tag:blogger.com,1999:blog-12370525.post-1140490019976289382006-02-20T21:28:00.000-05:002006-02-20T21:46:59.990-05:00किस्मत से मिलिये साधसंगकिस्मत से मिलिये साधसंग<br /><br />एक सज्जन कहते हैं कि लहसुन प्याज खाना छोड़ दें। चाय कॉफी भी नहीं। ये मूरखता है। ऐसे चक्कर में जो पड़ेगा वो अपना समय बरबाद करेगा। क्या खाना है क्या नहीं ये रोजमर्रा की बातें हैं। अगर डाक्टर बोले ये मत खाओ तो बात में दम है। <br /><br />पेट में दरद हो तो पेट के दरद की दवाइ ही लेनी चाहिए, चोट लगने की नहीं। हमारा बुखार दिमागी है। इसकी दवा भी मानसिक ही है। मैं ये हूँ, ये मेरा है, ये मेरे नौकर हैं, मैं इस जात का हूँ, मैं समाज के इस तबके में घूमता हूँ, मेरे पास इतने आर्थिक साधन हैं ... बीमारी ये "मैं" है... लहसुन न खाने से कोई फरक पड़ेगा? उलटा गर्व और हो जाएगा कि मैंने इतने साल से लहसुन नहीं खाया, मैं बड़ा महात्मा हो गया। महात्मा वो है जो महात्मा होते हुए भी आम आदमी की तरह रह सके। दूसरे को पता नहीं चले कितने पानी में है ये। अन्दरूनी स्थिती चाहकर भी कोई किसी को नहीं दे सकता। अगर किसी को यहाँ प्रेरणा मिले अपना जीवन बदलने में तो इस पन्ने का लक्ष पूरा हो गया। गुरु मुझ पर प्रसन्न हुआ।<br /><br />असली आहार हमारे विचार हैं। अनियन्त्रित विचार इच्छा रूपी हैं। अपनी बीज छोड़ जाते हैं मन में। जहाँ से यात्रा शुरू होती वहाँ हमें अपने विचारों के प्रति सचेत नहीं हैं। जितने हम विचारों के प्रति सचेत हैं, उतना हम आगे बढ पाए। <br /><br />जीवन बदलने के अवसर दुर्लभ हैं। मैं मूरख हूँ, मुझे कुछ ज्ञान नहीं है, ये ज्ञान के बीज हैं। लेकिन जब ये स्वतः जगे तब ही इसकी किमत है। केवल कह देने की बात नहीं है। दिल जब तड़प जगी, कि मेरा पूरा जीवन अनर्थ रहा, मुझे तो कुछ भी पता नहीं, तब शुरुआत हुई। ये बनावटी नहीं चलेगी। अज्ञान स्वीकार करके ही ज्ञान के लिए स्थान बनेगा। एक म्यान में दो तलवार नहीं रह सकतीं। जब ये समझ लिया "मैं अज्ञान में डूबा हूँ", तो, म्यान खाली हो गयी। अब इसमें ज्ञान की तलवार आ सकती है। जरूरी नहीं कि आ ही जाए, इस सदमे को सहन करने के लिए तगड़ा दिमाग चाहिए। ये समय, जब अज्ञान स्वीकार हो चुका है, लेकिन ज्ञान का विश्वास नहीं जगा है, बहुत परेशानी से भरा है। एक नाव छोड़ चुके हो, दूसरी कहाँ है कुछ पता नहीं। जिसपर गुरु किरपा हुई उसके तरने की ज्यादा उम्मीद है। जिसमें ये सदमा सहना की ताकत नहीं है उसे इन सवालों से दूर ही रहना चाहिए। नहीं तो आत्मविश्वास टूटने से मानसिक बीमारियाँ आ सकती हैं। मुझे ऐसा लगता है की कई मानसिक रोगी ज्ञान की झलक पा चुके हैं, लेकिन वो इसके लिए तैयार नहीं थे। अपने व्यक्तित्य से परे का आभास उनका नाजुक मस्तिष्क न झेल पाया।<br /><br />मिले साधसंग किस्मत से <br />मत खो ये अवसर रे मुए <br />बन्दा चाहे तेरी भलाइ<br />तेरा ध्यान तेरी कमाइ<br />साधसंगत बन्दे को राह दिखाई<br />बुद्ध नानक कबीर से गुरु देओ मिलाईjai hanumanhttp://www.blogger.com/profile/12333747248023611898noreply@blogger.com1