकर श्मिट के बाद अपोलो चंद्र मॉड्यूल में वापस लौटे थे. कर्नेन 1975 में प्राइवेट सेक्टर में आ गए, लेकिन नासा की परियोजनाओं में योगदान देते रहे. कर्नेन मानव अंतरिक्ष मिशन के बड़े पैरोकारों में से हैं. वर्षों से वे चाँद पर दोबारा मानव मिशन भेजे जाने के साथ-साथ मंगल ग्रह पर भी मनुष्य को पहुँचाने के लिए जनमत बनाने का प्रयास करते रहे हैं.<br /><br /><strong>12. हैरिसन जैक श्मिट, अपोलो 17 (11 दिसंबर 1972)</strong><br />चाँद पर उतरने वाले बारहवें व्यक्ति और एकमात्र वैज्ञानिक श्मिट 1975 में नासा को छोड़ कर राजनीति में आ गए. वे 1977 में अमरीकी सीनेट के लिए चुने गए. लेकिन अगले कार्यकाल के लिए नहीं चुने जाने पर 1982 में उन्होंने राजनीति को नमस्कार कह दिया. अब उनका समय हीलियम-3 पर रिसर्च में बीतता है. माना जाता है कि चाँद पर बहुतायत में उपलब्ध हीलियम-3 भविष्य में ऊर्जा का स्वच्छ स्रोत साबित हो सकता है.<div class="blogger-post-footer"><p><a href="http://feeds.feedburner.com/blogspot/mLvz" rel="alternate" type="application/rss+xml"><img src="http://www.feedburner.com/fb/images/pub/feed-icon16x16.png" alt="" style="vertical-align:middle;border:0"/></a> <a href="http://feeds.feedburner.com/blogspot/mLvz" rel="alternate" type="application/rss+xml">देश-दुनिया का रीडर-फ़ीडर</a></p></div>Hindi Bloggerhttp://www.blogger.com/profile/04059710706721725509noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-12465571.post-70455212913409852532008-01-31T19:01:00.000Z2008-02-01T12:12:33.539Zचाँद छूने के बाद<a href="http://bp2.blogger.com/_on3RyEKlOsA/R6IvT0Vnz1I/AAAAAAAAAFE/3RvhDheAUiU/s1600-h/armstrong+moonwalk.jpg"><img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp2.blogger.com/_on3RyEKlOsA/R6IvT0Vnz1I/AAAAAAAAAFE/3RvhDheAUiU/s320/armstrong+moonwalk.jpg" border="0" alt="चाँद पर आर्मस्ट्राँग"id="BLOGGER_PHOTO_ID_5161740140433362770" /></a>धरती से इतर किसी ज़मीन पर पाँव रखने का मौक़ा सिर्फ़ 12 लोगों को ही मिला है. इन लोगों ने अमरीका के अपोलो अभियान की विभिन्न उड़ानों के सहारे चाँद पर जाकर ये उपलब्धि अर्जित की.<br /><br />इन्होंने जुलाई 1969 से दिसंबर 1972 के बीच 'मूनवॉकिंग' की. उसके बाद इनकी ज़िंदगी ने क्या रुख़ किया? मुझे इस सवाल का जवाब हाल ही में एक लेख में मिला. आश्चर्य हुआ कि इनमें से ज़्यादातर ने बाद में वैज्ञानिक कार्यों से मुँह मोड़ लिया.<br /><br />आइए क्रमवार देखते हैं कि चाँद को छूने वाले दर्जन भर लोगों का बाद का जीवन कैसा रहा-<br /><br /><strong>1. नील आर्मस्ट्राँग, यान- अपोलो 11 (चाँद पर उतरने की तारीख़- 21 जुलाई 1969)</strong><br /><a href="http://bp2.blogger.com/_on3RyEKlOsA/R6Ir70Vnz0I/AAAAAAAAAE8/gYdiz8GppGo/s1600-h/moonlanding+stamp.jpg"><img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp2.blogger.com/_on3RyEKlOsA/R6Ir70Vnz0I/AAAAAAAAAE8/gYdiz8GppGo/s200/moonlanding+stamp.