tag:blogger.com,1999:blog-123705252008-05-05T13:17:26.351-04:00YogBlogjai hanumanhttp://www.blogger.com/profile/12333747248023611898noreply@blogger.comBlogger54125tag:blogger.com,1999:blog-12370525.post-55659346819619743882008-03-23T20:50:00.000-04:002008-03-23T20:51:09.613-04:00दूध का दूधऐसा सुना है कि एक बार एक भिक्षु जिसे कुछ याद नहीं रहता था, उसने बुद्ध से पूछा कि संक्षेप में उसे धर्म की सीख दें, जो पूरी हो, और इतनी सरल हो कि उसे भूले नहीं।<br /><br />तो बुद्ध ने कहा " मेरे धर्म का निचोड़, जो अतीत के बुद्धों ने भी कहा है, - भला करो, और बुरा मत करो।"jai hanumanhttp://www.blogger.com/profile/12333747248023611898noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-12370525.post-1156902746813133232006-08-29T21:50:00.000-04:002006-08-29T21:59:10.873-04:00धरमेंदर का तकिया कलामहम लोग मजाक बनाते थे कि धरमेंदर के आने पर शहर के सारे कुत्ते भाग जाया करते हैं। क्योंकि हर पिक्चर में वो बार बार "साले कुत्ते, तेरा खूऽऽन पी जाऊँगा" रटता रहता था।<br /><br />अमरीका में दोस्ती करनी बहुत मुश्किल है। यहाँ आदमी पैसे, कर्जे, होड़, और प्रतिस्पर्द्धा के बुखार से बावरा है। और भी बुखार हैं, उनके बारे में बात ना ही की जाए तो बेहतर। सुना है भारत भी उसी दशा में जल्दी से जल्दी पहुँचने की कोशिश में है। आशा है भारत की यात्रा उस मंज़िल पर नहीं ले जाएग जहाँ अमरीका पहुँचा। क्योंकि जब एक आदमी दूसरे को केवल दुख, प्रतिस्पर्द्धा का, स्रोत देखता है तो फिर दोस्ती मुश्किल है। आदमी अकेला पड़ जाएगा, और भी दुखी हो जाएगा। शायद इसका नतीजा है की अमरीका में मानसिक रोग शायद दुनिया में सबसे ज्यादा होते हैं।<br /><br />अब यहाँ दोस्ती करनी मुश्किल है, उसका नतीजा बच्चे को झेलना पड़ता है। उनकी भी दोस्ती नहीं हो पातीं, और उसका नतीजा यहाँ बच्चों की आपराधिक टोलियाँ बन जाती हैं। और सच तो यह है जिस तरह का यहाँ चाल चलन है अमरीकी बच्चों का, हम लोग अपने बच्चों को दूसरे देसी परिवारों के बच्चों से ही दोस्ती करने देते हैं। <br /><br />तो हमारा नौ साल का छोटू बहुत कम हिंदी जानता है। देसी समुदाय के बच्चों के साथ खेलता है। एक दिन घर आया और मुझे पूछता है "डैड, वॉट इज़ द मीनिंग ऑफ 'साले कुत्ते'" ।jai hanumanhttp://www.blogger.com/profile/12333747248023611898noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-12370525.post-1155004537317024862006-08-07T22:34:00.000-04:002006-08-07T22:35:37.330-04:00पारलो इटालियानोये छोटू की ओर से। वो शायद किसी पिक्चर से लाया और मुझे ये सुनाया।<br /><br />बोला इटलवी यानी इटली की भाषा में पीत्ज़ा को क्या कहते हैँ? मैं बोला "पीत्ज़ा"। बोला इटलवी में स्पागेटी को क्या कहते हैँ? मैं बोला "स्पागेटी"। वो बोला "देखा, इटलवी कितनी आसान है?"jai hanumanhttp://www.blogger.com/profile/12333747248023611898noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-12370525.post-1154834446140519742006-08-05T23:19:00.000-04:002006-08-05T23:20:46.150-04:00ये तो अच्छा हुआ अंगूर को बेटा न हुआजब आप किसी नई जगह जाते हैं तो आपकी नज़र वो देखती है जो आँखों के सामने तो है मगर अब लोगों का ध्यान नहीं खींचतीं। ये ६ साल पुरानी बात है अब तो भारत काफी तरक्की पर है, अमरीका वालों को अंग्रेजी में पछाड़ रहा है। उस समय नया नया उत्तर प्रदेश सरकार ने हल्की शराब बेचने की छूट दी थी।<br /><br />एक बार मैं मेरठ जा रहा था, गलत बस में चढ़ गया और मोदीनगर के पास किसी कस्बे में उसका आखरी पड़ाव था, वहाँ मुझे उतरना पड़ा। गरमी बहुत थी अगली बस का कुछ पता नहीं चल रहा था। प्यास लगी थी।<br /><br />सड़क के साथ दुकान थी वहाँ लिखा था "यहाँ ठंडी बीर मिलती है।"jai hanumanhttp://www.blogger.com/profile/12333747248023611898noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-12370525.post-1154054647340711672006-07-27T22:38:00.000-04:002006-07-27T22:47:15.073-04:00बारूदी सुरंग ढ़ूँढ़ने वाले चूहेकल ये <a href="http://news.nationalgeographic.com/news/kids/2005/07/rats.html">खबर </a>पढ़ी कि अफ्रीका में एक बड़ा सा चूहा होता है, जिसकी सूँघने की शक्ति कुत्ते जितनी तेज होती है। उन चूहों को बारूदी सुरंगों ढ़ूँढ़ना सिखा दिया गया है। चूहे कुत्ते से सस्ते पड़ते हैं, जो यूरोप से खरीदने पड़ते हैं, और अफ्रीका की गरमी ज्यादा नहीं जी पाते। <br /><br />हर सुरंग ढ़ूँढ़ने पर चूहे को ईनाम मिलता है, एक मूँगफली का दाना।<br /><br />इन सुरंगों की वजह से हजारों जीवन बरबाद हो रहे हैं। ये सरकारों के लीचड़पने का सबूत हैं। <br /><br />इसका योग से क्या लेना? योग आशा का संदेश है। जो दुख अभी झेले नहीं हैं, उनसे बचा जा सकता है। अगर पूरी तरह से नहीं, तो उन्हें कम तो किया ही जा सकता है। इसमें सबसे बड़ी मदद हमारी बुद्धि है। इस साधन से जहाँ बड़ी समस्या थीं अब हल मिल सकता है। इसके लिए बुद्धि को तेज करना और भावुकता से दूर रहना जरूरी है। बुद्धि को सही रास्ते पर जगाना, आत्मचेतना से जीना योग है। <br /><br />तब ये बुद्धि इस दुनिया में दुख कम करने में कुछ कामयाब हो सकती है। कुबुद्धि बारूदी सुरंग लगा रही है। बुद्धिमान जन को आशा और आत्मविश्वास की जरूरत है। तब जाके इस हजारों साल पुरानी कुबुद्धि की आदतों से लड़ा जा सकता है। इसके लिए सही नेतृत्व की जरूरत है। जो सही विचारों को बढ़ावा दे और गलत विचारों को बाहर करे। तब जवानों में आत्मविश्वास और तेज की लहरें दौड़ेंगी। <br /><br />चबूत्रे पर चढ़ के अस्सी साल के नेता, अंग्रेजों के टट्टू संचार साधन ये तेज नहीं फैला सकते।jai hanumanhttp://www.blogger.com/profile/12333747248023611898noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-12370525.post-1152839652394206432006-07-13T21:02:00.000-04:002006-07-13T21:14:12.420-04:00वसो मेरे हिरदैकर किरपा वसो मेरै हिरदै <br />होई सहाई आप ॥<br />सुणि सुणि नाम तुम्हारा <br />प्रीतम प्रभु का चाव ॥<br /> - श्री गुरु ग्रंथ साहिब<br /><br />वस जाओ मेरे हिरदय, और क्या आशीरवाद माँगू ....