tag:blogger.com,1999:blog-11667377667349242552008-07-06T05:04:50.742-07:00देखा-सुनासजीव सारथीhttp://www.blogger.com/profile/08906311153913173185noreply@blogger.comBlogger55125tag:blogger.com,1999:blog-1166737766734924255.post-36892538116389482412008-07-06T03:12:00.000-07:002008-07-06T03:14:39.796-07:00जाने तू या जाने न<strong>रेटिंग ****</strong><br />---------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------<br />आमीर खान युवाओं की नब्ज बखूबी पहचानते हैं और लेखक से निर्देशक बने अब्बास टायरवाला अभी खुद युवा हैं, इस लिए जाने तू या जाने न के जरिए उन्होंने टार्गेट ऑडियेंस को पूरी तरह से खुश कर लिया है।<br /><a href="http://bp0.blogger.com/_90nC-GzpqT0/SG5cgbUzb4I/AAAAAAAABOI/PvFApuauBpk/s1600-h/12917.jpg"><img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp0.blogger.com/_90nC-GzpqT0/SG5cgbUzb4I/AAAAAAAABOI/PvFApuauBpk/s320/12917.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5219210730329567106" /></a><br /><blockquote><strong>स्टार कास्ट</strong><br />इमरान खान<br />जेनीलिया<br />नसरुद्दीन शाह<br />रत्ना पाठक शाह<br />परेश रावल<br />सोहेल खान<br />अरबाज खान<br /><strong>डायरेक्टर</strong><br />अब्बास टायरवाला<br /></blockquote><br />कहानी जय (इमरान खान) और अदिती (जेनीलिया) की है, जिनका पूरा फ्रेंड्स ग्रुप और पेरेंट्स मानते हैं कि वह एक दूसरे को प्यार करते हैं, लेकिन खुद उन्हें ही अहसास नहीं होता। फिर जय की जिंदगी में मेघना (मंजरी) और अदिती की जिंदगी में सुशांत (अयाज खान) आते हैं, तभी दोनों दोस्तों को दिल में छिपे प्यार का अहसास होता है। कहानी रुटीन है और क्लाइमेक्स भी कई फिल्मों में देखा हुआ। डिफरेंट है तो ट्रीटमेंट, सबसे बड़ी बात आमिर और अब्बास ने फिल्म को मेट्रो शहरों के आम युवा से सहजता से जोड़ा है। लव स्टोरी में पेरेंट्स-बेटी, मां-बेटा, भाई-बहन के रिश्ते पिसे नहीं हैं। यही वजह है कि हर युवा खुद को कहानी से रिलेट कर सकता है। इमरान पहली ही फिल्म में अदाकारी की पुख्तगी का अहसास करवाते हैं। जेनेलिया भी गहरी छाप छोड़ती हैं। दोस्तों के ग्रुप में अनुराधा पटेल, जयंत, अलिशका, निरव, कर्न, सुगंधा, प्रतीक, रेणुका सबने अपने किरदार को बखूबी जिया है। रत्ना पाठक शाह और नसरूद्दीन की केमिस्ट्री हम पांच की याद दिलवाती है। दोनों ही शानदार हैं। परेश रावल छोटे से किरदार में जोरदार हैं। सोहेल और अब्बास जरुर इरीटेट करते हैं। एआर रहमान के दो गाने पप्पू को डांस नहीं आता और कहो न कहो पहले ही हिट हो चुके हैं। <br />----------------------------------------------------------------------------------------------------------------<br /><strong>रेटिंग चिन्ह---*पैसा बर्बाद/ **बस ठीक ठाक है/ *** पैसा वसूल/ ****जरूर देखें/ ****बेहतरीन </strong>Deep Jagdeephttp://www.blogger.com/profile/14695925764627099199noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-1166737766734924255.post-44929010228230658372008-07-04T10:35:00.000-07:002008-07-04T10:38:09.837-07:00लव स्टोरीः आधी 2008 बाकी 2050<strong>रेटिंग ***</strong><br />-----------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------<br />हवा में उड़ती कारें, उंगली के इशारे पर काम करती घरों की दीवारे, आगे पीछे घूमते और हुक्म बजाते रोबोट और मीशीनी जिंदगी में कहीं पनपती एक लव-स्टोरी। यही है लव स्टोरी 2050 की कहानी। भई फिल्म का नाम 2050 है, लेकिन आधी फिल्म तो 2008 में ही गुजर जाती है।<br /><a href="http://bp0.blogger.com/_90nC-GzpqT0/SG1DwLqd59I/AAAAAAAABOA/YFfS0NXI2gU/s1600-h/12430.jpg"><img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp0.blogger.com/_90nC-GzpqT0/SG1DwLqd59I/AAAAAAAABOA/YFfS0NXI2gU/s320/12430.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5218902038235965394" /></a><br /><blockquote><strong>स्टार कास्ट</strong><br />हरमन बवेजा<br />प्रियंका चोपड़ा<br />बोमन इरानी<br />अर्चना पूर्ण सिंह<br /><strong>डायरेक्टर</strong><br />हैरी बवेजा<br /><strong>शूटिंग लोकेशन</strong><br />आस्ट्रेलिया, न्यू यार्क, मुंबई</blockquote> वो भी मौजूदा मुंबईया स्टाइल लव स्टोरी में जिसमें प्रेमी हर रोज 'होने वाली प्रेमिका' के घर के चक्कर लगाता है, वो रोज डेट पर जाने के लिए मना करती है और फिर मान जाती है। लेकिन हैरी बवेजा ने इस बात को दो-तीन बार रिपीट करके तेजी से शुरू हुए पहले हाफ को कुछ ही देर बाद धीमा और बोर बना देता है। फिर भी अच्छी ओपनिंग, खास कर तेज़ रफ्तार पसंद करने वाले युवाओं को बांधने में कामयाब रहे हैं। हरमन बवेजा की एंट्री भी ठीक ठाक रही है। फिल्म की कहानी रुटीन लव स्टोरीज जैसी है, जिसमें पहले जन्म में प्रेमिका की मौत के बाद प्रेमी उसे ढूंढता फिरता है। बस इसमें नया ये है कि इस बार पुर्नजन्म की बजाए प्रेमी टाइम मशीन में बैठ कर 42 साल आगे चला जाता है। लेकिन घबराइए मत पहले हाफ से निराश होकर सिनेमा हाल छोड़ कर मत जाइए, दूसरे हाफ में फिल्म सब को चकित करती है। खास कर 2050 में कल्पित रोबो वल्र्ड हवा में उड़ती कारें, आसमान से उलटी लटक कर चलती ट्रेंन, वर्चुयल नियोन साइन बोर्ड और बोलते यूनीपोल, हवा में तैरती स्टेज के साथ ही मुंबई में हजारों मंजिली इमारतों के साथ ही समंदर में बनाए गए शीशे के घर आपको जरुर अकर्षित करेंगे। एडवांस दौर में हर काम में मदद करते रोबोट आपको काफी क्यूट लगेंगे। खास कर प्रिंयका चोपड़़ा का नन्हां पिंंक रोबो, जो उसके दिल में पनपते प्यार को न सिर्फ बखूबी समझता है, बल्कि हीरो के रोबो से सारी बातें शेयर भी करता है। हैरी बवेजा ने अपने बेटे को स्थापित करने के लिए स्क्रिप्ट और सक्रीन प्ले पर खास ध्यान दिया है। यहां तक कि खतरनाक ताकतों वाला विलेन उस पर हावी न हो उसके चेहरे को नकाब में ही रखा गया है। एक्टिंग की बात करें तो विभिन्न इमोशंस को एक्सप्रेस करने में हरमन काफी हद तक सफल रहें हैं, फिर भी उन्हें काफी मेहनत करनी होगी। जो लोग उनके चेहरे को ऋतिक रोशन से मिला रहे हैं, उन्हें हरमन में कुछ डिफरेंट देखने को मिलेगा। डांस, एक्शन, रोमांस, इमोशनल, ट्रेजेडी और कॉमेडी हर तरह के सीन फिल्म में उनके लिए खास तौर पर रखे गए हैं, शायद पापा हैरी साबित करना चाहते थे कि जूनियर बवेजा में पूरा फिल्मी मैटिरियल है। प्रियंका एतराज के बाद एक बार फिर काफी हॉट और सेक्सी लगी हैं। चाहे ड्रेसेस हों या सेकेंड हॉफ में 2050 की स्टाइल उनकी हर चीज में गलैमर देखने को मिला है। बोमन इरानी भी अपने किरदार को जी गए हैं। अर्चना पूर्ण सिंह भी ठीक ठाक लगी हैं। म्यूजिक के मामले में अनु मलिक इस बार भी निराश ही करते हैं। मीलों का फासला खास कर सैड वर्शन जरुर प्रभाव छोड़ता है। खैर सभी चीजों का गुलदस्ता सजा हैरी बवेजा का निर्देशन लोगों को बांधने में सफल रहा है, अगर वह पहले हाफ में थोड़ी कैंची चलाने का साहस दिखाते तो सक्रीनप्ले में और कसाव आता। विजय अरोड़ा और किरण दियोहंस की सिनेमेटोग्राफी भी फिल्म का साकारात्मक पक्ष है। खास कर आस्ट्रेलिया के समंदर के आस पास की लोकेशंस को उन्होंने खूबसूरती से फिल्माया है। ग्राफिक्स के पीछे नजर आता मुंबई भी उनके कैमरा वर्क को बखूबी दिखाता है। ग्राफिक्स के मामले में लव स्टोरी 2050 को बॉलीवुड में क्रांति कहा जा सकता है। अगर ऐसी फिल्में बनने लगे तो बॉलीवुड का हॉलीवुड करन होने में देर नहीं लगेगी। फिल्म युवाओं को तो जरुर आकर्षित करेगी, लेकिन उससे पहली पीढ़ी को दूसरे हाफ में वीडियो गेम्स पर आधारित फाइटिंग सीन्स शायद ही समझ आएं। फिल्म में एक और चीज काबिले जिक्र है वनिता उमंग कुमार का आर्ट, 2050 की तकनीकी दुनिया को उभारने में उनका आर्ट वर्क खास भूमिका निभाता ही है, उसमें भारतीय संस्कृति की छाप भी नजर आती है। खास कर प्रियंका चोपड़ा द्वारा कमरे का रंग गुलाबी करने वाले सीन में दीवारों पर लिखे श्लोकों में इसकी झलक मिलती है। <strong>पिक्चर अभी बाकी है दोस्त एक और सरप्राइज फिल्म में हरमन बवेजा का क्लोन भी देखने को मिलेगा, सो कम ऑन दोस्तो हरमन को हरमन से लड़ते देखते हैं।