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5161736429581619010" /></a>चाँद पर सबसे पहले क़दम रखने वाले आर्मस्ट्राँग बारह मूनवॉकर्स में सबसे रहस्मय माने जाते हैं. नायक वाली छवि उन्हें कभी रास नहीं आई. उन्होंने सार्वजनिक मंचों पर उपस्थिति, इंटरव्यू, विज्ञापन आदि से अपने को अलग रखा. वे 1971 में सेवानिवृति तक नासा से जुड़े रहे. इस समय वे अपनी पत्नी के साथ अमरीका के ओहायो में रहते हैं. अभी भी वे ऑटोग्राफ़ देने से मना कर देते हैं.<br /><br /><strong>2. बज़्ज़ एल्ड्रिन, अपोलो 11 (21 जुलाई 1969)</strong><br />चाँद से लौटने के बाद बज़्ज़ को बुरे वक़्त ने घेर लिया. अपोलो 11 अभियान में उनके सहयोगी माइक कॉलिन की मानें तो बज़्ज़ को शुरू से ही इस बात का मलाल रहा कि वे चाँद पर क़दम रखने वाला पहला नहीं, बल्कि दूसरा मानव बने. शीघ्र ही बज़्ज़ शराब में गोते लगाने लगे, उन्हें अवसाद ने घेर लिया. उन्होंने सेना की नौकरी छोड़ दी. एक-एक कर दो पत्नियों से तलाक हुआ. तीसरी शादी के बाद ही वे 1988 में फिर से सामान्य ज़िंदगी की ओर लौटते दिखे. बाद में उन्होंने एक लेखक के रूप में पहचान बनाई. बज़्ज़ अंतरिक्ष-पर्यटन के बड़े समर्थकों में से हैं.<br /><br /><strong>3. चार्ल्स पीट कोनरैड (अपोलो 12, 19 नवंबर 1969)</strong><br />करिश्माई व्यक्तित्व वाले कोनरैड ने 1974 में नासा को छोड़ कर प्राइवेट सेक्टर का रुख़ किया. उन्होंने मैकडोनेल-डगलस की व्यावसायिक अंतरिक्ष यात्रा परियोजना में योगदान दिया. अपोलो 12 के इस कमांडर की मौत 1999 में मोटरसाइकिल दुर्घटना में हुई.<br /><br /><strong>4. एलन बीन, अपोलो 12 (19 नवंबर 1969)</strong><br />अपोलो 12 अभियान की सफलता के 12 साल बाद तक बीन नासा से जुड़े रहे. वहाँ से 1981 में सेवानिवृति के बाद उन्होंने चित्रकारी का पेशा चुना. उनके चित्र मुख्यत: चाँद और अन्य अंतरिक्षीय विषयों पर आधारित होते हैं. <br /><br /><strong>5. एलन शेपर्ड, अपोलो 14 (5 फ़रवरी 1971)</strong><br />शेपर्ड मई 1961 में अंतरिक्ष में पहुँचने वाले पहले अमरीकी बने थे. क़रीब दस साल बाद उन्हें चाँद पर क़दम रखने वाला पाँचवाँ व्यक्ति बनने का सौभाग्य मिला. सैनिक पृष्ठभूमि वाले शेपर्ड को बड़ा ही कड़क यान-कप्तान माना जाता था. लेकिन जब उन्होंने चाँद पर क़दम रखा तो अपनी भावनाओं पर काबू नहीं रख पाए और रो पड़े. चंद्रयात्रा के बाद उनका व्यक्तित्व बिल्कुल बदल गया. वे शांत प्रकृति के इंसान बन गए. नासा से 1974 में सेवानिवृत होने के बाद उन्होंने निजी क्षेत्र में काम किया. वे 1998 में ल्यूकीमिया का शिकार होकर इस दुनिया से विदा हुए.<br /><br /><strong>6. एडगर मिशेल, अपोलो 14 (5 फ़रवरी 1971)</strong><br />मिशेल ने ही कहा था कि चाँद से धरती को देखने पर सार्वभौम-जुड़ाव का अहसास होता है. चंद्रयात्रा के तुरंत बाद उन्होंने नासा को छोड़ दिया. उन्होंने 1973 में <a href="http://www.noetic.org/about.cfm">Institute of Noetic Sciences</a> की स्थापना की जहाँ आध्यात्मिक ऊर्जा, वैकल्पिक चिकित्सा और परामानसिक क्षमता जैसे विषयों पर अनुसंधान होता है. मिशेल ने 2004 में दावा किया कि वैंकूवर के एक किशोर ने हज़ारों मील दूर रहते हुए उनका कैंसर ठीक कर दिया. उन्होंने अमरीकी सरकार से पराग्रहीय जीवों के बारे में सच्चाई सार्वजनिक करने की माँग की है. मिशेल का मानना है कि दूसरे ग्रहों के जीव दशकों से धरती पर आते रहे हैं.