tag:blogger.com,1999:blog-114703542008-05-07T01:27:44.529-06:00मानसीManoshihttp://www.blogger.com/profile/13192804315253355418noreply@blogger.comBlogger94125tag:blogger.com,1999:blog-11470354.post-83098504828508049402008-04-18T20:26:00.003-06:002008-04-19T07:10:58.001-06:00प्रिय चलो हम बिछड़ जाते हैं<span style="font-size:130%;">प्रिय चलो हम बिछड़ जाते हैं...<br /><br />प्रिय चलो हम बिछड़ जाते हैं<br />बरसों बाद तुम्हारी आँखों के<br />कोरों में चुपचाप मिलूँगी<br />बिन चाहे उस अथाह सागर से<br />पानी बन झर झरना झरूँगी<br />बन लाली हर शाम रँगूंगी<br />रात को सपना बन के सजूँगी<br />प्रिय चलो हम बिछड़ जाते हैं।<br /><br />सदियों बाद अपनी उंगली से<br />लिपटा कभी इक पल पाओगे<br />जिस पल तुम्हारी उंगली को<br />मैंने धीरे से चिमटा था<br />अपने हाथों में पढ़ लोगे<br />उन बंधन के स्मृति चिह्नों को<br />संग बाँध के उन स्मृतियों को<br />हाथ थाम कर साथ चलूँगी<br />प्रिय चलो हम बिछड़ जाते हैं।<br /><br />बहुत दिनों के बाद कभी तुम<br />इसी रा्ह पर चलते होगे<br />पतझड़ होगा, तेज़ हवा में<br />सूखे पत्ते गिरते होंगे<br />मेरे नाम का भी कोई पत्ता<br />तुम्हारी बाँह में आ गिरेगा<br />मेरी खुश्बू को जान तो लोगे<br />मैं खुश्बू बन संग रहूँगी<br />प्रिय चलो हम बिछड़ जाते हैं।<br /><br />कई सालों के बाद कभी तुम<br />आधे चांद को ढूँढते होगे<br />आधा चाँद पूरे होने की<br />रातें रातें गिनते होगे<br />और कोई तारा अचानक ही<br />आसमान से टूट गिरेगा<br />मेरे छोटे से सपनों के<br />आंगन में वो आ जुड़ेगा</span><br /><span style="font-size:130%;">मैं मुट्ठी में चांद और तारा<br />दोनों को संभाल रखूँगी<br />प्रिय चलो हम बिछड़ जाते हैं</span>।Manoshihttp://www.blogger.com/profile/13192804315253355418noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-11470354.post-90395530972046962142008-04-17T17:56:00.006-06:002008-04-17T18:16:40.030-06:00आज मैंने हाइवे पर गाड़ी चलाई-2<span style="font-size:130%;"><a href="http://manoshichatterjee.blogspot.com/2008/04/blog-post_16.html">पिछले पोस्ट से आगे-</a><br />पुराने शहर वापस आने के बाद फिर गाड़ी को हाथ लगाने की सोची। ५ घंटे के लेसन फिर लिये और पति के साथ बार बार गाड़ी चलाने निकली। अब मुझे समझ आया कि मेरी सभी सहेलियाँ ये नसीहत क्यों देती थीं कि कभी भी पति के साथ गाड़ी चलाने मत जाना। सिर्फ़ बहस होगी, गाड़ी सीखना तो खैर क्या होगा जो कुछ आता होगा वो भी भूल जाओगी| तो खैर, मेरी नई नौकरी की मांग ऐसी थी कि मुझे गाड़ी चलाना आना ज़रूरी था। मगर अभी तक एक दिन भी मैंने आत्मविश्वास के साथ अकेले गाड़ी नहीं चलाई थी। एक दिन बस ठान ही ली।<br /><br />उस दिन जब वो आफ़िस गये, मैंने अपनी दो पुरानी कलीग को फ़ोन किया। उनसे कहा कि मैं आज पहली बार गाड़ी अकेले ले कर निकलूँगी, क्या वो मेरे साथ आने को तैयार हैं? हम किसी माल में जा कर लंच करेंगे। दोनों मान गईं। कहा, " साथ जीयेंगे, साथ मरेंगे, चल।" मैंने गाड़ी निकाली, उन्हें उनके घरों से पिक-अप किया और घूम घाम कर सही सलामत घर वापस आ गई। बस वो दिन था और आने वाले दिन थे। उसके बाद शहर के अंदर हमेशा ही किसी काम से या स्कूल जाने के लिये गाड़ी चलानी ही पड़ती है।<br /><br />आज मैंने हाइवे पर गाड़ी चलाई। इसी खुशी का एलान करने को तो ये ब्लाग लिखा गया। दो दिन पहले मेरे स्कूल के प्रिंसिपल ने मुझे बुला कर कहा कि मुझे किसी वर्क्शाप में भेज रहे हैं जो कि न्यू मार्केट में है। न्यू मार्केट कोई ३० माइल दूर तो होगा ही। अब तक तो मैंने हाइवे पर गाड़ी नहीं चलाई थी कभी। तो वीकेंड पर पति से कहा कि मुझे हाइवे प्रैक्टीस करायें। हाथ भींच कर, तन कर बैठे हुये, किसी भी इमर्जन्सी में ब्रेक लगाने को तैयार </span><span style="font-size:130%;">मेरे पति के साथ </span><span style="font-size:130%;">(ब्रेक जब कि मेरे पैर के पास था) मैं हाइवे प्रैक्टीस के लिये निकली| कोई ६-७ बार सिर्फ़ किस तरह मर्ज करते हैं और एक्ज़िट करते हैं कि प्रैक्टीस करवाई गई। तब उन्होंने कहा, "ठीक तो चला रही हो यार...गुड।" मगर मुझे एक बात जमी नहीं। कायदे से १०० कि.मी. से ज़्यादा की स्पीड नहीं होनी चाहिये हाइवे पर, मगर १२०-१३० में क्या मज़ा आ रहा था| पति के बार बार टोकने की वजह से मज़ा किरकिरा होता रहा। और फिर अगले दिन मैंने अकेले हाइवे पर ड्राइव किया। और अकेले १२० पर गाड़ी चला कर घर सही सलामत वापस आ गई। घर आकर<br />अतिउत्साहित हो कर अपने चाचाजी को फ़ोन किया जो कि पास ही रह्ते हैं। उनको अपनी इस अचीवमेंट की दास्तां सुनाई। उन्होंने कहा," बेटे, शाबाश मगर ४०४ हाईवे कोई हाईवे है? ४०१ पर चलाती तो समझता कि हां अब अच्छा चला लेती है मुनिया।" चाचाजी पर खूब चिल्लाई मैं, कहा चाची को फ़ोन दो, आपसे बात ही नहीं करनी...वगैरह। अब फिर चैलेंज है। अगली मंज़िल है, हाइवे ४०१...फिर किसी मजबूरी में ही शायद ये मुकाम भी तय हो जाये।</span>Manoshihttp://www.blogger.com/profile/13192804315253355418noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-11470354.post-46365184181886538812008-04-16T21:02:00.003-06:002008-04-26T15:48:20.668-06:00मैंने आज हाइवे पर गाड़ी चलाई<span style="font-size:130%;">"दीदी मैं आपको २ दिन बाद लेने आ रही हूँ, लाइसेंस के रिटन टेस्ट के लिये, तैयार रहना"। मेरी मुँहबोली बहन ने हुक्म जारी कर दिया। "पर मुझे नहीं चलानी है गाड़ी भई, तेरे जीजाजी ले जाते हैं न मुझे जहाँ कहीं भी हो। और फिर यहाँ की बस सेवा इतनी अच्छी है" । मेरे टाल मटोल से कुछ भी काम नहीं बना। २ दिन बाद सचमुच हाज़िर थी वो मेरे दरवाज़े पर। "चलो, पढ़ाई ठीक से की है कि नहीं? २० में से १६ ही तो लाने हैं पास होने के लिये। ४ गलतियों की जगह तो है।"<br /><br />इस तरह मुझे मिला रिटन ड्राइविंग लाइसेंस जिसे जी-1 कहते हैं। चूँकि मुझे पहले गाड़ी चलाने का कोई अनुभव नहीं था, मैं इस लाइसेंस के साथ अकेले गाड़ी नहीं चला सकती थी। और अकेले गाड़ी चलाने के लिये एक दूसरी तरह का लाइसेंस लेना पड़ता है, जिसके पहले इस जी-1 लाइसेंस के साथ एक साल पूरा करना ज़रूरी होता है। तो देखते देखते एक साल गुजर गया और मैंने बकायदा एक ड्राइविंग इंस्ट्रक्टर रखा जो मुझे १० घंटे के ड्राइविंग लेसन के बाद ड्राइविंग टेस्ट के लिये ले जाने वाला था। मेरे पतिदेव ने कहा, "जो इंस्ट्रक्टर तुम्हें सिखायेगा वो तो अपना करीयर ही छोड़ देगा"। तो खैर १० घंटों के लेसन पूरे हुये। और आखिरी लेसन के बाद मेरे इंस्ट्रक्टर ने मुझे खबर सुनाई, " बहन जी, मैं आज के बाद आप्को सिखाने नहीं आ पाउंगा। मैं अपना करीयर बदल रहा हूँ। आज के बाद आपको एक नया इंस्ट्रकटर सिखाने आयेगा" मैं बेहद हैरान, परेशान। मगर फिर पता चला कि मेरे ये इंस्ट्रक्टर साहब दरअसल डाक्टर हैं, पाकिस्तान से। मगर यहाँ आने के बाद ड्राइविंग के लेसन दे रहे थे। अब फिर वापस मेडिकल का कोई कोर्स करने यहाँ के कालेज जाइन कर रहे हैं। मुझे ज़रा सुकूं आया। तो फिर अब ये नये इंस्ट्रक्टर आये और मुझे टेस्ट के लिये टेस्ट सेंटर ले गये।<br /><br />टेस्ट के रेज़ल्ट का मुझे तब ही पता लग गया जब मेरी एक्ज़ामिनर ने रास्ते में ब्रेक लगा दिया। यानि फ़ेल। तो मैंने बड़े बुझे मन से अपने फ़ेल होने की खबर सुनाने पति को फ़ोन किया, लगभग रोते हुये। पति ने बड़े प्यार से कहा, " चलो आज बाहर खाना खायेंगे। अगली बार पास हो जाओगी।" दिल को बड़ी तसल्ली हुई कि मेरा फ़ेल होना कोई बड़ी बात नहीं। रात को खाना नहीं बनाया, बाहर खाकर अगली बार पास हो जाने की उम्मीद की खुशियाँ मनाई और १० दिन बाद फिर टेस्ट दे कर हकीकत में मैं पास हो गई।