</strong><br />-----------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------<br /><strong>रेटिंग चिन्ह---*पैसा बर्बाद/ **बस ठीक ठाक है/ *** पैसा वसूल/ ****जरूर देखें/ ****बेहतरीन</strong>Deep Jagdeephttp://www.blogger.com/profile/14695925764627099199noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-1166737766734924255.post-62878490081158113252008-06-11T01:12:00.000-07:002008-06-11T02:08:47.198-07:00देखा-सुना फ़ोरम-क्या यौन शिक्षा दी जानी चाहिएदोस्तो जैसे कि हमने कुछ दिन पहले देखा सुना फ़ोरम शुरू करने की घोषणा की थी उसी कङी में हम पहला विषय लेकर आए हैं। जिसे संचालक मंडल के सदस्य सजीव सारथी ने रखा है। यही नहीं देखा सुना ने हर बुधवार एक विषय पर चर्चा करने का फ़ैसला किया है, सो आप सब भी विषय रख सकते हैं। हमें आपके विषय पर विचार कर खुशी होगी। जैसे कि आप सब जानते ही हैं कि देखा सुना ने जो फोरम शुरू किया है, वह अपने पाठकों अपनी राय टिप्पणीयों के बाहर सीधे मुख्य विषय में रखने की सुविधा देता है, इस लिए हमें खुशी होगी की आप देखा सुना फोरम पर जाकर ही अपने विचार रखें। <br /><!-- Start Bravenet.com Service Code --><br /><div align="center"><br /><a href="http://pub22.bravenet.com/forum/1857106297"><br /><img border="0" alt="Free Message Forum from Bravenet.com" src="http://assets.bravenet.com/cp/forum.gif" title="Free Message Forum from Bravenet.com"/></a>&nbsp;<a href="http://www.bravenet.com"><img border="0" alt="Free Message Forums from Bravenet.com" src="http://assets.bravenet.com/cp/bn-forum.gif" title="Free Message Forums from Bravenet.com"/></a><br /></div><br /><!-- End Bravenet.com Service Code --><br />देखा सुना फोरम के बारे में अधिक जानकारी के लिए <a href="http://dekhasuna.blogspot.com/2008/05/blog-post_26.html">यहां कलिक करें </a>या अधिक जानकारी के लिए sajeevsarathie@gmail.com या jjournalist007@gmail.com ईमेल कर सकते हैं। आप सब के विचारों, सुझावों और सहयोग का हमेशा इंतजार रहेगा।<br /><strong>इस हफ्ते का विषय ये है।</strong><br />कोडम बनाने वाली कम्पनियाँ जहाँ दावा करती हैं कि उनके उत्पाद लोगों कि कामेच्छा बढाने में कामयाब रहे हैं, तो वहीं विशेषज्ञों कि मानें तो अधिकतर भारतीयों को सेक्स कि सही विधि भी ज्ञात नही है, दिल्ली में अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान ( एम्स ), शादी के लिए तैयार युवक युवतियों को सेक्स का क्रेश कोर्स करवा रही है जिसका नाम है प्री मैरिज कोर्स फॉर हैप्पी मैरिड लाइफ, अब यहाँ स्कूलों में सेक्स शिक्षा पर बहस एक बार फ़िर छिड गई है, विशेषज्ञ मानते हैं कि आज के समय में नौजवानों को एड्स जैसी बीमारियों से बचाने और जटिल होती सेक्स समस्यों से निपटने के लिए ये अति आवश्यक है, वहीं बाबा रामदेव सरीखा एक समूह इसे भारतीय परिपेक्ष में सही नही मानता, कुछ लोग कक्षा और उम्र कि किस पायदान पर ये चर्चा हो इस पर मतभेद रखते हैं तो कुछ लोग कामसूत्र जैसी भारतीय सेक्स ज्ञान पुस्तक को पाठ्यक्रम में शामिल करने की वकालत करते हैं. अब मुद्दा आपके सामने हैं खुल कर अपने विचार रखें, हो सकता है इस सार्थक बहस से हम कुछ बेहतर परिणाम निकल पायें -<br />सवाल है, <br />१. क्या स्कूलों में यौन शिक्षा दी जानी चाहिए?<br />२. यदि नही, तो क्यों?<br />३. यदि हाँ तो किस कक्षा से इसकी शुरुवात हो?<br />कहिये खुलकर, क्या है आपकी राय - <br /><br />निवेदक -<br />नियंत्रक, देखा सुनाDeep Jagdeephttp://www.blogger.com/profile/14695925764627099199noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-1166737766734924255.post-4832030564179020872008-06-07T23:28:00.000-07:002008-06-07T23:57:31.176-07:00कायम रहेगा 'सरकार' का 'राज'<strong>रेटिंग ****</strong><br />-----------------------------------------------------------------------------------------<br /><br /><br />राम गोपाल वर्मा आग के दर्द को भुला सकते हैं, क्योंकि सरकार राज उस धुएं को उड़ा सकता है। 'सरकार' की 'सरकार राज' से तुलना होना स्वभाविक है और होनी भी चाहिए। <br /><a href="http://bp0.blogger.com/_90nC-GzpqT0/SEt-hCFr09I/AAAAAAAABLg/9VwoYZceHBE/s1600-h/still1.jpg"><img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp0.blogger.com/_90nC-GzpqT0/SEt-hCFr09I/AAAAAAAABLg/9VwoYZceHBE/s320/still1.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5209396499945608146" /></a><blockquote><strong>स्टार कास्ट</strong><br />अमिताभ बच्चन<br />अभिषेक बच्चन<br />एश्वर्या राय<br />तनिशा मुखर्जी<br />गोविंद नामदेव<br />रवि काले<br /><strong>डायरेक्टर</strong><br />राम गोपाल वर्मा<br /><strong>शूटिंग लोकेशन</strong><br />हैदराबाद</blockquote><br /><br />रामू ने सरकार राज को सरकार की तरह सॉलिड बनाने की कोशिश की है और काफी हद तक कामयाब भी रहे हैं। फिल्म की कहानी महाराष्ट्र की राजनीति पर केंद्र्ति है। अन्य राज्यों के दर्शक पहले से महाराष्ट्र के राजनैतिक ड्रामे की खबरों से दुखी हैं, उन्हें जरूर ये बात अखर सकती है। सरकार की कहानी सरकार और उसके विरोधियों के इर्द गिर्द घूमती थी, जबकि सरकार राज की कहानी उसकी सत्ता हथियाने की है। उसके लिए की गई साजिश ही कहानी का केंद्र बिंदू है, लेकिन अंत तक दर्शक को ये बात पता ही नहीं चलती और न ही फिल्मकार ने बताई है। ये राज क्लाइमैक्स में जाकर खुलता है, जब शंकर द्वारा दुशमनों को खत्म करने के बाद अचानक एक दिन कोई उसे मरवा देता है। फिर सरकार अपनी राजनीतिक सोच और ताकत का प्रयोग करते हुए असलियत का पता लगाता है, जो दर्शकों को चौंकाने के लिए काफी है। सरकार राज की कहानी सरकार की सत्ता प्राप्ती के साथ ही राजनीति सहित ताकत के हर क्षेत्र में परिवारवाद के सत्य को उजागर करती है। मूवी का सबसे दमदार पक्ष है इसका बैकग्राउंड स्कोर, जो हर सीन में दर्शकों की आंखें स्पाट खोल देता है। दरअसल पहली फिल्म में रामू ने सरकार की ताकत और उसके उसूलों के साथ खड़ा किया है, जबकि सरकार राज में वह नए दौर और पीढ़ी के मुताबिक समझौते करते नजर आते हैं। पहले जहां दुनिया में उनके फैसले को इंकार करने की हिम्मत खुद उनका बेटा भी नहीं दिखा सकता और ये हिमाकत करने पर अपने सगे भाई को भी मार देता है। <br />वहीं दूसरी में सरकार के पोते को सरकार के गिफ्ट ही पसंद नहीं आते खैर ये कहानी का हिस्सा है। सरकार राज में पूरी ताकत शंकर (अभिषेक) के हाथ में है और वह कोई बड़ा फैसला लेने के लिए सरकार (अमिताभ बच्चन) से बस सलाह मात्र करता है। 