मेरे ही नहीं औरों के हिरदय भी.... पा सकें गुरु किरपा से हम सरब पियार... मिल सकें हम उनसे जो दिखा सकें हमें सही ध्यान विचार...<br /><br /><br />सतुगुरु पूरा जे मिलै पाईयै रतन विचार ॥<br />मन दीजै गुरु आपणा पाईयै सरब पियार ॥<br /> - श्री गुरु ग्रंथ साहिबjai hanumanhttp://www.blogger.com/profile/12333747248023611898noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-12370525.post-1152418961395062322006-07-09T00:08:00.000-04:002006-07-09T00:22:46.120-04:00गलत सीखएक दिन कथा सुनने गया और ये सुना। परशुराम के पिता जमदाग्नि को पत्नि रेनुका पर किसी बात पर क्रोध आ गया। उन्होंने पुत्रों को आदेश दिया माँ का सर काटने को। एक एक करके सब ने मना कर दिया। फिर परशुराम घर आए युद्ध से। पिता ने उन्हें आदेश दिया कि सब भाइयों और माँ का सर काटने को। परशुराम ने आज्ञा का पालन किया, सबको खतम कर दिया।<br /><br />फिर पिता इतने प्रसन्न हो गये कि वर दे दिया परशुराम को। परशुराम ने माँगा कि सब भाई और माँ जीवित हो जाएँ, और जो हुआ सब भूल जाएँ। पिता को पास इतनी क्षमता थी कि प्राण फिर निर्वाहित कर सकें, और सब फिर जी उठे, और सब कुछ सामान्य हो गया।<br /><br />बेहतर ये होता कि कहानीकार ने परशुराम से मना करवा दिया होता़, और किसी जरिये से पिता का क्रोध का दौरा खतम करवा दिया होता। <br /><br />आदर ‌और भक्ति में फरक है। पिता की भक्ति करना मूरखता है। पिता आखिर आदमी ही है। आदमी को परमात्मा के पद पर बिठा देना बेकार की भावुकता है। हर आदमी उसी हालत में है जिसमें हम हैं। हमें उसी से सलाह या आदेश लेने चाहिए जो हमें ज्ञानी, समझदार, सयाना लगे। अगर कोई क्रोध के दौरे में पगला गया है, मूरखता की बात कर रहा है, तो वो उस समय मूरख है। उसके पास ताकत है और हमारी मजबूरी है तो बात और है, लेकिन अगर हम मूरख की मानेंगे भावुक बनके तो हम बड़े मूरख हैं। उसका दौरा तो उतर जाएगा, वो तो अपने आप को मना लेगा कि दौरा पड़ गया था, लेकिन हम कैसे अपने आप को मना पाएँगे? जब निर्णय खुद लिया तो फिर दूसरे को कोसने से क्या फायदा। <br /><br />हमारा धरम ऐसी भावुकताओं से भरा पड़ा है। धरम से समाज का ढाँचा बनता है। नतीजा ये हुआ कि हम लोग जहाँ भावुकता नहीं होनी चाहिए, वहाँ भावुकता का इस्तेमाल करते हैं। जब हम अपने नेता चुनते हैं, तो भावुकता के बूते पर, वो कौनसे परिवार से है, इसपर। कभी उन्होंने खुद को हमारा चाचा, बापु, वगैरह कह दिया था, इसलिए उनके वंशजों को हम अपना प्रतिनिधि बना लेते हैं। बताइये क्या आप डाक्टर या वकील भावुकता पर चुनेंगे? वो लोग हमारे जज़्बातों से खेल रहे थे, कुछ लक्ष साधने के लिए। अच्छा नेतृत्व, अच्छे अधयापक, अच्छे गुरु कभी जज़्बातों से नहीं खेलते। वो हमारी बुद्धि को जगाने की कोशिश करते है। फिर सही क्या है, गलत क्या है, ये हम खुद निर्णय कर सकते हैं।<br /><br />जहाँ कोमल भावुकता होनी चाहिए, पति पत्नि के बीच, आदर होना चाहिए परिवार में, वहाँ सास बहू के खेल चलते हैं। दहेज का व्यापार चलता है।<br /><br />ये सब उलटा पुलटा हो गया है। अब हमें सही सीख की जरूरत है।jai hanumanhttp://www.blogger.com/profile/12333747248023611898noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-12370525.post-1151982494741973832006-07-03T23:02:00.000-04:002006-07-03T23:08:14.803-04:00कुन्जी ३यहाँ आपको ध्यान का निचोड़ देने की कोशिश की जा रही है। ये काम मेरे बस से शायद बाहर है, और गुरु की आज्ञा के बिना सिखाना, यानी गुरु बनना ठीक नहीं है। क्योंकि यहाँ गुरु चेले का सवाल ही नहीं, आप मुझे जानते ही नहीं, इसलिए लिखा। कोई जबरदस्ती नहीं है, जिसकी रुची हो इन मामलों में उन्हें ही आगे चलना चाहिए। नहीं तो तरक्की होगी ही नहीं समय बरबाद होगा। लेकिन इस पिंजड़े में से निकलने के साधन दे गयें हैं हमें ज्ञानी जन, इतना जानना बहुत है। जब जिज्ञासा जगे, तो कहीं कोई विधी है, ये जानना उपयोगी है। तब विधी ढूँढ करके इस्तेमाल की जा सकती है।<br /><br />जब आप कहीं अकेले बैठे हों शान्त वातावरण में, तो जो "है सो है", उसका साक्षी बनकर अनुभव करने की कोशिश करें। शब्दार्थ न करने की कोशिश करें। जो विचार उठते हैं उन्हें सतर्कता से देखते रहें। कैसे एक विचार से दूसरा निकलता है, ये जानना जरूरी है। कैसे शुभ अशुभ विचार उठते हैं। इस क्षेत्र को जिसमें विचार भाव वगैरह उठते हैं, योग में अंतःकरण कहा गया है। इस विधी को योग में साक्षी ध्यान, और बौद्ध धर्म में विपस्सना कहा गया है।<br /><br />मन को एक यन्त्र की तरह समझ पाना उपलब्धी है। ये इतना आसान नहीं है। शायद ही किसी को इतनी सिद्धी मिल पाती है। यन्त्र ढर्रे पर चलता है, हमें परेशान नहीं कर सकता। जब छोटी मोटी बात पर परेशान हुए तो पहचानना जरूरी है कि हम नियंत्रण खो गए थे यन्त्र पर, परेशान हम हुए, दुखी हम हुए, नुकसान हमारा हुआ। बड़ी मुसीबत पर तो बड़े बड़े परेशान हो जाते हैं, हम क्या चीज़ हैं।jai hanumanhttp://www.blogger.com/profile/12333747248023611898noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-12370525.post-1151137970087131452006-06-24T04:31:00.000-04:002006-06-24T04:37:22.173-04:00नेपाल में क्रान्तिक्या कारण थे इसके?<br />अब आगे क्या?<br />सही नेतृत्व की क्या आवश्यक्तायें?<br /><br />कारण थका हुआ, भ्रष्ट नेतृत्व था। जरूरी नहीं की इस राजा की गलती हो। जनता ने नेतृत्व पर लम्बे समय से विश्वास किया, आदर किया। नेतृत्व ने धोखा दिया। जो करना चाहिए था वो नहीं किया। जो नहीं करना चाहिए था वो किया। जनता के साथ विश्वासघात किया। आखिरकार जनता पक गई, और जो उस समय प्रतीक था, उसकी ताकत खतम कर दी। <br /><br />इसका मतलब ये नहीं कि आने वाला नेतृत्व कोई अलग होगा। अगर हुआ तो किस्मत अचछी है। आसार कम हैं। नेतृत्व बदला नहीं है। वोही पुराने चेहरे जो पेहले भी कुछ नहीं कर पाए।<br /><br />क्रान्ति लाना इतना मुश्किल नहीं है भावुक समाज में। ये चापलूसी रवैय्या है। पेड़ उगने में बीस साल लगते हैं, काटने में एक घण्टा। आग लगाना आसान है, बुझाना और निर्माण करना मुश्किल। घाव करना आसान है, भरना मुश्किल। सकारात्मत रवैय्या, जिस्से सबका भला हो, उसकी जरूरत है। उसके लिए प्रणाली, यानि सिस्टम बनाने पड़ते हैं। जो सही में काम करें बिना सेटिंग के। अगर फोन ठीक कराने है तो मिस्त्री को घूस देने की जरूरत नहीं पड़नी चाहिए। वो ताकत का दुरुपयोग है, दुख पहुँचाएगा ही। उससे मारामारी फैलेगी ही समाज में। मारामारी के फैलने से उपद्रव में भला आदमी भी मरेगा। अगर बच्चे को पाठशाला भेजना हो तो नाक रगड़ने पर बात नहीं आनी चाहिए। मामला सहज होना चाहिए। रोज का जीवन साफ, हलका, सहज होना चाहिए। ये अच्छे नेतृत्व द्वारे बनाये हुए सिस्टम हैं। ये दुख कम करने के लिए किए हुए काम हैं।