<br /><br />लाइसेंस लेने के बाद भी मैंने गाड़ी चलाने की कोई कोशिश नहीं की, न ही पतिदेव ने कोई इल्तजा की। इसी बीच हमारा दूसरे शहर तबादला हो गया। वहाँ मैं नौकरी नहीं कर रही थी। तो गाड़ी चलाने की ज़रूरत बिल्कुल भी नहीं थी। वहाँ एक रिटायर किये हुए भले मानस मिल गये जो सभी नये सीखने वाले जानपहचान वालों को अपने खाली वक्त में यूँ ही गाड़ी चलाने का अभ्यास कराते थे। मैंने भी उनसे कहा कि मुझे भी प्रैक्टीस करवा दें क्योंकि १० घंटे गाड़ी चला कर मुझे अकेले गाड़ी चलाने की हिम्मत नहीं होती। वो भी मान गये। तो अक्सर ही मैं अंकल के साथ वैंक्यूवर की पहाड़ी रास्तों पर गाड़ी चलाने का अभ्यास करने निकल पड़ती। ऐसे ही एक दिन जब मैं वापस आ रही थी, गाड़ी में अंकल के साथ, सामने पीली ट्रैफ़िक सिग्नल पर एक दूसरी गाड़ी ने अपनी गाड़ी घुमाई (लेफ़्ट टर्न) और हो गई मेरी गाड़ी से उस गाड़ी की---- टक्कर। मेरी गाड़ी तो पिचक गई, मगर उस गाड़ी को कोई नुक्सान नहीं हुआ। पति को फिर रोते रोते फ़ोन किया, उन्होंने कहा, "अब जो करना है नियमानुसार, वो करो। तुम ठीक हो न?" तो खैर, इन्श्योरेंस को रिपोर्ट लिखायी, पूरा बयान दिया, मगर गाड़ी चलाने के लिये जो हिम्मत चाहिये वो पूरी तरह गायब हो गयी। आज तक सिर्फ़ अकेले नहीं चला पाती थी, पर अब तो अंकल या किसी के साथ भी चलाने की हिम्मत नहीं रही। पति के साथ तो वैसे भी कभी नहीं चलाया था, सिर्फ़ झगड़े होते हैं उनके साथ चलाओ तो, कोई फ़ायदा नहीं होता। कोई १ महीने बाद इंश्योरेंस कंपनी ने मुझे दोषमुक्त कर, दूसरे गाड़ी चालक को दोषी करार दिया और मेरी गाड़ी ठीक करवाने के पूरे पैसे भरे। मैंने फिर भी गाड़ी को नहीं छुआ। एक साल बिना गाड़ी चलाये आराम से गुज़र गया। मगर फिर हमारा तबादला पुराने शहर हो गया।<br /><br /><a href="http://manoshichatterjee.blogspot.com/2008/04/2.html">क्रमश:</a><br /></span>Manoshihttp://www.blogger.com/profile/13192804315253355418noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-11470354.post-35280279244336860232008-04-08T08:02:00.007-06:002008-04-11T19:21:57.787-06:00ग़ज़ल<span style="color: rgb(102, 51, 0);font-size:130%;" ><br /></span><span style="color: rgb(102, 51, 0);font-size:130%;" >दुआ में </span><span style="color: rgb(102, 51, 0);font-size:130%;" >मेरी कुछ यूँ असर हो<br />तेरे </span><span style="font-size:100%;"><span style="color: rgb(102, 51, 0);font-size:130%;" >सिरहाने </span></span><span style="color: rgb(102, 51, 0);font-size:130%;" >हर इक सहर हो<br /><br />जहां के नाना झमेले सर हैं<br />कहाँ किसी की मुझे ख़बर हो<br /><br />यहाँ तो कुछ भी नहीं है बदला<br />वहाँ ही शायद नई ख़बर हो<br /><br />मिले अचानक वो ख़्वाब मे कल<br />कहीं दुबारा न फिर कहर हो<br /><br />दिलों दिलों में भटक रहे हैं<br />कहीं तो अब ज़िंदगी बसर हो<br /><br />न याद कोई जुड़ी हो तुम से<br /></span><span style="color: rgb(102, 51, 0);font-size:130%;" >कहीं </span><span style="color: rgb(102, 51, 0);font-size:130%;" > तो ऐसा </span><span style="color: rgb(102, 51, 0);font-size:130%;" >कोई </span><span style="color: rgb(102, 51, 0);font-size:130%;" >शहर हो<br /><br />चलो चलें फिर </span><span style="color: rgb(102, 51, 0); font-size: 130%;">से</span><span style="color: rgb(102, 51, 0);font-size:130%;" > लौट </span><span style="color: rgb(102, 51, 0);font-size:130%;" >जायें<br />शुरु से फिर ये शुरु सफ़र हो</span><br /><br />--मानोशीManoshihttp://www.blogger.com/profile/13192804315253355418noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-11470354.post-86268120908402383052008-02-17T01:20:00.002-05:002008-04-08T10:41:44.378-06:00भविष्य<span style="font-size:130%;">स्टैट्काउंटर बताता है कि मेरे ब्लाग पर सबसे ज़्यादा हिट्स पड़ते हैं गूगल पर 'कुंडली' या 'राशि' सर्च करते हुये। कई बार हँसी आती है कि लोग क्यों इतना जानना चाहते हैं कि क्या होगा भविष्य में उनके। वैसे मेरा सबसे प्रिय विषय है ज्योतिष। एक वक्त था जब ज्योतिष में रमा हुआ था मन। हैरत होती थी जब काफ़ी सारी भविष्यवाणियाँ सही आती थीं। तब लगता, वाह ये तो ग़ज़ब का शास्त्र है। और कई बार कोई कुंडली बिल्कुल भी समझ नहीं आती थी, तो कृष्ना जी (जो हमें सिखाया करते थे) कहते थे, जो तुम्हारे बस का नहीं उसे समझने के लिये अभी और जीवन पड़ा है। मेरा दिमाग़ वैज्ञानिक तर्क़ देता है, क्या ज्योतिष सचमुच काम करता है? मगर हैरत होती है क्रुष्ना जी को भविष्यवाणियाँ करते देख। वो खुद मेकैनिकल इंजीनियर हैं, अपनी कम्पनी है, ज्योतिष शौकिया करते हैं। हज़ारों कैल्कुलेशन करने होते हैं। अपने खाली वक्त में वो ज्योतिष करते हैं और सिखाते हैं। खैर, अब मुझे तो कोई साल भर हो गया, ज्योतिष नहीं करते हुये। मगर फिर भी क्या भूल सकी हूँ मै इसे? हाँ किसी की शादी कब होगी की तारीख निकालने के जो नियम हैं उन्हें प्रैक्टीस के बगैर काफ़ी भूल चुकी हूँ शायद, पता नहीं। इस विषय का रिश्ता रसायन शास्त्र जैसा है मेरे साथ। मेरा रसायन शास्त्र से बरसों का नाता नहीं मगर फिर भी बेन्ज़ीन या कोई भी केमिकल का नाम लेने पर पहले उसका स्ट्रक्चर ध्यान आता है। या फिर पीरियोडिक टेबल कैसे भूल सकती हूँ मैं। बस वैसे ही कोई अगर कह दे कि उसकी नौकरी में समस्या चल रही है या शादी, या कुछ और...दिल करता है उसकी कुंडली देखूँ, देखूँ तो आखिर माजरा क्या है? क्या उसकी कुंडली देख कर ये पता चल सकेगा? मगर फिर लगता है अगर जीवन इसी पर निर्भर है और हमारे हाथ में कुछ नहीं तो फिर पहले से जान कर भी क्या होगा। और अपने हाथ में कुछ नहीं, ऐसा तो मानने को भी दिल पूरी तरह इंकार करता है। ज्योतिष अभी बंद है। कुछ डर सा गया था मन कि पूरी तरह निर्भर तो नहीं हो जायेगा ये इस पर? आजकल कृष्ना जी से सिर्फ़ इधर उधर की बातें होती हैं, ज्योतिष नहीं। उनका इस विषय पर एक बड़ा वर्कशाप है पूना में अगले सप्ताह। सीखने का अच्छा मौका था। शायद कभी फ़ुर्सत में इसे फिर शुरु करूँ...</span>Manoshihttp://www.blogger.com/profile/13192804315253355418noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-11470354.post-69937693105838120602008-02-11T21:14:00.000-05:002008-04-08T09:38:08.484-06:00आया वसंत<div style="text-align: center;"><a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://bp1.blogger.com/_m2DPuxNubh0/R7EDpxJ3bjI/AAAAAAAAB_E/fedoamCf5Lc/s1600-h/sunken+garden.JPG"><img style="margin: 0px auto 10px; display: block; text-align: center; cursor: pointer;" src="http://bp1.blogger.com/_m2DPuxNubh0/R7EDpxJ3bjI/AAAAAAAAB_E/fedoamCf5Lc/s320/sunken+garden.JPG" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5165914263674908210" border="0" /></a></div><span style=";font-family:Mangal;font-size:100%;" ></span><p style="color: rgb(102, 0, 0); text-align: center;"><span style=";font-family:Mangal;font-size:130%;" >झूमे डाल लद फूलों से अंग<br />झर-झर झर रहा सुनहरा रंग<br />सजी धरा बन पीली दुल्हन<br />छाया वसंत सखी आया वसंत </span></p><div style="text-align: center;"> </div><p style="color: rgb(102, 0, 0); text-align: center;"><span style=";font-family:Mangal;font-size:130%;" >पी के प्रेम कोयल मतवारी<br />मदहोश बिरही कूकती हारी<br />बौर आम के जो फैली सुगंध<br />छाया वसंत सखी आया वसंत</span></p><div style="text-align: center;"> </div><p style="color: rgb(102, 0, 0); text-align: center;"><span style=";font-family:Mangal;font-size:130%;" >पीली चुनरी धूप थिरके अंग<br />सरसों की बाली डोले है संग<br />रूप देख सुंदर लजाई ठंड<br />छाया वसंत सखी आया वसंत</span></p><div style="text-align: center;"> </div><p style="color: rgb(102, 0, 0); text-align: center;"><span style=";font-family:Mangal;font-size:130%;" >लाल पलाश बिछे धरा बिछौना<br />उड़े गुलाल सजे रंग सलोना<br />रंगों की बयार है चली अनंत<br />छाया बसंत सखी आया वसंत</span></p><div style="text-align: center;"> </div><p style="color: rgb(102, 0, 0); text-align: center;"><span style=";font-family:Mangal;font-size:130%;" ><br /></span></p><p