5 गांव के 40 हजार लोगों को विस्थापित कर बिजली प्रोजेक्ट लगाने का प्रस्ताव लेकर अनिता (ऐश्वर्या रॉय) सरकार के पास पहुंचती है, जो वो रिजेक्ट कर देता है, लेकिन शंकर इसे अपने राज्य के विकास के लिए अहम मानकर उन्हें मना लेता है। दूसरी कड़ी में सरकार के गॉडफादर राओ साहब से भी मुलाकात होती है, जिनका क्रांतिकारी पोता भी सरकार की सत्ता को चुनौती देता है। रामू की डार्क शेड फिल्म दर्शक को बांधे रखती है। बिग बी और अभि दोनों ही एक्टिंग के मामले में एक-दूसरे के सिर चढ़ कर बोलते हैं। ऐश का किरदार एक बिजनेस विमन है, जो दिग्गजों की राजनीति में पिस सा गया है। फिर भी जितने दृश्य उनके हिस्से आए है, उनको उन्होंने पूरी जिम्मेदारी से निभाया है। खास कर आखिरी सीन तक आपको इंतजार करना होगा। ऐश्वर्य राय पूरी फिल्म में एक असहाय बिजनेस वुमन बनी रहती हैं, जो सरकार और राजनीति के अखाड़ को देखकर हैरान होती रहती हैं। इसी बीच शंकर और अनिता के बीच प्रेम भी पनपता है, जो उसे क्लाइमेक्स पर ताकतवर बना देती है। चंद्र के किरदार में रवि काले ने बेहतरीन एक्टिंग की है, जिसे समिक्षकों ने पूरी तरह नजरअंदाज किया है। पहले हाफ में कहानी तेजी से बनती है, लेकिन दूसरे हाफ में रफ्तार कुछ धीमी है और ये कहानी की मजबूरी लगती है। दूसरी बात ये कि कहानी खुद-ब-खुद आगे बढ़ाने की बजाए रामू ने अमिताभ के मुंह से सारे राज खुलवाए हैं। चोट खाए शेर की मानिंद अंत में अमिताभ काफी प्रभावित करते हैं। पूरी फिल्म में साजिश रच रहे सभी विलेन तो मोहरा मात्र हैं, सच्चाई तो अंत में ही सामने आती है। फिल्म का क्लाइमेक्स आपको पिछली फिल्म सा लगेगा, लेकिन है बिल्कुल सिर पर पहाड़ टूटने जैसा। खास बात ये है कि आरजीवी ने सरकार राज की कहानी को सशक्त बनाने के साथ ही इस कड़ी की तीसरी फिल्म का प्लाट तैयार करने पर भी भरपूर मेहनत की है, जो फिल्म में सपष्ट नजर आती है। थिएटर से बाहर निकलते हुए, दर्शक इसी बात पर चर्चा करते नजर आते हैं। राजनीति में सक्रिय भूमिका न निभा कर भी किस तरह किंगमेकरों का किंगमेकर अपनी 'सरकार' चलाता है। ये देखने के लिए आपको सरकार राज देख लेनी चाहिए। हां पहली शर्त ये है कि आपने पहले सरकार देखी हो<br />-----------------------------------------------------------------------------------------<br /><strong>रेटिंग चिन्ह---*पैसा बर्बाद/ **बस ठीक ठाक है/ *** पैसा वसूल/ ****जरूर देखें/ ****बेहतरीन</strong>Deep Jagdeephttp://www.blogger.com/profile/14695925764627099199noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-1166737766734924255.post-44902319817792669862008-05-26T11:24:00.000-07:002008-05-26T13:02:10.138-07:00दिल की बात-देखा सुना फोरमसभी ब्लागर बंधुओं का आभारी हूं, जिन्होंने देखा सुना को लगातार सहयोग देकर हमें बेहतर काम करने का प्रोत्साहन दिया। देखा सुना को आपकी उम्मीदों पर खरा उतारने की हम भरपूर कोशिश कर रहें हैं। दोस्तो देखा सुना में हम अपने इर्द गिर्द देखी सुनी चीजों को अपने अहसासों के साथ बयान करने की कोशिश करते हैं। लगातार आपके सुझावों से इसे बेहतर बनाने की भी कोशिश जारी है। कुछ दिन पहले अंकित माथुर जी ने सुझाव दिया कि देखा सुना पर हम एक फोरम शुरू करें जिस पर लोग अपनी मर्जी के विचार दे सकें। उन्होंने एक तरीका भी सुझाया सो उस तरीके को प्रयोग करने की कोशिश कर रहा हूं।<br /><br /> उसी कड़ी में हम देखा सुना फोरम की शुरूआत कर रहे हैं। हम किसी भी टॉपिक से फोरम की शुरूआत करने की बजाए आप सभी से अनुरोध कर रहे हैं कि आप ही बताएं कि किन किन विषयों पर चर्चा की जाए। अपने पसंदीदा विषय सुझांए। हम आपकी पसंद पर आधारित विचार चर्चा शुरू कर खुशी महसूस करेंगे।<br /><br />उदाहरण के तौर पर ये विषय देखें<br />क्या ब्लागिंग में एक दूसरे पर छींटाकशी वाजिब है<br />अगर आपको ये विषय उचित लगे तो अपने विचार भेंजे।<br /><br />इस फोरम को प्रयोग करना बिल्कुल आसान है। बस आपको देखा सुना मे सबसे उपर नजर आ रहे <br /><br /><a href="http://bp0.blogger.com/_90nC-GzpqT0/SDsKE_d4M4I/AAAAAAAABAs/ET12vGSxOOo/s1600-h/forum.gif"><img style="float:center; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp0.blogger.com/_90nC-GzpqT0/SDsKE_d4M4I/AAAAAAAABAs/ET12vGSxOOo/s320/forum.gif" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5204764875229246338" /></a><br /><br /><!-- Start Bravenet.com Service Code --><br /><div align="center"><br /><a href="http://pub22.bravenet.com/forum/1857106297"><br /><img src="http://assets.bravenet.com/cp/forum.gif" border="0" title="Free Message Forum from Bravenet.com" alt="Free Message Forum from Bravenet.com" /></a>&nbsp;<a href="http://www.bravenet.com"><img src="http://assets.bravenet.com/cp/bn-forum.gif" border="0" title="Free Message Forums from Bravenet.com" alt="Free Message Forums from Bravenet.com" /></a><br /></div><br /><!-- End Bravenet.com Service Code --> के Enter My Forum बटन पर क्लिक करना है। उसके बाद आपके सामने फोरम पेज खुल जाएगा। (नीचे फोटो देखें)<br /><a href="http://bp1.blogger.com/_90nC-GzpqT0/SDsKFPd4M5I/AAAAAAAABA0/i9dXG4ImnOY/s1600-h/forum1.gif"><img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp1.blogger.com/_90nC-GzpqT0/SDsKFPd4M5I/AAAAAAAABA0/i9dXG4ImnOY/s320/forum1.gif" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5204764879524213650" /></a><br />आपकी बात नामक इस फोरम में विषयों की एक सूची नजर आएगी। आप उन में से किसी विषय को चुनने के लिए उस पर क्लिक कर सकते हैं। उदाहरण में स्वागतम को चुना गया है। (फोटो देखें) विषय चुनने पर ऐसा पेज खुलेगा। <br /><a href="http://bp2.blogger.com/_90nC-GzpqT0/SDsKFfd4M6I/AAAAAAAABA8/lBAIeidAovw/s1600-h/forum2.gif"><img style="float:right; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp2.blogger.com/_90nC-GzpqT0/SDsKFfd4M6I/AAAAAAAABA8/lBAIeidAovw/s320/forum2.gif" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5204764883819180962" /></a><br />उस पर अपने विचार व्यक्त करने के लिए Reply पर क्लिक करें फार्म में अपनी जानकारी और संदेश भरकर मैसेज पोस्ट करें। <br />अगर आप सूची में शामिल विषय के अलावा किसी अन्य विषय पर चर्चा करना चाहते हैं, तो Post पर क्लिक करें <br /><a href="http://bp3.blogger.com/_90nC-GzpqT0/SDsKFvd4M7I/AAAAAAAABBE/wbv2tjIogS8/s1600-h/forum3.gif"><img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp3.blogger.com/_90nC-GzpqT0/SDsKFvd4M7I/AAAAAAAABBE/wbv2tjIogS8/s320/forum3.gif" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5204764888114148274" /></a><br />और अपना विषय और उस पर अपने प्रारंभिक विचार दें। सूची मे आपका विषय भी शामिल हो जाएगा। दूसरे पाठक आपके विचारों के बारे में क्या राए रखते हैं, लगातार <a href="http://dekhasuna.blogspot.com/">देखा सुना</a> फोरम पर आकर देखते रहें।