<br /><br />जनता को भावुकता की शराब पिला के, नकारामत्मक शिक्षा के बाद अब जादू से स्वर्ण युग नहीं आ जाएगा। अगर हालत खराब है तो उसके पीछे लम्बा इतिहास है, कारण हैं, परिस्थितियाँ है। नेतृत्व के गलत निर्णय हैं। अच्छा नेतृत्व सबके भले की सोचता है। समुदायों में में सेतु बनाता है। जो पीढी अभी आई नहीं उसके लिए कुछ नींव छोड़ता है। शुभ भाव होनें चाहिएँ। ये जादू से नहीं आते। इनके पीछे कारण और परिस्थितियाँ होती हैं। <br /><br />सबसे जरूरी है सबके लिए अनुकूल शिक्षा। अमीर का बच्चा कुछ सीखे और गरीब का बच्चा कुछ और, ये सही व्यवस्था नहीं है। बच्चे पर अतीत लोदना, माँबाप की गरीबी के कारण खटारा शिक्षा थोंपना अत्याचार है। कोई समाज कितना न्यायी है इसका अच्छा अन्दाजा आप ये देख के लगा सकते हैं कि वहाँ गरीब बच्चे के हुनर को पनपने का मौका दिया जाता है या नहीं। पद पहुँचने में काम आखिर हुनर आता है या सेटिंग?<br /><br />ये सब ठीक से करने की लिए नेतृत्व की बुद्धि साफ होनी चाहिए। क्या सही गलत है ये बुद्धि है। ये करने से सुख होगा या दुख, ये बुद्धि है। बिना इसके सही, सम्यक नेतृत्व सम्भव है ही नहीं। केवल बुद्धि ही नहीं आत्मविश्वास की भी जरूरत है, लेकिन आत्मविश्वास चापलूस को भी हो सकता है। चोर, भावुकता से खिलवाड़ करने वाले, समुदायों में दरार डालने वाले, गुटबाजी करने वाले कभी अच्छा नेतृत्व नहीं दे सकते। चापलूसी और भावुकता दूश्मन हैं सम्यक बुद्धि के। जब अपने मन में ही गंदगी, चापलूसी भरी होगी तो क्या कोई समाज का रखरखाव कर पाएगा?<br /><br />चिन्ता की बात ये है कि जो बीज नेपाल में तूफान लाए वोही भारत में भी हैं।jai hanumanhttp://www.blogger.com/profile/12333747248023611898noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-12370525.post-1150702269721881172006-06-19T03:29:00.000-04:002006-06-19T03:31:09.736-04:00भारत को चाहिए किर्किट से अवकाशहद हो गई यार इतना पैसा ये खिलाड़ी कमाने लगे साबुन मंजन बेच के की साफ है खेलने में मन ना लगे इनका। जितना समय हम लोग इस वाहियाद खेल पर लगाते हैं, ये एक सामाजिक चस्का बन गया है। खिलाड़ियों का मन खेल में है नहीं। वो खेल के बाहर संचार माध्यमों में गिल्ली दंडा में ज्यादा रुची रखते हैं। बेतुकापन,भावुकपना और गैर जिम्मेवारी हमारे मीडिया का दूसरा नाम हो सकता है। जो बिके उसे और बेचो। अगर लोगों को किर्किट का चस्का लग गया है तो उस आग में ‌और घासलेट डालो। <br /><br />आप में से ज्यादातर को याद नहीं होगा की टीवी से पहले भारत में और खेल भी खेले जाते थे। मैं छोटा था, यादें धुंधली हैं, मगर हम लोग रेडियो पर हॉकी, फुटबॉल उतने ही शौक से सुनते थे जितने किर्किट।<br /><br />हुआ यूँ की किर्किट टीवी पर छा गया और बाकी सब को कुचल दिया मार्केटिंग और रोकड़े नें। किर्किट पाँच दिन चलता था, अच्छा टाइम पास था। फुटबॉल हाकी डेड़ दो घण्टा चलते थे, इसलिए किर्किट छा गया। फुटबॉल हाकी में कमसेकम मेहनती टीम, हट्टी कट्टी टीम के जीतने की ज्यादा संभावना तो होती है? सिवाय भारतीय उपमहाद्वीप के किर्किट टोटल फेल रहा है। बाकी दुनिया फुटबॉल विश्व कप मना रही हम धौनी की ज़ुल्फों में मस्त हें। धौनी जो खेले न खेले वो अलग। उसका मार्किट ऐसे हौ ऊपर चढ गया।<br /><br />अब क्यों किर्किट ने कुचल डाले बाकी खेल भारत में, इस पर तो किताब लिखी जा सकती है। कुछ मिनट में सामाजिक मनोविज्ञान करने की कोशिश करता हूँ। जाहिर है इससे मेरे नए दोस्त नहीं बनेंगे, पुराने शायद चिढ जाएँ।<br /><br />किर्किट निठल्लों का खेल है। आलसियों की बाछें खिल गईं। अरे यार किस वेले नें ये ५ दिन का खेल बनाया? कभी कभी तो छह दिन का भी हो जाता है। अब शरम से एक दिवसीय ज्यादा होने लगे हैं। फुटबॉल हाकी में व्यायाम इतना होता है कि २ घण्टे से ज्यादा खिलाड़ी खेल ही नहीं सकता। खिलाड़ी थका कि बाहर। एक मैच ठीक नहीं खेला कि बाहर। ये किर्किट अजीब है की खिलाड़ी मीडिया में प्रतिष्ठा पर गाड़ी खींच लेते हैं। और जातपात के कारण हमारे यहाँ शारीरिक स्पर्ष से लोगों के मन में घिन है। किर्किट इस वजह से भारत को जँचा। खिलाड़ी लम्बी पौशाक पहन के, निरर्थक रस्में करते रहते हैं। ये हमारे समाज को भाया।<br /><br />हम लोगों को बेसिरपैर के टोटकों में मजा आता है। अस्सी साल के जवान जिन्का दिमाग कुन्द हो गया है, हमारे देश के करोड़ों का जीवन संभालते हैं, क्योंकि हम उनपर भावुक कारणों से विश्वास करते हैं। भावुकता बुद्धि नष्ट कर देती है तो हमारी राजनीति का कोई सिरपैर न था न है। आप हमारे धरम देखें तो वहाँ भी येही मिलेगा। तोते की तरह रटे जा रहे हैं। बात में कितना दम है, कोइ सिरपैर है कि नहीं इससे कोई मतलब नहीं। जो सीधी सटीक बात करते हैं वो हमारे समाज में ज्यादा नहीं चल पाते। जो उलटी सीधी, भावुक, अंधविश्वासी बात करते हैं उनकी चलती है। नेता लोग तांत्रिकों पर विश्वास करते हैं, हुनर पर, नेतृत्व पर नहीं। नए घर में बिजली हो न हो, सूखा नींबू जरूर मिलेगा दरवाजे पर। ये सब प्रमाण है कि हमें आत्मविश्वास की कमी है। अपने सीधीपन से किये हुए काम पर विश्वास नहीं है। और ये टोटके बचेखुछे आत्मविश्वास को भी नष्ट करदेते हैं। हुनर हम उसी कलाकार का मानते हैं जिसे अंग्रेज ने शाबाशी दी हो। नहीं तो कलाकार बेकार है।<br /><br />अगर हमें सहज बुद्धि यानि कॉमन सेंस को बढावा देना है तो इन टोटकों को छोड़ना पड़ेगा। बिना उसके सम्यक आत्मविश्वास बनना मुशकिल है। इन टोटकों में हमारा भावुक पूँजीनिवेष किया जा चुका है। जैसे जुआरी या शराबी को लत छड़ाने के लिए कुछ दिन इनके जिक्र से भी दूर रखना पड़ता है, तब जाके वो अपना संतुलन पाके और कुछ कर पाता है। अगर जुआरी बुद्धि का इस्तेमाल कर पाता तो कबका छोड़ दिया होता। बुद्धि को ही तो नहीं जगने देता जुए का नशा़। <br /><br />अब किर्किट से २ साल का अवकाश भारत को चाहिए।