style="color: rgb(102, 0, 0); text-align: center;"><span style=";font-family:Mangal;font-size:130%;" ><span style="font-size:85%;">Picture location: Buchart Garden, Britush Columbia</span><br /></span></p>Manoshihttp://www.blogger.com/profile/13192804315253355418noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-11470354.post-62137807813764007412008-02-08T17:06:00.000-05:002008-04-08T10:36:00.198-06:00बर्फ़ बर्फ़ बर्फ़-फ़ील्ड ट्रिप<span style="font-size:130%;">बच्चों को सुबह फ़ील्ड ट्रिप पर ले कर जाना था। वैसे तो बर्फ़ में बाहर निकलना कोई अच्छा नहीं लगता पर आज बेहद ही खूबसूरत दिन था। सूरज निकला हुआ था और हवा भी नहीं थी। सबसे अच्छे लग रहे थे चहकते हुये बच्चे। हम एक पार्क में गये जहाँ सिर्फ़ बर्फ़, बर्फ़ और बर्फ़ थी और बच्चों ने नाना तरह की गतिविधियों में भाग लिया। उनमें से एक था, बर्फ़ के घर बनाना (इगलू नहीं, क्विन्ज़ी कहते हैं उन्हें)। ये बर्फ़ के घर कुछ ऐसे ही बनते हैं जैसे हम बचपन में रेत की गुफ़ायें बनाया करते थे। पहले ज़मीन पर पडे बर्फ़ को साफ़ कर के उस पर फिर बर्फ़ डाल दिया जाता है। हमें बताया गया कि इस तरह ज़मीन की गरमाहट से नर्म झुरझुरी बर्फ़ सख्त हो जाती है और क्विन्ज़ी बनाना आसान होता है। फिर उसके दक्षिण दिशा में बर्फ़ को खोद कर अंदर जाने के लिये जगह बनाई जाती है। कहते हैं कि दक्षिण दिशा में दरवाज़ा हो तो घर को सूरज की गर्माहट मिलती है। इस बर्फ़ की गुफ़ा के अंदर का तापमान बाहर के तापमान से ५० डिग्री फ़रहन्हाइट ज़्यादा होता है। अक्सर, बर्फ़ीले तूफ़ानों में फँसे लोग ऐसी गुफ़ायें बना कर अपनी जान बचाते हैं। लीजिये इस फ़ील्ड ट्रिप से कुछ तस्वीरें-<br /></span><div style="text-align: center;"><span style="font-size:85%;">सुंदर दिन<br /></span><a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://bp2.blogger.com/_m2DPuxNubh0/R6zWrrCaKCI/AAAAAAAAB-U/GF4N6b3de7c/s1600-h/IMG_2177.JPG"><img style="margin: 0px auto 10px; display: block; text-align: center; cursor: pointer;" src="http://bp2.blogger.com/_m2DPuxNubh0/R6zWrrCaKCI/AAAAAAAAB-U/GF4N6b3de7c/s320/IMG_2177.JPG" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5164738918462662690" border="0" /></a><span style="font-size:85%;">बर्फ़ में खेलते बच्चे<br /></span><a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://bp3.blogger.com/_m2DPuxNubh0/R6zXG7CaKDI/AAAAAAAAB-c/fcsFtzjNDuE/s1600-h/IMG_2179.JPG"><img style="margin: 0px auto 10px; display: block; text-align: center; cursor: pointer;" src="http://bp3.blogger.com/_m2DPuxNubh0/R6zXG7CaKDI/AAAAAAAAB-c/fcsFtzjNDuE/s320/IMG_2179.JPG" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5164739386614097970" border="0" /></a><br /><span style="font-size:85%;">बर्फ़ खोदता बच्चा<br /></span><a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://bp3.blogger.com/_m2DPuxNubh0/R6zX97CaKFI/AAAAAAAAB-s/S-rB-spbt_w/s1600-h/IMG_2208.JPG"><img style="margin: 0px auto 10px; display: block; text-align: center; cursor: pointer;" src="http://bp3.blogger.com/_m2DPuxNubh0/R6zX97CaKFI/AAAAAAAAB-s/S-rB-spbt_w/s320/IMG_2208.JPG" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5164740331506903122" border="0" /></a><br /><span style="font-size:85%;">बर्फ़ की गुफ़ा<br /></span></div><div style="text-align: center;"> <a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://bp2.blogger.com/_m2DPuxNubh0/R6zYbrCaKGI/AAAAAAAAB-0/227aRmK06nA/s1600-h/IMG_2201.JPG"><img style="margin: 0px auto 10px; display: block; text-align: center; cursor: pointer;" src="http://bp2.blogger.com/_m2DPuxNubh0/R6zYbrCaKGI/AAAAAAAAB-0/227aRmK06nA/s320/IMG_2201.JPG" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5164740842608011362" border="0" /></a></div>Manoshihttp://www.blogger.com/profile/13192804315253355418noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-11470354.post-76217098065348503462008-02-07T18:43:00.000-05:002008-04-08T10:36:00.199-06:00बर्फ़ बर्फ़ बर्फ़<a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://bp0.blogger.com/_m2DPuxNubh0/R6vSAbCaJ6I/AAAAAAAAB9U/x7_2vSObpn8/s1600-h/IMG_2146.JPG"><img style="margin: 0pt 10px 10px 0pt; float: left; cursor: pointer; width: 240px; height: 182px;" src="http://bp0.blogger.com/_m2DPuxNubh0/R6vSAbCaJ6I/AAAAAAAAB9U/x7_2vSObpn8/s320/IMG_2146.JPG" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5164452302410098594" border="0" /></a><span style="font-size:130%;"><br /><br />" एन्वायरमेंट कनाडा का कहना है कि शुक्रवार को ३० से.मी. बर्फ़ गिरेगी, बर्फ़ खतरा जारी किया गया है" आदि आदि। दो दिन से यही खबर आ रही थी रेडियो पर, टी. वी पर हर जगह। और सब त</span><span style="font-size:130%;">ो ठीक है बस मुश्किल ये है कि उस दिन शुक्रवार है, अर्थात स्कूल खुले होंगे। हाँ, उस दिन बच्चों के लिये स्कूल बंद है, 'प्रोफ़ेशनल डेवलपमेन्ट डे' है| अर्थात टीचरों की हाज़िरी ज़रूरी है। एक दिन पहले स्कूल में नोटिस ज़ारी हुआ था कि रेडियो टी.वी. ध्यान से सुनें। अगर स्कूल बंद होने की खबर हो तो स्कूल न आये कोई। बस हम सब ने प्रार्थनायें की कि स्कूल बंद हो जायें। इस बर्फ़ में न जाना पड़े। भगवान अपने ज़िद पर </span><span style="font-size:130%;">अड़े रहे, किसी की न सुनी और सुबह उठ कर एक घंटे टीवी के सामने बैठ कर आशाओं पर हर मिनट बाल्टी भर भर कर पानी फिरता देखा। पता चला कि बर्फ़ तो गिरेगी मगर स्कूल बंद नहीं होने वाले। मैं स्कूल जाने की तैयारी करने लगी। पति ने कहा," आज टैक्सी ले लेना, इस बर्फ़ में गाड़ी मत ले जाना"। टैक्सी कंपनी को फ़ोन किया तो पता चला कि किसी वक्त का वादा नहीं कर सकती आज टैक्स</span><span style="font-size:130%;">ी कंपनियाँ। जब भी मैं तैयार हो जाऊँ, तब ही फोन करूँ। खैर, पति के आदेश का उल्लंघन करने की ठानी, और तैयार होने लगी। पति आफ़िस के लिये रवाना हो चुके थे। उनके लिये आसान है, बस से, ट्रेन से इस </span><span style="font-size:130%;">मौसम में जाना उतना मुश्किल नहीं होता। मैं निकलने ही वाली थी कि दरवाज़ा खुलने की आवाज़ आई। कुछ दिनों से मेरी मुँहबोली बहन मेरे घर पर ही रह रही थी। यहीं से अपने काम पर आ-जा रही थी (वही, बर्फ़ </span><span style="font-size:130%;">आदि के चलते...उसका आफ़िस मेरे घर से पास है, उसके खुद के घर से)। वो अंदर आई और कहा," मेरे पीछे से किसी ने मेरी कार को क्रैश किया, कार डैमेज नहीं हुई है ज़्यादा, पर मैं वापस आ गई, इट इज़ नाट वर्थ गोइंग टु वर्क टुडे"।</span><span style="font-size:130%;"> मैंने अपने मनोबल को संभाला और कहा, " ह्म्म्म, मैं निकलती हूँ।" उसने कहा,"दीदी मेरी बात सुनो, मत जाओ आज, इट इज़ नाट वर्थ" । दो चार बार ये कहने पर मैंने आखिर फ़ोन कर ही दिया स्कूल। आज बर्फ़ के चलते नहीं आ पाउंगी। स्कूल से बताया गया, नियमानुसार ऐसी हालत में मुझे सबसे पास के स्कूल में हाज़िरी देनी होगी, वरना तन्ख़्वाह कटेगी। सोचा कई बार, कि सबसे पास के स्कूल के लिये निकलूँगी तो अपने ही स्कूल न चली जाउँगी। तो खैर, मैने दिल पर पत्थर रख कर कहा, </span><span style="font-size:130%;">मैं नहीं आ पाउँगी। घर में बैठ कर पकौड़े खाये, टीवी देखी और अफ़सोस भी करती रही, कि चली जाती स्कूल तो भी शायद उतना बुरा नहीं था, आज ज़रूरी मीटिंग भी थी। बाद में पता चल</span><a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://bp2.blogger.com/_m2DPuxNubh0/R6vTp7CaJ8I/AAAAAAAAB9k/3zQ5yRIxiQg/s1600-h/snow_storm.jpg"><img style="margin: 0pt 0pt 10px 10px; float: right; cursor: pointer; width: 263px; height: 197px;" src="http://bp2.blogger.com/_m2DPuxNubh0/R6vTp7CaJ8I/AAAAAAAAB9k/3zQ5yRIxiQg/s320/snow_storm.jpg" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5164454114886297538" border="0" /></a><span style="font-size:130%;">ा कि स्कूल की आधी छुट्टी कर दी गयी थी और स्कूल बोर्ड ने बुरे मौसम के चलते तनख़्वाह काटने की नीति को नहीं अपनाया।