Deep Jagdeephttp://www.blogger.com/profile/14695925764627099199noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-1166737766734924255.post-24857707771361477152008-05-22T03:36:00.000-07:002008-05-22T03:46:24.989-07:00सच्चाई की तस्वीर दिखाती जन्नतमौजूदा मसाला फिल्मों के दौर में फिल्मकारों की मजबूरी बन गई है कि उन्हें एक अच्छे मैसेज को ग्लैमर की चाश्नी में डूबो कर पेश करना पड़ता है, महेश भट्ट की जन्नत भी इसी का नमूना है।ये क्रिकेट की ही नहीं प्यार और पैसे की कहानी है। आज के हर युवा की चाहत है पैसा, गाड़ी, खूबसूरत घर और मनचाहा महबूब, लेकिन इन सब को हासिल करने के लिए वो कैसे हथकंडे अपना रहे हैं, महेश भट्ट ने युवा पीढ़ी के इस अंदाज से जुड़ी भावनाओं को बखूबी पड़ा है। फिल्म की शुरुआत में अखबारों की सुर्खियों बनी वो खबर याद आती है, जिसमें एक युवक ने अपने गर्लफ्रैंड को खुश करने के लिए लग्जरी कार चोरी करने के जुर्म में जेल की हवा खाई थी। फिल्म ऐसे ही एक युवक अर्जुन (इमरान हाशमी) की कहानी है, जो अपने पिता के असूलों की बजाए क्विक मनी में यकीन रखता है, जुए में हार के बाद जब अर्जुन क्रिकेट मैच बुकी के रुप में सफल होता है, तो फिर पैसे और सफलता का जुनून ऐसा चढ़ता है, कि अपनी मोहब्बत जोया (सोनल चौहान) को भी नजरअंदाज करने लगता है। फिल्म की शुरुआत में नवोदित डायरेक्टर कुनाल देशमुख ने गर्लफ्रैंड की खुशी के लिए गैरकानूनी कामों में उतरने की घटनाओं को कहानी में बखूबी पिरोया है। सोनम के पास पहले हाफ में करने के लिए कुछ नहीं है। लेकिन सेकेंड हाफ के कुछ सीन्स में वह प्रभाव छोड़ती नजर आई। समीर कोचर भी अपने किरदार को दमदार निभा गए हैं, लेकिन फिल्म की यूएसपी सिर्फ इमरान हाशमी हैं। महेश भट्ट कैंप की पैदावार इमरान ने एक बार फिर उन पर गर्व करने का मौका दिया है। फिल्म के हर फ्रेम में उनके अलग अलग शेड्स देखने को मिलते हैं और प्रभावित करते हैं। इमरान अपने सपनों का पीछा करते हुए जुएबाज से सट्टेबाज और फिर मैच फिक्सर बन जाता हैं। केपटाउन पहुंचकर वह आतंकवादी गुट के सरगना जावेद शेख भाई के चंगुल में फंस जाता है। फिल्म का क्लाइमेक्स आप पर पहाड़ की तरह टूट सकता है, जो कहानी का सबसे जबरदस्त पहलू है। कहानी का अंत हो सकता है कुछ लोगों को पसंद न आए, लेकिन ये एक सकारात्मक संदेश देता है। विलेन के कैरेक्टर में जावेद शेख भी जंचे हैं। राजू सिंह का बैकग्राउंड स्कोर खास कर दूसरे हाफ में चेस सीन में काफी रोमांचक है। प्रीतम और कामरान अहमद का म्यूजिक भी ठीक है। भट्ट ने एक बार फिर पाकिस्तानी गाने का प्रयोग किया है। खैर इस मसाला मूवी में लपेट के दिए संदेश की खातिर इस एंटरटेनिंग मूवी को आप एक बार देख ही सकते हैं।Deep Jagdeephttp://www.blogger.com/profile/14695925764627099199noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-1166737766734924255.post-31815405772451641102008-05-16T11:36:00.000-07:002008-05-16T11:41:20.853-07:00मजेदार है भूतनाथ से फ्रेंडशिपतारे जमीन के बाद बाक्स आफिस पर एकबार फिर परिवार खास कर बच्चों के देखने लायक फिल्म आई है। भूतनाथ आधुनिकता के दौर में पेरेंट्स और बच्चों में खत्म होती संवेदनाओं के साथ ही नि:स्वार्थ प्यार की कहानी बयान करती है। आपको अब नन्हें हीरोज का दबदबा मानने की आदत डालनी होगी। बीग बी को शाहरूख टक्कर दे सकते हैं या नहीं बाद की बात है लेकिन नन्हां अमन ये दम रखता है। ऐ चार फुट दो इंच के बदले ऐ छह फुट 2 इंच का डायलॉग अमिताभ की डॉयलॉग डिलवरी की हाइट पर जाकर बोलने के साथ ही अमन ने ये साबित कर दिया है। पूरी फिल्म दोनों के कंधों पर है और दोनों ने ही इस जिम्मेदारी को बखूबी निभाया है। दोनों एक दूसरे को पूरी तरह कम्पलीमेंट करते नजर आते हैं। एंट्री में भद्दे भूत के रूप में भी अमिताभ काफी डिसेंट लगे हैं। कहानी एक परिवार की है, जिसमें पापा शाहरुख ट्रांसफर के बाद गोआ पहुंचते हैं, जो जॉब के सिलसिले में खुद तो चले जाते हैं और नया घर संभालना होता है मम्मी जूही चावला और नन्हें बंकू यानि अमन सिद्दीकी को। उनकी मुश्किलें और बढ़ जाती हैं जब पता चलता है कि खूबसूरत घर पर डरावने भूत का कब्जा है। लेकिन नन्हां बंकू मम्मी के कहे मुताबिक भूत नहीं सिर्फ ऐंजल को जानता है। बस फिर वो डरने की बजाए उसको चैंलेज करता है और दोस्त बना लेते हैं। बच्चे आराम से फिल्म देख सकते हैं, क्यों कि भूतनाथ भाई भी इमोशनल हैं और बच्चों के प्यार से मोहित हो जाते हैं। अरे जनाब बिग बी सूटेड बूटेड भूत जो ठहरे। उनके भूत बनने की पीछे कहानी भी आज के समाज की तस्वीर को पेश करती है, जिसमें बच्चे बेहतर करियर के लिए पेरेंट्स की परवाह किए बगैर विदेश चले जाते हैं और उन्हें भूल जाते हैं। शाहरुख खान की 20 मिनट की मेहमान भूमिका के साथ ही प्रियाशंू भी दूयरे हाफ में ठीक लगे हैं। जूही चावला भी केयरिंग मां के किरदार को निभा गई हैं और बच्चे सतीश शाह को पंसद करेंगे। राजपाल यादव को वेस्ट किया गया है। नए डायरेक्टर विवेक शर्मा कहानी को संभालने में सफल हुए हैं। खास बात ये कि आजकल के जो बच्चे सफलता के लिए शॉट कट या मैजिक का सहारा चाहते हैं, भूतनाथ उन्हें अपनी जंग हिम्मत से लडऩे की सलाह देते हैं। तो बच्चो भूतनाथ से दोस्ती करनी है, तो आप मम्मी-पापा को मना ही लो। वैसे फिल्म को ओपनिंग एवरेज रही। अगर फिल्म कहीं जून की छुट्टियों में रिलीज होती तो बाक्स आफिस की तस्वीर अलग होती। म्यूजिक जरूर निराश करता है, लेकिन आखिर का गाना सुनने लायक है।Deep Jagdeephttp://www.blogger.com/profile/14695925764627099199noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-1166737766734924255.post-19374146711650528682008-05-02T23:54:00.000-07:002008-05-16T11:44:33.256-07:00वादियों में गूंजते किसी गाँव के मातम में 'शौर्य' क्या है?<a href="http://bp3.blogger.com/_WblAxHQl62A/SBwNleIoCdI/AAAAAAAAAHc/hibuEyNO6y0/s1600-h/shaurya-wallpaper-99335-1024768.jpg"><img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5196043007474272722" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; CURSOR: hand" alt="" src="http://bp3.blogger.com/_WblAxHQl62A/SBwNleIoCdI/AAAAAAAAAHc/hibuEyNO6y0/s320/shaurya-wallpaper-99335-1024768.jpg" border="0" /></a><br /><div>“ शौर्य किसी को मार गिराने को नहीं कहते, शौर्य किसी को सलामी देने को नहीं कहते। शौर्य तो हमारे बहुत अन्दर होता है, एक हौसला, एक हिम्मत....”<br />’शौर्य’ भारत की चुनिंदा सच्ची फ़िल्मों में से एक है। उस दौर में, जब असाधारण गति से आगे बढ़ने के साथ अभिव्यक्ति की आज़ादी छीनने की और भी तेज कोशिश हो रही है, शौर्य नीम के पत्तों जितना कड़वा सच कहती है। यह सच काला है और कुछ लोगों का आरोप है कि इस तरह की फ़िल्मों से भारतीय सेना का मनोबल टूट सकता है, लेकिन यह आरोप लोकतंत्र को न समझने वाले लोगों का है और उनके जितना ही खोखला है।<br />के. के. मेनन ने जीवन भर याद रखे जाने लायक अभिनय किया है। अंत में कोर्टड्रामा के एक लम्बे दृश्य में वे अपने दौर के, अपने आस पास के सब अभिनेताओं और सुपर स्टारों से मीलों आगे निकल गए हैं। उसी दृश्य का एक बहुत अच्छा संवाद है-<br />...सच ये है कि सात हज़ार फीट ऊपर मैं हड्डियाँ गलाता हूं, इसलिए तुम्हें सहूलियत मिलती है बुद्धिजीवी होने की...संवेदनशील होने की...डिस्को जाने की...त्योहार मनाने की...जीने की...