jai hanumanhttp://www.blogger.com/profile/12333747248023611898noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-12370525.post-1150635170396561412006-06-18T08:46:00.000-04:002006-06-18T08:52:50.396-04:00कुन्जी २कुन्जी २<br />ये आपको कोई भी बता देगा की ये "मैं" ही दुख की जड़ है। मैंने यहाँ इस दुख के पिंजड़े से निकलने का भी रस्ता बताने की कोशिश की है। <br /><br />मजे की बात ये है कि ये "मैं" आपको बचा भी सकता है। जब ये आग नियन्त्रण के बाहर है तो दुख है ये आपका घर जला देगी। जब ये वश में है तो सुख है आपकी रोटी पका देगी। किसके वश में? अपने आप के वश में। <br /><br />और भी रस्ते हो सकते हैं, वो नक्शा मेरे पास नहीं है। यहाँ मुझे जो सबसे प्राकृतिक रस्ता लगा, जिसने मेरा दरद खतम किया, बता दिया। बाकी परमात्मा का जिस पर आशीरवाद है उसी की नाँव तरेगी। <br /><br />गुरु नानक कह गए हैं कि "मन जीता जग जीत"। <br /><br />मन ही मन को जीत रहा है। मन ही मन को समझ रहा है।<br /><br />इस छोटे मैं के पीछे क्या है? बड़ा मैं, जिसे योग में द्रष्टा कहा गया है। असल में छोटा मैं गलतफहमी है, भय है। छोटे मैं में जीवन के प्रकाश की शक्ति नहीं है। जीवन प्रकाश द्रष्टा से हो रहा है। कम से कम ऐसा लगता तो है।<br /><br />ये मैं ही बीमारी है। ये मैं ही दवा है। ये मैं ही औजार है। ये मैं ही अभ्यास है। ये मैं ही नक्शा है। ये मैं ही शुरुआत है और ये मैं ही लक्ष है। लेकिन जिस मैं से शुरु होते हैं वो काफी बदल जाता है। जैसे भद्दा कीड़ा सुन्दर तितली में बदल जाता है। पहले ये मैं गंदगी से भरा था। अब प्रेम से भरा है। घड़ा वोही है पानी बदल गया है। घड़ा टूट के अपना व्यक्तित्तव नहीं भूल गया है। अब भी वोही बीबी बच्चे हैं, वोही नौकरी, वोही माँ बाप। कुछ बदल गया है, कुछ खुल गया है, लेकिन वो समझाना मुशकिल है। कच्चा आम खट्टा और बेस्वाद था। अब पक गया है मीठा हो गया है। आम वोही है। ये सब प्राकृतिक है।jai hanumanhttp://www.blogger.com/profile/12333747248023611898noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-12370525.post-1150601690260895932006-06-17T23:34:00.000-04:002006-06-17T23:41:13.550-04:00भूल भुलय्या की कुन्जीबच्चा जब जनम लेता है तो पशु से ज्यादा दूर नहीं होता। भूख लगी तो रो देगा। पेट में दरद हुआ तो रो देगा। नहीं तो चुपचाप शान्त पड़ा रहेगा। फिर एक दिन चमत्कार होता है। बच्चा माता पिता को पहचानने लगता है। चमत्कार ये है कि अब पहचानने वाले का निर्माण हो गया है। अब उसका "मैं" बन गया। ये "मैं" उसकी अपने मन में अपनी तस्वीर है। बच्चा पहले भी था। लेकिन उसमें अपने बारे में तस्वीर नहीं थी। बच्चे का मनोवैजज्ञानिक रूप से जनम हो गया। अब वो अलग है। अब उसकी मुसीबतें शुरू हो गयीं। अब उसका चैन खतम हो गया। अब सिर्फ भूख लगने पर ही नहीं परेशान करेगा। अब कल्पना करेगा और परेशान करेगा। समय और ध्यान माँगेगा। हँसेगा, खेलेगा, लड़ेगा। अब उसका व्यक्तित्व बनना शुरू हो गया। इसमें बहुत हद तक पहले से बना हुआ आता है। कुछ बच्चे प्रकृति से शान्त होते हैं, कुछ शैतान, वगैरह। <br /><br />बिना इस "मैं" के बच्चा प्राकृतिक इच्छाओं को वश में नहीं कर सकता। बिना इसके उसमें पशु का स्वभाव है। इसके साथ भी पशु का स्वभाव हो सकता है अगर सही परिस्थिती नहीं मिलीं। वो माता पिता, शिक्षा, संस्कृति से सीख के इंसान बनेगा। मनुष्य और पशु में ये ही फरक है कि मनुष्य अपनी प्राकृतिक इच्छाओं को वश में कर सकता है। कुत्ता कुत्ता ही रहेगा। कभी कहीं किसी मौके पर कुत्ता भलाई का काम कर देगा। वोभी तब अगर कुत्ता आदमी के साथ पला है। अब उसमें आदमी के कुछ गुण आ गये। <br /><br />प्रकृति का सबसे बड़ा चमत्कार ये "मैं" है । भौतिकी कहते हैं ब्रह्माण्ड को बने १४०० करोड़ वर्ष हो चुके हैं। इस "मैं" को बनने में १४०० करोड़ वर्ष लगे हैं। केवल इस "मैं" में ही जगने की क्षमता है। हम इस "मैं" का सही इस्तेमाल कर सकें। ये "मैं" दुनिया में चैन का स्रोत बन सके।<br /><br />जब ये "मैं", "मैं" को ढूँढेगा, टटोलेगा, तो योगी हुआ। जब "मैं" "मैं" को पा लेगा, समझ जाएगा, तो चैन पाया। फिर उसके जीवन का असली काम शुरु हुआ।jai hanumanhttp://www.blogger.com/profile/12333747248023611898noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-12370525.post-1150556461749100722006-06-17T10:56:00.000-04:002006-06-17T23:33:40.816-04:00मेरे घर आई एक नन्हीं परीमुबारक हो, आप फिर से चाचा, या चाची बन गए। माँ बेटी सब ठीक हैं। जहाँ तीन थे अब चार हो गए। रातों की नींद गायब हो गई। मेज पर मेरी किताबों की जगह अब रुई, डाईपर, और न जाने क्या क्या बच्चे का तामझाम जम के बैठ गया। श्रीमती जी से बात करे दिन निकल जाते हैं। किसी के पास टाइम नहीं है। घर में वी आई पी आ गयी हैं। हमारी जरूरत डाइपर बदलने, बड़े साहबज़ादे को फुटबॉल खेलने, हिन्दी सीखने ले जाने और छुटकी को डकार निकलवाने के लिए ही पड़ती है। जिन्होंने शादी नहीं की है, उनको ट्रेलर दिखा रहा हूँ।jai hanumanhttp://www.blogger.com/profile/12333747248023611898noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-12370525.post-1147045946491105162006-05-07T19:51:00.000-04:002006-05-07T19:52:26.506-04:00बुरा जो देखन मैं चला ...असली दुख वो नहीं जो बुराई लोगों ने हमारे साथ करी। असली दुख वो है जो मूरखता में पड़कर बुराईयाँ हमने करीं। क्योंकि हम ये जानते थे कि हमारे पास चुनाव था। वो न करने को। कोई कितना भी बड़ा मूरख, पापी, नीच क्यों न हो। उसके अन्दर वोही विवेक है जो संत के अन्दर है। उसके पास आज़ादी है मूरखता करने या न करने को। कोई मूरख नहीं यहाँ। सब सयाने हैँ। सब अपना भला चाहते ही हैँ। उस भले को पहुँचने के रस्ते में कुछ भूल हो गयी किसी से। वो ठीक भी हो सकती है। जीवन के अवसर हमारे हाथ में नहीं हैं। ये पिक्चर हमनें नहीं लिखी। ये भयानक न हो। <br /><br />परमात्मा हमें सद्बुद्धि दे।<br />परमात्मा हमें सही से गलत जानने का विवेक दे।<br />परमात्मा हमें सही रस्ते पर चलने का आत्मविशवास दे।<br />परमात्मा हमें भली संगत से मिलाए।<br />परमात्मा हमें गुमराह लोगों से दूर रखे।<br />परमात्मा हमें जीवन में शुभ अवसर दे।