<br /><br />अगले दिन सब साफ़ था और मैंने राहत की साँस ली कि चलो, अब कुछ दिन तो बर्फ़ नहीं गिरनी चाहिये, १५ दिन का आराम शायद। रविवार रात को फिर टी.वी. पर १० से.मी. बर्फ़ की खबर थी। बस??? १० से.मी. ओह, कुछ भी नहीं। और बुधवार को फिर ३०-४० से.मी. बर्फ़ की खबर, इस बार भी कोई हल्ला नहीं, हम सभी काम पर गये, बर्फ़ में गाडियाँ भी चलीं और किसी ने कोई शिकायत भी नहीं की। मौसम के शुरु में काम के दिन पहली भारी बर्फ़ पर बड़े बड़े किस्से बने, मगर बाद के बदतर मौसम में भी सब सामन्य थे। इंसान की फ़ितरत ही ऐसी होती है। हर चीज़ की आदत हो जाती है। आज फिर भारी बर्फ़ गिरी है। कल बच्चों को लेकर टोबागनिंग, स्कींग आदि के लिये फ़ील्ड ट्रिप ले जा रही हूँ। बर्फ़ न हो तो मज़ा किरकिरा हो जायेगा। सब खुश हैं कि आज जम कर बर्फ़ गिरी है।</span><br /><br /><br /><br /><span style="font-size:78%;">दूसरी छवि: सौजन्य: www.570news.com/shows/jeffallan.jsp</span>Manoshihttp://www.blogger.com/profile/13192804315253355418noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-11470354.post-27146475727132619052007-12-31T11:26:00.000-05:002008-04-08T09:38:08.485-06:00हो शुभ बहुत ये साल नया<a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://bp3.blogger.com/_m2DPuxNubh0/R3kYeE6s6jI/AAAAAAAABqo/V7Umw_jKEgo/s1600-h/IMG_1542.JPG"><img style="margin: 0pt 10px 10px 0pt; float: left; cursor: pointer;" src="http://bp3.blogger.com/_m2DPuxNubh0/R3kYeE6s6jI/AAAAAAAABqo/V7Umw_jKEgo/s320/IMG_1542.JPG" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5150174553869969970" border="0" /></a><br /><span style="font-size:130%;"><span style="color: rgb(0, 0, 153); font-weight: bold;"><br /><br /><br /><br /><br /><br /><br /><br /><br /><br /><br /><br /><br />हो शुभ बहुत ये साल नया<br />वो बीत गया जो साल गया<br />मुंडेर की ओट से हाथ हिलाता<br />पीछे छूटा जो साल गया<br />हो शुभ बहुत ये साल नया<br /><br />दुख का दरिया पार किया और<br />खुशी के भी दो सीप चुने<br />दो पल खुशियाँ, ढेरों आंसू<br />हो कर मालामाल गया<br />गुज़र गया जो साल गया<br /><br />कई सपने टूटे शाखों पर<br />कई रातें बीती आहें भर<br />माथे की सिलवट, सूजी आंखें<br />ले कर अपना हाल गया<br />गुज़र गया जो साल गया<br /><br />पूरा हो हर स्वप्न सुहाना<br />सच्चा हो अब ख्वाब पुराना<br />नये जहाँ में नयी उमंग से<br />बनेगा अब चौपाल नया<br />वो बीत गया जो साल गया<br />हो शुभ बहुत ये साल नया<br /></span></span>Manoshihttp://www.blogger.com/profile/13192804315253355418noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-11470354.post-90051031354436295732007-12-16T20:20:00.000-05:002008-04-08T09:43:43.895-06:00आप किस तरह के बुद्धिमान हैं?<span style="font-size:130%;">मेरा दिशा बोध अच्छा नहीं है बल्कि यूँ कहूँ कि दिशा बोध है ही नहीं तो भी शायद गलत न हो। किसी भी जगह जाने के लिये मुझे मेरे पति से ५ बार समझना पड़ता है जबकि वो एक बार कहीं जायें तो ज़िंदगी भर उस जगह का रास्ता नहीं भूलते। एक कोर्स करते वक्त हमें 'मल्टिपल इंटेलिजेन्स' के बारे में बताया गया। तब समझ आया कि वो स्पेशियली इंटेलिजेंट हैं अर्थात उनकी बुद्धि स्थानिक है। उन्हें मानचित्रों का अध्ययन करना अच्छा लगता है, चित्रों के माध्यम से वो अपनी बात ज़्यादा अच्छे से समझा सकते हैं, आदि।<br /><br />मैंने <a href="http://manoshichatterjee.blogspot.com/2007/06/blog-post_06.html">पहले भी लिखा था कि हर बच्चा अलग तरीक़े से सीखता है</a>। जो चीज़ उसे बार बार पढ़ने पर याद नहीं होती या समझ नहीं आती, हो सकता है उसे वही चीज़ सिर्फ़ सुन कर समझ में आ जाये। क्योंकि हर इंसान के सीखने की विधि अलग होती है। हर किसी की बुद्धि अलग तरह से काम करती है।<br /><br />सर्वेक्षण से पता चलता है कि इंसान आठ तरह से बुद्धिमान हो सकता है। क्या आप फ़ोन पर बात करते वक्त कुछ आंका-बांका लिखते रहते हैं? तब आपका दिशा बोध ज़रूर अच्छा है क्योंकि आप मेरे पति की तरह 'स्पेशियली इंटेलिजेंट' हैं।<br /><br />हावर्ड गार्डनर का बहु-बौद्धिक सिद्धांत आजकल शिक्षण के हर क्षेत्र में काम में लाया जा रहा है। हम शिक्षक हमेशा इस बात का खयाल रखते हैं कि हर बच्चे को उसकी 'इन्टेलिजेन्स' के हिसाब से परखा जाये कि उसने कितना सीखा। आप भी अगर अपने बच्चे की सीखने की विधि को जान जायेंगे तो उसे पढ़ाई में मदद कर पायेंगे।<br /><br />ये आठ 'इंटेलिजेन्ट' लोग इस तरह से हैं<br /><br />१) लाजिकल या तार्किक बुद्धि वाले (साइंटिस्ट, इन्जीनियर, कंप्यूटर के ज्ञानी, बैंकर आदि)<br />२)लिंगुइस्टिक या शाब्दिक बुद्धि वाले (जर्नलिस्ट, वक्ता, टीचर, कवि आदि)<br />३) स्पेशियल या स्थानिक बुद्धि वाले (कलाकार, डिज़ाइनर, आर्किटेक्ट, फोटोग्राफर आदि)<br />४)बाडिली-काइनेस्थेटिक या शरीर के अंगों ज़्यादा को काम में लाने वाले (नर्तक, अभिनेता, खिलाड़ी आदि)<br />५)म्यूज़िकल या संगीत की समझ वाले (गायक, डी.जे. आदि)<br />६)इन्टर्पर्स्नल या लोगों के साथ मिल कर काम काज करने में सक्षम (मानव संसाधन से जुड़े लोग, डाक्टर, शिक्षक, मनोवैज्ञानिक आदि)<br />७)इन्ट्रापर्सनल या खुद का जानकार(कोई भी जो अपने को समझता है, अकेले काम कर के आनंदित होता है)<br />८)नेचरलिस्ट या प्रकृति संबंधित काम करने में होशियार (जिसे प्रकृतिसे लगाव है, बोटनिस्ट, ज़ूओलोजिस्ट आदि)<br /><br />आपको जब मालूम हो जाये कि आप किसे तरह के बुद्धिमान हैं तो उस तरह के उदाहरणों को काम में लाइये और सीखने की कोशिश कीजिये। जो भी आप समझना चाहते हैं उसे अपने इन्टेलिजेन्स के साथ जोड़ कर समझने की कोशिश कीजिये। उदाहरणार्थ अगर आप तार्किक बुद्धि वाले हैं तो किसी भी काम को समझने के लिये अंकों का प्रयोग कीजिये, समीकरणों का प्रयोग आदि आपको जल्दी सीखने में मदद करेगा। या संगीतिक बुद्धि के लिये शायद उस विषय संबंधी कोई गीत सुनिये या गीत लिखकर सुनिये आदि।<br /><br />अब इस लिंक पर जाइये और पता लगाइये कि आप किस तरह के बुद्धिमान हैं। आप सबसे अच्छे से और जल्दी कैसे सीख सकते हैं? अपने बच्चे पर भी इस टेस्ट को कीजिये और उसे उस तरह से सीखने में मदद कीजिये।<br /><a href="http://www.jaconline.com.au/sosealive/home/mitest.swf">आप किस तरह के बुद्धिमान हैं?</a><br /></span>Manoshihttp://www.blogger.com/profile/13192804315253355418noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-11470354.post-90260272991675202952007-09-19T21:08:00.000-06:002008-04-08T09:38:08.485-06:00बस एक बार<a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://bp0.blogger.com/_m2DPuxNubh0/RvHnUTkoLJI/AAAAAAAABjg/w6HHL8FCzD0/s1600-h/raviShakuntala.jpg"><img style="margin: 0px auto 10px; display: block; text-align: center; cursor: pointer;" src="http://bp0.blogger.com/_m2DPuxNubh0/RvHnUTkoLJI/AAAAAAAABjg/w6HHL8FCzD0/s320/raviShakuntala.jpg" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5112121388079525010" border="0" /></a><br /><br /><div style="text-align: center; font-weight: bold;"><span style="font-size:130%;">कई दिनों से<br />ख़्वाब एक बुन रही हूँ<br />हर एक धागे के साथ<br />जुड़ रही हैं कहानियाँ<br />आड़े तिरछे लकीरों सा<br />कहीं कुछ बन रहा है<br />एक आकार देने की<br />कोशिश में लगी हूँ<br />उस शाम से जब शुरु हुई थी<br />ये कहानी अनजाने ही<br />आज भी मन ही मन<br />छू आती हूँ उन पलों को<br />तब एक और ताना<br />बुन जाता है मेरे ख़्वाब में<br />मगर एक बाना फिर<br />बिखर जाता है दूसरे ही पल<br />चलो, आज ख़तम कर दो<br />ये कहानी तुम ही<br />मुझसे बस एक बार कह दो प्रियतम<br />और कह कर रोक लो<br />एक पल होठों पर<br />फिर छू लेने दो<br />मुझे उस पल को<br />बस एक बार, बस एक बार...