<br />पत्रकार से फ़िल्म निर्देशक बने समर खान इससे पहले ‘कुछ मीठा हो जाए’ बना चुके हैं। इस बार इन्होंने हमारी फ़िल्मों और समाज में बनी हुई भारतीय सेना की परंपरागत छवि तोड़ी है। हम पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में किए जा रहे अत्याचारों का रोना रोते रहते हैं, लेकिन कभी इस पर बात नहीं करते कि हमारी अपनी सेना कश्मीर में क्या कर रही है? फ़िल्म किसी का पक्ष नहीं लेती, न ही फौज को गाली देती है। केवल फौज में घुस आए कुछ भेड़ियों के खिलाफ़ आवाज़ उठाती है, वो भी सभ्य तरीके से।<br />कहानी का मूल कथ्य अंग्रेज़ी की a few good men से प्रेरित है, लेकिन फिर भी बहुत मेहनत की गई है और फ़िल्म के पास अपना बहुत कुछ मौलिक है।<br />अदनाम सामी का संगीत ठीक है, सुकून देने वाला है। जावेद अख़्तर अपने आधे से ज्यादा गाने केवल लिखने के लिए लिखने लगे हैं। कमाया हुआ नाम डुबोने से बेहतर है कि थोड़ा विराम ले लिया जाए।<br />राहुल बोस ठीक लगे हैं, लेकिन क़े के की प्रतिभा के सामने बाकी सब दब गए हैं। राहुल और मिनिषा हिन्दी में उतने सहज नहीं लगते, जितना एक अभिनेता को होना चाहिए। दोनों ही हिन्दी के कई शब्द अंग्रेज़ी ढंग से बोलते हैं। मिनिषा लाम्बा ख़ूबसूरत हैं, लेकिन इसी तरह का किरदार ‘लक्ष्य’ में प्रीति जिंटा उनसे बहुत बेहतर ढंग से कर चुकी हैं।<br />जावेद ज़ाफरी ने शायद अपने जीवन का सबसे बेहतर अभिनय किया है। ऐसा लगता है कि उन्हें उनके लायक फ़िल्में कभी मिल ही नहीं पाई। सीमा बिस्वास छोटे से रोल में भी अपने हिस्से का काम बखूबी कर जाती हैं। अमृता राव एक चौंकाने वाले सुखद तोहफ़े की तरह हैं।<br />ओंकारा का रज्जू सबको याद होगा। दुबले पतले से असाधारण अभिनेता दीपक डोबरियाल केन्द्रीय किरदार में ज्यादा समय खामोश ही रहे हैं, लेकिन उनकी खामोशी बार बार अलग अलग तरीके से अपनी बात कहती रहती है। जब वे कहते हैं कि- “...एक और सच से आपको वाक़िफ़ करा दूं। मेरा नाम जावेद ख़ान है...और मैं अपने होने की सजा भुगत रहा हूं..”, तो हमारे पूरे समाज को बहुत मन्द स्वर से ही नंगा कर देते हैं।<br />सब आतंकवादी मुसलमान ही क्यों होते हैं....इन सबको गोली मार देनी चाहिए...सबको पाकिस्तान में भेज दो.... – इस तरह की बेसिरपैर की बातें करने वाले सरफिरे लोगों को ‘शौर्य’ जाते जाते जवाब दे जाती है- “...यही सॉल्यूशन है तो फिर तो उस कौम को भी खत्म कर देना चाहिए, जिसने महात्मा गाँधी को मारा, जिसने मार्टिन लूथर किंग को मारा...”<br />शौर्य भारत के मुसलमान की, भारत के फौजी की और भारत के लोकतंत्र की सच्ची कहानी है।<br /><a href="http://chavannichap.blogspot.com/2008/03/blog-post_10.html">‘शौर्य क्या है’</a>, जयदीप सरकार की यह उम्दा कविता फ़िल्म के आखिर में शाहरुख ख़ान की आवाज़ में आती है और फ़िल्म का सार बता जाती है।<br />मरती मारती इस दुनिया में निहत्थे डटे रहने की हिम्मत, शौर्य है...<br />‘शौर्य’ जरूर देखे जाने लायक है।<br /></div>गौरव सोलंकीnoreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-1166737766734924255.post-55224439805081593172008-04-25T10:31:00.000-07:002008-04-25T10:53:31.323-07:00ये कैसी 'टशन'<a href="http://bp3.blogger.com/_90nC-GzpqT0/SBIYRzv0nbI/AAAAAAAAAVk/u50Uorwax6o/s1600-h/13446.jpg"><img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp3.blogger.com/_90nC-GzpqT0/SBIYRzv0nbI/AAAAAAAAAVk/u50Uorwax6o/s320/13446.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5193240014539234738" /></a><br />साल की चिर प्रतिक्षित फिल्म के लिए अगर ये कहें कि 'खोदा पहाड़ और निकली चुहिया' तो गल्त न होगा। भोजपुरिया डॉन से बदला लेने निकली उसके पूर्व बॉस की बेटी की कहानी 70 के दशक की फिल्मों की याद करवाती है। बेमतलब का एक्शन और ढांय ढांय कहानी में जान नहीं डाल पाती। बचपन की मोहब्बत की कहानी (करीना-अक्षय कुमार) और डॉन की गैंग में घुस कर उसके 25 करोड़ रुपए उड़ाकर बदला लेना अब लोगों को नहीं पचता। पहले हाफ में तो लोग कहानी की तलाश में सिर पकड़ लेते हैं। कॉल सेंटर में काम करने वाला और इंगलिश टीचर सैफ अली खान अपनी शुरूआती फिल्मों की तरह आशिक मिज़ाज है, जो हर रोज़ नई गर्ल फ्रेंड की तलाश में रहता है। (काश डायरेक्टर साहब ने उनकी ऐसी पुरानी फिल्मों का हश्र ध्यान में रखा होता) एक दिन उनकी मुलाकात भोली भाली सीधी सादी करीना से होती है। करीना के चक्कर में फंस सैफ, डॉन 'भैया जी' यानि अनिल कपूर को अंग्रेजी सिखाने पहुंचता है। अदाओं को प्यार समझ धोखे के जाल में फंस कर सैफ करीना संग मिलके डॉन के 25 करोड़ उड़ा लेता है। लेकिन भई आज के ज़माने की हिरोईन और डॉन की पीए क्या सचमुच भोली भाली होगी? सो वो पैसे लेकर रफू चक्कर और अपने सैफ मियां बलि के बकरे बन जाते हैं। तभी एंट्री होती है जनाब बच्चन पांडे (अक्षय कुमार) की जो भैया जी के भक्त हैं और उनके नक्शे कदम पर चलते हुए डॉनगिरी में नाम कमाना चाहते हैं। न जाने हमारे फिल्मकारों को क्या हो गया है। यही जताने पर तुले हैं, आज कल के युवाओं के रोल मॉडल बस गुंडे ही हैं। कुछ हफ्ते पहले रिलीज हुई वन टू थ्री में तुषार का किरदार भी कुछ ऐसा ही था। खैर अब सैफ बच्चन की कस्टडी में है और करीना को ढूंढ कर लाने पर ही उसकी जान बख्शी जा सकती है। अक्षय कुमार पहले हाफ के मध्य में एंट्री के बाद फिल्म को पूरी तरह अपने कंधों पर उठा लेते, लेकिन बिना कहानी के हीरो फिल्म में जान नहीं डाल सकता। एक्शन के अलावा करीना को शादी के लिए प्रपोज करने की सलाह सैफ से लेने वाले सीन में अक्षय की एक्टिंग बेहद शानदार है। अनिल कपूर के भोजपुरी स्टाइल में हिंगलिश बोलना अखरता है। डायलाग समझने के लिए लोगों को काफी मशक्कत करनी पड़ेगी। दीवार के अमिताभ का इंगलिश स्टाइल कॉपी करने के चक्कर में वह अपने कैरेक्टर को बर्बाद कर गए, लेकिन एक्टिंग के मामले में उनका कोई सानी नहीं। करीना भी अपने रोल में सटीक बैठी हैं। <a href="http://bp0.blogger.com/_90nC-GzpqT0/SBIX9Dv0naI/AAAAAAAAAVc/rJ_cLEWtNzA/s1600-h/still2.jpg"><img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp0.blogger.com/_90nC-GzpqT0/SBIX9Dv0naI/AAAAAAAAAVc/rJ_cLEWtNzA/s320/still2.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5193239658056949154" /></a><br />खास कर उनका सीधी साधी लडक़ी से ग्लैमर डॉल बनते ही समंदर से निकलते हुए 5 सैकेंड का बिकिनी शो, लेकिन बॉक्स आफिस पर ये शो कितनी भीड़ जुटा पाता है कहना मुश्किल है। सैकेंड हाफ में गोलियों की बारिश में अकेले अक्षय का मजे से लडऩा और हाथ पर गोली लगने के बाद अगले ही सीन में वह करीना के बदन पर उसी हाथ को फिरा कर इश्क फरमाते नजर आते हैं और खरोंच एक भी नहीं। डायरेक्टर साहब ने 70 के दशक का प्लाट तो उठा लिया, लेकिन ये भूल गए शायद कि उन दिनों अगर हीरो के गोली गले, तो हीरोईन चाकू गर्म कर उसे निकाल कर पट्टी करती है, ही ही ही।। कानपुर का बच्चन सिंह जो मुश्किल से भोजपुरी अंदाज में हिंदी बोल पाता है, अचानक उर्दू लफ्जों वाले गीत फलक तक ले चल भी... गाने लगता है। वाह! डायरेक्टर साहब। फिल्म से बतौर डायरेक्टर विजय कृष्णा आचार्य बढ़ीया स्टार कास्ट के बावजूद कहानी के मामले में चूक गए। विशाल-शेखर का म्यूजिक भी निराश करता है। पंजाब के उदास गीतों का बादशाह सलीम का गाया टाइटल ट्रैक भी पूरे झमेले में कहीं खोकर रह गया।