<br /><br /><strong>7. डेविड स्कॉट, अपोलो 15 (30 जुलाई 1971)</strong><br />डाक-टिकट घोटाले में शामिल होने के आरोपों में अमरीकी सरकार ने स्कॉट को दोबारा अंतरिक्ष में भेजे जाने पर रोक लगा दी थी. उन पर आरोप था कि वे अपने साथ विशेष अवसर पर जारी किए जाने वाले 398 डाक-टिकट साथ ले गए थे. कथित तौर पर उनकी एक जर्मन व्यवसायी से सांठगांठ थी जिसने भारी क़ीमत पर उनमें से सौ डाक-टिकट ख़रीदने का वादा किया था. 1975 में नासा से रिटायर होने के बाद वे सार्वजनिक मंच से ग़ायब ही हो गए. वापस 2003 में वो तब चर्चा में आए, जब समाचार-वाचिका एना फ़ोर्ड ने उनसे अपनी सगाई की ख़बर दी. हालाँकि ये संबंध ज़्यादा दिन नहीं चल पाया. स्कॉट इन दिनों 'मोटिवेशनल स्पीकर' का काम करते हैं.<br /><br /><strong>...अगली पोस्ट में जारी...</strong><div class="blogger-post-footer"><p><a href="http://feeds.feedburner.com/blogspot/mLvz" rel="alternate" type="application/rss+xml"><img src="http://www.feedburner.com/fb/images/pub/feed-icon16x16.png" alt="" style="vertical-align:middle;border:0"/></a> <a href="http://feeds.feedburner.com/blogspot/mLvz" rel="alternate" type="application/rss+xml">देश-दुनिया का रीडर-फ़ीडर</a></p></div>Hindi Bloggerhttp://www.blogger.com/profile/04059710706721725509noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-12465571.post-69762055076576236202007-12-30T21:12:00.000Z2007-12-31T01:00:11.290Zख़ुशहाली का विज्ञान<a href="http://bp2.blogger.com/_on3RyEKlOsA/R3gsFp0GLYI/AAAAAAAAAEk/zjhdyZy5s1U/s1600-h/happy.GIF"><img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp2.blogger.com/_on3RyEKlOsA/R3gsFp0GLYI/AAAAAAAAAEk/zjhdyZy5s1U/s320/happy.GIF" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5149914649533492610" /></a>वर्षांत के अख़बारों और पत्र-पत्रिकाओं को पढ़ने का एक अलग ही सुख है. इस सुखद अनुभव के दौरान कई बार कुछ ऐसे लेख भी मिल जाते हैं, जो कि ज़िंदगी को बेहतर बनाने की क्षमता रखते हैं. मुझे ऐसा ही एक लेख पढ़ने को मिला है जिसका लेखक 'ख़ुशी के प्रोफ़ेसर' के नाम से प्रसिद्ध एक विद्वान है. मेरा आशय हार्वर्ड विश्वविद्यालय के Positive Psychology के प्रोफ़ेसर ताल बेन-शहर से है.<br /><br />लंदन से प्रकाशित अख़बार गार्डियन ने प्रोफ़ेसर बेन-शहर का एक लेख छापा है जिसका शीर्षक है- "आनंद का अनुभव करो. मैं बताता हूँ कैसे..."<br /><br />अपने लेख में ख़ुशी के प्रोफ़ेसर ने नए साल की शुरुआत के अवसर पर अपने विशेष लेख में वर्ष 2008 को अपने लिए बेहतर बनाने के चार सरल उपाय बताए हैं. प्रो. बेन-शहर बताते हैं कि आमतौर पर हमारी पीढ़ी पिछली पीढ़ियों से ज़्यादा धनी है, लेकिन हम ज़्यादा ख़ुशहाल नहीं हैं. यदि हम पहले से ज़्यादा धनी हैं, तो फिर हम ख़ुश क्यों नहीं हैं? कोई संदेह नहीं कि ख़ुशहाली धन से नहीं आती, न ही प्रतिष्ठा या स्टेटस से. तो फिर 2008 को पिछले वर्ष से ज़्यादा ख़ुशहाल कैसे बनाया जाए?