<br /><br />--मानसी<br /><br /></span><div style="text-align: left;"><span style="font-size:130%;"><span style="font-size:78%;"><span style="font-weight: normal;">छवि सौजन्य से: http://www.hotdishes.com/raviShakuntala.jpg</span></span></span><br /></div><span style="font-size:130%;"><br /></span></div>Manoshihttp://www.blogger.com/profile/13192804315253355418noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-11470354.post-4315117982776072472007-09-14T19:32:00.000-06:002008-04-08T10:36:00.199-06:00पड़ाव-२- अम्स्टर्डाम<span style="font-weight: bold;font-size:130%;" >हमारे टूर गाईड का नाम था मनीष। बहुत ही मिलनसार और अच्छे स्वभाव वाला। उसके साथ टूर पर कभी कभी लगता कि हम सब फिर अपने बचपन में पहुँच गये हैं। किसी टीचर के साथ फ़ील्ड ट्रिप पर हों जैसे। बस में जाते हुये हमें आने वाले मंज़िल की पूरी जानकारी के साथ साथ, कहाँ क्या मिलेगा, कहाँ हमें जेबकतरों से सावधान रहना चाहिये से लेकर कहाँ सबसे अच्छी आइसक्रीम मिलती है तक की ख़बर वो हमें देता था। १२ साल से इसी पेशे में रहने की वजह से शायद टूरिस्ट के मनोविज्ञान से वो भली भाँति परिचित था। इस टूर पर हम सब छोटे-बड़े मिलाकर ३७ लोग थे। हमें यहाँ हमारे पड़ोसी भी मिले...मतलब ये कि हमारे पास के शहर में, हमारे घर से २० मिनट की दूरी पर रहने वाले एक दम्पत्ति, जो कि इसी सैर के लिये आये हुये थे। दुनिया कितनी छोटी है सच!<br /><br /><a href="http://manoshichatterjee.blogspot.com/2007/08/blog-post.html">ब्रसल्स</a> से हम पहुँचे आइंडहोवन। सारी दोपहर के सफ़र के बाद प्राय: शाम हो चुकी थी जब हम अपने होटल पहुँचे। बहुत सुंदर होटल, और सबसे अच्छी बात, खाना भारतीय। मेरा तो वैसे भी भारतीय खाने के बग़ैर गुज़ारा नहीं होता। भारत से खानसामा आये हुये थे हमारे लिये, जिन्होंने खाना बनाया था। शाकाहारी, माँसाहारी, सभी तरह के व्यंजन थे..वाह!<br /><br />मनीष साहब ने हमें हमारे अगले दिन का कार्यक्रम बता दिया था। सुबह ६ बजे उठो, ७ बजे ना<a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://bp1.blogger.com/_m2DPuxNubh0/Rus4MjEyJkI/AAAAAAAABhc/r6r-Bpj4xnA/s1600-h/Diamond+crown+Factory.JPG"><img style="margin: 0pt 0pt 10px 10px; float: right; cursor: pointer; width: 143px; height: 221px;" src="http://bp1.blogger.com/_m2DPuxNubh0/Rus4MjEyJkI/AAAAAAAABhc/r6r-Bpj4xnA/s320/Diamond+crown+Factory.JPG" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5110239990406850114" border="0" /></a>श्ता, और ८ बजे अगले पड़ाव की ओर रवाना। वापस रात को इसी होटल में बसेरा। अगले दिन सुबह बस में चढ़ कर सभी सो गये। रोज़ ही ऐसा होता था। होटल से किसी मंज़िल की ओर सुबह जाते हुये २ से ३ घंटे का सफ़र होता था, जब हम सभी सोया करते थे। हम पहुँचे अम्स्टर्डाम शहर। सबसे पहले हम गये वहाँ की हीरे की फ़ैक्ट्री देखने। छोटे-बड़े, सुंदर, रंगीन, जाने कितने तरह के हीरे। कारीगर काम करते हुये हीरों पर। और आखि़र में हीरे की ख़रीदारी। इस टूर के बाद अब हीरे ख़रीदने के पैसे कहाँ थे। खै़र... (दुखी मन मेरे...)<br /><br />हमें शहर का क्रूज़ करवा<a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://bp3.blogger.com/_m2DPuxNubh0/Rus5ZDEyJmI/AAAAAAAABhs/mLvQM1bZg-w/s1600-h/House+boats,+holland.JPG"><img style="margin: 0pt 10px 10px 0pt; float: left; cursor: pointer; width: 182px; height: 135px;" src="http://bp3.blogger.com/_m2DPuxNubh0/Rus5ZDEyJmI/AAAAAAAABhs/mLvQM1bZg-w/s320/House+boats,+holland.JPG" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5110241304666842722" border="0" /></a>या गया, एक नौका पर। कनाल के दोनों तरफ़ थे हाउस्बोट जहाँ लोग रहते हैं और ये हाउस्बोट बहुत महँगे होते है। रहने वालों को उस के आसपास की ज़मीं भी ख़रीदनी पड़ती है। आम्स्टर्डाम को साइकिल सवारों की राजधानी कहा जाता है। बहुत सुंदर और स्वच्छ शहर।<br /><br /><br /><br />हालैंड के लकड़ी के जूते बहुत प्रसिद्ध हैं। तो हम गये अब लकड़ी के जूतों की फ़</span><span style="font-weight: bold;font-size:130%;" ><a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://bp0.blogger.com/_m2DPuxNubh0/Rus6JTEyJnI/AAAAAAAABh0/UC83wp6aRi0/s1600-h/21.JPG"><img style="margin: 0pt 0pt 10px 10px; float: right; cursor: pointer; width: 192px; height: 166px;" src="http://bp0.blogger.com/_m2DPuxNubh0/Rus6JTEyJnI/AAAAAAAABh0/UC83wp6aRi0/s320/21.JPG" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5110242133595530866" border="0" /></a></span><span style="font-weight: bold;font-size:130%;" >ैक्ट्री में। वहाँ लकड़ी के जूते बनते हुये देखे। आज भी शादी के समय रिवाज़ अनुसार जोडों को लकड़ी के जूते दिये जाते</span><span style="font-weight: bold;font-size:130%;" > हैं, दूल्हा-दुल्हन के नाम खुदवा कर। लड़की के जूते लाल</span><span style="font-weight: bold;font-size:130%;" > होते हैं और लड़कों के पीले।<br /><br />जूतों की फ़ैक्ट्री से हम गये दोपहर का खाना खाने, शहर के बीच खुले एक भारतीय रेस्तराँ में। यही बात सबसे अच्छी है एस.ओ.टी.सी. के टूर की...रोज़ भारतीय खाना...क्या कहने। खाना खा कर, हम पहुँचे वोलेन्डाम, जो कि अम्स्टर्डाम की एक मछुआरों की बस्ती है। यहाँ साफ़ दिखाई देता है कि क<a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://bp1.blogger.com/_m2DPuxNubh0/Rus8PjEyJpI/AAAAAAAABic/pWY2UT177ik/s1600-h/windmill.JPG"><img style="margin: 0px auto 10px; display: block; text-align: center; cursor: pointer; width: 171px; height: 186px;" src="http://bp1.blogger.com/_m2DPuxNubh0/Rus8PjEyJpI/AAAAAAAABic/pWY2UT177ik/s320/windmill.JPG" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5110244439992968850" border="0" /></a>िस तरह समुद्र की सतह ज़मीन की सतह से ऊँची है। रास्ते में हमने पुरानी विंड मिल भी देखी, तस्वीरे खींची और दो घंटे के क़रीब वोलन्डाम में शांति से बिताने के बाद हम गये विश्वविख्यात मड्यूरोडाम में।<br /><br />मड्यूरोडाम है एक बौना शहर यानि कि इस शहर में पूरे अम्स्टर्डाम को <a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://bp1.blogger.com/_m2DPuxNubh0/Rus7fjEyJoI/AAAAAAAABiU/8truQZrjybA/s1600-h/miniature+world,+madurodam.jpg"><img style="margin: 0pt 10px 10px 0pt; float: left; cursor: pointer; width: 175px; height: 162px;" src="http://bp1.blogger.com/_m2DPuxNubh0/Rus7fjEyJoI/AAAAAAAABiU/8truQZrjybA/s320/miniature+world,+madurodam.jpg" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5110243615359248002" border="0" /></a>बौना कर के दिखाया गया है। विंडमिल, कथिड्रल, एयरपोर्ट आदि सभी बौनाकार। अपने आप में एक अनोखा देश। काफ़ी समय यहाँ बिता कर, हम वापस पहुँचे अपने उस रात के बसेरे में, थक कर चूर। पहुँचते पहुँचते शाम ढल चुकी थी। अम्स्टर्डाम की यादों को दिल में बसाये, अगले दिन एक नये पड़ाव की ओर निकलने की मानसिक तैयारी में लग गये हम, एक और सुबह के इंतज़ार में, कुछ नये याद संजोने, ब़ड़ी बेसब्री से...