<br />परमात्मा हमें जीवन में ज्यादा आराम न दे।<br />परमात्मा हमें जीवन में ज्यादा कठिनाई न दे।<br />परमात्मा हमें जीवन में कुण्ठाओं में न फँसने दे।<br />परमात्मा हमारे जीवन को वैकुण्ठ बनने दे।<br />परमात्मा हमें ये वैकुण्ठ सबको बाँटने के अवसर दे।jai hanumanhttp://www.blogger.com/profile/12333747248023611898noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-12370525.post-1142996426132099972006-03-21T21:33:00.000-05:002006-03-21T22:00:26.146-05:00पैंसठ साल के जवानये हमारे देश की खासियत है। पैंसठ साल के बूढे अपने आप को जवान मानते हैं। नहीं तो फिर क्यों पैंसठ साल के बूढे अपने आप को युवा नेता कहलाते?<br /><br />भविष्य दिनबदिन गढ्ढे में गिरता जा रहा है। आखिर क्या किया है इन नेताओं ने भारत के लिए? शायद हम लोगों में नेतृत्व की कमी है। आपको इतिहास की किताबों में ये कोई नहीं बताएगा की हमारे राजा इतने लीचड़ और अन्यायी थे की अंग्रेजों के आने पर जनता ने राहत महसूस की। जनता ने स्वागत किया न्याय का। शायद आप ये न जानते होंगे की १८५७ में हार का असली कारण ये था की बगावतीयों ने लूटमार, और ताकत का दुरोपयोग शुरु कर दिया था। वे जनता का सहयोग खो चुके थे।<br /><br />हमें ये बड़ा गर्व है प्राचीन भारत पर। जवानों को इन भावुकता के जालों में से बचना चाहिये। ये वोही प्राचीन भारत है जहाँ पर असहाय विधवाओं को जला दिया जाता था। जहाँ शूद्र के कान में सीसा डाला जाता था वेद सुनने पर। आपका भविष्य आपका है। केवल आपका अतीत आपका है। ये हजारों सालों की मूरखता आपकी नहीं है। मूरखों के हाथ में राजनैतिक बल न जाने दें। कोई किसी परिवार का है या किसी धरम का, अगर इस कसौटी पर हम लोग ताकत इनको सौंपेंगे तो जिम्मेदार हम हैं इस लीचड़ नेतृत्व के। <br /><br />अगर आप भारत के पुराने शहरों में जाएँ तो पाएँगे हमारे असली मानसिकता। कोई एक पौधा तक लगाने के लिए तैयार नहीँ है क़ौम के लिए। जब अंग्रेजों ने भारत छोड़ा तो खूब जंगल थे। वो जंगल आज़ादी के बाद काले धन में बदल गए। जितनी रेल अंग्रेजों ने भारत में छोड़ीं, उससे शायद ५ प्रतिशत भी ज्यादा नहीं बना पाए हैं हमारे नेता। पैसा जरूर खर्च किया है। करजा जरूर लिया है। सबकी हवेलियाँ बन गईं।<br /><br />क्या बचा है जवानों के लिए? शराब से भरी थैलीयाँ और कुक्कड़। वनडे मैच। अश्लील पिक्चरें जहाँ अब लगता है गोरी चमड़ी का नाच का फैशन है। नंगी तस्वीरों से भरे अखबार।<br /><br />जवानों, ये समाज पहले से ही भ्रष्ट था, और अब और ज्यादा भ्रष्ट हो रहा है। एक तुम पर ही उम्मीद की जा सकती है। पहाड़ पर चढना हो तो पहला कदम घर की सुरक्षा से बाहर जो लिया, वो सबसे महत्वपूरण है। हर आदमी बुद्ध नहीं बन सकता। हर आदमी अमिताभ नहीं बन सकता। लेकिन हम अपनी तरफ से कहीं कोई बदलाव ला सकते हैं। हर पेड़ की शुरुआत कहीं किसी बीज से हुई थी। धरम का मतलब आँख मूँद के बैठ जाना नहीं है। ये सबको मालूम है क्या सही है क्या गलत है। अब इसको बाहर भी चमकने का मौका मिले। तब ये भारत गर्व करने लायक होगा। मूरख अतीत का गर्व करते हैं। बुद्धिमान लोग वर्तमान को कर्म से चमकाते हैं। <br /><br />अगर युवाओं को भविष्य उजाला करना हो तो राजनीति में उतरना पड़ेगा। अगर दस साल बाद आप आम खाना चाहते हैं तो गुठली किसी को तो बोनी ही पड़ेगी। अपने गाँव कसबों में, जहाँ हो सके राजनीति में उतर जाओ और ईमानदारी के वातावरण की माँग करो। अकेले हीरो बनने की कोई जरूरत नहीं है समूह में ताकत होती है। बूंड बूंद से घड़ा भर जाता है। नेताओं को लगना चाहिये की जनता की नजर उन पर है। जब बुद्धिमान लोग, जवान लोग, संवेदनशील लोग समाज में रुचि लेना शुरु करेंगे तो धीरे धीरे ये रामराज बन जाएगा, नहीं तो ये नरक बन जाएगा। और कोई रास्ता नहीं।jai hanumanhttp://www.blogger.com/profile/12333747248023611898noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-12370525.post-1142823072856745992006-03-19T21:49:00.000-05:002006-03-19T21:51:12.870-05:00वो अब भी हमारे साथ हैएक बार मैं रेल में दफ्तर से घर जा रहा था। उन दिनों काम की वजह से काफी परेशान था। अमरीका के खटारा "ह" वीसा में फँस के, अच्छे खासे कैरियर को चौपट करके, अनजान लोगों के चंगुल में फँस के, दफ्तर की नेतागिरी में रौंदे जाने पर अपनी किस्मत को कोस रहा था। <br /><br />मन में विचार उठा " हे परमात्मा ये मैं कहाँ फँस गया, कुछ मदद करो, कुछ हौसला बढाओ, कोई इशारा भेजो"।<br /><br />एक आदमी बगल में बैठा था, वो उठा और सामने से निकल गया।<br /><br />उसने जैकेट पहनी थी। उसकी पीठ पे लिखा था "गॉड इज़ विद यू ईवन नाओ"।jai hanumanhttp://www.blogger.com/profile/12333747248023611898noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-12370525.post-1140493075569230242006-02-20T22:30:00.000-05:002006-02-20T22:59:53.333-05:00पायो गुरकिरपापायो गुरकिरपा<br />जीवन से परशान होके मैं ॠषिकेश में गुरुजी के पास पहुँच गया। मैंने कहा, सब शास्त्र कहते हैं कि हम सत्चिदानन्द हैँ। मैं सत् हूँ ये तो साफ है। नहीं तो परिवर्तन को पहचानूँगा कैसे। मैं चित हूँ ये भी साफ है। नहीं तो कौन पूछ रहा है?<br /><br />लेकिन आनन्द कहाँ है? मुझे को सिर्फ परेशानी और दुख ही दिखाई पड़ रहे है। <br /><br />उन महात्मा ने कहा, वो चींटी को देखो। उसे लकड़ी से छेड़ोगे तो क्या होगा? चींटी लकड़ी से दूर भागने की कोशिश करेगी। चींटी पहले से ही आनन्द में थी। उसे छेड़ा तो उसे पीड़ा का आभास हुआ, और वो फिर वापिस आनान्द की खोज में चल दी। <br />"ये सहज है। ये स्वतः है। ये है। ये बिना कारण है। ये मेरे से अलग नहीं है। ये मैं ही हूँ। "<br /><br />बहुत समय लगा मूरख को समझने में।<br /><br />आध्यात्मिक आनन्द कोई चरसी की तरह का अनुभव नहीं है। कि बस पड़े हैं कोने में। जब कोने से उठे तब? क्या ये सहज है? क्या आनन्द इतना स्वार्थी है?