<br /><br />सकारात्मक मनोविज्ञान के विशेषज्ञों ने इन सवालों का जवाब गहन अनुसंधानों के ज़रिए ढूंढने की कोशिश की है. प्रो. बेन-शहर का कहना है कि इन अनुसंधानों में चार मुख्य विचार उभर कर सामने आए:-<br /><br /><strong>1. मानव बने रहें-</strong><br /><br />हमारी संस्कृति में पीड़ा से जुड़ी भावनाओं को नकारात्मक मानने की प्रवृत्ति रही है. इसलिए हममें से बहुतों को लगता है कि चिंता, दुख, उदासी, डर या ईर्ष्या के अनुभव का मतलब है आपके अंदर कुछ कमी का होना. जबकि सच्चाई इसके उलट है. दो ही प्रकार के व्यक्ति पीड़ा से जुड़ी भावनाओं से बच सकते हैं- मनोरोगी और मृत व्यक्ति.<br /><br />यदि हम चिंता, उदासी या डर जैसी भावनाओं से बचने की कोशिश करते हैं, ख़ुद को मानव बने रहने नहीं देते हैं, तो इसका नुक़सान हमें ही उठाना पड़ता है. क्योंकि इन भावनाओं से बचने की कोशिश में ये और ज़ोर मारती हैं, हमें पहले से ज़्यादा बुरा लगता है. दरअसल भावनाओं के तमाम प्रकार मानव प्रकृति का अभिन्न हिस्सा हैं, जैसे गुरुत्वाकर्षण हमारे ब्रह्मांड का अभिन्न हिस्सा है. एक परिपूर्ण स्वस्थ जीवन जीने के लिए ज़रूरी है कि हम अन्य नैसर्गिक चीज़ों की तरह ही अपनी तमाम भावनाओं को भी स्वीकार करें. अगर आप मानवता को पूर्णता से स्वीकार करना सीख सकें, तो आने वाला साल ही नहीं, बल्कि जीवन का हर वर्ष बेहतर ही होता जाएगा.<br /><br /><strong>2. जीवन को सरल बनाएँ-</strong><br /><br />नोबेल पुरस्कार विजेता मनोविज्ञानी डैनियल कैनेमन और उनके सहयोगियों ने दिन-प्रतिदन की ज़िंदगी में विभिन्न कामों के असर का अध्ययन किया. उन्होंने जीवन के विभिन्न क्षेत्र की महिलाओं को बीते हुए एक दिन के कार्यकलापों की सूची तैयार करने को कहा. उनसे ये भी लिखने को कहा गया कि वो अलग-अलग कार्यकलापों के दौरान कैसा अनुभव करती हैं. कई दिनों तक ये प्रयोग चलाया गया. महिलाओं ने खाने, काम करने, बच्चे संभालने, यात्रा करने, परिवार से अंतरंग संबंधों आदि की बातें दर्ज कीं. इस अध्ययन में सबसे चौंकाने वाला परिणाम ये था कि आम तौर पर महिलाओं ने अपने बच्चों के साथ बिताए समय के दौरान ज़्यादा आनंद का अनुभव नहीं किया.<br /><br />इसमें कोई शक नहीं कि महिलाएँ अपने बच्चों को बहुत-बहुत प्यार करती हैं. शायद इतना ज़्यादा प्यार, जितना दुनिया में किसी और चीज़ से नहीं. लेकिन फिर भी छोटी-छोटी बातों, छोटे-छोटे कार्यों के कारण ही ज़िंदगी इतनी जटिल हो जाती है, समय का इतना अभाव रहता है, कि हम आनंददायक कार्यों में भी आनंद नहीं महसूस कर पाते हैं.<br /><br />आइए इस तथ्य को थोड़ा और आसान बनाते हैं. आपसे आपकी पसंद के दो गाने बताने को कहा जाता है. एक-एक कर दोनों गाने आपको सुनाए जाते हैं और 1 से 10 अंक के बीच उन्हें रेट करने को कहा जाता है. पूरी संभावना है कि आप अपनी पहली पसंद को 10/10 की रेटिंग देंगे, और पसंद नंबर दो को भी 10 नहीं तो 9 या कम-से-कम 8 की रेटिंग ज़रूर ही देंगे. अब दोनों गाने एक साथ बजाए जाते हैं और आपको रेटिंग करने को कहा जाता है...पूरी संभावना है कि आप 10 में 2 या 3 से ज़्यादा नहीं दें.