</span>Manoshihttp://www.blogger.com/profile/13192804315253355418noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-11470354.post-16547925699951515362007-09-09T16:37:00.000-06:002007-09-09T17:35:52.322-06:00सरस्वती श्लोक- (टेस्ट)<table bgcolor="#000000" cellpadding="0" cellspacing="0"><tr><td><embed quality="high" pluginspage="http://www.macromedia.com/go/getflashplayer" type="application/x-shockwave-flash" bgcolor="#000" width="328" height="94" src="http://res0.esnips.com/escentral/images/widgets/flash/esnips_player.swf" flashvars="theTheme=blue&autoPlay=no&theFile=http://www.esnips.com//nsdoc/6e71c2c3-6303-48fa-8976-642e6ab0b878&theName=sarasawati shlok&thePlayerURL=http://res0.esnips.com/escentral/images/widgets/flash/mp3WidgetPlayer.swf"></embed></td></tr><tr><td><table cellpadding="2" style="font-family:Verdana, Arial, Helvetica, sans-serif; padding-left:2px; color:#FFFFFF; text-decoration:none ; ; font-size:10px; font-weight:bold"><tr><td><a style="color:#FFFFFF; text-decoration:none " href="http://www.esnips.com/CreateWidgetAction.ns?type=0&objectid=6e71c2c3-6303-48fa-8976-642e6ab0b878"> Get this widget </a></td><td style="font-size:7px; font-weight:normal;">|</td><td><a align="center" style="color:#FFFFFF; text-decoration:none" href="http://www.esnips.com//selectedfile/emaildoc/6e71c2c3-6303-48fa-8976-642e6ab0b878"> Share </a></td><td style="font-size:7px; font-weight:normal;">|</td><td align="center"><a align="center" style="color:#FFFFFF; text-decoration:none " href="http://www.esnips.com/doc/6e71c2c3-6303-48fa-8976-642e6ab0b878/sarasawati-shlok/?widget=flash_player_esnips_blue"> Track details </a></td></tr></table></td></tr></table>Manoshihttp://www.blogger.com/profile/13192804315253355418noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-11470354.post-75836461283978790272007-08-22T18:15:00.000-06:002008-04-08T10:36:00.200-06:00यूरोप की सैर- पहला पड़ाव- ब्रसल्स<span style="font-size:130%;">गर्मी की छुट्टियाँ शुरु हुईं और खत्म भी होने लगीं। दो महीने की छुट्टी में एक मही्ना तो कोर्स करने में चला गया। अगस्त में यूरोप के कुछ देशों की सैर को निकल पड़े हम। एस.ओ.टी.सी., जो कि एक भारतीय टूर कंपनी है, विदेश में रह रहे भारतीयों के लिये भी सैर का प्रबंध करती है। सैर या टूर शुरु हो रहा था लंडन से पर हम ने उसे ब्रसल्स से लिया। यानि कि हमारा पहला पड़ाव था ब्रसल्स, बेल्जियम की राजधानी। यूरोप में अपनी चीज़ें सम्हाल के रखने की लोगों की हिदायतें हमें कंठस्थ हो चुकी थीं। ज़रा सा चूके नहीं कि सामान ग़ायब। जैसा सुना था वैसा बुरा अनुभव रहा नहीं वैसे।<br /><br />ब्रसल्स, एक सुंदर छोटा सा यूरोपीय शहर। मेरे सास-ससुर हमें आकर यहीं मिले और हम ने एक साथ अपनी यात्रा शुरु की। ब्रसल्स में लोगों का व्यवहार कुछ रूखा ही लगा। यहाँ (कनाडा में) रास्ते में चलते हुये भी लोगों को देख कर मुस्कराने की जैसे आदत सी हो गयी है, मगर ब्रसल्स में हमारा अनुभव कुछ बहुत अच्छा नहीं रहा। ख़ैर, टूर के पहुँचने के एक दिन पहले ही हम पहुँच गये थे तो ब्रसल्स को अपनी तरह से एक्सप्लोर करने का मौक़ा हमें मिला। ब्रसल्स बेल्जियम की राजधानी है और यहाँ फ़्रेन्च और फ़्लेमिश बोली जाती है। यहाँ हर जगह से लोग आ कर बसे है और इसलिये आपको रास्ते में हर तरह के लोग दिखेंगे। पुराना शहर है ब्रसल्स। यहाँ घूमने आ रहे लोगों को अगर फ़्रेंच न आती हो तो काफ़ी दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है। यहाँ अंग्रेज़ी बहुत कम समझते हैं लोग।<br /><br />कुछ तस्वीरें यहाँ के दर्शनीय स्थानों की-<br /><br /><br /><a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://bp2.blogger.com/_m2DPuxNubh0/RszTeoielaI/AAAAAAAAABo/nMjhPyqLxbM/s1600-h/IMG_0636.JPG"><img style="margin: 0pt 10px 10px 0pt; float: left; cursor: pointer;" src="http://bp2.blogger.com/_m2DPuxNubh0/RszTeoielaI/AAAAAAAAABo/nMjhPyqLxbM/s320/IMG_0636.JPG" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5101685001135494562" border="0" /></a><br /><br /><br /><br /><br /><br /></span><span style="font-size:100%;">यहाँ का प्रसिद्ध </span><span style="font-weight: bold;font-size:100%;" >ग्रैंड प्लेस</span><span style="font-size:100%;">, ब्रसल्स के मध्यकाल का मार्केट स्क्वैर में स्थित, सिटी हाल के सामने।</span><br /><br /><br /><br /><br /><br /><span style="font-size:130%;"><br /></span><div style="text-align: right;"><span style="font-size:130%;"><a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://bp2.blogger.com/_m2DPuxNubh0/RszWFoielbI/AAAAAAAAABw/Kr-mSNlB4i8/s1600-h/3+atomium+brussels.JPG"><img style="margin: 0pt 10px 10px 0pt; float: left; cursor: pointer;" src="http://bp2.blogger.com/_m2DPuxNubh0/RszWFoielbI/AAAAAAAAABw/Kr-mSNlB4i8/s320/3+atomium+brussels.JPG" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5101687870173648306" border="0" /></a><br /></span></div><span style="font-size:130%;"><br /><br /><br /><br /><br /></span><span style="font-weight: bold;font-size:100%;" >ऐटोमियम- </span><span style="font-size:100%;">हेसेल पार्क में बनाया गया १९५८ के विश्व मेले के दौरान लोहे के अणु को १५० करोड़ बार बड़ा कर के दिखाया गया है। इसमें आप अंदर जा कर सबसे ऊपर की मंज़िल (गोलाकार) पर जा सकते हैं और पूरा ब्रसल्स शहर देख सकते हैं।<br /></span><span style="font-size:130%;"><span style="font-size:85%;"><br /><br /><br /><br /><br /><span style="font-weight: bold;"><br />अगला पड़ाव- अम्सटर्डाम</span></span><br /></span>Manoshihttp://www.blogger.com/profile/13192804315253355418noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-11470354.post-59018577108795226092007-08-01T19:59:00.000-06:002008-04-08T09:46:02.488-06:00कुछ अपने मन की-2 -( छुट्टियाँ)<span style="font-size:130%;">मुझे याद है, <a href="http://manoshichatterjee.blogspot.com/2006/05/blog-post_09.html">पिछले साल</a> जब मैंने वैक्यूवर से अपनी बेरोज़गारी के आलम में शिकायत की थी, कि मैं सारे दिन सिर्फ़ खिड़की से बादलों को देख कर बोर चुकी हूँ, पता नहीं नौकरी कब लगेगी और मैं कब फिर बिज़ी हो पाऊँगी, तो कई बलागरों कहा था कि बाद में नौकरी मिलने पर जब वक्त नहीं मिलेगा आराम के लिये, तब मैं पछताऊँगी कि वो ज़माना कितना सुंदर था। पिछले सप्ताह मेरा कोर्स ख़त्म हुआ। उसके एक महीने पहले मेरी स्कूल की छुट्टियाँ तो शुरु हो चुकी थीं मगर अगले ही दिन ये कोर्स शुरु हो गया था। एक घंटे की रोज़ सुबह की ड्राइव ही थका देती थी। और फिर घर आते आते ३-३:३० हो ही जाते थे। तो एक महीने बाद आख़िरकार ये कोर्स खत्म हुआ और शुरु हुई मेरी असली छुट्टियाँ। बिल्कुल बचपन में जैसे गर्मी की छुट्टियाँ आने पर ख़ुशी होती थी, वही फिर महसूस हो रहा था। मुझे लगता है, किसी साइकोलोजी के चलते, पढ़ाई के खत्म होने की छुट्टियाँ ज़्यादा मीठी होती हैं, किसी भी और छुट्टी से। तीन दिन से घर पर आराम हो रहा है, पूरा आराम। दो दिन बाद घूमने जा रही हूँ, १५ दिन के लिये, जो घर में बैठने जैसा छुट्टी का मज़ा नहीं दे सकता। मेरी कलीग कहती है कि वो गर्मी की छुट्टियों में कहीं नहीं जाती, सिर्फ़ घर में अपने परिवार के साथ वक्त बिताती है। इसी में उसे असली छुट्टी का मज़ा मिलता है। पर एक बात कह सकती हूँ मैं, कि छुट्टी का अलग मज़ा है, बेशक़, मगर जब लंबे समय के लिये एक अन्सर्टेन ख़ाली वक्त से गुज़रना पड़ता है तो वो मज़ा नहीं देता। वो कहानी कितनी सच लगती है जिसमें एक मज़दूर सुख की नींद सोता है मगर धनाढ्य को सब होते हुये भी नींद न आने की बीमारी होती है। सच है, अंधेरे से जो न गुज़रा हो उसे रोशनी के महत्व का क्या पता। </span>Manoshihttp://www.blogger.com/profile/13192804315253355418noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-11470354.post-68318637884638352642007-06-06T12:50:00.000-06:002008-04-08T09:43:43.896-06:00मेरा बच्चा जानता है, पर अंक बुरे लाता है...