tag:blogger.com,1999:blog-12395516.post-1130501631033142452005-10-28T17:43:00.000+05:302005-10-28T17:43:00.000+05:30सुमीर, मैं जो कहना चाहता था, वो ख़ुद मानवेन्द्र ने ...सुमीर, मैं जो कहना चाहता था, वो ख़ुद मानवेन्द्र ने कह डाला है। वाकई अपने अनुभव को इतने विस्तार से, चौकन्ने होकर और ईमानदारी से बता पाना तो एक छंटे हुए कहानीकार की निशानी है। आपको बहुत बहुत बधाई। <BR/><BR/>बाकी आपके जैसे अनुभव मेरे भी रहे हैं जर्मनी में पुराने अनपढ़ पंजाबियों को देखकर। हम लोग अपनी पढ़ाई की वजह से अपने instinct और रिस्क लेने की शक्ति खो बैठते हैं। कोई भी काम करने से पहले सौ चीज़ें सोचने लगते हैं।रजनीश मंगलाhttp://www.blogger.com/profile/08365898829052109147noreply@blogger.com