<br /><br />आपके इर्दगिर्द अच्छी चीज़ों की प्रचूरता हो सकती है, लेकिन जब ख़ुशियों की बात आती है तो अक्सर थोड़े ही में ज़्यादा का अहसास होता है. समय का दबाव अवसाद का एक बड़ा कारण है. हम कम समय में ज़्यादा से ज़्यादा क्रियाकलापों को अंज़ाम देने की कोशिश करते हैं....और इस प्रक्रिया में हम ख़ुशियों के मौक़े यों ही गँवा देते हैं. चाहे वह काम की ख़ुशी हो, घूमने-फिरने की, संगीत की, नैसर्गिक छटा देखने की, अपने जीवनसाथी या फिर अपने बच्चों के साथ होने की ख़ुशी.<br /><br /><strong>3. नियमित रूप से व्यायाम करें-</strong><br /><br />न जाने कितने ही अध्ययनों से ये बात ज़ाहिर हो चुकी है कि शारीरिक कसरत का फ़ायदा मानसिक स्वास्थ्य पर भी दिखता है. व्यायाम करने से आप प्रफ़ुल्लित रह सकते हैं. तो क्या व्यायाम करना अवसादरोधी दवा का काम करता है? बेहतर है इसका जवाब इस तरह दिया जाए कि व्यायाम नहीं करना अवसाद का कारण होता है.<br /><a href="http://bp0.blogger.com/_on3RyEKlOsA/R3gtCJ0GLZI/AAAAAAAAAEs/jeNjeK-N_tE/s1600-h/exercise1.jpg"><img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp0.blogger.com/_on3RyEKlOsA/R3gtCJ0GLZI/AAAAAAAAAEs/jeNjeK-N_tE/s400/exercise1.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5149915688915578258" /></a><br />व्यायाम करना हमारी ज़रूरत है, और यदि हम इस ज़रूरत को पूरा नहीं करते हैं, तो हमें ही इसकी क़ीमत चुकानी होती है. मानव शरीर अक्रिय बने रहने के लिए, दिन भर कंप्यूटर या टीवी के सामने बैठे रहने के लिए नहीं बना है. विकास के क्रम में मानव शरीर दौड़ कर हिरण का शिकार करने के लिए तैयार हुआ है, या फिर भाग कर भूखे शेर से अपनी जान बचाने के लिए. जो व्यायाम नहीं करते, वो एक महत्वपूर्ण शारीरिक ज़रूरत को अपूर्ण रखते हैं.<br /><br />हार्वर्ड मेडिकल स्कूल में मनोचिकित्सा के प्रोफ़ेसर जॉन रैटे बताते हैं कि व्यायाम से हमारे तंत्रिका तंत्र में norepinephrine, serotonin और dopamine का रिसाव होता है, जोकि दवाओं की तरह हैं. हाँ, ये सही है कि व्यायाम को रामबाण औषधि के तौर पर नहीं लिया जा सकता, और कई बार दवाएँ ज़रूरी भी होती हैं. लेकिन अनेक मामलों में व्यायाम, दवाओं से ज़्यादा असरदार होता है. इसलिए क्यों नहीं इस प्राकृतिक चिकित्सा का फ़ायदा उठायें! व्यायाम के सकारात्मक प्रभावों में आप बढ़े आत्मविश्वास, सक्रिय मस्तिष्क, दीर्घायु, बेहतर नींद, बेहतर सेक्स और शरीर के ज़्यादा प्रभावी प्रतिरक्षण तंत्र को भी गिनें.<br /><br /><strong>4. सकारात्मक पक्ष पर ध्यान दें-</strong><br /><br />ख़ुशियाँ न सिर्फ़ हमारे जीवन से जुड़ी घटनाओं पर निर्भर करती हैं, बल्कि उन घटनाओं को हम किस तरह लेते हैं उस पर भी बहुत कुछ आधारित होता है. तभी जहाँ ज़िंदगी में सब कुछ हासिल करके भी बहुत लोग नाख़ुश रहते हैं, वहीं बहुत कम पर जीने वाले भी ख़ुशहाल ज़िंदगी बिता रहे होते हैं. हमारी ख़ुशियाँ सिर्फ़ इस बात पर निर्भर नहीं करती हैं कि हमारे पास क्या-क्या है, बल्कि इस बात का भी काफ़ी महत्व होता है कि किसी के पास जो कुछ भी है, वह उसकी कितनी क़द्र करता है.