<br />यश राज से पीवीआर की मुनाफा बंटवारे को लेकर चल रही 'टशन' के चलते पीवीआर सहित कई मल्टीपलैक्स में फिल्म नहीं लग सकी। यश राज बैनर, कहानी को गुप्त रखने के चलते बढ़ी उत्सुकता और आज कल बाक्स आफिस पर छाई हुई स्टार कास्ट भीड़ को पुराने स्टाइल के सिनेमा घरों तक खींच लाने में सफल रहे। जिन मल्टीपलैक्स में टशन लगी है, उन्होंने सारे शोस का हाउस फुल का 'टशन' (बोर्ड) भी टांग दिया पर वीक एंड तक फिल्म की हवा निकल सकती है। गैर भोजपुरी क्षेत्रों में भी फिल्म को नुकसान होगा।Deep Jagdeephttp://www.blogger.com/profile/14695925764627099199noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-1166737766734924255.post-53598115274219360082008-04-18T05:47:00.000-07:002008-04-18T06:22:48.732-07:00साहिल का नजरिया-संगीत<strong><em> <span style="color:#006600;"> classically mild </span></em></strong><br /><strong><em> सोनू निगम एक ऐसा नाम है कि भारतीय संगीत को जानने वाला शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति हो जो इससे अन्जाना हो.इनकी खासियत है कि ये जो भी करें ,चाहें फिल्मों में चलताऊ गाने गायें या कोई गंभीर गाना गायें,या फ़िर अपना अल्बम ही क्यों न निकालें ,हमेशा छाये ही रहते हैं.ऐसा लगता है कि आज की पीढी के वे सबसे अधिक प्रतिभावान गायक हैं,इस सोच को पुख्ता करती है,उनकी हालिया रिलीज अल्बम classically mild,जिसमें इन्होने अपनी शास्त्रीय गायन की क्षमता को जमकर उभारा है ।</em></strong><br /><strong><em> इस अल्बम के गीतकार हैं अजय झीन्गरण,जिन्होंने बेहद अर्थपूर्ण और भावपूर्ण गीत रचे हैं.इस अल्बम में कुल आठ गीत हैं,संगीत दिया है दीपक पंडित ने।</em></strong><br /><strong><em><span class=""> इस अल्बम की विशेष बात आदमी के तरह तरह के मूड्स को प्रतिविम्बित करते राग भैरव,राग खम्माज,राग विहाग और राग पुरिया धनश्री आदि के साथ पाश्चात्य वाद्य यंत्रों की संगत.</span> </em></strong><br /><strong><em> वैसे तो अल्बम के लगभग सभी गीत कर्णप्रिय हैं पर "छलकी-छलकी चाँदनी में गाती है दीवानगी " और "ऐ दिल मत रो..." बेहतरीन हैं।</em></strong><br /><strong><em> </em></strong><br /><strong><em>विशेष- अच्छे संगीत की जरा भी परख हो तो इसे जरुर सुनें।</em></strong><br /><strong><em></em></strong><br /><strong><em> <span style="color:#33ff33;">आलोक सिंह "साहिल "</span></em></strong>nav pravahhttp://www.blogger.com/profile/07273857599206518431noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-1166737766734924255.post-59136936344600486202008-04-14T04:10:00.000-07:002008-04-14T04:21:47.477-07:00साहिल का नजरिया<span style="color:#990000;"> <strong>यू मी और हम</strong> </span><br /><span class=""> पिछले</span> हफ्ते बॉक्स ऑफिस पर घोर ठंडक छाई रही,यद्यपि कि ३ "फिल्में खुदा के लिए","शौर्य" और 'भ्रम" रिलीज हुई थी पर तीनो का हाल बेहद बुरा,थोड़ा संतोष हुआ खुदा के लिए देखकर,वैसे भी इसके पीछे एक पूंछ लगी थी कि ये ४० साल बाद भारत में प्रदर्शित होने वाली कोई पाकिस्तानी फ़िल्म थी,कुछ इसका भी फायदा इस फ़िल्म को मिला फ़िर भी टिकट खिड़की तरस के रह गई,ऐसे में इस हफ्ते बॉक्स ऑफिस पर ज्यादा दबाव था क्योंकि अगले हफ्ते से "आई पी एल" शुरू होने जा रहा है तो इसका असर भी टिकट खिड़की पर पड़ना लाजिमी है,इन सबके बीच रिलीज हुई दो बड़ी फिल्में 'यू मी और हम' तथा 'क्रेजी ४".एक अजय देवगन निर्देशित तो दूसरी राकेश रोशन निर्मित.<br /> अब आगे हम किसी फ़िल्म के बारे में बात करें उसके पहले जरुरी है कुछ मामूली सवालों से गुजरना-<br />१.क्या आप शादीशुदा/किसी के प्यार में हैं?<br />२.क्या आपके रिश्ते में ठंडक आ गई है?<br />३.क्या आप अपने पत्नी/पति/प्रेमी/प्रेमिका के साथ बैठकर कुछ द्विअर्थी संवाद और शोरगुल झेल सकते हैं? <br /> यदि तीनों सवालों के जवाब सकारात्मक हैं तो पेश है,निर्देशक के तौर पर अजय देवगन की पहले पेशकश "यू मी और हम"- <br /> कहानी पेशे से सायकात्रिस्ट डाक्टर अजय की है जो अपने दो दोस्तों और उनकी पत्नियों के साथ छुट्टियाँ मनाने स्टार क्रूज पर जाता है,वहाँ उसकी मुलाकात वेट्रेस का कम कर रही पिया (काजोल) से होती है.अजय पिया को देखते ही उसपर फ़िदा हो जाता है,और उसको पटाने के लिए तरह तरह के उलजलूल प्रयास करता है अंत में दोनों की शादी हो जाती है,इस तरह पहला हाफ ख़त्म. <br /> अजय,पिया की जिंदगी हँसी खुशी चल रही होती है कि अचानक पता चलता है कि पिया को अल्जाईमेर(एक ऐसी बीमारी जिसमे इन्सान धीरे सबकुछ भूल जाता है) है.डाक्टर अजय को सलाह देते हैं कि पिया को केयर सेंटर भेज दो पर अजय राजी नहीं होता बाद में स्थिति इतनी बिगड़ जाती है कि न चाहते हुए भी अजय,पिया को केयर सेंटर भेज देता है.इसी बीच इनका एक बच्चा भी होता है. <br /> पिया से दूर रहने पर अजय को इस बात का अहसास होता है कि उसने पिया को केयर सेंटर भेजकर बहुत बड़ी गलती कर दी,तो क्या हुआ की पिया एक बड़ी बीमारी से ग्रस्त है,उसका हक़ है कि वह अपने पति और बच्चे के साथ रहे.उसको अहसास होता है कि प्यार का मतलब केवल खुशी में ही नहीं बल्कि दुःख में भी साथ निभाना होता है और अजय अंत में पिया को हास्पिटल से घर लेता आता है. <br /> इस फ़िल्म में दो कपल और भी हैं हैं पर उनका काम केवल मेन लीड को उभरना ही रहा. है.<br /> <strong>अदाकारी</strong>- जिस फ़िल्म के दोनों लीड करेक्टर नेशनल अवार्ड विनर हों उसमें अभिनय कि बात ही क्या करना,बाकि कलाकार करण खन्ना,दिव्या दत्ता,सुमित राघवन,आदित्य राजपूत और इशा शर्वानी भी अपना अपना काम कर गए.<br /><br /><strong>संगीत</strong>- विशाल भारद्वाज का संगीत औसत से थोड़ा ठीक और सिचुअशन के अनुकूल है.<br /><br /><strong>निर्देशन-</strong> यद्यपि कि यह अजय का पहला प्रयास था फ़िर भी कहीं भी कच्चापन नहीं दिखा,यदि करण खन्ना और इशा शर्वानी के कुछ गंदे दृश्यों,द्विअर्थी संवादों तथा बेमतलब के शोर गुल से फ़िल्म को बचा ला जाते तो फ़िल्म और बेहतरीन हो गई होती.खैर यह काम काफी हद तक एडिटिंग में आता है.निर्देशन के लिए अजय को १० में ७ अंक दिए जा सकते हैं.<br /><strong>विशेष</strong>- जहाँ तक बात है कि फ़िल्म क्यों देखें क्यों न देखें तो इसके लिए आप उपर दिए गए सवालो का सहारा ले सकते है.<br /><span class=""></span><br /><span style="color:#33cc00;">आलोक सिंह "साहिल"</span>nav pravahhttp://www.blogger.com/profile/07273857599206518431noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-1166737766734924255.post-81339167052964408082008-03-29T01:11:00.000-07:002008-03-29T01:15:17.392-07:00दिमाग का कर डाला वन टू थ्रीइन दिनों कॉमेडी फिल्मों की एक ही रेस्पी बन कर रह गई है। नाम और काम का कन्फयूजन, सेक्स और डबल मीनिंग वन लाइनर और छुपे या खो गए खजाने को ढूंढने की भागदौड़। कॉमेडी फिल्मों के डॉन भी खूंखार नहीं बेवकूफ होते हैं। वन टू थ्री भी इसी रेसिपी की डिश है, जो खाते (देखते) हुए तो स्वाद देती है, लेकिन खत्म होते ही इसका स्वाद भूल जाते हैं। कहानी की शुरूआत डॉन मनोज पाहवा का हीरा गुम होने से शुरू होती है, जो दूसरे पापा डॉन के गुर्गे चुराते हैं। लेकिन उनसे ये हीरा उपेन पटेल और तनीशा चुरा लेते हैं। दोनों पांडी में समीरा रेडृडी के विटेंज कार शोरूम में काम करते हैं और हीरे को उसके पैट्रोल टैंक में छुपा देते हैं। फिर एंट्री