tag:blogger.com,1999:blog-11728010.post-92136477001380097662008-03-13T22:06:00.000+05:302008-03-13T22:06:00.000+05:30इन चित्रों को देख अपनी एक पुरानी कविता याद आ गई हा...इन चित्रों को देख अपनी एक पुरानी कविता याद आ गई हालाँकि ये शूट उसे अभिव्यक्त नहीं कर पाएंगे। इसलिए लिख रहा हूँ शायद अब की बार वह कविता शूट हो जाए तो दोनों को एक साथ पेश किया जाए। <BR/>" उस ने आते ही <BR/>कटार मार दी <BR/>सूरज के सीने में <BR/>और रवि <BR/>रवि रक्त से<BR/>रक्त सा हो गया <BR/>हो गया साम्राज्य, फिर <BR/>उस क्रूर कलुषित रात्रि का <BR/>जिस की अग्रदूत <BR/>बन आई थी <BR/>वह निर्दयी सांझ <BR/>जिस की अग्रदूत बन<BR/>आई थी, वह निर्दयी सांझ......"<BR/><BR/>मुझे इस कविता के शूट की प्रतीक्षा रहेगी।दिनेशराय द्विवेदीhttp://www.blogger.com/profile/00350808140545937113noreply@blogger.com