<br /><br />ख़ुशी की राह में एक बड़ी बाधा इस बात से आती है कि हम जीवन की अच्छी बातों को पर्याप्त गंभीरता से नहीं लेते हैं. कभी-कभी ही ऐसा होता है कि हम अपने अच्छे स्वास्थ्य, अच्छे दोस्तों, अच्छे भोजन को लेकर बहुत ज़्यादा उत्साहित रहते हों. जब बुरा वक़्त आता है, तभी हमें महसूस होता है कि अच्छा वक़्त वास्तव में ईश्वर के आशीर्वाद की तरह होता है. बीमार पड़ने के बाद ही पता चलता है कि कितने भाग्यशाली थे जब तंदरुस्त थे. लेकिन एक बार बीमारी गई नहीं कि हमें फिर अच्छे स्वास्थ्य के आनंद की अनुभूति करने का समय नहीं मिलने लगता है.<br /><br />तो क्या अच्छे वक़्त की अच्छी अनुभूति हासिल करने के लिए हमें बुरे वक़्त का इंतज़ार करना चाहिए? निसंदेह नहीं. तो क्यों न हम जीवन की अच्छी-अच्छी चीज़ों को लेकर आनंद का अनुभव करने की आदत डाल लें. अच्छे स्वास्थ्य, अच्छे खानपान, अच्छे दोस्तों-परिजनों को लेकर यदि हम आनंदित रहने लगें, तो फिर इन अच्छी बातों को गंभीरता से नहीं लेने की बुरी आदत ख़ुद ही छूट जाएगी.<br /><br />यदि हम कृतज्ञता को अपनी आदतों में शुमार कर लें, तो हमें आनंदित होने के लिए किसी विशेष अवसर का इंतज़ार नहीं रहेगा...नए साल का भी नहीं. यदि हम आँखें खोल कर देखें तो हमारे इर्दगिर्द की चमत्कारिक दुनिया में हर चीज़ अनूठी लगेगी...हर चीज़, हर बात स्मृतियों में संजोने लायक़ मालूम पड़ेगी, क़ाबिलेतारीफ़ लगेगी...आनंद विभोर होने के अवसर बहुतायत में मिलेंगे.<br /><br />नववर्ष मंगलमय हो!<div class="blogger-post-footer"><p><a href="http://feeds.feedburner.com/blogspot/mLvz" rel="alternate" type="application/rss+xml"><img src="http://www.feedburner.com/fb/images/pub/feed-icon16x16.png" alt="" style="vertical-align:middle;border:0"/></a> <a href="http://feeds.feedburner.com/blogspot/mLvz" rel="alternate" type="application/rss+xml">देश-दुनिया का रीडर-फ़ीडर</a></p></div>Hindi Bloggerhttp://www.blogger.com/profile/04059710706721725509noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-12465571.post-27914827203887535702007-12-16T23:41:00.000Z2007-12-17T01:12:22.925Zगूगल नॉल या गूगलपीडिया<a href="http://bp0.blogger.com/_on3RyEKlOsA/R2XI350GLXI/AAAAAAAAAEc/Fp4S36rg_uI/s1600-h/knol.GIF"><img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp0.blogger.com/_on3RyEKlOsA/R2XI350GLXI/AAAAAAAAAEc/Fp4S36rg_uI/s400/knol.GIF" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5144739012078349682" /></a><br />अंतत: गूगल ने अपनी विकिपीडिया शुरू करने की घोषणा कर ही दी. गूगल विकिपीडिया को नॉल(Knol) नाम दिया गया है. नॉल यानि नॉलेज का गूगलावतार!<br /><br />जैसा कि गूगल की इससे पहले की बड़ी परियोजनाओं या टेकओवर के बारे में होता आया है, नॉल के बारे में भी ख़बर हल्के से लीक की गई. गूगल के एक इंजीनियर यूडि मैनबर ने पिछले हफ़्ते <a href="http://googleblog.blogspot.com/2007/12/encouraging-people-to-contribute.html">The Official Google Blog</a> पर इस परियोजना की जानकारी सार्वजनिक की.