होती है पहले लक्षमी नारायण तुषार कपूर जो डॉनगिरी में कॅरियर बनाना चाहता है और भाई से मर्डर की सुपारी लेकर होटल पहुंचता है, तो दूसरा लक्ष्मी नारायण सुनील शेट्टी अपने बॉस के लिए विंटेज कार खरीदने उसी होटल पहुंचता है और तीसरा लक्ष्मी नारायण परेश रावल अपनी दुकान के लिए डिजायनर अंडर गारमेंट खरीदने वहां पहुंचता है। फिर तीनों के काम की चिट्ठियां बदल जाती हैं और शुरू होता है गड़बड़झाला। परेश रावल का बलाऊज देखकर ब्रा का साइज बताने और पीस देखकर उसके मैटीरियल और दुकान का पता बताने वाले डॉयलॉग पूरी फिल्म में छाए रहते हैं, जबकि सुनील शैट्टी की लैफ्ट राइट शुरू में तो गुदगुदाती है, लेकिन बाद में तंग करने लगती है। बतौर डायरेक्टर पारी की शुरुआत कर रहे ऑफिस-ऑफिस सीरियल के लेखक अश्विनी धीर बिखरी हुई कहानियों को तो समेटने में सफल रहे। लेकिन वन लाइनर डबल मीनिंग डॉयलाग हाल से बाहर निकलते ही लोग भूल जाते हैं। कॉमेडी के मामले में तुषार कपूर, समीरा रेड्डी और सुनील शेट्टी वन रहे हैं, तो परेश रावल, ईशा दयोल और मुकेश तिवारी भी टू रहे हैं। उपेन पटेल और तनीशा बेकार साबित हुए हैं, तो नीता चंद्रा ओवर हैं। धीर भी क्लाइमैक्स में गलती कर गए हैं। कार को सिर पर उठाने से पहले सब सुनील शेट्टी के हाथों में गन पकड़ा देते हैं। फिर कार से हीरा लपकने के लिए वह खाली हाथ नजर आता है। हीरा गिरते ही वह सबको गन लौटाते नजर आता है। खैर फिल्म में दिमाग लगाने की जरूरत नहीं है, सवा दो घंटे हंसने के लिए फिल्म एक बार देखी जा सकती है। लेकिन ध्यान रखना परिवार के साथ नहीं दोस्तों के साथ, वरना घर से वन टू थ्री होना पड़ सकता है।Deep Jagdeephttp://www.blogger.com/profile/14695925764627099199noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-1166737766734924255.post-69191588386020536242008-03-28T13:00:00.000-07:002008-03-28T13:20:23.071-07:00प्यार,धोखे और पैसे की 'रेस'<a href="http://bp3.blogger.com/_90nC-GzpqT0/R-1SyboLDII/AAAAAAAAARI/Lf0RPukMnns/s1600-h/13399.jpg"><img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp3.blogger.com/_90nC-GzpqT0/R-1SyboLDII/AAAAAAAAARI/Lf0RPukMnns/s320/13399.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5182889772536499330" /></a><br />रेस कोई भी हो, हर दौडऩे वाला बस जीतना चाहता है। कुछ ऐसी ही रेस है अब्बास-मस्तान की, जिसमें दौड़ रहे हैं सैफ, अक्षय, कैटरीना, बिपाशा, अनिल और समीरा। बाक्स आफिस पर ये रेस कितनी लम्बी चलती है फाइनल तो आने वाले दिनों में होगा, फिलहाल होली की छुट्टी के बावजूद फिल्म की ओपनिंग एवरेज रही।<br /><br />मूवी में जिंदगी की रेस के तीन पहलू हैं, पैसा, धोखा और प्यार, जी हां कहानी में प्यार भी किया जाता है तो धोखा देने के लिए। रेस के असली हीरो सैफ अली खान हैं। चेहरे पर दाड़ी की लुक उन्हें खूब भाई है और उनके किरदार को सूट भी करती है, यही वजह है कि दर्शकों के दिलों पर वह छा जाते हैं। अब्बास मस्तान की जोड़ी खिलाड़ी और बाजीगर के बाद एक , अच्छी ससपेंस थ्रिलर बनाने में सफल हुई हैं। कहानी का केंद्र बिंदु सस्पैंस हैं, जो लोगों को पसंद आया है। म्यूजिक ठीक ठाक है, लेकिन बाकी गानों से ज्यादा लोग अल्हा दुआई है का इंतजार करते हैं और उन्हें इस गाने का डबल डोज मिलता है। एक बार गाना फिल्म में आता है, तो दूसरी बार क्लइमैक्स के बाद। कहानी दो सौतेले भाईयों की है जो डर्बन में स्टड फार्म चलाते हैं और रेस सैफ का पैशन है, लेकिन उसे हैरानी तब होती है जब उसका जान से प्यारा छोटा भाई उसकी जिंदगी की रेस पर फुल स्टॉप लगाना चाहता है। फिर शुरू होती है धोखे की रेस और इस धोखे का हथियार बनता है प्यार। सैफ अपने प्यार बिपाशा को अपने भाई को सौंप देता है, लेकिन ये त्याग नहीं धोखे के राज खोलने के लिए होता है। आखिर कलई खुलती है और धोखे के सूत्रधार कैटरीना और अक्षय, सैफ की जिंदगी की रेस पर फुल स्टाप लगाने की कोशिश करते हैं। खैर फिल्म एक बार देखने लायक तो है। कहीं कहीं फिल्म खिंचती सी लगती है, लेकिन एक नया सस्पेंस कहानी आगे बढ़ाता है। सो अगर सस्पेंस के साथ थ्रिल करने का शौक है, तो हो जाए रेस<br /><br /><strong>नोट: दोस्तो वादे के मुताबिक हर हफ्ते रिलीज होने वाली कुछ खास फिल्मों की समीक्षा देने का प्रयास कर रहा हूं। रेस पिछले हफ्ते रिलीज हुई थी, लेकिन किसी कारण वश लिखने के बावजूद इसका रिव्यू पोस्ट नहीं कर सका। देरी के लिए क्षमा चाहता हूं। कल आपके लिए नई रिलीज हुई फिल्म वन टू थ्री की समीक्षा भी पेश होगी। तब तक मस्त रहें खुश रहें यूं ही सहयोग देते रहें। </strong>Deep Jagdeephttp://www.blogger.com/profile/14695925764627099199noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-1166737766734924255.post-53774169034840646432008-03-27T13:04:00.000-07:002008-03-28T00:55:23.359-07:00और गुरदास मान फफक कर रोने लगे (खास वीडियो)<a href="http://bp2.blogger.com/_90nC-GzpqT0/R-wBHboLDEI/AAAAAAAAAQM/8v8Pj397IXI/s1600-h/gurdas_bobbysandhu.jpg"><img style="float:right; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp2.blogger.com/_90nC-GzpqT0/R-wBHboLDEI/AAAAAAAAAQM/8v8Pj397IXI/s320/gurdas_bobbysandhu.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5182518498383563842" /></a><br />गूरदास मान न सिर्फ पंजाबी गायकी की जीती जागती विरासत हैं, बल्कि पंजाबी गीतकारी के स्तर को कायम रखने में भी उनकी अहम भूमिका है। गुरदास के लिखे गीत कई सामाजिक बुराईयों के खिलाफ मुहिम बन कर खड़े हुए हैं और जो काम बड़े बड़े प्रचारक या नेता नहीं कर सके गुरदास के गीतों ने उन्हें भी कर दिखाया है।<br /><a href="http://bp1.blogger.com/_90nC-GzpqT0/R-wBHLoLDDI/AAAAAAAAAQE/ymhGpMDQwR0/s1600-h/bs_gurdas_maan.jpg"><img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp1.blogger.com/_90nC-GzpqT0/R-wBHLoLDDI/AAAAAAAAAQE/ymhGpMDQwR0/s320/bs_gurdas_maan.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5182518494088596530" /></a><br />बीते साल में उनका एक गीत कुड़िए इतना चर्चित हुआ के लोग इसे सुनकर आज भी भावुक हो जाते हैं। लोग तो छोड़िए खुद इस गीत के लिए गुरदास कितने भावुक हैं, मैंने 2007 की आखिरी शाम को अलविदा कहने के लिए रखे एक लाइव कंसर्ट में अपनी आखों से देखा। लोगों की फरमाइश पर गुरदास अपना सबसे ज्यादा चर्चित गीत 'छल्ला' गाने लगे। हाई स्केल के इस गीत का अभी अलाप ही शुरू किया था कि एक नन्हीं सी बच्ची हाथ में उनकी फोटो लेकर मंच के बिल्कुल सामने आकर खड़ी हो गई। गुरदास ने उसे मंच पर बुलाया और गले से लगा लिया। फिर एकदम से ऊंचे सुर को छोड़ कर निचले सुर पर आते हुए कुड़िए गीत को गाना शुरू किया। जैसे जैसे वो गीत की एक एक पंक्ति गाते गए, उनकी आखें में समंदर का तूफान उछाल पर आता गया। कब आंसूओं की सुनामी उनमें से बहने लगी पता न चला। गीत की आखिरी पंक्तियों पर आते आते वह एक दम नीचे नन्हीं बच्ची के कदमों में लेट गए। मेरे ख्याल से इससे बढ़िया ऑटोग्राफ आज तक किसी फैन को नहीं मिला होगा। फिर गुरदास ने उस बच्ची को उठकर गले लगा लिया। काफी पलों तक हजारों के पंडाल में सन्नाटा छाया रहा। उन्होंने बच्ची के हाथ में पकड़ी अपनी तस्वीर को उसके हाथ सहित अपने हाथ में लेकर ऑटोग्राफ दिया। उसके बाद वह प्रोग्राम को आगे नहीं बढ़ा सके और पैकअप कर दिया। अपनी गायकी के साथ अपनी भावुकता से वह लोगों को भ्रूण हत्या के खिलाफ गहरा संदेश दे गए। आप सब दोस्तों के लिए उस गीत का वीडियो खास तौर पर पेश कर रहा हूं। साथ ही गीत के बोल हिंदी लिपियांतर भी कर रहा हूं। अगर किसी शब्द के बारे में आप पूछना चाहते हैं, तो कमेंट्स में जरूर पूछें। मुझे वर्णन करने में खुशी होगी।