<br /><br />"गुरकिरपा से अब मैं सिंह गर्जन कर रहा हूँ। <br />अब मैं आनन्दित हूँ। <br />अब मैं सहर्ष हूँ। <br />अब मैं सहज हँसमुख हूँ। <br />मेरा उत्साह गुरु की भेंट है। <br />अब मैं सहज सुख हूँ। <br />अब मैं दुख से चौकन्ना हूँ। <br />अब मेरी सहन भेड़िया जैसी है। <br />दुख भेड़ है मैं भेड़िया हूँ। <br />अब मेरी आँखों में तेज है। <br />अब मेरे ह्रदय में अट्टाहास है। <br />अब मेरी साँसों में प्रेम की माला है। <br />अब मैं आशीर्वाद हूँ। <br />अब मैं शुभ हूँ। <br />अब मेरा विश्वास असीमित है। <br />अब मैं बुद्धि की जीत करा सकूँ। <br />अब मेरी चाल में ध्यान है। <br />अब मैं धोखे को पहचान गया हूँ। <br />अब मेरा काम शुरु हुआ। <br />अब मेरी नींद खुली। <br />अब मैं प्रेम में खो गया हूँ। <br />अब मैं कहाँ हूँ? मेरा अन्त कहाँ है? <br />मैं कहाँ शुरु हुआ? अब मेरी सीमा कहाँ है? <br />अब मैं हूँ। <br />अब मैं प्रसन्न हूँ। <br />अब मैं खुशी का दीपक हूँ। <br />अब मैं प्राण विभोर हूँ। <br />अब मैं बालक जैसा उत्साह हूँ। <br />अब मैं चैन पा गया हूँ। <br />अब मैं दुखियों का सेवक हूँ। <br />गुरकिरपा से अब मैं आनन्द हूँ। "<br /><br />ये आनन्द की भूमिका है।jai hanumanhttp://www.blogger.com/profile/12333747248023611898noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-12370525.post-1140490019976289382006-02-20T21:28:00.000-05:002006-02-20T21:46:59.990-05:00किस्मत से मिलिये साधसंगकिस्मत से मिलिये साधसंग<br /><br />एक सज्जन कहते हैं कि लहसुन प्याज खाना छोड़ दें। चाय कॉफी भी नहीं। ये मूरखता है। ऐसे चक्कर में जो पड़ेगा वो अपना समय बरबाद करेगा। क्या खाना है क्या नहीं ये रोजमर्रा की बातें हैं। अगर डाक्टर बोले ये मत खाओ तो बात में दम है। <br /><br />पेट में दरद हो तो पेट के दरद की दवाइ ही लेनी चाहिए, चोट लगने की नहीं। हमारा बुखार दिमागी है। इसकी दवा भी मानसिक ही है। मैं ये हूँ, ये मेरा है, ये मेरे नौकर हैं, मैं इस जात का हूँ, मैं समाज के इस तबके में घूमता हूँ, मेरे पास इतने आर्थिक साधन हैं ... बीमारी ये "मैं" है... लहसुन न खाने से कोई फरक पड़ेगा? उलटा गर्व और हो जाएगा कि मैंने इतने साल से लहसुन नहीं खाया, मैं बड़ा महात्मा हो गया। महात्मा वो है जो महात्मा होते हुए भी आम आदमी की तरह रह सके। दूसरे को पता नहीं चले कितने पानी में है ये। अन्दरूनी स्थिती चाहकर भी कोई किसी को नहीं दे सकता। अगर किसी को यहाँ प्रेरणा मिले अपना जीवन बदलने में तो इस पन्ने का लक्ष पूरा हो गया। गुरु मुझ पर प्रसन्न हुआ।<br /><br />असली आहार हमारे विचार हैं। अनियन्त्रित विचार इच्छा रूपी हैं। अपनी बीज छोड़ जाते हैं मन में। जहाँ से यात्रा शुरू होती वहाँ हमें अपने विचारों के प्रति सचेत नहीं हैं। जितने हम विचारों के प्रति सचेत हैं, उतना हम आगे बढ पाए। <br /><br />जीवन बदलने के अवसर दुर्लभ हैं। मैं मूरख हूँ, मुझे कुछ ज्ञान नहीं है, ये ज्ञान के बीज हैं। लेकिन जब ये स्वतः जगे तब ही इसकी किमत है। केवल कह देने की बात नहीं है। दिल जब तड़प जगी, कि मेरा पूरा जीवन अनर्थ रहा, मुझे तो कुछ भी पता नहीं, तब शुरुआत हुई। ये बनावटी नहीं चलेगी। अज्ञान स्वीकार करके ही ज्ञान के लिए स्थान बनेगा। एक म्यान में दो तलवार नहीं रह सकतीं। जब ये समझ लिया "मैं अज्ञान में डूबा हूँ", तो, म्यान खाली हो गयी। अब इसमें ज्ञान की तलवार आ सकती है। जरूरी नहीं कि आ ही जाए, इस सदमे को सहन करने के लिए तगड़ा दिमाग चाहिए। ये समय, जब अज्ञान स्वीकार हो चुका है, लेकिन ज्ञान का विश्वास नहीं जगा है, बहुत परेशानी से भरा है। एक नाव छोड़ चुके हो, दूसरी कहाँ है कुछ पता नहीं। जिसपर गुरु किरपा हुई उसके तरने की ज्यादा उम्मीद है। जिसमें ये सदमा सहना की ताकत नहीं है उसे इन सवालों से दूर ही रहना चाहिए। नहीं तो आत्मविश्वास टूटने से मानसिक बीमारियाँ आ सकती हैं। मुझे ऐसा लगता है की कई मानसिक रोगी ज्ञान की झलक पा चुके हैं, लेकिन वो इसके लिए तैयार नहीं थे। अपने व्यक्तित्य से परे का आभास उनका नाजुक मस्तिष्क न झेल पाया।<br /><br />मिले साधसंग किस्मत से <br />मत खो ये अवसर रे मुए <br />बन्दा चाहे तेरी भलाइ<br />तेरा ध्यान तेरी कमाइ<br />साधसंगत बन्दे को राह दिखाई<br />बुद्ध नानक कबीर से गुरु देओ मिलाईjai hanumanhttp://www.blogger.com/profile/12333747248023611898noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-12370525.post-1140474590610746472006-02-20T17:14:00.000-05:002006-02-20T19:28:33.913-05:00हम निम्रता से जी सकेंजीवन हमारे वश में नहीं है। पहलवानों तक को लकवा मार जाता है। अगली साँस आएगी कि नहीं, कुछ गारण्टी नहीं। हम कहाँ पैदा हुए, किसके घर में, कैसे शरीर में, कुछ भी हमारे वश में नहीं है। कोई बच्चा अन्धा पैदा हुआ। वो बच्चा हम भी हो सकते थे। <br /><br />हम किससे मिलेंगे हमारे वश में नहीं है। कल को हो सकता है कोई संत हमारे जीवन में आ जाए। या हो सकता है कोई मूरख हमसे टकरा जाए। कोई खुशखबरी आ जाए। कोई कलेश आ जाए। <br /><br />कौन से लोग हमारे दोस्त बन जाएँ, क्या मालूम। ये वातावरण, संगी साथी, ही हमारे मन को आकार देते हैं। हमारा मन कैसा है, इस पर हमारा मामूली सा वश है। लेकिन इस मन को अच्छे या बुरे रास्ते पर कौन लाया था? क्या वो वाकया हमारे वश में था? नहीं, ऐसा नहीं था। ये सब हो गया। ऐसा विलयात की किताबों में फैशन चल पड़ा है, कि जो हुआ, इसलिए हुआ क्योंकि आपने ये चाहा था। कौन चाहेगा की उसका बच्चा अंधा पैदा हो? कौन चाहेगा कि सुनामी में लाखों तबाह हि जाएँ? जीवन महारहस्य है। एक के घर में राम पैदा होता है, एक के घर में रावण। कुछ भी हो जाता है। जो कहता है जीवन के कारणों और परिस्थितियों के क्रम को समझ गया है, समझ लेना कि फेंक रहा है। <br /><br />हम अपनी परिस्थिती पर घमण्ड न करें। हम अपनी परिस्थिती पर ग्लानी न करें। हम दूसरे की परिस्थिती पर जलन न करें। हम दूसरे की दुख पर सहानुभूति कर सकें। परिस्थिती बदलेगी। जीवन अस्थिर है। परिस्थिती को वश करने के लिए बावले हुए फिर रहे हैं जिनके हाथ में तुक्के से कुछ ताकत आ गयी है। अब ये बावलापन उबल के सामने आ रहा है समाज में। पेड़ उगने में बीस साल लगते हैं, काटने में एक घण्टा। बावला हो जाना आसान है। फिर स्वस्थ होना उतना आसान नहीं है। हम निम्रता से जी सकें। यदि जीवन हमें ताकत दे तो उसके साथ निम्रता भी दे सके। इस बन्दर को उस्तरा न मिल सके। और मिले तो अकल भी साथ में मिल सके।<br /><br />आशा और उत्साह से जलाया हुआ दीपक रौशनी फैलाएगा ही। आम की गुठली बोने से आम उगेगा ही। मैत्री और प्रेम से जिया हुआ जीवन सुख फैलाएगा ही। जो दूसरों के सुख के लिए जीएगा वो सुखी होगा ही।