<span style="font-size:130%;">जब मैं स्कूल में थी, मुझे हमेशा परीक्षा के अंकों से ही मापा गया। कभी किसी ने ये नहीं सोचा कि शायद मुझे लिखना अच्छा नहीं लगता हो। मुझे मालूम तो है इस प्रश्न का उत्तर मगर अगर कोई मुझसे इसे ज़ुबानी पूछ ले, तो मैं बेहतर बता पाऊंगी। मैंने कक्षा में इस विषय पर हमेशा बहुत अच्छा काम किया होगा, पर परीक्षा मेरे बस का नहीं...कोई क्यों नहीं समझ पाता इस बात को?<br /><br />काफ़ी दिनों से सोच रही थी कि इस विषय पर लिखूँ, मगर ज़िंदगी के नाना झमेलों में पड़ कर ये स्थगित होता गया। यहाँ पढ़ाते हुये, अनुभवों के साथ ही सीखने को मिल रहा है बहुत कुछ लगातार। जब भारत में पढ़ाती थी तो बच्चे को हम सिर्फ़ पेपर-पेन्सिल वाली परीक्षाओं से ही मापते थे। मगर कुछ बहुत अहं चीज़ों पर न मैंने कभी ध्यान दिया न ही कभी सोचा। अब धारणा बदल रही है।<br /><br />परीक्षा क्यों हो? क्या ये तय करने के लिये कि बच्चे ने कितना नहीं सीखा? या सीखा? और जो नहीं सीख पाया उसे वो खुद कैसे समझे कि क्या करने से वो उस विषय को समझ पायेगा?<span style="font-weight: bold; font-style: italic;"> परीक्षा बच्चे के 'सीखने' को 'लगातार सुधारने' के लिये होनी चाहिये न कि उसने क्या सीखा या नहीं सीखा उसे 'जज' करने के लिये।</span><br /><br />मुझे याद है, मैंने कई बार कम अंक इसलिये प्राप्त किये कि मुझे ज़्यादा समय नहीं दिया गया लिखने के लिये। मुझे प्रश्नों के उत्तर पता थे, पर मैं बहुत तेज़ नहीं लिख पाती थी, तो अंक कम मिले। मुझसे मेरी कापी छीन ली गयी।<br />आज अगर मैं देखती हूँ कि कोई बच्चा धीरे लिखता है, तो उसे ज़्यादा समय देना हानिकारक नहीं। ये दूसरे बच्चों के प्रति अन्याय भी नहीं। इसे कहते हैं <span style="font-weight: bold; font-style: italic;">"accomodation" </span>| अगर कोई बच्चा, अकेले में ज़्यादा अच्छा काम करता है, तो उसे एक अलग जगह बिठा कर काम करने देने में कोई हर्ज नहीं। किसी भी शिक्षक के लिये ये ध्यान में रखना कि वो किसी को कंट्रोल नहीं करता, बल्कि ब्च्चों को सीखने में मदद करता है, याद रखना बहुत ज़रूरी है।<br /><br />एक बच्चा है मेरी कक्षा में। बहुत अच्छा बोलता है। मगर लिखने में उतना अच्छा नहीं। एक और बच्चा है जो बहुत अच्छा लिखता है, पर बोलता अच्छा नहीं। और एक और बच्चा, उसे कुछ बनाने दे दो, कुछ हाथों से काम करने दे दो, वो अपना सारा ज्ञान उँडेल देगा, मगर बिल्कुल चुपचाप रहता है। तीनों बच्चों के सीखने की गति एक ही है, सबका ज्ञान बराबर का है, मगर तीनों की सीखने की पद्धति अलग अलग है। इसे कहते हैं <span style="font-weight: bold; font-style: italic;">' learning style'</span> । आप ख़ुद भी ऐसे ही हैं। आपकी <span style="font-weight: bold; font-style: italic;">'learning style</span>' आपकी विशेषता है। तो बच्चे ने कितना सीखा, ये देखने के लिये क्या आप उसे एक जैसा ही पेपर-पेन्सिल वाली परीक्षा में डाल देंगे? ऐसा नहीं होना चाहिये। अगर आप शिक्षक हैं तो बच्चों ने कितना सीखा जानने के लिये, परीक्षाओं को कई तरह से डिज़ाइन करें। उसमें लिखना भी हो, कुछ करने वाले कार्य भी हों (जैसे, कोई एक्स्पेरिमेंट, या कुछ तैयार करना आदि), और कुछ मौखिक प्रश्न भी। इस तरह से आप बच्चे ने कितना सीखा सही तरीके से जान पायेंगे। अगर आप अभिभावक हैं तो घर पर भी आप बच्चे को इसी तरह जानने की कोशिश करें। <span style="font-style: italic; font-weight: bold;">अगर आपको लगता है कि बच्चा विषय को जानता है मगर परीक्षा में खराब अंक लाता है तो आपको पूरा हक़ है कि आप स्कूल में टीचर के ध्यान में इस बात को लायें और परीक्षा में विविधता लाने पर ज़ोर दें।</span><br /><br />इस विषय पर तो शायद पूरी किताब ही लिखी जा सकती है, मगर अभी बस इतना ही। हमारे देश में शिक्षण पद्धति में थोड़े बदलाव की ज़रूरत है। विषय को कंठस्थ कर वापस परीक्षा में उंडेल देना, कभी भी शिक्षा का ध्येय नहीं हो सकता। बच्चे को ज्ञान के साथ साथ उसे व्यवहार में ला पाने की काबिलियत दे पाना ही शिक्षा का ध्येय होना चाहिये।<br /></span>Manoshihttp://www.blogger.com/profile/13192804315253355418noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-11470354.post-34357853557733464772007-06-03T11:00:00.000-06:002008-04-08T09:38:08.486-06:00जुगनू<span style="font-size:130%;">कहते हैं, भगवान जब इंसान को बना रहा था, उसने कुछ परीक्षायें ली, या कह लें कि कुछ 'टेस्ट' किये उस पर। उसने खुशी, ग़म आदि को हर प्राणी पर आज़माया। जब उसने पत्थर को शोक दिया, तो वो टूट गया। पेड़ को शोक दिया तो वो गिर गया मगर इंसान को शोक दिया तो वो दो दिन रोया और तीसरे दिन सह गया। भगवान ने तब शोक का भाग इंसान के हिस्से डाल दिया।<br /><br />सच है, इंसान वो सब सह जाता है जो एक आम प्राणी न सह पाये। ज़िंदगी आगे चलने का नाम है। कब रुकी है वो? हम पिछले कल में बैठे भी तो नहीं रह सकते। आशायें टूट जाती हैं, मगर इंसान नये उम्मीद लिये चल पड़ता है, फिर किसी अनजाने मंज़िल की खोज में।<br /><br /><span style="font-weight: bold;">हरिवंश राय बच्चन</span> की इस कविता में गूढ़ अर्थ छिपा है, मेरी एक और प्रिय कविता--<br /><br /><span style="font-weight: bold;">जुगनू </span><br /><br />अँधेरी रात में दीपक जलाए कौन बैठा है?<br /><br /> उठी ऐसी घटा नभ में<br /> छिपे सब चांद औ' तारे,<br /> उठा तूफान वह नभ में<br /> गए बुझ दीप भी सारे,<br />मगर इस रात में भी लौ लगाए कौन बैठा है?<br />अँधेरी रात में दीपक जलाए कौन बैठा है?<br /><br /> गगन में गर्व से उठउठ,<br /> गगन में गर्व से घिरघिर,<br /> गरज कहती घटाएँ हैं,<br /> नहीं होगा उजाला फिर,<br />मगर चिर ज्योति में निष्ठा जमाए कौन बैठा है?<br />अँधेरी रात में दीपक जलाए कौन बैठा है?<br /><br /> तिमिर के राज का ऐसा<br /> कठिन आतंक छाया है,<br /> उठा जो शीश सकते थे<br /> उन्होनें सिर झुकाया है,<br />मगर विद्रोह की ज्वाला जलाए कौन बैठा है?<br />अँधेरी रात में दीपक जलाए कौन बैठा है?<br /><br /> प्रलय का सब समां बांधे<br /> प्रलय की रात है छाई,<br /> विनाशक शक्तियों की इस<br /> तिमिर के बीच बन आई,<br />मगर निर्माण में आशा दृढ़ाए कौन बैठा है?<br />अँधेरी रात में दीपक जलाए कौन बैठा है?<br /><br /> प्रभंजन, मेघ दामिनी ने<br /> न क्या तोड़ा, न क्या फोड़ा,<br /> धरा के और नभ के बीच<br /> कुछ साबित नहीं छोड़ा,<br />मगर विश्वास को अपने बचाए कौन बैठा है?<br />अँधेरी रात में दीपक जलाए कौन बैठा है?<br /><br /> प्रलय की रात में सोचे<br /> प्रणय की बात क्या कोई,<br /> मगर पड़ प्रेम बंधन में<br /> समझ किसने नहीं खोई,<br />किसी के पथ में पलकें बिछाए कौन बैठा है?<br />अँधेरी रात में दीपक जलाए कौन बैठा है?<br /></span>Manoshihttp://www.blogger.com/profile/13192804315253355418noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-11470354.post-23307122567417892072007-03-18T20:56:00.000-06:002007-03-18T21:12:07.006-06:00मीरा नायर की फ़िल्म 'द नेमसेक'<a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://bp3.blogger.com/_m2DPuxNubh0/Rf39RarLzjI/AAAAAAAAABA/PJPTy_Ck7hM/s1600-h/The+Namesake.jpg"><img style="margin: 0pt 10px 10px 0pt; float: left; cursor: pointer;" src="http://bp3.blogger.com/_m2DPuxNubh0/Rf39RarLzjI/AAAAAAAAABA/PJPTy_Ck7hM/s320/The+Namesake.jpg" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5043465633384877618" border="0" /></a><br /><span style="font-size:130%;">इस सप्ताहांत में '<a href="http://www.foxsearchlight.com/thenamesake/">द नेमसेक'</a> देखी। तबू और इरफ़ान ख़ान का मंजा हुआ अभिनय और कहानी को बिल्कुल उपन्यास से लेकर ज्यों का त्यों दर्शकों को परोस देना ही शायद इस फ़िल्म की सबसे बड़ी ख़ासियत है। प्रवासी भारतीयों के जीवन पर आधारित ये कहानी, वास्तविकता के बहुत क़रीब है और हर प्रवासी भारतीय कहीं </span><span style="font-size:130%;">इस सिनेमा मे</span><span style="font-size:130%;"> अपनी छवि देख सकता है।