<br /><br />मैनबर ने नॉल शब्द को नॉलेज की इकाई के रूप में परिभाषित किया है. आइए देखें नॉल परियोजना के बारे में वे और क्या-क्या कहते हैं, ख़ुद मैनबर के ही शब्दों में:<br /><br /><strong>'दुनिया में लाखों लोगों के पास उपयोगी ज्ञान है, जिसका फ़ायदा अरबों लोग उठा सकते हैं. अधिकांश लोग अपने ज्ञान को सिर्फ़ इसलिए बाँट नहीं पाते हैं क्योंकि उनके पास इसका कोई सरल तरीका नहीं है. हमें ऐसा ज़रिया ढूंढने के लिए कहा गया जिसके ज़रिए लोग अपना ज्ञान बाँट सकें. यही हमारा मुख्य उद्देश्य है.'</strong><br /><br /><strong>'हमारा लक्ष्य है किसी ख़ास विषय का ज्ञान रखने वाले व्यक्ति को उस विषय पर एक आधिकारिक आलेख लिखने के लिए प्रेरित करना.'</strong><br /><br /><strong>'नॉल परियोजना के पीछे एक प्रमुख विचार लेखक के नाम को रेखांकित करने का भी है. किताबों के कवर पर ही लेखक का नाम होता है, सामयिक लेखों के साथ लेखक का नाम जाता है और विज्ञान लेखों के साथ तो अनिवार्य रूप लेखक का नाम छपता है. लेकिन वेब का विकास कुछ इस तरह हुआ है कि लेखकों के नाम को प्रमुखता देने का प्रचलन स्थापित नहीं हो पाया. हमें लगता है कि लेखक का नाम देने से लोगों को वेब सामग्री के बेहतर उपयोग में मदद मिलेगी.'</strong><br /><br /><strong>'गूगल लेखन, संपादन आदि के लिए आसान टूल्स उपलब्ध कराएगा. ये नॉल की मुफ्त होस्टिंग की भी व्यवस्था करेगा. आप सिर्फ़ लिखें भर, बाक़ी काम हम करेंगे.'</strong><br /><br /><strong>'किसी विषय विशेष पर नॉल की भूमिका वैसे बुनियादी लेख की होगी, जो कि उस विषय की जानकारी पहली बार ढूंढ रहा कोई व्यक्ति पढ़ना चाहता हो.'</strong><br /><br /><strong>'गूगल नॉल लेखों पर किसी तरह का संपादकीय नियंत्रण नहीं रखेगा, न ही किसी नॉल विशेष की तरफ़दारी करेगा. तमाम संपादकीय नियंत्रण और ज़िम्मेदारी ख़ुद लेखक की होगी. लेखक अपनी साख दाँव पर लगाएगा.'</strong><br /><br /><strong>'हम ये अपेक्षा नहीं करते कि सभी लेख उच्च स्तर के होंग. लेकिन जब एक ही विषय पर अलग-अलग नॉल गूगल सर्च में दिखेंगे तो उनकी रैंकिंग गुणवत्ता के हिसाब से होगी. वेब पेज की रैंकिंग का हमारा अच्छा अनुभव है, और हमें पूरा विश्वास है कि हम इस चुनौतीपूर्ण काम को भी ढंग से संभाल सकेंगे.'</strong><br /><br />ज़ाहिर है, यदि गूगल उपरोक्त बातों को कार्यान्वित कर पाएगा तो एक बिल्कुल ही नए तरह की विकिपीडिया तैयार हो सकेगी. गूगल नॉल में विकिपीडिया जैसा 'संपादन युद्ध' देखने को नहीं मिलेगा, क्योंकि इसमें सामूहिक संपादन की व्यवस्था नहीं होगी.<br /><br />गूगल नॉल एक अन्य मामले में विकिपीडिया से बिल्कुल अलग होगा. चूँकि गूगल का बिज़नेस मॉडल वेबजाल के हर पन्ने पर विज्ञापन डालने की कोशिशों को बढ़ावा देता है. इसलिए गूगल नॉल के पन्नों पर भी विज्ञापन डालने की भी गुंज़ाइश होगी. हालाँकि अभी गूगल का कहना है कि विज्ञापन उन्हीं नॉल पन्नों पर होंगे जिसका लेखक इसके लिए ख़ुद हामी भरेगा. नॉल के विज्ञापनों से होने वाली आय का एक हिस्सा लेखक को मिलेगा. (कहने की ज़रूरत नहीं कि इस आय का बड़ा हिस्सा गूगल के पास रहेगा!)<br /><br />सीमित स्तर पर गूगल की नॉल परियोजना शुरू हो चुकी है. और अगले कुछ महीनों में इसे सबके के