jai hanumanhttp://www.blogger.com/profile/12333747248023611898noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-12370525.post-1135437627132152432005-12-24T10:13:00.000-05:002005-12-24T10:20:27.146-05:00जो डर गया, समझो मर गयायदि आप हमारे देश के धरमों को पढें तो पाएँगे की इनका लक्ष मोक्ष, या, निर्वाण है। मोक्ष का मतलब पुनर्जनम से मुक्ती बताया गया है। भारत के धरम दूसरे देशों के धरमों से ज्यादा सुलझे हुए हैं। आदमी की हालत जो हमारे धरमों ने समझाई है, उसमें ज्यादा दम लगता है। परमात्मा, या बुद्धधातु की, अद्वैत की जो सीख हमारे यहाँ मिलती है उसका कोई मुकाबला नहीं है। ऐसा कहा गया है की जिसके संस्कार जैसे थे, वैसी धार्मिक परिस्थिती में वो पैदा हुआ। इनको धार्मिक परिवार, या गोत्र कहा गया है। याने की किस रास्ते की तरफ उसका ज्यादा रुझान है।<br /><br />हमारे धरमों ने ज्यादातर दुनिया को परमात्मा की लीला माना है। जब पूरी दुनिया ही खेल है तो खेल खेलने से कैसा कतराना? जब परमात्मा ही खेल रहा है तो हमें छोड़ने की कैसी सीख? बन्दे के खयाल में मोक्ष में जीवन से भागने को प्रोत्साहन दिया गया है। बुद्ध ने कहा है की जैसे अनन्त सागर में एक लकड़ी तैर रही है, लहरों के थपेड़ों में, और सौ वर्ष में एक कछुआ सागर के तल से उठकर ऊपर आए, और उसकी गरदन उस लकड़ी में एक छेद में से निकल कर हवा तक पहुँच जाए, इतना दुर्लभ है मानव जीवन। अब अगर इतनी अनमोल है ये, तो इस मानव जीवन का लक्ष इसी जीवन से छुटकारा बताने की क्या तुक हुई? "मैं वापिस ना आऊँ, क्योंकि जीवन दुख से भरा है", ये डरी हुई मानसिकता सी लगती है। <br /><br />ये मोक्ष की आकाँक्षा भी अहंकार सा ही लगता है। पहले जमीन जायदाद चहिए थी, अब निर्वाण चहिए। असंतोष वही है। या केवल बनियागिरी बन के रह गये हैं हमारे धरम? <br /><br />अरे किसने कहा था की जीवन फूलों की सेज पे गुजरेगा। हर आदमी दुख झेल ही रहा है। जरा से दुख से, कामिनी काँचन से डरे घूम रहे हैं वो लोग जो हमें रास्ता दिखाने वाले थे। पूरी जिन्दगी पत्थरों की पूजा में निकल गयी लेकिन किसी दुखी आदमी पर दया नहीं आई। बच्चों के पास पीने को पानी नहीं है और ये लोग दूध की नदियाँ बहा रहे हैं मूर्तियों पर। अगर दुख है तो उसके पीछे कारणों को हम देखें, और उनका हल करने की कोशिश करें। किसी का बच्चा मर गया है। किसी की बेटी को दहेज के लिए जला दिया गया है। दुख गहरे हैं। और दुख का कारण और परिस्थितियाँ अगर हमारे वश में नहीं हैं तो मामला और मुश्किल हो जाता है।<br /><br />ये जीवन अनमोल है। ये अवसर दुबारा मिले या न मिले, कुछ पता नहीं। हम प्रसन्न रहने की आदत डालें। गमगीन रहना आत्मग्लानी की निशानी है, और आत्मग्लानी एकदम लीचड़ तरह का अहंकार है जिससे निकलना मुश्किल है। इसमें आदमी को दुख में मजा आने लगता है। हमारी पिक्चरें, खासकर पुरानी, इसका उदाहरण हैं। राजकपूर आँसू ही बहाता रहता है। ये कैसे मरद हैं जिन्हें आँसू बहाने में गर्व होता है?<br /><br /> हम जीवन का सामने शेर की तरह करें। साहसी, चौकन्ना, और ताकतवर। अपने इरादों को पूरा करने में काबिल। और अगर शेर पिंजड़े में बन्द कर भी दिया जाए तो वो शेर ही रहेगा, वोही साहस, वोही चौकन्नापन और वोही ताकत। आखरी दम तक हम तेज से भरे सकें। हम प्रेम के सिपाही बन सकें। और ये तेज, ये ताकत जब हमारे प्राणों में से उपजने लगे तो हम इसे दूसरों में भी बाँट सकें। रोशनी का फायदा तब है जब वो उजाला करे। हम ऐसी रोशनी बनें। हमारा तेज ऐसा हो की दूसरों को भी उत्साह से भर दे। बन्दे के खयाल में ये ही निर्वाण है।<br /><br />साफ, निर्मल मन से कोई जीले,<br />दूसरों के सुख के लिए कोई जीले, <br />ऐसा निर्गुन प्रेम का प्याला कोई पीले ।<br />अब अनमोल हैं ये प्राण,<br />इनके आगे अब क्या निर्वाण ?<br />रोगियों की दवा बनूँ मैं,<br />दुखियों का सुख बनूँ मैं,<br />असहायों का सहारा बनूँ मैं ।<br />जीऊँ अनगिनत बार आऊँ यहाँ बार बार,<br />पोंछता रहूँ अनगिनत आँसुओं की धार,<br />काट पाए दुनिया के दुख ये मेरे उत्साह की तलवार ।<br />जला पाऊँ ऐसा दिया किसी दिल में,<br />फैला पाऊँ ऐसा आनन्द इस जग में<br />ऐसा आशीरवाद प्रभु दें हमें ।jai hanumanhttp://www.blogger.com/profile/12333747248023611898noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-12370525.post-1132621489772007282005-11-21T20:03:00.000-05:002005-12-24T10:32:37.893-05:00ये खेल इच्छाओं काजापान से ये सुन्दर ज़ेन बौद्ध कहानी मिली। हम अपनी इच्छाओं के बारे में सतर्क रहें।<br /><br />एक गरीब दुखी आदमी जंगल से गुजर रहा था, अपनी परेशानियों के बारे में सोचते हुए। एक पेड़ के सहारे बैठ गया। पेड़ जादुई था, जो उसे छुए उसकी इच्छा पूरी कर देता। <br /><br />आदमी को ध्यान आया कि उसे प्यास लगी थी। सामने पानी का बर्तन आ गया। आदमी को झटका लगा, पर वो पानी पी गया, सोचके कि पानी पीने लायक है।<br /><br />फिर उसे याद आया कि भूख लगी थी। भोजन सामने आ गया। <br /><br />जब उसे समझ आया, तो उसने कहा "मुझे इच्छा है कि मेरा अपना सुन्दर घर हो"। सामने मैदान में घर खड़ा था। फिर उसने नौकर माँगे। फिर एक सुन्दर, चतुर पत्नी माँगी। सब मिल गए। <br /><br />फिर उसे अपनी जीवन याद आया, और वो बोला, "रुको, ऐसा नहीं हो सकता। मेरी तकदीर तो एकदम बेकार है। ये सब मुझे भला कैसे हौ सकता है?" जैसे ही वो बोला, सब कुछ गायब हो गया। उसने अपना सिर पीट लिया और अपनी परेशानियों के बारे में सोचते हुए आगे चला।jai hanumanhttp://www.blogger.com/profile/12333747248023611898noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-12370525.post-1130807462301301892005-10-31T20:10:00.000-05:002005-10-31T20:11:02.320-05:00हम नहीं सुधरेंगेएक सज्जन भारत से अमरीका आए । बड़े हैरान हुए । कैसे सड़क की दाँई तरफ लोग गाड़ी चलाते हैं । हवाई अड्डे से बाहर निकले ही थे । टैक्सी माँगी । टैक्सी चलाने वाले मिले बंता । <br /><br />सज्जन ने पूछा " आप तो भारत से होंगे ?"<br /><br />बंता बोले " हाँ, बिलकुल । " <br /><br />सज्जन बोले " भारत में तो हम सड़क की बाँई तरफ गाड़ी चलाते हैं । यहाँ सड़क की दाँई तरफ लोग गाड़ी चलाते हैं । आप को परेशानी नहीं हुई यहाँ पर ? "<br /><br />बंता बोले " जी बिलकुल नहीं ।"