<br /><br /><object width="425" height="355"><param value="http://www.youtube.com/v/jZ639wzJU2w" name="movie"/><param value="transparent" name="wmode"/><embed width="425" src="http://www.youtube.com/v/jZ639wzJU2w" wmode="transparent" height="355" type="application/x-shockwave-flash"></embed></object><br /><br />कुड़िए किस्मत थुड़िए तैनू ऐना प्यार देआं<br />अपने हिस्से दी दुनिया मैं तैथों वार देआं<br /><a href="http://bp2.blogger.com/_90nC-GzpqT0/R-yjKboLDGI/AAAAAAAAAQc/o5ttGClgeMA/s1600-h/gurdas.JPG"><img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp2.blogger.com/_90nC-GzpqT0/R-yjKboLDGI/AAAAAAAAAQc/o5ttGClgeMA/s320/gurdas.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5182696670806871138" /></a><br /><br />तू जम्मी तां मापे कहन पराई एं धीए<br />सोहरे घर विच कहन बेगानी जाई एं धीए<br />केहड़े घर दी आखां तैंनू की सत्कार देआं<br />अपने हिस्से दी दुनिया मैं तैथों वार देआं<br /><br />इक धोबी लई सीता मां नू राम विसार गए<br />जुए विच द्रौपदिए तैनू पांडो हार गए<br />जी करदा मैं अपनी किस्मत तैनूं हार देआं<br />अपने हिस्से दी दुनिया मैं तैथों वार देआं<br /><br />सत्त भरा एक मिर्जा बाकी किस्साकारा ने<br />कल्ली साहिबा बुरी बनाती मर्द हजारां ने<br />कवियां दी इस गल्ती नू मैं किवें सुधार देआं<br />अपने हिस्से दी दुनिया मैं तैथों वार देआं<br /><br />मरजाने दे अंदर वसदी कुड़िए जिउंदी रह<br />तू कमली मैं कमला तेरा गीत लिखाउंदी रह<br />सदा सुहागन थीवें तेरी नजर उतार देआं<br />अपने हिस्से दी दुनिया मैं तैथों वार देआंDeep Jagdeephttp://www.blogger.com/profile/14695925764627099199noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-1166737766734924255.post-77595001787134443822008-03-23T11:58:00.000-07:002008-03-27T13:58:36.083-07:00द ग्रेट खली को अंडर टेकर की मात खास वीडियो आपके लिए17 फरवरी 2008 को मौत की रिंग में खली ने कुछ पल बिताए,आखिर अंडरटेकर से उसे हारना पड़ा। पूरी कहानी आपको पता है। बस उस फाइट की वीडियो आप सब दोस्तों के लिए<br /><br /><br /><div><object width="420" height="336"><param name="movie" value="http://www.dailymotion.com/swf/x4f13t&v3=1&related=1"></param><param name="allowFullScreen" value="true"></param><param name="allowScriptAccess" value="always"></param><embed src="http://www.dailymotion.com/swf/x4f13t&v3=1&related=1" type="application/x-shockwave-flash" width="420" height="336" allowFullScreen="true" allowScriptAccess="always"></embed></object><br /><b><a href="http://www.dailymotion.com/video/x4f13t_wwe-no-way-out-2008-hd-part-5_sport">WWE No Way Out 2008 HD Part 5</a></b><br /><i>Uploaded by <a href="http://www.dailymotion.com/wweadz">wweadz</a></i></div>Deep Jagdeephttp://www.blogger.com/profile/14695925764627099199noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-1166737766734924255.post-568036530643641442008-03-14T06:53:00.002-07:002008-03-27T13:59:00.624-07:00साहिल का नजरिया<span class=""> पिछले</span> हफ्तों बड़ी फिल्मो का अभाव रहा,बड़े दिनों बाद एक धमाके डर फ़िल्म आई,जोधा अकबर,तमाम अच्छी बातों के होने के बाद भी भारतीय लोकतंत्र हावी रहा और फ़िल्म को मिलाजुला response ही मिल सका,फ़िर जैसा की हर बड़े बैनर की फ़िल्म के रेलेअसे के बाद होता,बॉक्स ऑफिस पर फिल्मी सन्नाटा,सो फ़िर लंबा इन्तजार करना पड़ा,इन्तजार इसलिए भी करना था की अपने junior showman को अपने अस्तित्व की आखिरी लड़ाई लड़नी थी, खैर जैसे तैसे वो शुक्रवार भी आ ही गया,पहुँचा देखने, फ़िल्म का नाम black n white,निर्देशक -सुभाष घई कलाकार-अनिल कपूर,शेफाली शाह,अनुभव सिन्हा,हबीब तनवीर आदि.. <br /> एकबारगी तो लगा की घई पागल हो गए है,क्या विषय उठा लिए,पर bottom line यह है कि घई के तरकश में बाण अभी बाकी है. <br /> कहानी एक ऐसे लड़के कि है जो गुजरात के दंगों में अपने परिवार को खो चुका होता है,उसके जेहन में बस यही रहता है कि हिंदुस्तान दुश्मन है और मुसलमानों के लिए यहाँ जगह नहीं है,उसका उद्देश्य १५ अगस्त को लाल किला में फिदायीन हमला करना है,जब वो बिस्फोत के १५ दिनों पहले चांदनी चौक पहुँचता है तो यहाँ उसकी मुलाकात होती है जाकिर हुसैन कालेज के प्रफेसर अनिल कपूर और उनकी पत्नी शेफाली शाह से,धीरे धीरे इनके साथ रहते रहते उसे अहसास होता है कि जो रास्ता उसने अख्तियार किया है वो कदापि ग़लत है,जो लोग जिहाद के नाम पर ऐसे हमले करते हैं वो असल में अपना उल्लू सीधा कर रहे होते हैं, <br /> फ़िल्म में आतंकवाद के जड़ को दिखाते हुए यह बताने की कोशिस की गई है की आतंकवाद कोई भौतिक वस्तु या इन्सान नहीं है वरन एक विचार है जिसे वैचारिकता के माध्यम से ही ख़त्म किया जा सकता है. <br /> <strong> अदाकारी</strong>-अनिल,शेफाली बेहतरीन राहे तो थियेटर सम्राट हबीब साहब usp,आज का छोरा अनुभव सिन्हा अपने किरदार के साथ इमानदारी बरतने में सफल रहा, <br /> <strong>संगीत</strong>- बहुत स्तरीय नहीं रहा,पर back ground score औसत रहा cinematography- बेहतरीन,भव्य सेट्स के बरक्स चांदनी चौक की तंग गलियों को यथार्थ रूप में देखना सुखद रहा<br /> <strong>निर्देशन</strong>- बहुत खुशी की बात है की केवल रूमानी सपने बेचने वाले भी अब यथार्थ को जानने लगे हैं, घई के कायल हो गए,१० में से ८ अंक <br /> कुल मिलकर एक ऐसी फिल्म जिसको देखने के अनेक कारन नहीं देखने का सिर्फ एक,लटके झटकों का अभाव <br /><span class=""> <strong> अन्तिम</strong></span><strong> बात</strong>- जरुर देखें <br /><strong> </strong><br /><strong> आलोक सिंह "साहिल"</strong>nav pravahhttp://www.blogger.com/profile/07273857599206518431noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-1166737766734924255.post-26104276519012883372008-03-13T12:22:00.000-07:002008-03-27T13:59:47.341-07:00साहित्य अकादमी के चुनाव अब 13 अप्रैल कोपंजाबी साहित्य अकादमी के 30 मार्च को होने वाले चुनाव अब बैसाखी के दिन 13 अप्रैल को होंगे। दरअसल पंजाब यूनिवर्सिटी चंडीगढ़ 30 मार्च को विश्व पंजाबी कान्फ्रेंस करवा रहा है, जाहिर है दुनिया भर के पंजाबी विद्वान इसमें जुटेंगे। इस लिए सबने मिल कर सलाह दी कि चुनाव तो बाद में भी हो सकते हैं और सभी ने कान्फ्रेंस में शामिल होने के लिए इस फैसले को मंजूरी दे दी। देखा जाए तो इससे चुनाव लड़ने वालों को फायदा ही होगा। अगर उसी दिन चुनाव होते तो उम्मीदवारों को वोटर साहित्यकारों के लाले पड़ जाते। दूसरा अब उन्हें गोटियां फिट करने का ज्यादा समय भी मिल गया। खैर अब नामाकंण वापिस लेने कh आखिरी तारीख 23 मार्च है और चुनाव 13 अप्रैल।Deep Jagdeephttp://www.blogger.com/profile/14695925764627099199noreply@blogger.comtag