<br /><br />अशीमा (तबू) का विवाह होता है अमेरिका मे बसे युवा प्रोफ़ेसर अशोक (इरफ़ान) के साथ। अशीमा के लिये अपने लोगों को छोड़, विदेश में पति के साथ अकेले इतनी दूर अमेरिका आ कर ज़िन्दगी शुरु करना आसान नहीं। मगर धीरे धीरे अमेरिका की ज़िंदगी में खुद को ढाल लेती है अशीमा। बेटे के जन्म के बाद अशोक अस्पताल में अपने बेटे का नाम दर्ज कराते हैं महान रूसी लेखक निकोलाई गोगोल के नाम पर, गोगोल। बेटा गोगोल (काल पेन) और बेटी सोनिया के जन्म के साथ ही और भी रंग जुड़ने लगते हैं अशीमा और अशोक की ज़िंदगी में। बच्चे अमेरीकी परिवेश में बड़े होने लगते हैं और यहीं के तौर-तरीक़े अपनाने लगते हैं। बड़े होते गोगोल को अपना नाम पसंद नहीं। सभी दोस्त उसे उसके नाम का अर्थ पूछते हैं और कुछ अजीब से इस नाम का मज़ाक भी उड़ाते हैं। दुनिया में हज़ारों अन्य सुंदर भारतीय नामों के होते हुये अशोक ने आख़िर अपने बेटे का नाम गोगोल क्यों रखा? क्या गोगोल अपना नाम बदल लेगा? अशीमा की ज़िंदगी में आगे क्या होगा?<br /><br />अशोक, अशीमा, और गोगोल के इर्द-गिर्द घूमती इस कहानी की लेखिका हैं पुलित्ज़र पुरस्कार की विजेता सुश्री झुमपा लाहिड़ी और इस सिनेमा का निर्देशन किया है मानसून वेडिंग व सलाम बांबे की निर्देशिका मीरा नायर ने। एक बहुत अच्छी फ़िल्म जिसको कलाकारों के सशक्त अभिनय ने चार चाँद लगा दिये हैं, यक़ीनन आपका भी मन छू लेगी।</span>Manoshihttp://www.blogger.com/profile/13192804315253355418noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-11470354.post-9089011618044939112007-03-13T22:13:00.000-06:002008-04-08T09:38:08.486-06:00मेरा प्यार<span style="font-size:130%;">टेक कर घुटने, झुका सिर, प्रेम का जो दान माँगे,<br />हो किसी का प्यार लेकिन , प्यार वो मेरा नहीं है।<br /><br />रख नहीं पाया मान निज जो, प्यार वो कैसे करेगा?<br />हीनता से ग्रस्त है जो, दीनता ही दे सकेगा।<br />द्वार पर तेरे खड़ा हूँ, स्नेह का लेकर निमंत्रण,<br />एक चुटकी भीख को यह दीन का फेरा नहीं है।<br />हो किसी का प्यार लेकिन, प्यार वो मेरा नहीं है।<br /><br />है विदित, होती रही है प्यार की उद्दाम धारा,<br />बँध सके जो बंधनों से और ना निज कूल से।<br />राह में अवरोध कोई सर उठाये,<br />यह बहा दे, तोड़ दे, ढाये उखाड़े मूल से।<br />है अगर यह प्यार तो आश्वस्त हूँ मैं<br />इस प्रभंजन ने प्रबल, यह मन मेरा घेरा नहीं है|<br />हो किसी का प्यार लेकिन प्यार वो मेरा नहीं है।<br /><br />प्यार है ले बहे जो, मन्द मन्धर गति निरंतर,<br />जी उठे स्पर्श पाकर हाँफ़ती मरुभूमि बंजर।<br />मान रखता, मान देता, मधुर मंगल रूप कोमल,<br />प्यार का जो स्वप्न मेरा क्या वही तेरा नहीं है?<br />टेक कर घुटने, झुका सिर, प्रेम का जो दान माँगे,<br />हो किसी का प्यार लेकिन , प्यार वो मेरा नहीं है।<br /><br />--अचला दीप्ति कुमार<br /><br />(मैं अचला जी के अनुमति के साथ उनकी इस कविता को यहाँ प्रकाशित कर रही हूँ। ये मेरी प्रिय कविताओं में से एक है। )</span>Manoshihttp://www.blogger.com/profile/13192804315253355418noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-11470354.post-26247783399890655382007-03-07T22:43:00.000-05:002008-04-08T09:43:43.896-06:00क्या आपका बच्चा भी हाईपर है?<span style="font-size:130%;">" बेटे 'कारीडर' में भागना मना है स्कूल में। वापस जाओ और चल कर आओ।" टीचर की बात सुन बच्चे ने अपनी गति पर रोक लगाई और बड़े अनमने तरीक़े से वापस नलके तक चल कर गया और वापस आया...चल कर।<br /><br />मैंने कभी भी किसी बच्चे को अपनी मर्ज़ी से चलते हुये नहीं देखा है। किसी गली में अगर बच्चा अकेला कहीं जा रहा होगा तो दौड़ कर। कभी किसी भी जगह ज़रा सा ध्यान दीजिये, बच्चों की प्रवृत्ति होती है भागने की। सिर्फ़ यही नहीं, कहीं रास्ते में कोई टापूनुमा उबड़खाबड़ स्थान हो तो, बच्चा उसी पर से चढ़ कर जायेगा।<br /><br />बच्चों का मनोविज्ञान बहुत अचंभित करता है मुझे। एक बच्चा है मेरे स्कूल में। सभी टीचरों की नाक में दम कर रखा है। सातवीं में पढ़ता है। उसकी क्लास-टीचर भारतीय है और बहुत ही कड़ा अनुशासन है उनका। उस दिन मैं उनके क्लास में थी। अचानक बच्चा पूरी तरह झूल गया अपने चेयर पर इस तरह कि सर और पैर ज़मीं पर और पेट चेयर के ऊपर। अजीब स्थिति। टीचर ने कहा" बच्चे, ठीक से बैठो।" बच्चे ने बात मानी, और एक स्लाइड की तरह झूल गया इस बार। मेरी हँसी रुक नहीं रही थी। पर मैं तो हँस नहीं सकती। टीचर ने कहा," ऐसा करते हैं तुम ज़रा देर कक्षा के बाहर जो चेयर है वहाँ ठीक तरीक़े से बैठने की प्रैक्टिस कर के आओ।" बच्चा कक्षा से बाहर चला गया, कुछ इस भाव से कि उसने तो कुछ किया ही नहीं।<br /><br /><span style="font-weight: bold;">क्या आप जानते हैं कि एक बच्चे का ऐटेन्शन स्पैन यानि 'एकाग्रता अवधि' क्या है?- </span><span style="font-style: italic; font-weight: bold;">आठ मिनट।</span><span style="font-weight: bold;"> और हम बडों का </span><span style="font-style: italic; font-weight: bold;">१८ मिनट</span><span style="font-weight: bold;">। </span>इसलिये एकाग्र रूप से अगर बिना किसी हलचल के हमें कोई भाषण सुनना पड़े तो अट्ठारह मिनट से ज़्यादा हमारे लिये सज़ा ही होगी।<br /><br />उस दिन मेरी कक्षा में एक बच्चा बार बार उठ रहा था, बात कर रहा था। उसे वैसे भी ध्यान देने और एकाग्र बने रहने में दिक्कत होती है। उसे मैंने एक चिट्ठी दी और कहा,"बेटे क्या ये चिट्ठी कक्षा सातवीं के मिस. डेविड (टीचर) के पास ले जाओगे? वो तुम्हें एक और चिट्ठी देंगी, उसे ले आना।" उस चिट्ठी में मैंने लिखा था, "कृपया इसे हस्ताक्षर कर बच्चे को वापस कर दें।" वो टीचर भी जानती है कि ये एक तरीक़ा है बच्चे को 'ब्रेक' देने का।<br /><br />हमारे समय में तो हमें पढ़ाई में मन न लगे या ज़्यादा उछलकूद करने पर मार पड़ती थी। अब बच्चे के मनोविज्ञान और उसके अहं को ध्यान में रख कर सब काम करने पड़ते हैं जो शायद कारगर भी होते हैं ( वैसे मार भी बड़ा कारगर अस्त्र हुआ करता था)।<br /><br /><u><span>तो आइये, हम भी परंपरागत तरीक़े छोड़ कुछ आधुनिक और परखे हुये तरीक़े अपनायें।</span></u><br /><br />अगर आपके बच्चा भी बहुत ही 'हाईपर' है या एकाग्र नहीं रह पाता तो शायद ये कुछ उपाय जो आपकी सहायता कर सकें-<br /><br />१) <span style="font-style: italic; font-weight: bold;">उसे किसी दूसरे काम पर जाने दीजिये।</span> जैसे, "बेटे ज़रा पानी पी कर आओ।" या "ज़रा देख कर आओ समय क्या हो रहा है? आते वक्त मेरे लिये पानी लेकर आना।"<br /><br />२) ये दूसरा उपाय बहुत ही कारगर है। एक <span style="font-style: italic; font-weight: bold;">स्क्विशी बाल</span> (यानि एक ऐसा नरम गेंद जो हाथ से दबाया जा सके) बच्चे के हाथ में दे दें। बच्चा शांत हो जायेगा और थोड़ी देर बाद वो गेंद उस से ले लें और वो काम पर लग जायेगा।<br /><br />३) बच्चे का कोई <span style="font-weight: bold; font-style: italic;">मनपसंद काम</span> उसे दे दें जैसे पेन्सिल की नोक बनाना , या थोड़ी देर उसे उसका मनपसांद चित्र बनाने देना।<br /><br />४) एक घड़ी पर हर ५ मिनट पर <span style="font-weight: bold; font-style: italic;">अलार्म लगा दें</span> । और हर पाँच मिनट में वो अपना काम कर ले तो उसे एक ब्रेक दें जो ३-४ मिनट से ज़्यादा न हो। उससे बात करें कि उसके स्कूल मॆं उसने क्या किया? उसके दोस्तों के बारे में आदि।<br /><br />अगर ये सारे उपाय काम न आयें तो...? मुझे बतायें कौन सा तरीक़ा आपने अपनाया जो काम आया...<br /><br /></span>Manoshihttp://www.blogger.com/profile/13192804315253355418noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-11470354.post-32896444177221902512007-02-22T22:39:00.000-05:002008-04-08T09:46:02.488-06:00चिट्ठाजगत और अनजाने दोस्त<span style="font-size:130%;">मेरे खयाल से २ साल हो