tag:blogger.com,1999:blog-11924325.post-50440022128950922062007-10-20T16:53:00.000+03:002007-10-20T16:54:41.459+03:00सूरज का टुकड़ावक्त के मछुआरे ने<br />फेंका था जाल<br />कैद करने के लिए<br />सघन तम को<br />जाल के छिद्रों से<br />फिसल गया तम<br />और कैद हो गया<br />सूरज का टुकड़ा ।<br />वक्त का मछुआरा<br />कैद किए फिर रहा है<br />सूरज के उस टुकड़े को<br />और<br />सघनतम होती जा रही है<br />तमराशि घट घट में<br />उगानी होगी<br />सूरज के नए टुकड़ों की नई पौध<br />जगानी होगी बोधगम्यता<br />युग शिक्षक के अन्तस में<br />तभी खिलेगी वनराशि<br />महकेगा वातास<br />छिटकेंगीं ज्ञान रश्मियाँ ।<br />क्यों न चल पडें हम<br />अभी से ! हाँ अभी से !!<br />इस नए पथ की ओर<br />कहा भी गया है<br />जब आँख खुलें<br />तभी होती है भोर<br />तभी होती है भोर !!<br /><br /><span style="color:#990000;">-डा० जगदीश व्योम</span>डॉ॰ व्योमhttp://www.blogger.com/profile/10667912738409199754noreply@blogger.com