<br /><br />सज्जन बोले " अरे ये कैसे ? मुझे तो देख के ही परेशानी हो रही है । " <br /><br />बंता बोले " जी हमतो वहाँ भी सड़क के बीच में चलाते थे, यहाँ भी सड़क के बीच में चलाते हैं । "jai hanumanhttp://www.blogger.com/profile/12333747248023611898noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-12370525.post-1130110427889659322005-10-23T19:33:00.000-04:002005-10-23T19:43:38.583-04:00बड़ी धमकियाँये किस्सा मेरे सामने हुआ । <br /><br />मेरठ से ग़ाज़ियाबाद की बस में मैं शाम के समय आ रहा था । सरकारी बस थी, खटारा, शोर मचाती हुई । जब बस ग़ाज़ियाबाद के पास पहुँची तो कई लड़के चढ़े । एक एक करके कंडक्टर ने उन्हें टिकट दिया । एक कुछ हीरो टाइप था । उसने टिकट खरीदने से मना कर दिया । "मैं नहीं देता पैसे" , उसने साफ कह दिया, ग़ाज़ियाबादी पत्थर मार भाषा में । कंडक्टर ने बहुत समझाया, "बेटा, बस में पैसा तो देना ही पड़ता है, मुफ्त में नहीं चढ़ सकते" । लड़का बोला "मैं तो स्टाफ का हूँ" । कंडक्टर बोला, "तो अपना कार्ड दिखा ?" । लड़का फेंक रहा था । होते होते गरमा गरमी हो गयी । <br /><br />लड़का बोला " मैं तुझे गोली मार दूँगा, मेरे से पंगा मत ले ।"<br /><br />कंडक्टर बोला, "अबे छोड़, दो रुपय का टिकट खरीदने में तो तेरे पेट में दरद हो रहा है, बीस रुपय की गोली क्या खरीदेगा ?"jai hanumanhttp://www.blogger.com/profile/12333747248023611898noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-12370525.post-1130110363042456682005-10-23T19:31:00.000-04:002005-10-23T19:32:43.043-04:00झाड़ू की आदत<em>वो, जो पहले नासमझ था ।</em> ये धर्म शिक्षा तथागत ने दी जब वह जटावन में रह रहे थे, महानीय सम्मुंजनी के बारे में । <br /><br />ये महानीय , प्रतीत होता है, झाड़ू लगाते रहते थे, सुबह से शाम तक । एक दिन वो झाड़ू लेकर महानीय रेवत के कमरे में गए, जो वहाँ हमेशा की तरह बैठे थे । इस पर महानीय सम्मुंजनी ने सोचा "ये आलसी जनता के चढ़ावे के खा के, आराम करता है । इसे कम से कम एक कमरे में झाड़ू तो लगानी चाहिए ।" तो महानीय रेवत ने उन्हें कहा " नहा के मेरे पास आओ" । महानीय सम्मुंजनी नहाने के बाद आए ।<br /><br /><br />महानीय रेवत ने उन्हें कहा "भाई, भिक्षु को हर समय झाड़ू नहीं लगानी चाहिए । सुबह झाड़ू लगाने के बाद उसे भिक्षा के लिए जाना चाहिए । उसके बाद उसे ध्यान कक्ष में बैठ कर शरीर के बत्तीस अंगों का ध्यान करना चाहिए । उसे ध्यान रहना चाहिए शरीर की नश्वारता का । शाम को उसे उठ कर फिर से झाड़ू लगानी चाहिए । मगर उसे पूरे दिन झाड़ू नहीं लगानी चाहिए । कुछ समय आराम भी करना चाहिए । " महानीय सम्मुंजनी ने बात को माना, और जल्दी ही ज्ञान प्राप्त लर अरिहंत हो गए ।<br /><br />लेकिन उसके बाद, कमरों में कचड़ा भरा रहने लगा । तो भिक्षुओं ने कहा, " महानीय सम्मुंजनी, आप झाड़ू क्यों नहीं लगाते, कमरों में कचरा भरा रहता है ?" तो वो बोले "महानीयों, पहले मैं नासमझ था, अब मुझे समझ आ गयी है ।" तो भिक्षुओं ने बुद्ध को मामला बताया और बोले, " ये महानीय कहते कुछ हैं, और करते कुछ और हैं ।" तो बुद्ध बोले, " मेरा पुत्र महानीय सच कहता है, पहले उसे समझ नहीं थी, तब वो झाड़ू लगाता रहता था । अब वो ध्यान के आनन्द में मस्त रहता है । इसलिए अब वो झाड़ू नहीं लगाता ।" और उन्होनें ये दोहा कहा ,<br /><br /><br />१७२ वो, जो पहले नासमझ था, नासमझ नहीं है,<br /> प्रकाश फैलाता है जगत में, जैसे बादलों से मुक्त चाँद ।<br /><br />( ये कहानी धम्मपद १७२ के बारे में है )jai hanumanhttp://www.blogger.com/profile/12333747248023611898noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-12370525.post-1130110150125860482005-10-23T19:25:00.000-04:002005-10-23T19:29:10.133-04:00मेहनत की रोटी खाओ<em>आदमी को महनत करनी चाहिए ।</em> ये धर्म शिक्षा तथागत ने दी जब वह पीपल वन में रह रहे थे, अपने पिता के बारे में ।<br /><br /><br />एक समय पर, जब बुद्ध ने पहली यात्रा की कपिल नगर को, तो उनसे मिलने उनके रिशतेदार आए । कुछ समय बाद बुद्ध ने धर्म की शिक्षा दी । इसके बाद रिशतेदार चले गए, एक ने भी उनको आमंत्रण नहीं दिया । उनके पिता, जो वहाँ के राजा थे, को विचार आया, लेकिन वो भी बिना आमंत्रण दिये चले गए । घर पहुँचने पर उन्होंने बीस हजार भिक्षुओं के लिए भोजन बनवाया ।<br /><br />अगले दिन जब बुद्ध नगर में आ रहे थे, भिक्षा माँगने के लिए, तो उनके मन में विचार आया, "क्या अतीत के बुद्ध, अपने पिता की नगरी में आने पर, अपने रिशतेदारों के घर सीधे जाते थे, या घर घर भिक्षा माँगने के लिए जाते थे । " समझने पर कि वो हमेशा घर से घर जाते थे, बुद्ध भी घर घर भिक्षा माँगने के लिए गए । <br /><br />जब राजा को समाचार मिला तो वो बुद्ध के पास गए और बोले, " पुत्र, क्यों मुझे सता रहे हो, इस नगर में तुम्हें घर घर से भीख माँगते देख कर मेरी क्या लाज रह जाएगी ?" तो बुद्ध बोले " मैं आपको लज्जित नहीं कर रहाँ हूँ । मैं अपनी परंपरा को मान रहा हूँ ।" राजा बोले, " पुत्र, क्या मेरी परंपरा ने तुम्हें घर घर भीख माँगना सिखाया है ?" तो बुद्ध बोले " महाराज, आपकी परंपरा में ये नहीं है । लेकिन मेरी परंपरा में ये है, क्योंकि सैकड़ों, अनगिनत बुद्धों ने घर घर भीख माँगकर ही गुजारा किया है " ये कहने पर उन्होनें ये दोहा कहा , <br /><br /><br />१६८ मनुष्य को श्रम करना चाहिए, और नासामझी का जीवन नहीं जीना चाहिए ,<br /> मनुष्य को सही जीवन जीना चाहिए, क्योंकि सही जीवन से,<br /> मनुष्य सुखी रहता है, इस लोक में, और परलोक में।<br /><br /><br />१६९ मनुष्य को धर्म से जीना चाहिए, अधर्म से नहीं,<br /> क्योंकि धर्म से जीने से, मनुष्य सुखी रहता है, इस लोक में, और परलोक में।<br /><br /><br />इस शिक्षा के बाद राजा और बाकी लोगों को परिवर्तन के फल का लाभ हुआ ।<br /><br />( ये कहानी <a href="http://www.accesstoinsight.org/canon/sutta/khuddaka/dhp/tb0/dhp-13-tb0.html"> धम्मपद १६८, १६९ </a>के बारे में है )jai hanumanhttp://www.blogger.com/profile/12333747248023611898noreply@blogger.com